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bandar or magarmach ki kahani

bandar or magarmach ki kahani
Written by Abhishek Pandey

bandar or magarmach ki kahani किसी नदी के तट पर एक वन था.  उस वन में एक बंदर निवास करता था, जो वन के फल आदि खा कर अपना निर्वाह करता था.  नदी में एक टापू भी था और टापू और तट के बीच में एक बड़ी सी चट्टान भी थी.

 

 

जब कभी बंदर को टापू के फल खाने की इच्छा होती वह उस चट्टान पर उस टापू पर पहुँच जाता और जी भर अपने मनचाहे फलों का आनंद उठाता.

 

उसी नदी में घड़ियालों की एक  जोड़ी भी रहती थी.  जब भी वह उस हृष्ट-पुष्ट बंदर को मीठे-रसीले फलों का आनंद उठाते देखती तो उसके मन में उस बंदर के हृदय को खाने की तीव्र इच्छा उठती .

 

एक दिन उसने नर घड़ियाल से कहा, “प्रिय ! अगर तुम मुझसे प्रेम करते हो तो मुझे उसका हृदय खिला कर दिखा दो,” नर घड़ियाल ने उसकी बात मान ली.

 

bandar aur magarmach ki kahani hindi mai 

 

दूसरे दिन बंदर जैसे ही टापू पर पहुँचा नर-घड़ियाल टापू और तट के बीच के चट्टान के निचले हिस्से पर चिपक गया. वह बंदर एक बुद्धिमान प्राणी था. शाम के समय जब वह लौटने लगा और तट और टापू के बीच के चट्टान को देखा तो उसे चट्टान की आकृति में कुछ परिवर्तन दिखाई पड़ा.

 

उसने तत्काल समझ लिया कि जरुर कुछ गड़बड़ी है.  तथ्य का पता लगाने के लिए उसने चट्टान को नमस्कार करते हुए कहा, “हे चट्टान मित्र ! आज तुम शांत कैसे हो ? मेरा अभिवादन भी स्वीकार नहीं कर रही हो ? ”

 

घड़ियाल ने समझा, शायद चट्टान और बंदर हमेशा बात करते रहते हैं इसलिए उसने स्वर बदल कर बंदर के नमस्कार का प्रत्युत्तर दे डाला. बंदर की आशंका सत्य निकली.

 

बंदर टापू में ही रुक तो सकता था मगर टापू में उसके निर्वाह के लिए पर्याप्त आहार उपलब्ध नहीं था. जीविका के लिए उसका वापिस वन लौटना अनिवार्य था.

 

अत: अपनी परेशानी का निदान ढूंढते हुए उसने घड़ियाल से कहा, “मित्र ! चट्टान तो कभी बातें नहीं करती . तुम कौन हो और क्या चाहते हो?” दम्भी घड़ियाल ने तब उसके सामने प्रकट हो कहा, ” ओ बंदर ! मैं एक घड़ियाल हूँ और तुम्हारा हृदय अपनी पत्नी को खिलाना चाहता हूँ. ”

 

तभी बंदर को एक युक्ति सूझी.  उसने कहा, ” हे घड़ियाल ! बस इतनी सी बात है तो तुम तत्काल अपनी मुख खोल दो, मैं सहर्ष ही अपने नश्वर शरीर को तुम्हें अर्पित करता हूँ.” बंदर ने ऐसा इसलिए कहा कि वह जानता था कि जब घड़ियाल मुख खोलते हैं, तो उनकी आँखें बंद हो जाती हैं.

 

फिर जैसे ही घड़ियाल ने अपना मुख खोला, बंदर ने तेजी से एक छलांग उसके सिर पर मारी और दूसरी छलांग में नदी के तट पर जा पहुँचा.
इस प्रकार अपनी सूझ-बूझ और बुद्धिमानी से बंदर ने अपने प्राण बचा लिए. मित्रों यह bandar or magarmach ki kahani थी . अब दूसरी bandar ki kahani hindi mai पढ़िए .

 

 

bandar ki kahani hindi mai

 

हिमवंत के निर्जन वन में कभी एक महान मर्कट रहा करता था.  शीलवान्, दयावान और एकांतप्रिय वह सदा ही फल-फूल और सात्विक आहार के साथ अपना जीवन- यापन करता था.

एक दिन एक चरवाहा अपने जानवरों की खोज में रास्ता भूल उसी वन में भटक गया. भूख प्यास से व्याकुल जब उसने एक पेड़ की छाँव में विश्राम करना आरम्भ किया …तभी उसकी नजर फलों से लदे एक तिंदुक के पेड़ पर पड़ी.

 

पलक झपकते ही वह उस पेड़ पर जा चढ़ा.  भूख की तड़प में उसने यह भी नहीं देखा कि उस पेड़ की एक जड़ पथरीली पहाड़ी की एक पतली दरार से निकलती थी और उसके निकट एक झरना बहता था.

 

शीघ्र ही वह रसीलों फलों से लदी एक शाखा पर पहुँच गया मगर वह शाखा उसके बोझ को संभाल न सकी और टूट कर बहते झरने में जा गिरी. चरवाहा भी उसी प्रपात में जा गिरा.

 

बहते पानी के साथ फिर वह एक ऐसे खड्ड में जा फँसा, जहाँ की चिकनी चट्टानों को पकड़ कर उसका या किसी भी आदमी का बाहर आ पाना असंभव था.

मृत्यु के भय से निकलती उस आदमी की चीखें उस निर्जन वन में गूंजने लगी.  आदमी तो वहाँ कोई था भी नहीं जो उसकी पुकार सुन सके. हाँ, उसी वन में रहने वाले उस मर्कट ने उसके क्रन्दन को अवश्य सुना.

 

दौड़ता हुआ वह शीघ्र ही वहाँ पहुँचा और आनन-फानन में कूदता हुआ उस खड्ड में पहुँच कर उस आदमी को खींचता हुआ बड़ी मुश्किल से झरने के बाहर ले आया. आदमी के बोझ से उसके अंग-प्रत्यंग में असीम पीड़ा हो रही थी.

 

वह बेहोशी की हालत में था और विश्राम के लिए सोना चाहता था. इसी उद्देश्य से उसने आदमी को अपने पास बैठ रखवाली करने को कहा, क्योंकि उस वन में अनेक हिंस्त्र पशु भी विचरते थे.

जैसे ही मर्कट गहरी नींद में सोया, वह आदमी उठकर एक बड़ा-सा पत्थर उठा लाया क्योंकि वह सोच रहा था कि उस मर्कट के मांस से ही वह अपना निर्वाह कर सकेगा. ऐसा सोचकर उसने उस पत्थर को मर्कट के ऊपर पटक दिया.

 

पत्थर मर्कट पर गिरा तो जरुर मगर इतनी क्षति नहीं पहुँचा सका कि तत्काल हो उसकी मृत्यु हो सके. असह्य पीड़ा से कराहते मर्कट ने जब अपनी आँखें खोली और अपने ऊपर गिरे पत्थर और उस आदमी की भंगिमाओं को देखा तो उसने क्षण में ही सारी बातें जान ली।.

 

आवाज में उसने उस आदमी को यह कहते हुए धिक्कारा : अगर मैंने तेरी जान नहीं बचाई होती तो तू काल के गाल में समा चुका था. उसके बाद घायल वानर  ने उसपर हमला कर दिया और  घायल महान् मर्कट ने  उस व्यक्ति को उस वन से बाहर निकाल दिया.

कालान्तर में वह चरवाहा कुष्ठ रोग का शिकार हुआ.  तब उसके सगे संबन्धी व गाँव वाले घर और गाँव से निर्वासित कर दिये कही और शरण न वह फिर से उसी वन में निवास करने लगा.

 

उसके कर्मों की परिणति कुष्ठ रोग में हो चुकी थी, जिससे उसका शरीर गल रहा था और पश्चाताप की अग्नि में उसका मन ! काश ! उसने वह कुकर्म न किया होता .

 

 

 bandar ki kahani in hindi  

 

हज़ारों साल पहले किसी वन में एक बुद्धिमान बंदर रहता था.  वह  बंदरों का राजा भी था.  एक दिन वह और उसके साथी वन में कूदते-फाँदते ऐसी जगह पर पहुँचे जिसके निकट क्षेत्र में कहीं भी पानी नहीं था.

 

नयी जगह और नये परिवेश में प्यास से व्याकुल नन्हे वानरों के बच्चे और उनकी माताओं को तड़पते देख उसने अपने अनुचरों को तत्काल ही पानी के किसी स्रोत को ढूंढने की आज्ञा दी.

कुछ ही समय के बाद उन लोगों ने एक जलाशय ढूंढ निकाला. प्यासे बंदरों की जलाशय में कूद कर अपनी प्यास बुझाने की आतुरता को देख कर वानरराज ने उन्हें रुकने की चेतावनी दी, क्योंकि वे उस नये स्थान से अनभिज्ञ था.

 

अत: उसने अपने अनुचरों के साथ जलाशय और उसके तटों का सूक्ष्म निरीक्षण व परीक्षण किया. कुछ ही समय बाद उसने कुछ ऐसे पदचिह्मों को देखा जो जलाशय को उन्मुख तो थे मगर जलाशय से बाहर को नहीं लौटे थे.

 

बुद्धिमान् वानर ने तत्काल ही यह निष्कर्ष निकाला कि उस जलाशय में निश्चय ही किसी खतरनाक दैत्य जैसे प्राणी का वास था. जलाशय में दैत्य-वास की सूचना पाकर सारे ही बंदर हताश हो गये.

 

तब बुद्धिमान वानर ने उनकी हिम्मत बंधाते हुए यह कहा कि वे दैत्य के जलाशय से फिर भी अपनी प्यास बुझा सकते हैं क्योंकि जलाशय के चारों ओर बेंत के जंगल थे जिन्हें तोड़कर वे उनकी नली से सुड़क-सुड़क कर पानी पी सकते थे.

 

सारे बंदरों ने ऐसा ही किया और अपनी प्यास बुझा ली. जलाशय में रहता दैत्य उन्हें देखता रहा मगर क्योंकि उसकी शक्ति जलाशय तक ही सीमित थी, वह उन बंदरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका . प्यास बुझा कर सारे बंदर फिर से अपने वन को लौट गये.

 

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