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बच्चों की कहानियाँ

बच्चों की कहानियाँ
Written by Abhishek Pandey

बच्चों की कहानियाँ  रविवार का दिन था .  सबकी छुट्टी थी .  आसमान साफ था और ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी . सूरज की किरणें शहर के ऊपर बिखरी थीं .  धूप में गरमी नहीं थी.  मौसम सुहावना था.  बिलकुल वैसा जैसा एक पिकनिक के लिए होना चाहिये . मन्नू सोचने लगा, काश! आज हम कहीं घूमने जा सकते.

 

मन्नू रसोई में आया.  माँ बेसिन में बर्तन धो रही थी.

 

“माँ क्या आज हम कहीं घूमने चल सकते हैं?” मन्नू ने पूछा.

 

“क्यों नही, अगर तुम्हारा स्कूल का काम पूरा हो गया तो हम ज़रूर घूमने चलेंगे . ” माँ ने कहा.

 

“मैं आधे घंटे के अंदर स्कूल का काम पूरा कर सकता हूँ .” मन्नू ने कहा .

 

मन्नू स्कूल का काम करने बैठ गया.

 

“हम कहाँ घूमने चलेंगे?” मन्नू ने पूछा .

 

“बाबा और मुन्नी ने गांधी पार्क का कार्यक्रम बनाया है .” माँ ने बताया .

 

“यह पार्क तो हमने पहले कभी नहीं देखा?” मन्नू ने पूछा.

 

“हाँ, इसीलिये तो.” माँ ने उत्तर दिया.

 

मन्नू काम पूरा कर के बाहर आ गया.

 

“क्या गांधी पार्क बहुत दूर है?” मुन्नी ने पूछा.

 

“हाँ, हमें कार से लम्बा सफर करना होगा .” बाबा ने बताया.

 

सुबह के काम पूरे कर के सब लोग तैयार हुए.  माँ ने खाने पीने की कुछ चीज़ें साथ में ली और वे सब कार में बैठ कर सैर को निकल पड़े .

 

 

रास्ता मज़ेदार था.  सड़क के दोनो ओर पेड़ थे . हरी घास सुंदर दिखती थी . सड़क पर यातायात बहुत कम था.  सफ़ेद रंग के बादल आसमान में उड़ रहे थे.  बाबा कार चला रहे थे . मुन्नी ने मीठी पिपरमिंट सबको बांट दी। कार में गाने सुनते हुए रास्ता कब पार हो गया उन्हें पता ही नहीं चला। बाबा ने कार रोकी . माँ ने कहा सामान बाहर निकालो अब हम उतरेंगे.

 

 

गांधी पार्क में अंदर जा कर मुन्नी ने देखा चारों तरफ हरियाली थी .  वह इधर-उधर घूमने लगी . बहुत से पेड़ थे . कुछ दूर पर एक नहर भी थी . नहर के ऊपर पुल था.  उसने पुल के ऊपर चढ़ कर देखा. बड़ा सा बाग था.  एक तरफ फूलों की क्यारियाँ थीं.  थोड़ा आगे चल कर मुन्नी ने देखा गाँधी जी की एक मूर्ति भी थी.

 

 

घूमते-घूमते मुन्नी को प्यास लगने लगी .  माँ ने मुन्नी को गिलास में संतरे का जूस दिया .  माँ और बाबा पार्क के बीच में बने लंबे रास्ते पर टहलने लगे . मुन्नी फूलों की क्यारियों के पास तितलियाँ पकड़ने लगी . तितलियाँ तेज़ी से उड़ती थीं और आसानी से पकड़ में नहीं आती थीं . तितलियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते जब वह थक गयी तो एक पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गयी.

 

 

उसने देखा पार्क में थोड़ी दूर पर झूले लगे थे . मन्नू एक फिसलपट्टी के ऊपर से मुन्नी को पुकार रहा था,

 

“मुन्नी मुन्नी यहाँ आकर देखो कितना मज़ा आ रहा है .”

 

मुन्नी आराम करना भूल कर झूलों के पास चली गयी . वे दोनों अलग अलग तरह के झूलों का मज़ा लेते रहे.

 

 

“मन्नू – मुन्नी बहुत देर हो गयी? घर नहीं चलना है क्या?”

 

माँ और बाबा बच्चों से पूछ रहे थे.

 

दोनों बच्चे भाग कर पास आ गए .

 

“पार्क कैसा लगा बच्चों?” माँ ने पूछा.

 

“बहुत बढ़िया” मन्नू और मुन्नी ने कहा. वे खुश दिखाई देते थे .

 

 

चलो, अब वापस चलें, फिर किसी दिन दुबारा आ जाएँगे .” बाबा ने कहा.

 

सफर मज़ेदार था. दिन सफल हो गया. बच्चों ने सोचा .

 

सब लोग कार में बैठ गए. बाबा ने कार मोड़ी और घर की ओर ले ली. मौसम अभी भी बढ़िया था . मुन्नी फिर से सबको मीठी पिपरमिंट देना नहीं भूली . सैर की सफलता के बाद सब घर लौट रहे थे.

 

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सूर्य अस्त हो चला था . आकाश में बादल छाए हुए थे . नीम के एक पेड़ पर ढेर सारे कौवे रात बिताने के लिए बैठे हुए थे . कौवे अपनी आदत के अनुसार, आपस में एक-दूसरे से काँव-काँव करते हुए झगड़ रहे थे . उसी समय एक मैना आई और रात बिताने के लिए नीम के उस पेड़ की एक डाल पर बैठ गई.  मैना को देखकर सभी कौवे उसकी ओर देखने लगे .

 

बेचारी मैना सहम गई . डरते हुए बोली, “अँधेरा हो गया है . आसमान मे बादल छाए हुए है.  किसी भी समय पानी बरस सकता है . मैं अपना ठिकाना भूल गई हूँ.  आज रात भर मुझे भी इस पेड़ की एक डाल के एक कोने में रात बिता लेने दो .”

 

कौवे भला कब उसकी बात मानते . उन्होंने कहा, “यह नहीं हो सकता. यह पेड़ हमारा है. तुम इस पेड़ नहीं बैठ सकती हो. भागो यहाँ से.”

 

कौवों की बात सुनकर बड़े ही दीन स्वर में मैना बोली, “पेड़ तो सभी भगवान के हैं. यदि बरसात होने लगी और ओले पड़ने लगे, तो भगवान ही सबको बचा सकता है. मैं बहुत छोटी हूँ.  तुम लोगों की बहन हूँ . मेरे ऊपर दया करके रात बिता लेने दो.”

 

मैना की बात सुनकर सभी कौवे हँसने लगे . फिर बोले, “हम लोगों को तेरी जैसी बहन की कोई जरूरत नहीं है.  तू भगवान का नाम बहुत ले रही है, तो भगवान के सहारे यहाँ से जाती क्यों नहीं? यदि तू यहाँ से नहीं जाएगी, तो हम सब मिलकर तुझे मार भगाएँगे .” और सभी कौवे मैना को मारने के लिए उसकी ओर दौड़ पड़े.

 

कौवों को काँव-काँव करते हुए अपनी ओर आते देखकर मैना वहाँ से जान बचाकर भागी . वहाँ से थोड़ी दूर एक आम के पेड़ पर अकेले ही रात बिताने के लिए मैना एक कोने में छिपकर बैठ गई.

 

रात में तेज हवा चली. कुछ देर बाद बादल बरसने लगे और इसके साथ ही बड़े-बड़े ओले भी पड़ने लगे . ओलों की मार से बहुत से कौवे घायल होकर जमीन पर गिरने लगे. कुछ तो मर भी गए .

 

मैना आम के जिस पेड़ पर बैठी थी, उस पेड़ की एक डाल टूट गई . आम की वह डाल अन्दर से खोखली थी . डाल टूटने की वजह से डाल के अन्दर के खाली स्थान में मैना छिप गई . डाल में छिप जाने की वजह से मैना को न तो हवा लगी और न ही ओले ही उसका कुछ बिगाड़ पाए . वह रात भर आराम से बैठी रही.

 

सवेरा होने पर जब सूरज निकला, तो मैना उस खोह से निकली और खुशी से गाती-नाचती हुई ईश्वर को प्रणाम किया.  फिर आकाश में उड़ चली . मैना को आराम से उड़ते हुए देखकर, जमीन पर पड़े घायल कौवों ने कहा, “अरी मैना बहन, तुम रात को कहाँ थीं? तुम्हें ओलों की मार से किसने बचाया?”

 

मैना बोली, “मैं आम की डाली पर बैठी ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि हे ईश्वर! दुखी और असहाय लोगों की रक्षा करना.  उसने मेरी प्रार्थना सुन ली और उसी ने मेरी भी रक्षा की .”

 

मैना फिर बोली, “हे कौवों सुनो, भगवान ने केवल मेरी रक्षा ही नहीं की . वह तो जो भी उस पर विश्वास करता है और उसकी प्रार्थना करता है, उसे याद करता है, तथा भरोसा करता है, ईश्वर उसकी रक्षा अवश्य ही करता है और कठिन समय में उसे बचाता भी है .”

 

 

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बंटी आज जब स्कूल से आया तो फिर उसने घर पर ताला देखा . घर की सीढ़ियों पर वह अपना बैग रख कर बैठ गया . उसे भूख लगी थी और वह थका हुआ भी था . वह सोचने लगा, काश मेरी माँ भी राजू की माँ की तरह ही घर पर ही होती .

मैं स्कूल से आता तो मुझे स्कूल के हाल-चाल पूछती, मेरे लिये गरम-गरम खाना बनाती और मुझे प्यार से खिलाती .  सचमुच कितना खुशनसीब है राजू! इन्ही विचारों में खोए बंटी की न जाने कब आँख लग गयी .

 

 

वह वहीं बैठे-बैठे ऊँघने लगा.  कुछ देर में माँ दफ्तर से आई और बोली, “बंटी, उठो बेटे, चलो अंदर चलो” . बंटी उकताए हुए स्वर में बोला, “ओफ-ओ माँ, तुमने कितनी देर लगा दी, मैं कब से तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा हूँ . तुम्हे मालूम है, मुझे कितनी ज़ोरों की भूख लगी है.  मेरे पेट में चूहे दौड़ रहे हैं”.

माँ बंटी को पुचकारते हुए बोली, “देखो, मैं अभी तुम्हारी थकावट दूर करती हूँ . खाना गरम कर के अभी परोसती हूँ” . ऐसा कहते हुए माँ ने ताला खोला, जल्दी से अपना पर्स सोफे पर फेंकत हुए माँ किचन में जा घुसी . “बंटी, जल्दी से कपड़े बदलो, दो मिनट में खाना आ रहा है” . बंटी सोफे पर फिर से ऊँघने लगा . माँ ने आ कर बंटी को उठाया और उसे बाथरूम में धकेला.

 

बंटी ने हाथ- मुँह धोए और खाने की मेज़ पर जा बैठा . खाना खाते-खाते बंटी कुछ सोचने लगा.  उसे वे दिन याद आने लगे जब पापा भी थे.  घर खुशियों का फव्वारा बना रहता था.  पापा की हँसी, पापा के चुटकुले सारे घर को रंगीन बना देते थे.  पापा प्यार से उसे मिठ्ठू बुलाते थे. बंटी की कोई भी परेशानी होती, पापा के पास सब के हल होते, मानो परेशानियाँ पापा के सामने जाने से डरती हों.

 

 

 

 

कितने बहादुर थे पापा . एक बार उसे याद है जब पापा दफ्तर से आईस्क्रीम ले कर आए थे.  तीनों की अलग-अलग फ्लेवर वाली आईस्क्रीम! घर तक आते-आते आईस्क्रीम पिघल चुकी थी और माँ ने कहा था, “तुम भी बस…! क्या इतनी गर्मी में आईस्क्रीम यूँ ही जमी रहेगी”? और पापा ने तीनों आईस्क्रीमों को मिला कर नए फ्लेवर वाला मिल्क-शेक बनाया था.

अचानक माँ का कोमल हाथ उसके बालों को सहलाने लगा. वह मानो नींद से जाग उठा हो.  माँ ने कहा, “क्या बात है? आज तुम बड़े गुम-सुम से दिखाई दे रहे हो.  कहीं आज फिर से तो अजय से झगड़ा नहीं हुआ, या फिर तुम्हारी टीम क्रिकेट के मैच में हार गई”?

 

बंटी ने कहा, “माँ, पता नहीं क्यों आज मुझे पापा की बड़ी याद आ रही है. पापा को भगवान ने अपने पास क्यों बुला लिया”?

 

 

इतना सुनते ही माँ ने जोर से बंटी को गले से लगा लिया और उसकी आँखें आसुँओं से लबा-लब भर गायें.  माँ की सिसकियाँ बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.  यह देख कर बंटी का उदास मन कुछ और उदास हो गया .

 

 

 

उसे लगा जैसे इसी क्षण वह बहुत बड़ा हो गया है और माँ का उत्तरदायित्व उसी के कन्धे पर आ गिरा है .  उसने ठान लिया कि वह अपने आसुँओं से माँ को कमज़ोर नहीं होने देगा.

 

 

 

कितनी मेहनती है माँ! घर का, बाहर का सारा काम कर के वह उसे हमेशा खुश रखने की कोशिश करती है.  अब वह कभी नहीं रोयेगा.  वह पापा की तरह बनेगा, हमेशा खुशियाँ बाँटने वाला और तकलीफों पर पाँव रख कर आगे बढ़ने वाला.

 

 

वह माँ को बहुत सुख देगा.  उसे हमेशा खुश रखेगा.  इतना सोचते-सोचते वह जल्दी-जल्दी खाना खाने लगा.

अगले दिन उठ कर बंटी ने अपनी गुल्लक से पाँच रूपये का नोट निकाला.  माँ से छिपाकर, जेब में डालते हुए वह स्कूल की ओर चल पड़ा.  ये पैसे वह ऐरो-मॉडलिंग के लिये बचा रहा था.

 

 

 

उसे नये-नये छोटे-छोटे लड़ाकू विमान बनाने का बहुत शौक था.  पर आज यह पैसे किसी और मकसद के लिये थे.  स्कूल से आ कर वह माँ से बोला, “माँ देखो तो मैं तुम्हारे लिये क्या लाया हूँ! ये रही तुम्हारी फ्रूट एैंड नट आईस्क्रीम और मेरी चॉकलेट आईस्क्रीम.

 

 

लिफाफा आगे बढ़ाया तो देखा, दोनो आईस्क्रीमें घुल कर एक हो गई थीं.  माँ ने कहा, “तुम भी बस… क्या इतनी गर्मी में… ”. और बंटी ने वाक्य पूरा करते हुए कहा, “आईस्क्रीम यूँ ही जमी रहेगी”? और दोनों ज़ोर से खिलखिलाकर हँस दिये.

 

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