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Arjun Mahabharat in Hindi : पढ़ें महावीर धनुर्धारी अर्जुन की पूरी कहानी

arjun mahabharat
Written by Abhishek Pandey

Arjun Mahabharat अर्जुन की पूरी कहानी 

 

 

 

Arjun Mahabharat अर्जुन कुंती के पुत्र थे और इनके पिता का नाम पांडु था. भगवान् इंद्र के आशीर्वाद से उत्पन्न होने के कारण भगवन इंद्रा भी उनके पिता थे.

 

 

अर्जुन इंद्र के समान ही प्रतापी और पराक्रमी थे. पांडवों में सबसे अधिक युद्ध कुशल और वीर वही थे. महाभारत युद्ध में इस पक्ष का सबसे बड़ा महारथी  अर्जुन ही थे, जिसने कौरवों के परम वीरों से टक्कर ली और अंत में सबको पराजित कर दिया.

 

 

 

 

1-arjun mahabharat पिता – पांडू 

 

२- माता                                 – कुंती 

 

३-arjun mahabharat गुरु- द्रोणाचार्य 

 

४- Arjun Mahabharat   पत्नी   – सुभद्रा , द्रौपदी 

 

५- वंश-गोत्र                         – चंद्र वंश

 

 

 

इंद्र ने पिता होने के नाते समय-समय पर अर्जुन की सहायता की थी. गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन धनुर्वेद की शिक्षा दी थी.उस समय पाठशाला में कौरव-पांडव सभी मिलकर अस्त्र-शस्त्र विद्या सीखते थे. 

 

 

 

अर्जुन उन सबमें तीव्र बुद्धि वाले थे. गुरु के बताने पर तत्क्षण ही बात उसकी समझ में बैठ जाती थी और वह उसी समय उसका प्रयोग उनके अन्य साथियों को विस्मित कर देता था.

 

 

 

कौरवों के विद्वेष का एक कारण यह भी रहा. गुरु द्रोणाचार्य उसको अपने पुत्र अश्वत्थामा से भी अधिक चाहते थे. arjun अर्जुन भी सदा गुरु की भक्ति में सन्नद्ध रहते थे.

 

 

 

 

अश्वत्थामा और अर्जुन में काफी गहरी मित्रता थी. वे दोनों ही गुरु के प्यारे थे और सदा अपना अस्त्र-शस्त्र-कौशल बढ़ाने में लगे रहते थे. एक रात की बात है, गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन पास बैठे भोजन कर रहे थे, उसी समय सहसा दीपक बुझ गया.

 

 

 

अंधेरा हो गया और उसमें हाथ से हाथ दिखना असंभव हो गया. उस समय यह देखकर कि अर्जुन के हाथ का कौर सीधे मुंह में ही गया उन्होंने कहा, “वत्स अर्जुन ! अब मुझे विश्वास है कि तू शब्दवेधी बाण चलाना शीघ्र सीख जाएगा.”

 

 

 

उसी समय द्रोणाचार्य ने शब्दवेधी बाण चलाना  अर्जुन को सिखाया और वह कुछ ही क्षण में उसकी क्रिया सीख गए. उसी के द्वारा तो उसने अनेक स्थलों पर शत्रुओं के कुचक्रों को व्यर्थ कर दिया था.

 

 

 

एक बार गुरु द्रोणचार्य ने इसकी परीक्षा भी ली थी. जब वे अपने शिष्यों के साथ गंगा नहाने गए तो जल में उतरते ही एक मगर ने उनका पैर पकड़ लिया.

 

 

 

द्रोणाचार्य ने शिष्यों की परीक्षा लेने हेतु पुकारा, “वत्सो ! मुझे यहां एक ग्राह ने पकड़ लिया है. यह जल के भीतर मुझे खींचे ले जा रहा है, आकर मुझे बचाओ.”

 

 

गुरु की पुकार सुनकर सभी छात्र भागकर आए, लेकिन तट पर आकर सभी किंकर्त्तव्यविमूढ़-से होकर एक-दूसरे की ओर ताकने लगे. अकेला अर्जुन ऐसा था, जिसने उसी क्षण धनुष पर बाण चढ़ाकर जल के भीतर मारे और पांचों बाणों से उस ग्राह को मार डाला.

 

 

Arjun Mahabharat Yuddh – अर्जुन महाभारत की कहानी

 

 

 

 

इस तरह की तत्काल बुद्धि अर्जुन में ही थी. परिस्थिति के सामने झुकना तो उसने सीखा ही नहीं था. जब अर्जुन ने ग्राह को मारकर गुरु को भीषण संकट से बचा लिया तो गुरु ने प्रसन्न होकर उसे प्रयोग और उपसंहार सहित ब्रह्मशिर अस्त्र चलाना सिखाया.

 

 

 

इसी प्रकार की एक और परीक्षा गुरु द्रोणाचार्य ने ली. परीक्षा के लिए एक दिन निश्चित कर दिया. सभी शिष्य अपने साहस और कौशल का दंभ करते हुए मैदान में आकर खड़े हो गए.

 

 

 

लेकिन उन सबमें  अर्जुन ही सबसे अधिक कुशल और साहसी प्रमाणित हुआ और गुरु द्रोणाचार्य ने उसकी हृदय से प्रशंसा की, जिसे सुनकर दुर्योधन के हृदय को धक्का लगा.

 

 

 

कौरवों में से कोई योद्धा वह काम नहीं कर पाया था, जो अर्जुन ने किए थे. अंत में कर्ण ने आकर वह सारा कार्य कर दिखाया. तब दुर्योधन को कुछ संतोष आया.

 

 

 

कर्ण भी अर्जुन की तरह ही वीर और युद्ध-विद्या में निपुण था. उसको तो गुरु भी परशुराम जैसे मिले थे, जिन्होंने अपने अपूर्व पराक्रम से पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया था.

 

 

 

वह कभी भी अर्जुन के कौशल की प्रशंसा नहीं करता था और सदा उसके प्रति एक ईर्ष्या का भाव इसके हृदय में बना रहता था. इसी कारण वह कभी भी पांडव पक्ष में नहीं मिल पाया. उसकी विशेष शत्रुता तो अर्जुन से थी, क्योंकि उसे ही वह अपना प्रतिद्वंद्वी समझता था.

 

 

 

अर्जुन के अपार पराक्रम का परिचय हमें उस समय भी मिलता है, जब उसने कर्मक्षेत्र में गंधर्वराज अंगारपूर्ण का सामना किया था. गंधर्वराज महापराक्रमी थे .

 

 

 

पहले उसने अर्जुन को इस तरह ललकारा था जैसे पर्वताकार देह वाला एक योद्धा एक साधारण व्यक्ति को ललकारता है, लेकिन महाबली अर्जुन ने शीघ्र ही अपने पराक्रम का परिचय दे दिया और कुछ ही क्षणों में अपने युद्धकौशल से गंधर्वराज को विचलित कर दिया.

 

 

 

 

यहां तक कि उसने पराजय स्वीकार करके अर्जुन से मित्रता कर ली और उसे चाक्षुषी विद्या सिखा दी, जिसकी प्राप्ति के लिए छ: महीने तक अर्जुन को कठोर तपस्या करनी पड़ी थी.

 

 

 

 

गंधर्वराज ने पाण्डवों को गंधर्व जाति से सौ-सौ घोड़े देने का वचन दिया था. उसी की श्रेष्ठ सम्मति मानकर पांडवों ने महर्षि धौम्य को अपना पुरोहित बनाया था.

 

 

महावीर अर्जुन

 

 

धनुर्विद्या में अर्जुन ने जो अद्वितीय कौशल प्राप्त कर लिया था, परिचय हमें द्रौपदी स्वयंवर के समय भी मिलता है. राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था.

 

 

 

 

देश-विदेश से महापराक्रमी क्षत्रिय कुमार राजकुमारी का वरण करने की इच्छा से आए हुए थे. उस समय पांडव वनवास का समय काट रहे थे. उन्हें भी जब स्वयंवर का पता चला तो कौतूहलवश वे भी द्रुपद की नगरी में आ पहुंचे.

 

 

 

 

शर्त यह थी कि जो कोई योद्धा स्तंभ के ऊपर घूमती हुई मछली की आंख को, नीचे तेल में उस मछली की परछाईं को देखकर वेध देगा, उसे ही द्रौपदी अपने पति के रूप में स्वीकार कर लेगी.

 

 

 

स्वयंवर मण्डप में उपस्थित सभी योद्धाओं ने अपना-अपना कौशल दिखाया, लेकिन कोई भी उस आंख को नहीं वेध पाया. कौरव भी वहां उपस्थित थे.

 

 

 

वे भी प्रयत्न करने के पश्चात लज्जित होकर अपने-अपने स्थान पर आ बैठे. जब सभा में चारों ओर निराशा व्याप्त हो गई, तो कर्ण ने उठकर अपना बाण उस मछली की आंख के लिए साधा और वह वीर निश्चित ही उसको वेध देता, लेकिन सूत-पुत्र होने के नाते उसको क्षत्रिय कन्या के साथ विवाह करने का अधिकार नहीं दिया गया.

 

 

 

सभा में चारों ओर उसके विरुद्ध स्वर उठने लगे. स्वयं द्रौपदी ने ही उसका सूत-पुत्र कहकर तिरस्कार किया था. किसी को भी यह पता नहीं था कि यह कर्ण भी क्षत्रिय पुत्र है, चूंकि सूत ने उसको पाल-पोसकर बड़ा किया था, इसलिए यहीं तक का ज्ञान सबको था.

 

 

 

कर्ण अपने मन में घुटकर बैठ गया, तब सबसे अंत में अर्जुन ने अपने धनुष पर बाण साधा और नीचे तेल से भरे कहाड़ में मछली की परछाईं देखकर उसने उसकी आंख वेध दी.

 

 

 

बस, चारों ओर बैठे योद्धाओं के हृदय धक से रह गए. द्रौपदी ने आकर उसके गले में वरमाला डाल दी. इस तरह अपने वनवास के समय भी अर्जुन के पराक्रम के कारण पांडवों को द्रौपदी जैसी श्रेष्ठ पत्नी मिली, जो सदा पांडवों के लिए प्रेरक शक्ति बनी रही.

 

 

Who was Arjun in Mahabharat?  अर्जुन कौन थे?

 

 

 

कौरवों और कर्ण के हृदय में उस समय भी कील-सी ठुक गई थी. सभी क्षत्रियों ने इसका विरोध किया था और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र उठाकर सभी ने अर्जुन को ललकारा था कि हमारे होते हुए एक भिखमंगा द्रुपद की पुत्री को नहीं ले जा सकता.

 

 

 

स्थिति काफी भयानक हो गई थी. अर्जुन ने उन योद्धाओं के समूह का अकेले ही सामना किया और सबको परास्त करके उसने यह सिद्ध कर दिया कि वह वनवास के समय भी कोई भिक्षु या याचक नहीं है, बल्कि एक पराक्रमी योद्धा है जो एक बार तो सारे संसार के योद्धाओं को चुनौती दे सकता है.

 

 

 

 

सबको पराजित करके वह अपने भाइयों के साथ द्रौपदी को माता के पास ले गए. वह अपने भाइयों और माता को अपनी जान से भी अधिक चाहते थे. स्वार्थ तो उनमें था ही नहीं.

 

 

 

 

यद्यपि द्रौपदी को उसने अपने पराक्रम के बल पर प्राप्त किया था और उसके भोग करने का अधिकार उसी को था, लेकिन माता के यह कहने पर कि जो भिक्षा लाए हो, उसे सभी मिलकर बांट लो, अर्जुन ने द्रौपदी के ऊपर अन्य भाइयों का अधिकार स्वीकार कर लिया.

 

 

 

कुंती ने तो बिना यह जाने कि वह द्रौपदी थी, कोई स्थूल वस्तु नहीं, यह बात कही थी ; लेकिन अर्जुन ने अक्षरश: अपनी माता की आज्ञा का पालन किया.

 

 

 

वह कभी भी मर्यादा नहीं तोड़ते थे और सदा अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की आज्ञा मानता था. जब द्रौपदी पर सभी का अधिकार हो गया, तो पांचों भाइयों ने मिलकर यह निश्चय किया कि जिस समय द्रौपदी एक भाई के पास रहे.

 

 

 

 

उस समय अन्य चारों भाइयों में से कोई उसके पास न जाए और यदि भूल से कोई चला भी जाए, तो उसे वनवास भोगना पड़ेगा. एक समय की बात है, युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकांत में थे और जहां वे थे, वहीं अर्जुन का धनुष रखा हुआ था.

 

 

 

एक ब्राह्मण की रक्षा करने के लिए उसको धनुष की आवश्यकता थी , अत: वह नियम तोड़कर अंदर चले गए और धनुष ले आये. इस तरह उसने ब्राह्मण की रक्षा तो कर ली, लेकिन उन्हें वनवास भोगना पड़ा.

 

 

 

वनवास में तीर्थ यात्रा करते समय मध्य देश में उसको नागकन्या उलूपी प्राप्त हो गई. उसके साथ सहवास से उन्हें एक पुत्र पैदा हुआ. जिसका नाम बभ्रुवाहन था.

 

 

 

यह बालक अभिमन्यु की तरह ही महापराक्रमी था. अपने पिता अर्जन को न पहचानकर जब उसने अर्जुन से ही से युद्ध किया था, तब एक बार तो अपने पराक्रम से अर्जुन को भी मूर्च्छित करके युद्धस्थल पर पटक दिया था.

 

 

 

इसी वनवास काल में ही अर्जुन की श्रीकृष्ण से भेंट हुई. जब वह पश्चिम में प्रभास क्षेत्र में पहुंचे, तो श्रीकृष्ण भी द्वारका से आए थे. कृष्ण ने उसे द्वारका चलने का निमंत्रण दिया तो वे द्वारका आ गए.

 

 

 

 

नियम का पालन करते हुए अर्जुन नगर के भीतर नहीं घुसा, बल्कि रैवतक पर्वत पर ही ठहर गए. वहीं बलराम तथा यादवगण प्रमुख व्यक्ति उनसे मिलने आए.

 

 

 

कुछ दिन तक अर्जुन वहीँ रहे , इसी बीच में एक उत्सव हुआ जिसमें उसने कृष्ण की बहन सुभद्रा को देखा, उसके रूप और लावण्य को देखकर अर्जुन उन पर मोहित हो गए.

 

 

अर्जुन सुभद्रा विवाह

 

 

 

 

कृष्ण उसके हृदय के भाव को जान गए और सुभद्रा के लिए योग्य वर समझकर उन्होंने उसे सुभद्रा का हरण करने की सम्मति दी, क्योंकि कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि वैसे बलराम तथा अन्य संबंधी सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ नहीं करेंगे.

 

 

 

 

सखा की बात पर विश्वास करके अर्जुन ने सुभद्रा का हरण किया. सुभद्रा भी इस योद्धा को देखकर मुग्ध हो गई और पूर्ण संतोष के साथ उसकी पत्नी होकर चली गई.

 

 

 

 

पीछे से बलराम तथा अन्य यादवों को बड़ा क्रोध आया, लेकिन कृष्ण ने सबको समझा दिया. बलराम तो युद्ध के लिए उतारू हो रहे थे, लेकिन कृष्ण के तर्कों के सामने वे भी चुप हो गए और अंत में सभी ने अर्जुन को सुभद्रा के योग्य वर स्वीकार कर लिया और विधिपूर्वक उन दोनों का विवाह करा दिया.

 

 

 

 

उसी सुभद्रा के गर्भ से वीर बालक अभिमन्यु का जन्म हुआ, जिसने चक्रव्यूह में अपने पराक्रम से शत्रुओं को चकित कर दिया और जो अंत में अपने पिता का यश बढ़ाकर वीरगति को प्राप्त हुआ था.

 

 

 

अर्जुन अपने ही सम्मान की चिंता नहीं करता था, दूसरों की मान-मर्यादा की भी चिंता उसे रहती थी. उन्होंने इंद्र के विरुद्ध अग्नि की मान-मर्यादा की रक्षा की थी और उसी से उसे कपिध्वज नाम का दिव्य रथ और गाण्डीव धनुष प्राप्त हुआ.

 

 

 

 

अग्नि ने इंद्र के दंभ को चूर करके खांडव वन को भस्म कर दिया. उसमें से केवल मय नाम का असुर, तक्षक नाग और चार शार्ग्ङक पक्षियों कसे सिवा कोई जीवित नहीं बचा.

 

 

 

 

 

चूंकि Arjun Mahabharat ने मय को प्राणदंड दिया था, इसलिए उसने अपनी कला से पांडवों के लिए एक हजार खंभों का विलक्षण सभा-भवन बना दिया. इसमें उसने कैलास और मैनाक पर्वत से मूल्यवान मणियां लाकर लगाई थीं.

 

 

 

देवदत्त नाम का शंख भी मय ने ही अर्जुन को दिया था. राजसूय यज्ञ के दौरान अर्जुन ने तमाम वीर राजाओं को हराया. यह समय पांडवों का स्वर्णिम था.

 

 

 

 

इसके बाद शकुनी की कुटिल चाल से युधिष्ठिर द्युत में सब कुछ हार गए और द्रौपदी के चिर हरण के समय भगवान् श्रीकृष्ण ने उनकी लज्जा को बचाया और उसके बाद पांडवों ने सबसे बदला लेने की सौंगंध ली और पूरी सभा को द्रौपदी ने श्राप दिया.

 

 

 

 

अर्जुन बहुत ही दूरदर्शी थे. आगे क्या करना है उसके लिए पहले से ही योजना बनाना वह प्रारंभ कर देते थे. वनवास के समय में उन्हें यह आशंका हो गई थी कि कौरवों का हृदय मैला है.

 

 

 

 

वे वनवास के पश्चात भी राज्य का थोड़ा भी हिस्सा नहीं देंगे. युद्ध के द्वारा ही उनसे अपना अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, यह दृढ़ संकल्प लेकर उसने अपनी सामर्थ्य बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया.

 

 

 

इसके पश्चात दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति के लिए वह तपस्या करने चल दिए. हिमालय और गंधमादन पर्वत को लांघकर वह कैलास पर्वत पर आये. वहां एक वराह के ऊपर उनका एक किरात से झगड़ा हो गया.

 

 

 

दोनों मरे हुए वराह को अपना बतलाते थे. अंत में युद्ध हुआ. किरात ने अपनी कला से  Arjun Mahabharat   का सारा पराक्रम हर लिया. इस तरह अपने को निर्बल पाकर अर्जुन को आश्चर्य होने लगा और फिर एक क्षण में ही किरात की अलौकिक शक्ति का अनुमान लगाकर उसने उसको प्रणाम किया और उसे प्रसन्न करके उससे पाशुपात अस्त्र प्राप्त किया. वह किरात और कोई नहीं, स्वयं वेश बदले हुए भगवान शिव थे. इस प्रकार उन्होंने अर्जुन के बल की परीक्षा ली थी.

 

 

 

 

 

इससे यह पूरी तरह स्पष्ट होता है कि अर्जुन परिस्थिति को ठीक तरह पहचानकर उससे लाभ उठाने वाला बुद्धिमान योद्धा थे. पाशुपात अस्त्र प्राप्त करके वह आगे बढ़ा तो उसे इंद्र का सारथी मातलि रथ लिए हुए मिला.

 

 

 

गंगा में स्नान करके वह रथ पर बैठ गए और अमरावती पहुंच गए. वहां इंद्र ने उसका बड़ा स्वागत किया और अपने साथ ही आसन पर बिठा लिया.

 

 

 

 

यहां उसने पांच वर्षों तक अनेक दिव्यास्त्रों की संचालन-क्रिया सीखी. उसी समय चित्रसेन गंधर्व उसका मित्र हो गया, जिसे उसने नाचना-गाना आदि सिखाया, जो मत्स्य-नरेश विराट के यहां काम आया.

 

 

 

 

देव सभा में उर्वशी नाम की महासुंदरी अप्सरा आया करती थी, जिसको अर्जुन वंश-माता के रूप में देखा करते थे . उसके हृदय के भाव को न जानकर चित्रसेन ने समझा कि वह उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए है.

 

 

 

इसीलिए उसने एक दिन उर्वशी को उनके पास भेज दिया. उर्वशी अपना कामुक रूप लेकर उनके पास पहुंची और सहवास के लिए इच्छा प्रकट करने लगी.

 

 

 

 

अर्जुन के तेजस्वी रूप को देखकर वह काम से पीड़ित हो रही थी. उसने अर्जुन को अपने साथ रमण करने की इच्छा जताई. यह सुनकर अर्जुन ने चौंककर कहा, “उर्वशी ! आप तो हमारी वंश-माता हैं, फिर मैं ऐसा पाप-कार्य कैसे कर सकता हूं? आपकी यह धारणा मेरे विषय में गलत है कि मैं आपके प्रति कामासक्त हूं. मैं तो आपको पूज्या मानकर आपका सम्मान करता हूं.”

 

 

 

Arjun Mahabharat की इस बात को सुनकर भी उर्वशी की काम पीड़ा उतनी ही बनी रही और उसने कहा, “छोड़ो, इस धारणा को वीरवर ! आओ मेरी काम-पीड़ा को शांत करो.”

 

 

 

जब उर्वशी के कई बार कहने पर भी अर्जुन तैयार नहीं हुये तो उसने क्रुद्ध होकर उसे नपुंसक हो जाने का शाप दिया. उसके लिए निश्चित अवधि थी.

 

 

 

 

आगे चलकर यह शाप ही अर्जुन का सहायक बना और अज्ञातवास के समय इसी के कारण विराट के यहां उनका रहना संभव हुआ. जहां Arjun Mahabharat  ने वृहन्नला बनकर उत्तरा को नृत्य सिखाते थे.

 

 

 

 

इंद्र से अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त करके अर्जुन बदरी वन में नर-नारायण के आश्रम में पहुंचे .अन्य पांडव भी वहीं प्रतीक्षा कर रहे थे. आकर उसने अपने भाइयों को अपनी यात्रा का सारा विवरण सुनाया और जो दिव्यास्त्र प्राप्त किए थे उनका परिचय दिया.

 

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arjun mahabharat

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जब वह अज्ञातवास के समय राजा विराट कौरवों ने आक्रमण कर दिया और उस सेना में कर्ण , भीष्म , दुर्योधन, आचार्य द्रोणा जैसे योद्धा थे. दुर्योधन को यह शक हो गया था कि पांडव राजा विराट के यहाँ छुपे हुए हैं.

 

 

 

झूठा दंभ भरने वाला उत्तर उस समय अर्जुन को सारथी बनाकर युद्ध के लिए ले गया था, लेकिन वह कौरवों की सैन्य शक्ति देखकर डरकर भागने लगा. तब अर्जुन ने उसे रोककर कौरवों का स्वयं सामना किया और उन्हें परास्त किया.

 

 

विराट युद्ध Virat War In Mahabharat

 

 

 

राजा विराट के प्रति अपने कर्तव्य का वह इसी तरह पालन कर सकते थे. अभिमान तो अर्जुन छू तक नहीं गया था. बड़े से बड़ा कार्य करके वह भी वह अपने पराक्रम की डींग नहींमारते थे. दूसरों को प्रशंसा करते हुए सुनकर भी वह कुछ नहीं बोलते थे.

 

 

 

अर्जुन नम्र और विनयशील थे. वह श्रीकृष्ण के पूछे बिना कोई कार्य नहीं करता था और उन्हें अपना सच्चा सखा मानते थे. कृष्ण ही उसकी विजय के आधार थे.

 

 

 

यदि उसे ऐसा सारथी नहीं मिलता, तो शायद वह कौरवों की उस विशाल सेना को नहीं जीत पाता, जिसमें भीष्म, द्रोण, कर्ण जैसे महारथी युद्ध कर रहे थे.

 

 

 

 

कृष्ण की नीति-निपुणता से ही उसने भीष्म पितामह को धराशायी किया. उन्हीं की चाल से गुरु द्रोणाचार्य को उसने पराजित किया और उन्हीं की सूझ के बल पर कर्ण जैसे योद्धा को मार गिराया.

 

 

 

इन तीन पराक्रमी सेनापतियों से टक्कर लेना मामूली काम नहीं था, लेकिन अर्जुन से अपनी सामर्थ्य और शक्ति के बल पर इनका सामना किया और इन सबको धराशायी करके विजय का शंख बजाया.

 

 

 

कृष्ण ने अनेक बार अर्जुन के जीवन की भी रक्षा की थी. पहले-पहल तो भीष्म जैसे पराक्रमी से ही उसका बचना कठिन था, फिर कर्ण तो उसे जीवित कभी नहीं छोड़ता.

 

 

 

जब उसने सर्प के विष में बुझा बाण उसकी ओर लक्ष्य करके मारा था और यह घोषणा की थी कि अर्जुन मारा गया, तब श्रीकृष्ण ने ही घोड़ों को बिठाकर रथ को नीचा किया था जिससे वह भयानक बाण अर्जुन का मुकुट काटकर ही निकल गया था, नहीं तो उस दिन उसके जीवन का अंत था.

 

 

 

कृष्ण के उपदेशों के फलस्वरूप ही वह निष्काम कर्मयोगी हो गए थे. कर्तव्य के आगे सुख और दुख एक जैसे ही उसको दिखाई पड़ते थे. इसी उपदेश की शक्ति से वह पूरे महाभारत युद्ध में कभी विचलित नहीं हुए.

 

 

 

 

हम पहले ही देख चुके हैं कि स्वार्थ तो उसके हृदय पर कभी अधिकार नहीं जमा सका था. इंद्र ने उससे इंद्रपुरी में रहकर ऐश्वर्य भोगने के लिए कहा था, लेकिन अपने सुख के लिए उसने भाइयों का तिरस्कार नहीं किया. वास्तव में वह पूरा साधक थे. इसी लिए वे कान्हा को प्रिय थे.

 

 

 

जब अर्जुन के पुत्र का वध कौरवों ने कर दिया था और उस पर दुखी होकर उसने जयद्रथ को मारा था, लेकिन अगर वह चाहते तो अपने दिव्य अस्त्रों के बल से सभी शत्रुओं का विनाश कर सकते थे , लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

 

 

 

अगर दूसरी तरफ अश्वत्थामा को देखें कि कितने दिनों तक उसके हृदय में प्रतिशोध पलता रहा और अंत में उसने द्रौपदी के पांचों पुत्रों की हत्या करके ही चैन लिया.

 

 

 

यहां तक कि पांडवों को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी किया था. ऐसा निर्दयतापूर्ण कार्य अर्जुन कभी नहीं कर सकते थे.

 

 

 

उसने अपनी प्रतिशोध की आग को शांत करने के लिए निहत्थे बालकों पर कभी हाथ नहीं उठाया. वह तो योद्धाओं को ललकारना जानता था और उन्हीं को पराजित करने में सच्चा गौरव मानते थे. इस तरह कहीं भी देखें, arjunने कूटनीति का कभी आश्रय नहीं लिया.

 

 

 

इसके अलावा क्षमा भी अर्जुन के स्वभाव का विशेष गुण था. कौरव-पक्ष में किसी योद्धा के अंदर यह गुण नहीं था और यही उनके हार का और इस महाभारत युद्ध का कारक बना .

 

 

 

इसके साथ ही वे विवेकपूर्ण भी थे. अपनी भूल पर पश्चाताप करने का साहस उनमें था. एक बार युधिष्ठिर के लिए arjun अर्जुन के मुंह से कुछ कटु वचन निकल गए थे, लेकिन फिर संयत अवस्था में आने पर उसने अपनी भूल पर पश्चाताप किया और अग्रज से क्षमा मांगी.

 

 

 

अग्रज की आज्ञा पालन करना ही उसके जीवन का सुख था. असंतोष तो कभी उसने अनुभव ही नहीं किया और न कभी यह कामना की कि मुझे अपने भाइयों से अधिक मान-प्रतिष्ठा मिले.

 

 

 

कभी-कभी लोग कर्ण का अन्यायपूर्ण वध करने के बारे में अर्जुन को दोषी ठहराते हैं, लेकिन स्पष्ट बात यह है कि यह सारा इशारा तो श्रीकृष्ण का था.

 

 

 

यदि कृष्ण आदेश नहीं देते तो अर्जुन कभी कर्ण को रथ का पहिया निकालते समय नहीं मारते. वे उसे युद्ध से लड़ते हुए मारना चाहते थे, लेकिन कर्ण ने अभिमन्यु के साथ जो अक्षम्य कृत्य किया था और अभिमन्यु को निहत्थे होने पर मारा था, प्रकृति को उसका भी बदला लेना था.

 

 

 

इसके साथ ही कर्ण को परशुराम का यह शाप भी था कि अर्जुन से युद्ध करते समय वह शस्त्र प्रयोग करना भूल जाएगा और अर्जुन के द्वारा ललकारने पर भी कर्ण युद्ध के लिए सज्ज नहीं हो सके .

 

 

 

उनकी विद्याएँ उन्हें भुलने लगीं. इसी प्रकार भीष्म पितामह की भी हत्या अन्याय से अर्जुन ने नहीं की थी, स्वयं भीष्म ने ही अपनी मृत्यु का उपाय उसे बता दिया था, फिर उसके लिए किसी प्रकार के छल के लिए स्थान ही नहीं था.

 

 

 

उक्त विवरण से हमें यही पता चलता है कि अर्जुन एक अजेय योद्धा था, लेकिन कृष्ण ही उसके एक ऐसे साथी थे जिनकी सहायता से उसके सभी कार्य पूर्ण हो जाते थे.

 

 

 

जब कृष्ण इस संसार को छोड़कर चले गए, तो अर्जुन ने देखा कि उस गाण्डीव धनुष द्वारा अर्जुन कृष्ण की स्त्रियों की आभीरों से रक्षा नहीं कर सके. वे लोग उन स्त्रियों को लूटकर ले गए और अर्जुन गाण्डीव की प्रत्यंचा नहीं खींच सके. वह वृद्ध और दुर्बल हो गया थे.

 

 

 

 

उस समय उनका यह अहंकार भी टूट गया था कि वह एक अदम्य और अजेय योद्धा है. वह उसी निर्जन वन में अपने साथी और गुरु कृष्ण की याद में विलाप करने लगे.

 

 

 

Mahabharat Yuddh  के 36 वर्ष पश्चात सभी पांडव हिमालय की ओर चले गए और वहीं गलकर इस संसार से सदा के लिए उठ गए. इस तरह महाभारत के इस परम योद्धा की जीवन-यात्रा समाप्त हुई.

 

 

 

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