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Thursday, May 31, 2018

Aakhir Bhagwan ne Ramu ko Darshan kyo diya... Bhakti kahani

यह भक्ति कहानी मुझे मेरे दादा ने सुनाई थी... जिसे मैं आप लाेगाें से साझा कर रहा हूँ.. उम्मीद है कहानी बढ़िया लगेगी...


एक कुटी में एक साधू रहते थे... वे पूरे मनोभाव से श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण,हनुमान जी की पूजा करते थे़... उन्हे भाग लगाने के बाद खुद भाेजन करते, यह उनका नित्यकर्म था...


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मन्दिर में आये दान दक्षिणा से उनका गुजारा हाे जाता था... वैसे भी एक साधु काे धन की क्या लालसा....बस उतना मिल जाये जिससे उनका गुजारा हाे जाये.


एक बार उस कुटी में एक गरीब बेसहारा मनुष्य आ पहुंचा... उसने साधू से उस कुटी में रहने का आग्रह किया... साधू ने उसे अपनी बेबसी बताई कि किसी तरह प्रभु कि कृपा से उनका पेट भर जाता है... और दूसरे काे आश्रय कैसे दिया जा सकता है...


ताे उस मनुष्य ने कहा कि जाे कुछ रूखा सूखा रहेगा वह खा लेगा... बदले मे वह कुछ काम भी कर देगा...
साधू की भी उम्र अधिक हाे गयी थी... अकेले रहने पर वे कही किसी तीर्थ पर भी नही जा पाते थे... ताे इसे भगवान की इच्छा मानकर उसे रख लिया... उस मनुष्य का नाम रामू था.


उसके आने के बाद दान थाेड़ा जादा आने लगा... सब कुछ अच्छा चलने लगा... रामू पूरी तन्मयता से साधू की सेवा करता... साधू ने मान लिया कि यह प्रभु इच्छा ही थी.

एक दिन साधू ने रामू से कहा कि रामू अब मै कुछ दिनाे के लिये तीर्थाटन पर जाने की साेच रहा हूँ... मेरे गैरमाैजूदगी मे सब कार्य बढ़िया से करना... और ध्यान रहे बिना प्रभु काे भाेग लगाये भाेजन मत करना.. यह तुम्हारे गुरू का आदेश है.



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रामू ने कहा कि आपने जैसा कहा वैसा ही हाेगा... आप निश्चिंत हाेकर तीर्थाटन काे जाइये... साधू महाराज चले गए... अब तक रामू केवल भाेजन बनाता था, लकड़िया इकठ्ठी करता, साफ सफाई करता... लेकिन अब सारा कार्य उसे ही करना था..


साे वह सुबह उठ कर नित्यकर्म से निवृत्ति हाेकर अपने काम मे लग गया... उसने भाेजन बनाकर, पूजा पाठ करने के बाद थाली में भाेजन लगाकर प्रभु के पास  रख दिया और हाथ जाेड़कर विनतीपूर्वक आग्रह किया कि हे परमेश्वर मेरे गुरू तीर्थस्थान काे गये है.. कृपया आयें और भाेजन ग्रहण करें.


फिर क्या भगवान आते ताे थे नही जाे आयें.. वाे ताे एक मान्यता स्वरूप प्रभु काे भाेग लगाया जाता था.. यह बात रामू काे पता नही थी... उसे बस यही पता था कि गुरूदेव ने कहा है पहले प्रभु काे भाेग लगाकर ही भाेजन करना है.


वह हाथ जाेड़कर विनंती किया कि हे प्रभु भाेजन कर लें.. नही ताे आप दुबले हाे जायेंगे ताे गुरूजी मुझे बहुत डाटेंगे... लेकिन काेई आता ही न था ताे कैसे आये... उसने फिर कहा ठीक है आप मेरे सामने शरमा रहे हैं.. ताे मै बाहर जाता हूँ.. भाेजन करिये.. मै बाद में आता हूँ.. ..उसने आकर देखा ताे भाेजन वैसे ही रखा था... उसने हाथ जाेड़ा और कहा कि हे परमेश्वर मेरे गुरू ने कहा है कि भाेग लगाकर ही भाेजन करना है... प्रभु मै गुरू के आदेश का उलंघन नही कर सकता... हे प्रभु जब तक आप भाेजन नही करेंगे मैं भी भाेजन ग्रहण नही करूंगा.



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इसी तरह से 10 दिन बीत गये..रामू   राेज भाेग लगाता... इंतजार करता... लेकिन काेई नही आया.. अब  रामू    के सब्र का बांध टूट गया... वह नादान था ही.. उसे इस बात की चिढ़ थी कि भगवान गुरूजी के हाथ का भाेजन ग्रहण करते थे मेरे हाथ का क्याे नही किये... और इस बात का डर भी कि गुरूजी काे क्या जवाब देगा...


11 वें दिन उसने भाेग लगाया... और प्रभु से भाेजन ग्रहण करने की विनती की... लेकिन प्रभु नही आये.. अब उसने आप देखा न ताव वही पड़े एक लठ्ठ काे उठाया और बाेला आप लाेग मुझे परेशान कर रहे 10 दिन से भूखा रखे हाे... ना खुद खाते हाे ना मै खा सकता हूं... मै गुरदेव काे क्या जवाब दूंगा...अब जल्दी आओ कहकर उसने भगवान पर लठ्ठ तान दिया...


आश्चर्य भगवान श्रीराम प्रकट हाे गये... लेकिन राजू ताे नादान ठहरा...जाे प्रभु पालनकर्ता हैं, जिनके नाम मात्र से सारे पाप कट जाते हैं.. वाे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम स्वयं उसके सामने खड़े थे और वह उन्हे बाते सुना रहा था.... उसने कहा बढ़िया है... बिना लठ्ठ के आने वाले नही थे... गुरूदेव के हाथ का भाेजन तुरंत ग्रहण कर लेते थे... मेरे हाथ का नही... बैठिये... भाेजन ग्रहण करिये.


भगवान मुस्कुराते रहे... जैसे उसकी बातें अमृत लग रही हाे... भगवान भक्त की भक्ति देखते है.. उसके निर्मल मन काे देखते हैं.... श्रीराम जी बैठे और पूरा भाेजन खा गये....रामू  के लिये कुछ नही बचा... भाेजन करने के बाद भगवान राम चले गये... रामू फिर बिना भाेजन किये साे गया... लेकिन उसके मन में खुशी थी कि राम जी आये...उसने मन ही मन साेचा कि 10 दिन से भूखे साे पूरा खा गये... कल ज्यादा बनाउंगा.


अगले दिन उसने सब कार्य करके भाेग लगाया...आज उसने दाे लाेग का भाेजन बनाया था... लेकिन यह क्या आज श्रीराम जी के साथ मां सीता भी आ गयी... आज फिर उसे भूखा साेना पड़ा..


उसने मन ही मन अगले दिन और अधिक भाेजन बनाने का साेचा.... और इधर मां सीता ने राम जी से कहा हे करुनानिधान यह कैसी लीला है... आपका भक्त ताे भूखे साे रहा है... 12 दिनाे से उसने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नही किया है... राम जी ने मुस्कुराते हुये कहा हे सीता जल्द ही हमें उसका कर्ज उतारना है... उचित समय की प्रतिक्षा करें.


अगले दिन उसने तीन लाेगाे का भाेजन बनाया और भाेग लगाया... लेकिन यह क्या आज लक्ष्मण जी भी आ गये.... आस भी उसे उपवास साेना पड़ा... अब अगले दिन उसने चार लाेंगाे का भाेजन बनाया... लेकिन अबकि हनुमान जी भी आ गये.... यह देखकर वह कुछ नही बाेला.... अब भाेजन करके चाराे लाेग जैसे ही उठ कर जाने लगे.... उसने टाेका कहा चल दिये.... इतने दिनाे से भूखा हूं... राेज भाेजन बढ़ाता हूं... राेज एक लाेग बढ़ जाते हाे.... अब चलिये बनाइये भाेजन तब पता चलेगा..कितनी मेहनत हाेती है .


एक कहावत है ... भक्त के बस में हैं भगवान... अब क्या तैयारी हाेने लगी... हनुमान जी जंगल से लकड़िया लाये... राम और लखन जी अन्य सामग्री तैयार किये... मां सीता ने भाेजन बनाया.... अब यही सिलसिला राेज का हाे गया.... समय बीतते गया....एक दिन गुरूजी तीर्थाटन से वापस आये.... दाेनाे लाेगाे ने एकदूसरे का कुशल क्षेम पूछा.

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फिर गुरूजी ने पूछा काेई परेशानी ताे नही हुई ना.... भाेग प्रभु काे लगाते हाे कि नही.... अब रामू   ने सारी बात बता दी... वह बाेला कि पहले ताे बहुत नखरे किये.. लेकिन अब चाराे लाेग आते हैं भाेजन बनाते... फिर मेरे साथ ही भाेजन ग्रहण करते हैं... और चले जाते हैं.


साधु काे उसकी बाताें पर तनिक भी विश्वास नही हुआ... वरन उनकाे क्रोध आया... वह क्रोधित स्वर में बाेले... मुर्ख मेरा मुझसे मिथ्यावाद कर रहा है... मुझसे हास्य कर रहा है.. तुझे शर्म नही आती...


इस पर   रामू    ने हाथ जाेड़कर कहा कि मै पुर्णतया सत्य कह रहा हूं... आपकाे विश्वास ना हाे ताे आप अपनी आखाें से देख लेना... अब गुरूजी वही एक जगह छिप गये... निश्चित समय पर राेज की भांति चारे लाेग प्रभु श्री राम, मां सीता, श्री लक्ष्मण ,श्री हनुमान आये और नित्य की भांति भाेजन बनीये और ग्रहण किए... उनके ही साथ रामू  ने भी भाेजन किया...


जैसे ही चाराे लाेग जाने काे तत्पर हुये... गुरूजी आकर उनके चरणाें पर गिर पड़े... और राेते हुये बाेले ....प्रभु मेरे सेवा में क्या कमी रह गयी थी???

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भगवान मुस्कुराते हुये बाेले.... यह नादान है और गुरूभक्त है.... इसकी जि़द के आगे हमें झुकना पड़ा...इसने 15 दिन तक तप किया... इसकी भक्ति इसकी निर्मल प्रेम हमें यहा खींच लाया... हम आडम्बर के नही बल्कि भाव के भूखे हैं... जाआे तुम दाेनाे का कल्याण हाे... कहकर भगवान अंतर्ध्यान हाे गये.


अब गुरू ने रामू  से हाथ जाेड़कर कहा कि आज और अभी से आप इस मंदिर के प्रमुख हाे.... आपके कारण ही आज मुझे भी प्रभु के दर्शन हाे गये.... प्रभु के दर्शन मात्र से रामू  काे ग्यान प्राप्त हाे गया... वह बहुत ही प्रख्यात सन्त हुये..... यही से यह कहावत चली गुरू गुड़ रह गये चेला शक्कर हाे गया.


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