Bhakti Story

aalha udal

aalha udal
Written by Abhishek Pandey

aalha udal दो भाई थे. ये बुंदेलखंड के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे. कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खंड नामक एक काव्य की रचना की, जिसमे उन वीरों ने की वीरगाथा वर्णित है. इस ग्रन्थ में aalha udal के ५२ रोमांचकारी लड़ाईयों के बारे विस्तार से वर्णन हैं. आल्हाखंड में इस बात का प्रमाण है कि aalha udal का आखिरी युद्ध पृथ्वीराज चौहान के साथ हुआ था, जिसमे पृथ्वीराज की हार हुई और आल्हा के भाई ऊदल की मृत्यु हो गयी. ऊदल की मृत्यु के बाद आल्हा के अन्दर वैराग्य का भाव आ गया और गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया.

 

aalha udal ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी. इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था. माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था और इसी बरदार के कारण पृथ्वीराज के साथ युद्ध में आल्हा को विजय मिली. maihar mata mandir में तमाम ऐतिहासिक अवशेष aalha udal और पृथ्वीराज के युद्ध की गवाही देते हैं.

 

आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा ही करते हैं. मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है. यही नहीं, तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां aalha udal कुश्ती लड़ा करते थे.बुन्देली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान से लिया जाता है. वहाँ का लोकगीत आल्हा ऊदल के नाम पर है जिसे सावन के महीने में हर गली मोहल्ले में गाया  जाता है.

 

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