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गरुड़

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गरुण भगवान् श्री नारायण के वाहन हैं. गरुण सर्प के विष को और सर्पों को पल भर में समाप्त कर देते हैं. जब भी नागास्त्र का आह्वान होता है तो उसके काट की रूप में गरुण अस्त्र का ही प्रयोग होता है. रामायण में जब मेघनाद अपने अस्त्र से श्रीराम और लक्ष्मण को मूर्छित कर देता है, तब गरुण ही विष और सर्पों को हटाकर श्रीराम और लक्ष्मण की जान बचाते हैं. सागर मंथन के दौरान अपने पीठ पर अमृत रखकर गरुण ही उसे राक्षसों से बचाते हैं.

हिन्दू धर्म में बहुत से धर्मग्रन्थ हैं उन्ही में से एक है गरुण पुराण , जिसका पाठ मृत्यु के पश्चात किया जाता है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ऐसा कहा जाता है गरुण पुराण के द्वारा ही आत्मा को इस संसार से मुक्ति मिलती है और वह निर्धारित स्थान की ओर प्रस्थान करती है. गरुण पुराण से तो हम ज्यादातर लोग अवगत हैं लेकिन बहुत से लोग यह नहीं जानते कि आखिर कैसे हुआ था उस गरुण का जन्म?
गरुण के जन्म की यह कहानी कश्यप ऋषि जिन्हें देवों, असुरों, naagon और पक्षियों का पिता माना जाता है, की दो पत्नियों विनता और कद्रु के साथ शुरू होती है.

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एक बार ऋषि कश्यप ने अपनी पत्नी कद्रु से कहा कि वह संतानोत्पत्ति के लिए एक यज्ञ प्रारंभ करने जा रहे हैं ताकि उन्हें और अधिक पुत्रों की प्राप्ति हो सके. कश्यप ऋषि ने सबसे पहले कद्रु से पूछा कि उन्हें और कितने पुत्र चाहिए? मन ही मन कद्रु बहुत प्रसन्न हुईं क्योंकि विनता से पहले उनके पति ने उनकी इच्छा पूछी थी.इस सवाल के जवाब में कद्रु ने कहा कि उन्हें बहुत सारे पुत्र चाहिए ताकि वह उनकी आज्ञा का पालन करने के साथ-साथ उनकी हर इच्छा भी पूरी कर सकें. इतना ही नहीं वह विनता से अधिक ताकतवर कहलवाना चाहती थी इसलिए उन्होंने और अधिक पुत्रों की कामना की.

जब यही सवाल ऋषि कश्यप ने अपनी दूसरी पत्नी विनता से किया तब विनता ने जवाब दिया कि वह मात्र 2 पुत्रों की कामना करती है, जो कद्रु के सभी पुत्रों की अपेक्षा ज्यादा ताकतवर हों. कश्यप ऋषि ने उन दोनों की इच्छा को स्वीकार कर लिया.कश्यप ऋषि ने यज्ञ प्रारंभ करने के लिए प्रस्थान किया। यज्ञ के लिए उन्हें एक विशिष्ट पेड़ की लकड़ी चाहिए थी इसलिए उन्होंने अपने और अदिति के पुत्र इन्द्र देव का आह्वान किया. पिता के बुलाने पर इन्द्र देव प्रकट हुए और उनसे बुलाने का कारण पूछा.कश्यप ऋषि ने अपने पुत्र इन्द्र देव से कहा कि वह एक यज्ञ शुरू करने जा रहे हैं जिसके लिए उन्हें बहुत सी लकड़ी चाहिए. कश्यप ऋषि ने चार बौने ऋषियों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ‘इनके साथ जाओ और पेड़ों की लकड़ियां काटकर ले आओ’. बौने ऋषियों को देखकर इन्द्र देव को हंसी आने लगी लेकिन अपने पिता के क्रोध को जानते हुए उन्होंने ऐसा नहीं किया.

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इन्द्र देव बहुत ताकतवर थे.वह फटाफट पेड़ों की लकड़ियां काटने लगे लेकिन इन बौने ऋषियों को समय लग रहा था. इन्द्र ने खुद को बहुत नियंत्रित किया लेकिन वह अपनी हंसी रोक नहीं सके और ऋषियों की मदद करने के स्थान पर वह जोर-जोर से उन पर हंसने लगे. वे ऋषि बहुत क्रोधित हुए और सोचने लगे कि इस इंद्र को देवता कहलाने का कोई अधिकार नहीं है इसलिए केवल ईश्वर ही इस बात का निर्णय कर सकते हैं कि ये देव रहेगा या नहीं.किसी तरह सभी लकड़ियां एकत्रित हुईं और तैयारियां पूरी होने के बाद कश्यप ऋषि ने यज्ञ प्रारंभ किया. यज्ञ पूर्ण होने के बाद कद्रु को हजार अंडज मिले जिनसे उन्हें हजार पुत्र उत्पन्न होने थे. कद्रु ने सभी अंडों को गर्म पानी में रख दिया और उनकी देखरेख करने लगी.

इसके बाद उन बौने ऋषियों ने विनता के दो पुत्रों की उत्पत्ति के लिए यज्ञ प्रारंभ किया. इस यज्ञ के द्वारा उन्होंने एक ऐसे पुत्र का आह्वान किया जो इन्द्र देव से कहीं ज्यादा ताकतवर होता और साथ ही उसके भीतर अपने स्वरूप को बदलने के साथ-साथ भारी से भारी सामान उठाने की भी ताकत होती.इन्द्र को यह भनक लगी कि इस यज्ञ के द्वारा एक नए और ताकतवर इन्द्र का जन्म होने वाला है तब उन्हें अपनी गलती पर पछतावा हुआ. इन्द्र को समझ आ गया कि नया इन्द्र उन्हें हराने और देवराज बनने की काबीलियत रखता है. इसी चिंता के समाधान के लिए वह अपने पिता ऋषि कश्यप के पास गए.
इन्द्र ने अपने पिता से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह किया, जिस पर कश्यप ऋषि आश्चर्यचकित हो उठे. कश्यप ऋषि ने अपने पुत्र इन्द्र देव से पूछा कि क्या उनसे कोई गलती हुई है जिसकी वजह से वो ऐसा करने के लिए कह रहे हैं. जब इन्द्र ने पूरी घटना सुनाई तब ऋषि कश्यप बहुत क्रोधित हुए. अपने पुत्र के सम्मान को बचाए रखने के लिए कश्यप ऋषि बौने ऋषियों के पास गए और उनसे कहा कि “उनके पुत्र से एक भूल हो गई है जिसके लिए वे माफी के हकदार है, आप जिस ताकतवर इन्द्र का आह्वान कर रहे हैं उसे देवताओं का नहीं बल्कि पक्षियों के इन्द्र के रूप में बुलाएं”.

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ऋषि कश्यप के आग्रह को मानकर बौने ऋषियों ने पक्षियों के ताकतवर इन्द्र का आह्वान कर यज्ञ से उत्पन्न हुए दो अंडे कश्यप ऋषि को सौंप दिए. अपनी पत्नी विनता को अंडे सौंपते हुए कश्यप ऋषि ने कहा कि “इनका बहुत ध्यान रखना और कुछ भी हो जाए अपना धीरज मत खोना”.इतना कहकर ऋषि कश्यप हिमालय पर तप करने के लिए प्रस्थान कर गए. समय बीतता गया और कद्रु के हजार अंडों में से हजार सांप निकले, जो बहुत ताकतवर थे. कद्रु उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न होती और उनके साथ खेलती. लेकिन समय पूरा होने के बाद भी विनता के अंडों में से कुछ नहीं निकला.कद्रु, विनता को ताना मारने का एक भी मौका नहीं छोड़ती थी और विनता को कद्रु का खुशहाल जीवन देखकर ईर्ष्या होने लगी, इसी जलन में आकर उन्होंने अपना एक अंडा तोड़ दिया. यह देखने के लिए कि उसमें कुछ है भी या नहीं. अंडे के भीतर उसे अपना पुत्र दिखाई दिया जिसके शरीर का ऊपरी हिस्सा तो था लेकिन बाकी का हिस्सा मात्र मांस का लोथड़ा था.

विनता और कश्यप ऋषि के इस पुत्र का नाम अरुण था. अरुण ने अपनी मां से कहा कि “पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया. इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा. अगर दूसरे अंडे में से निकला उनका पुत्र उन्हें इस श्राप से मुक्त ना करवा सका तो वह आजीवन दासी बनकर रहेंगी”.इतना कहकर अरुण आसमान की ओर प्रस्थान कर सूर्य देव के रथ का सारथी बन गया. कहते हैं सूर्य के निकलने के समय जो बैंगनी रंग की रोशनी आती है वह अरुण की होती है.इस घटना के कुछ समय बाद कद्रु और विनता बाग में सैर के लिए निकलीं जहां उन्हें समुद्र मंथन में निकले इन्द्र देव के घोड़े उच्चैश्रवा के दर्शन हुए। घर वापस आकर दोनों में इस बात पर बहस होने लगी कि उस घोड़े का रंग क्या है? कद्रु ने कहा कि घोड़े की पूंछ काली थी तो विनता का कहना था कि घोड़ा दूधिया सफेद रंग का था। दोनों में शर्त लगी कि जो भी हारा उसे आजीवन दूसरे की दासी बनकर रहना होगा.

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कद्रु ने अपने पुत्रों से पूछा कि उच्चैश्रवा का रंग क्या है? इस सवाल के जवाब में उन सभी ने कहा कि वह दूधिया सफेद रंग का घोड़ा है. पुत्रों के जवाब पर कद्रु ने सारी घटना और शर्त की बात उन्हें बताकर यह कहा कि वे जाकर उस घोड़े की पूंछ को काला कर दें.अपनी मां की बात को गलत मानते हुए भी वे इसे करने के लिए राजी हुए और उच्चैश्रवा की पूंछ को काला कर दिया, कद्रु ने उन्हें श्राप दिया था कि अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो या तो उनकी मौत यज्ञ की आग में जलकर होगी या फिर वह अपने ही भाई द्वारा मारे जाएंगे.विनता को कद्रु की सेविका बनना पड़ा और कुछ दिनों बाद अंडे में से निकले गरुड़ , जिनका चेहरा, सिर और चोंच चील की तरह और शरीर इंसान का था, का जन्म हुआ. वह भी अपनी मां के साथ सेवक के तौर पर ही रहा. गरुड़ बहुत ताकतवर थे और अपनी इच्छानुसार अपना स्वरूप बदल सकते थे.लेकिन जब गरुड़ को अपनी सौतेली मां की चालाकी की बात पता चली तो उन्होंने अपने आधे सर्प भाइयों को मार डाला और उनमें से आधे की मृत्यु एक श्राप की वजह से तब हुई जब अपने पिता की मौत से आहत जनमजेय द्वारा सर्पों के विनाश से जुड़ा यज्ञ संचालित किया.

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