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Bhakti Story

bhakti kahani

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Written by Hindibeststory

bhakti kahani महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे.एक बार की बात सरस्वती नदी के तट पर तमाम ऋषि – मुनि इकट्ठा हुए थे और तभी इस बात पर चर्चा होने लगी की तीनों देवों ” ब्रह्मा, विष्णु और महेश ” में से कौन सबसे बड़ा है. बहस काफी बढ़ गयी, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला तो ऋषि – मुनियों ने तीनो देवों की परीक्षा लेनी का निश्चय किया और इसके लिए भृगु ऋषि को नियुक्त किया गया.

महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के पास गए. उन्होंने ब्रह्मा जी को ना तो प्रणाम किया और ना ही स्तुति की. यह देखकर ब्रह्मा जी क्रोधित हो गए और उनका चेहरा अंगार की तरह दहकने लगा. वे श्राप देने ही वाले थे कि उन्होंने सोचा यह मेरा ही पुत्र है और उन्होंने अपने क्रोध को अपने योग से दबा लिया.

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वहाँ से भृगु ऋषि कैलाश पहुंचे. जब वहा भगवान् भोले ने देखा की भृगु ऋषि आ रहे हैं तो उन्होंने आलिंगन करने के लियए भुजाये फैला दीं , लेकिन भृगु ऋषि उनका अस्वीकार करते हुए बोले ” महादेव ! आप सदैव ही वेदों और धर्म की मर्यादा का उलंघन करते हैं और उससे सृष्टि पर संकट आ जाता है. अतः मैं आपका आलिंगन स्वीकार नहीं करूँगा. ”

यह सुनते ही भगवान् शिव क्रोधित हो गए और अपना त्रिशूल उठा लिया, लेकिन माता पार्वती ने किसी तरह उन्हें शांत कराया. अब भृगु ऋषि वैकुण्ठ गए. वहा पहुंचते ही द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया. इससे वे बहुत क्रोधित हुए और द्वारपालों श्राप देने के साथ ही वे अन्दर प्रवेश कर गए और भगवान् विष्णु को निद्रा में देखकर वे बहुत क्रोधित हुय्ये और उन्होंने भगवान् विष्णु के वक्ष स्थल पर एक लात मारी.

लात लगते ही भगवन की निद्रा भंग हो गयी. उन्होंने पास भृगु ऋषि को देखा तो अपने आसन से उठ खड़े हुए और भृगु ऋषि के पैर को सहलाते हुए बोले ” ऋषिवर !आपके पैर में चोट तो नहीं लगी. कृपया आसन ग्रहण करें. मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञात नहीं था. इसीलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका . मुझे क्षमा करें ऋषिवर. आपके चरण स्पर्श से मैं धन्य हो गया “.

भगवान् विष्णु के इस प्रेम – व्यवहार को देखकर भृगु ऋषि की आखों से अश्रु बहने लगे. उसके बाद वे ऋषि – मुनियों के पास लौट आये और पूरी घटना विस्तार से बतायी. उसके बाद सभी ऋषि – मुनि ने भगवान् विष्णु को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया .

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