Bhakti Story

ashwathama story history of ashwathama

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ashwathama story history of ashwathama ashwathama द्रोणाचार्य का पुत्र था. ashwathama के mother का नाम कृपी था. कृपी क्रिपाचार्य की बहन थीं. महाभारत युद्ध से पुर्व गुरु द्रोणाचार्य अनेक स्थानो में भ्रमण करते हुए himalaya प्‌हुचे. वहाँ तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा में तपेश्वर नामक स्वय्मभू शिवलिंग है. वहाँ द्रोणाचार्य और कृपी ने भगवान शंकर की तपस्या की. इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने इन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया. ashwathama पैदा होते ही अश्व की भांति रोया था. इसीलिए उसका नाम ashwathama रखा गया. जन्म से ही ashwathama के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी. जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी. वह बहुत ही क्रूर और दुष्ट बुद्धि वाला था . धर्म और न्याय के प्रति उसकी अधिक ही शत्रुता थी. ashwathama का जीवन बहुत ही गरीबी और कठिनाइयों में बीता था. क्योंकि उस समय आचार्य द्रोणाचार्य बहुत ही निर्धन थे. उनके पास अपने परिवार के पालन पोषण के लिए पर्याप्त धन नहीं था.

एक दिन ashwathama ने अपनी माता कृपी से दूध माँगा. लेकिन उनके पास दूध के लिए गाय तक नहीं थी. कृपी ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन भूखा होने के कारण ashwathama हठ करने लगा. माता कृपी उसके हठ देखकर बहुत दुखी हुयी और उसे किसी तरह से बहलाने के लिए चावल धोकर सफेद पानी उन्हें पीने को दे दीं. उसे यह नहीं पता था कि दूध कैसा होता अतः उसने उस सफेद पानी को ही दूध समझ कर पी लिया और कुछ पानी को बचाकर अन्य ऋषि पुत्रों को दिखाने ले गया. ऋषि पुत्र चावल के पानी को पहचान लिए और उसका उपहास करने लगे. इससे ashwathama बहुत दुखी हुआ और वापस आ कर माता कृपी की गोद में रोने लगा. उस समय माता कृपी को जो असह्य वेदना हुई उसका वर्णन नहीं किया जा सकता. अपनी निर्धनता के कारण उन्हें अपने ही पुत्र से छल करना पड़ा.

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जब वह युवावस्था में पहुंचा , तब तक द्रोणाचार्य पांडव और कौरवों के गुरु हो गए थे और गुरु दक्षिणा में उन्होने अर्जुन के अपार पराक्रम से राजा द्रुपद को हराकर उनका आधा राज्य लेकर
ashwathama को भेट कर दिया था. अब ashwathama के पास धन दौलत, राज्य, संपत्ति सबकुछ थी. लेकिन उसकी कभी भी पांडवों के साथ नहीं बनी. वह हमेशा ही अर्जुन से इर्ष्या करता था. उसे हमेशा लगता था कि द्रोणाचार्य अर्जुन को मानते हैं. दुर्योधन उसका परम मित्र था. उसने हठ करके brahmashtra की विद्या द्रोणाचार्य से पायी, लेकिन वह brahmastra को वापस बुलाना नहीं सीखा. वह बहुत ही बलवान और महारथी तथा विभिन्न प्रकार के दिव्यास्त्रों का ज्ञाता था, लेकिन सबके बीच उसकी एक कमी थी. वह सदैव ही युद्ध से भयभीत रहता था.

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ashwathama mahabharat के khatarnak khalnayak में से एक था. mahabharat के युद्ध में एक कूटनीतिक चाल से जब उसके पिता द्रोणाचार्य का वध हुआ, तो इससे ashwathama बहुत कुद्ध हुआ. उसने दुर्योधन से कहा कि अगले मैं नारायाणास्त्र चलाकर इस युद्ध को यही समाप्त कर दूंगा. अगले दिन का mahabharat yuddh बहुत ही प्रचंड हुआ ashwathama ने पांडव सेना पर नारायणास्त्र का प्रहार किया. इस अस्त्र का कोई तोड़ नहीं था. जब कोई योद्धा इस अस्त्र को रोकने की कोशिश करता तो यह और भी आक्रामक हो जाता. इस अस्त्र पांडव सेना में कोहराम मचा दिया. तब krishna ने कहा कि सभी लोग अपने अपने वाहन से निचे उतर कर इस अस्त्र को प्रणाम करो. मात्र यही इस अस्त्र को रोकने का उपाय है. अन्यथा यह अस्त्र सम्पूर्ण सेना को समाप्त कर देगा. लेकिन bhim को ह बात उचित नहीं लगी.उन्होंने उस अस्त्र पर गदा प्रहार किया, लेकिन नारायण अस्त्र और भी प्रबल होकर bhim की तरफ बढ़ा. यह देखकर भीम भी अपने रथ से निचे उतर कर इसे प्रणाम किये,तब यह अस्त्र शांत हुआ और सेना तथा पांडवों की सुरक्षा हुई. हालाकि अर्जुन इस अस्त्र का तोड़ जानते थे लेकिन उन्होंने गाय और नारायणास्त्र पर वार नहीं करने का वचन लिया था.

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उसके बाद ashwathama ने आग्नेय अस्त्र चला दिया, लेकिन उसे arjun ने निष्क्रिय कर दिया. उस दिन का mahabharat yuddh समाप्त हुआ. ashwathama अपने आप से बहुत ही नाराज था. हालाकि उसने पांडव सेना की बहुत क्षति की थी, लेकिन बड़े योद्धाओं को नहीं मार पाने का उसे कष्ट हो रहा था. वह कृष्ण सहित पुरे पांडव को मारना चाहता था. mahabharat yuddh अपने अंत की ओर था. सभी कौरव योद्धा मारे जा चुके थे. दुर्योधन ही शेष रह गया था. वह द्वैपायन सरोवर में छिप गया था. सभी पांडव उसे ढूढते हुए सरोवर के पास पहुंचे और bhim दुर्योधन को ललकारने लगे. उनकी ललकार को सुनकर दुर्योधन बाहर आये और गदा और मल्लयुद्ध होने लगा. दुर्योधन की माता गांधारी के आशीर्वाद से दुर्योधन का शरीर वज्र का हो गया था. krishna god ने चालाकी से उसे पत्ते का अन्तःवस्त्र पहनाकर उसके सम्पूर्ण शरीर को वज्र होने से रोक दिया था और युद्ध के दौरान bhim ने krishna god के इशारे पर दुर्योधन के जांघ पर वार किया और दुर्योधन जमीन पर गिर पडा. हालांकि यह युद्ध के नियमो के विरुद्ध था, लेकिन इसी मल्लयुद्ध में दुर्योधन ने कई बार नियमों को तोड़ा.

इस कृत्य से ashwathama को बहुत क्रोध आया और उसने प्रतिज्ञा ली कि वह सम्पूर्ण पांडव वंश को ही समाप्त कर देगा. उसने उस काली रात को दृष्टद्युम्न और पांडवों के पुत्रों को मार डाला . ashwathama का क्रोध इतना प्रचंड हो गया था कि न्याय , दया,धर्म, संस्कार सब उसके आँखों से ओझल हो गए थे. वह तो राक्षस बन चुका था. वह भीषण तबाही करने बाद दुर्योधन पास पहुंचा और उसे सारी बात बताई, लेकिन दुर्योधन ने जब यह बात सुनी तो रोने लगा और ashwathama को धिक्कारते हुए बोला कि मेरी शत्रुता पांडवों से थी, ना कि उनके बच्चों सी, तुम्हारे इस कृत्य ने तुम्हारे साथ ही सदा के लिए मुझे भी अपमानित कर दिया. अब हमारे कुल में कोई दीपक जलाने वाला नहीं होगा… यह कहते हुए दुर्योधन ने प्राण त्याग दिए.

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इधर जब द्रोपदी ने अपने पाँचों पुत्रों का शव देखा तो एकदम से विक्षिप्त हो गयी. एक ही रात में उनकी गोद सूनी हो गयी थी. किसी तरह भीम ने उन्हें संभाला और ashwathama के पीछे भागे . उनके पीछे बाकी पांडव और भगवान krishna भी भागे. कुछ ही दूर पर उन्होने ashwathama को पकड़ लिया और सभी उसे मारने लगे. तब उसने कहा कायरों की तरह सभी मिलकर मुझे मारते हो….हिम्मत है तो धनुर्विद्या में मुझे हराओ. तब उसके और अर्जुन के बीच युद्ध प्रारंभ हुआ और कुछ ही क्षण बाद उसने brahmastra का आह्वान कर दिया और उसके ऐसा करते ही arjun ने भी brahmastra का आह्वान कर दिया. प्रचंड ध्वनि, अग्नि और वेग से दोनों brahmastra प्रकट होने लगे. यह देखकर srikrishna बोले दो ब्रह्मास्त्र के टक्कर से सम्पूर्ण पृथ्वी समाप्त हो जायेगी. फिर इस mahabharat yuddh के धर्म स्थापना के उद्देश्य का पालन कैसे होगा. अतः तुम दोनों ही ब्रह्मास्त्र को लौटा लो.

यह बात सुनकर arjun ने ब्रह्मास्त्र लौटा लिया, लेकिन ashwathama को brahmastra लौटाने नहीं आता था. तब कृष्णा ने कहा कि नियमानुसार तुम उसपर ब्रह्मास्त्र नहीं चला सकते, जिसने साधा हुआ ब्रह्मास्त्र वापस लौटा लिया हो..अतः तुम्हे इसे दूसरी दिशा में छोड़ना होगा. तब उसने क्रोध में बोला कि मैं इस ब्रह्माश्त्र को उत्तरा के गर्भ पर छोड़ता हु, जिससे पांडवों के वंश को समाप्त करने का मेरा पूर्ण हो जाएगा. उसके बाद आवेशित होकर उसे मारने के लिए बढे तभी कृष्णा ने उन्हें रोक दिया और अश्वत्थामा संबोधित करते हुए कहा कि आज तुमने महापाप किया है, इससे तुमने अपना ब्राह्मणत्व खो दिया है. अब तुम्हे ऐसा दंड मिलेगा जिसकी तुमने कभी कल्पना नहीं की होगी.

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और उत्तरा के गर्भ की रक्षा मैं स्वयं करूंगा और यह कहते हुए krishna god ने एक मोर पंख उत्तरा के गर्भ की ओर आदेशित कर छोड़ दिया और पांडवों को आदेश दिया कि ashwathama के मस्तक से मणि को निकाल लो. यह सुनकर अश्वत्थामा काँप उठा. मणि निकालने के बाद कृष्णा ने उसे श्राप दिया कि तुम्हारे यह घाव कभी नहीं भरेंगे और तुम चिरकाल तक ऐसे ही सड़ते रहोगे. आज भी बहुत से लोग ashwathama still alive की बात करते हैं. उसके बाद उत्तरा के गर्भ से जन्मे बालक का नाम परीक्षित रखा गया. मित्रों मेरी यह hindi story ashwathama story history of ashwathama आपको कैसी लगी अवश्य ही बताएं और अन्य bhakti kahani के लिए इस लिंक https://www.hindibeststory.com/mahan-dhanurdhar-ekalavya-ki-kahani-bhakti-story/ पर क्लिक करें.

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