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Bhakti Story

मकरध्वज की कथा

मकरध्वज की कथा
मकरध्वज की कथा
Written by Hindibeststory

मकरध्वज की कथा mahabali hanuman को बाल ब्रह्मचारी कहा जाता है. हालाँकि पुराणों में उनके विवाह का वर्णन है जहाँ उन्हें भगवान सूर्यनारायण की पुत्री सुवर्चला से विवाह करना पड़ा था. किन्तु ये विवाह केवल उनकी शिक्षा पूर्ण करने के लिए था और इसके अतिरिक्त उन दोनों में कोई और सम्बन्ध नहीं रहा. इसके साथ ही रामायण में हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज का वर्णन है. आज हम हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज के बारे में बताने जा रहे हैं.

यह कथा यहाँ से शुरू करते हैं जब रावण अपने भाई अहिरावण को सहायता के लिए बुलाता है और अहिरावण अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर लेता है. जब सबको पता चलता है कि श्रीराम और लक्ष्मण शिविर में नहीं हैं तो सभी चिंतित हो जाते हैं. विभीषण द्वारा ये पुष्टि करने पर कि दोनों भाइयों को अहिरावण ले गया है, हनुमान उन्हें मुक्त करवाने पाताल लोक पहुँचते हैं. जब वे पाताल लोक के मुख्य द्वार पर पहुँचते हैं तो उन्हें वहाँ एक वानर द्वार की रक्षा करते हुए दिखता है. एक वानर को इस प्रकार अहिरावन के महल की करते देख हनुमान जी बड़े हैरान हो जाते हैं. वे उसके पास जाते हैं और उसका परिचय पूछते हैं. तब मकरध्वज अपना परिचय बताते हुए कहते हैं की मैं हनुमान पुत्र मकरध्वज हूँ . इस पर हनुमाज जी बहुत क्रोधित होते हैं. वे कहते हैं ‘हे वानर! तुम वेश भूषा से ज्ञानी लगते हो किन्तु तुम्हे इस प्रकार असत्य वचन नहीं बोलना चाहिए। हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी है। फिर किस प्रकार तुम उनके पुत्र हो सकते हो?’

इसपर मकरध्वर कहते है – ‘हे ज्येष्ठ! मैं असत्य वचन नहीं कहता. मेरे पिता हनुमान जी ही हैं. मैं आपको पूरी बात बताता हूँ. मेरे पिताश्री को जब महाराज रावण ने लंका में बंदी बनाया तो उनकी पूछ में आग लगा दी. उसी अग्नि से मेरे पिता हनुमान ने पूरी लंका को जला डाला. लंका नगरी के जलने के कारण उत्पन्न हुए ताप से हनुमान व्यथित हो गए और शीतलता के लिए समुद्र के जल में उतर गए. इतने श्रम को करने के कारण उनके शरीर से स्वेद गिरने लगा जिसे उसी समुद्र में रहने वाली एक मकर ने निगल लिया. महापराक्रमी हनुमान के स्वेद को निगलने के कारण वो मकर गर्भवती हो गयी. कुछ समय के पश्चात मेरे स्वामी अहिरावण ने शिकार कर उस मकर को पकड़ा और जब उसका उदर चीरा गया तो उसी से मेरी उत्पत्ति हुई. मकर के शरीर से उत्पन्न होने के कारण महाराज अहिरावण ने मेरा नाम मकरध्वज रखा.’उसे इस प्रकार बोलते देख कर हनुमान ने कहा – ‘तुम्हे अपने जन्म का रहस्य कैसे पता चला? अगर ये रहस्य तुम्हे अहिरावण ने बताया है तो इसकी सत्यता पर मुझे संदेह है क्यूंकि राक्षस इस प्रकार की कहानी बनाने में माहिर हैं.’ तब मकर ध्वज ने कहा – ‘कपिश्रेष्ठ! ये कथा मुझे अहिरावण ने नहीं अपितु स्वयं देवर्षि नारद ने सुनाई है।’ इसपर हनुमान ने कहा – ‘अगर ये कथन देवर्षि का है तब तो ये निश्चय ही सत्य होगा.’ इसपर मकरध्वज ने कहा – ‘किन्तु आप ये प्रश्न क्यों कर रहे हैं? क्या आप मेरे पिता हनुमान को जानते हैं?’

तब हनुमान ने प्रसन्नतापूर्वक उसे अपना परिचय दिया।.अपने पिता को अपने सामने देख कर मकरध्वज उनके चरणों में गिर पड़ा और उन्हें अपने अश्रुओं से धो डाला. हनुमान ने उसे अपने ह्रदय से लगाया और कहा कि आज अपने पुत्र को अपने सामने देख कर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है. फिर उन्होंने कहा कि अहिरावण उनके आराध्य श्रीराम और उनके भाई लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर आया है. इसपर मकरध्वज ने भी इस बात की पुष्टि की कि आज ही अहिरावण दो वनवासियों को अचेतावस्था में अपने महल में लेकर आया है. तब हनुमान उनदोनों को छुड़ाने के लिए पाताल लोक में प्रवेश करना चाहते हैं किन्तु मकरध्वज उन्हें रोकते हुए कहता है – ‘हे पिताश्री! मैं विवश हूँ किन्तु मैं आपको पाताल लोक में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं दे सकता. ये सत्य है कि आप मेरे पिता हैं और आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा कर्तव्य है किन्तु फिर भी मैं अपने स्वामी के प्रति सेवा के कर्तव्य से बंधा हुआ हूँ। अतः अगर आप अंदर जाना चाहते हैं तो आपको मुझसे युद्ध करना होगा.’तब हनुमान जी ने मकरध्वज के साथ युद्ध किया और दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. मकरध्वज निश्चय ही पराक्रमी थे किन्तु हनुमान के बल को कौन पार पा सका है? हनुमान उसे अंततः परास्त कर देते हैं और उसे उसी की पूछ से बांध कर वही द्वार पर छोड़ देते हैं. फिर अहिरावण की यञशाला में जाकर हनुमान पंचमुखी रूप धारण करते हैं और पांच दीपकों को एक साथ बुझाते हैं जिससे अहिरावण का अंत हो जाता है. इस प्रकार हनुमान श्रीराम और लक्ष्मण को अहिरावण की कैद से छुड़ा कर बाहर आते हैं. वहाँ द्वार पर एक वानर को उसी की पूँछ में जकड़ा देख कर श्रीराम हनुमान से पूछते हैं कि ये कौन है? तब हनुमान उन्हें बताते हैं कि वो उनका पुत्र मकरध्वज है. ये जानने के बाद श्रीराम उसे कैद से मुक्त करते हैं और वही उसका राज्याभिषेक कर मकरध्वज को पाताल लोक का राजा बना देते हैं.

मकरध्वज के पुत्र का विवरण भी हमें रामायण में मिलता है. उसके पुत्र का नाम मोदध्वज था और मोदध्वज के पुत्र का नाम जेठीध्वज था. मकरध्वज के पौत्र जेठीध्वज के नाम पर ही क्षत्रियों की एक शाखा ‘जेठवा’ चली. आज भी जेठवा समाज स्वयं को मकरध्वज का वंशज मानते हैं और हनुमान उनके आराध्यदेव कहलाते हैं. भारत देश में मकरध्वज के कई मंदिर है. जिसमें प्रमुख मंदिर पोरबंदर के ओड़ाडार गाँव में है. इसके अलांवा मकरध्वज का मंदिर गुजरात के ही कच्छ जिले के शंकोधर में , महाराष्ट्र के बीड जिले के वाडवाणी , मध्यप्रदेश के ग्वालियर , राजस्थान के बीवर में स्थित है. मित्रों आपको यह bhakti story in hindi मकरध्वज की कथा कैसी लगी जरुर बताएं और इस तरह की और भी bhakti story in hindi के लिए इस ब्लॉग को लाइक , शेयर और सबस्क्राइब करें और दूसरी bhakti story in hindi के लिए इस लिंक bhakti kahani पर क्लिक करें.

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