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Monday, June 11, 2018

Mahan Dhanurdhar Ekalavya ki kahani... Bhakti story


आज मै आप लोगो को महान धनुर्धर एकलव्य के बारे मे बताने जा रहा हुन.यह एक Bhakti story है. जिसमें एकलव्य के त्याग, बलिदान और एकलव्य की मृत्यु के बारे में बताया जायेगा.



महाभारत के सभी किरदारों में भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन को मुख्य किरदार माना जाता है. महाभारत की सारी लीला तो प्रभु श्रीकृष्ण की ही थी और अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहा जाता है,लेकिन क्या आप जानते हैं अर्जुन से भी बड़ा एक धनुर्धर था जिसका नाम था एकलव्य .एकलव्य एक भील पुत्र था.जब पांडवों और कौरवों को गुरु द्रोणाचार्य अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दे रहे थे तो एकलव्य ने भी द्रोणाचार्य से विद्या ग्रहण करने का आग्रह किया,लेकिन द्रोणाचार्य ने उसके भील पुत्र होने के कारण शिक्षा देने से इंकार कर दिया.तब शिक्षा आज की तरह नहीं हुआ करती थी. शिक्षा ग्रहण करने के लिए शिष्य गुरुकुल मे रहा करते थे और शिक्षा भी कुल के हिसाब से दी जाती थी. 

कौन था एकलव्य-- 

महाभारत काल मे प्रयाग (जो की इस समय भारत के उत्तर प्रदेश मे है ) के तटवर्ती प्रदेश मे फैला हुआ राज्य शृंगवेरपुर था. वहाँ की राजा हरिण्यधनु थे.वह एक महान पराक्रमी राजा थे. निषाद राज हरिण्यधनु की पत्नी का नाम सुलेखा था.रानी सुलेखा ने एक पुत्र को जन्म दिया ,जिसका नाम अभिद्युम्न रखा गया.बचपन से ही शस्त्र विद्या में उसकी लगन को देखते हुए उसका नाम एकलव्य रखा गया.एकलव्य का विवाह निषादराज के मित्र की कन्या सुनीता से हुआ था.

एकलव्य को अपनी धनुर्विद्या से संतुष्टि नही थी .उसने द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखने की सोची .जब उसने यह बात निषादराज को बताई तो उन्होने उसे वहां जाने से मना किया,क्योंकि वे जानते थे कि द्रोणाचार्य उसे शिक्षा नहीं देंगे.जब वह द्रोणाचार्य के आश्रम मे गया तो द्रोणाचार्य ने उसे अपमाअनित कर भगा दिया,लेकिन वे इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए बल्कि उन्होने विद्या ग्रहण करने का दृढ़ संकल्प ले लिया और वही जंगल मे द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर और उनका ध्यान करते हुये विद्या सीखने लगे.द्राेणाचार्य जाे भी अपने शिष्याें काे सिखाते वह एकलव्य छिप कर देखते फिर उसका गहन अभ्यास करते.


एक बार जब द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ आखेट के लिए जंगल मे गये तो उनके साथ एक कुत्ता भी गया था जाे कि आश्रम में ही रहता था. अचान से वह कुत्ता उस स्थान पर जाकर भौकने लगा जहां एकलव्य अभ्यास कर रहे थे.कुत्ते की भौकने की आवाज द्रोणाचार्य को भी सुनाई दे रही थी.वह उस तरफ बढ़ ही रहे थे कि अचानक से आवाज आनी बंद हो गयी.वे तेजी से वहा पहुंचे तो देखा कि किसी ने कुत्ते को कोई हानि पहुँचाए उसका मुँह बाणाें से भर दिया है.यह देख कर द्रोणाचार्य अाश्चर्य में पड़ गये क्योंकि ऐसी विद्या केवल अर्जुन ही जानते थे और उन्होने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी का आशीर्वाद दिया था.

द्रोणाचार्य ने विस्मि होकर एकलव्य से पूछा ..तुमने ऐसा कैसे किया. 

तब एकलव्य ने सारी बात बता दी,उसने कहा मैने आपकी एक मूर्ति बनाई और आपका ध्यान करके कड़ा अभ्यास किया,लेकिन द्रोणाचार्य ने अर्जुन को सबसे बड़ा धनुर्धारी घोषित कर दियाथा सो उन्होंनेकलव्य से कहा कि तुमने मेरी मूर्ति के सामने मेरा ध्यान कर के यह विद्या ,ज्ञान अर्जित किया है, तो तुम्हें गुरु दक्षिणा भी देनी पड़ेगी. 

इस पर एकलव्य सहर्ष तैयार हो गया.तब द्रोणाचार्य ने उससे उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया.जिस पर एकलव्य मुस्कुराए और बोले गुरुदेव मेरे लिए यह किसी सौभाग्य से कम नहीं है कि आपने मुझे अपना शिष्य माना.अगर आप मेरी मृत्यु भी मुझसे मांगते तो भी मैं खुशी से दे देता और उसने यह कहते हुए पना अंगूठा दे दिया और गर्व से कहा कि वह द्रोणाचार्य शिष्य एकलव्य है.


 श्री कृष्ण ने एकलव्य का वध क्यो किया??
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विष्णुपुराण के हरिवंशपुराण के अनुसार निषादराज बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की तरफ से मथुरा पर आक्रमण किया और श्रीकृष्ण की सेना मे हाहाकार मचा दिया. मात्र चार उंगलियों से भीषण प्रहार करते देख भगवान कृष्ण को भी विश्वाश नहीं हुआ.उसी महायुद्ध में भगवान कृष्ण के हाथों एकलव्य मारा गया.दाेस्ताें यह Hindi kahani कैसी लगी.

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