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चौरी चौरा काण्ड

चौरी चौरा काण्ड
चौरी चौरा काण्ड

चौरी चौरा काण्ड ५ फ़रवरी १९२२ को उत्तर प्रदेश के gorakhpur के चौरी चौरा कस्बे में हुआ था. इस काण्ड में भारतीयों ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी, जिसमें २२ पुलिसकर्मियों सहित ३४ लोग मारे गए. इस घटना के बाद महात्मा गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था. तब गांधीजी ने कहा था कि यह आन्दोलन अब हिंसात्मक हो गया है अतः इसे वापस लिया जाना चाहिए. हालाकि भगत सिंह , चंद्रशेखर आज़ाद आदि ने इसका विरोध किया और इस आन्दोलन से अलग हो. चौरी चौरा काण्ड के अभियुक्तों का मुकदमा मदन मोहन मालवीय ने लड़ा .

जब ब्रिटिश हुकूमत का अत्याचार अपने चरम पर था और पुरे देश में आज़ादी की लहर चल रही थी. उसी समय गांधी जी असहयोग आन्दोलन का आह्वान किया, उसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया. असहयोग आन्दोलन का मुख्य लक्ष्य अंग्रेजों को आर्थिक रूप से कमजोर करना और उनके खिलाफ पुरे देश में माहौल बनाना था. उनके इस जुलुस में हर कोई जुड़ रहा था चाहे वह गरम दल के हो या फिर नरम दल के. उनका यह आन्दोलन रंग ला रहा था और इससे अंग्रेजी हुकूमत की चिन्ता बढ़ गयी थी.

चौरी चौरा काण्ड
चौरी चौरा काण्ड

शनिवार ४ फ़रवरी १९२२ को chauri chaura की भोपा बाजार में सत्याग्रही इकठ्ठा हुए और जुलुस की शक्ल में थाने के सामने से गुजरने लगे. उस समय के तत्कालीन थानेदार ने इसे अवैध करार दे दिया और जुलुस को रोकने लगे. बात उस समय अधिक बिगड़ गयी जब एक सिपाही ने किसी एक सत्याग्रही की गांधी टोपी को पैरों से कुचल दिया . अपने नेता के सम्मान में पहनी जाने वाली टोपी के इस अपमान पर सत्याग्रही भड़क गए और नारेबाजी के साथ इसका विरोध करने लगे. जिससे जवाब में पोलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. इससे ११ सत्याग्रही मौके पर ही शहीद हो गए और करीब ५० से अधिक की संख्या में घायल हुए.

इसी बीच पुलिस की गोलियां समाप्त हो गयी और सत्याग्रहियों की भीड़ बढती गयी. भीड़ बढ़ते देख सिपाही डरकर थाने की तरफ भागने लगे. फायरिंग से आक्रोशित भीड़ ने उन्हें दौड़ा लिया और मूंझ और सरपत ( एक तरह की घास जिसमें आग जल्द पकड़ लेती है ) को थाने में बिछाकर उस मिटटी का तेल उड़ेलकर उसमे आग लगा दी. आग से बचने के लिए जब थानेदार भागना चाहा तो लोगों ने उसे पकड़कर आग में झोक दिया. किसी तरह से एक सिपाही बचाकर भगा और झंगहा के कलेक्टर को इसकी सूचना. जब तक फ़ोर्स के साथ मौके पर पहुंचाते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया था.

इस आग की चपेट में थानेदार गुप्तेश्वर सिंह, दरोगा पृथ्वीपाल सिंह, हेड कांस्टेबल व्वाशिर खां, लखी सिंह, रघुवीर सिंह, कपिल देव सिंह, लखई सिंह, विशेसर राम यादव, मुहम्मद अली, जमां खां, मंगरू चौबे, रामबली पाण्डेय, घिसई, इन्द्रासन सिंह, रामलखन सिंह, जगदेव सिंह, जगई सिंह , मर्दाना खां, घिन्सई, कतवारू, जथई, गदाबख्श खां , कपिल देव आदि की मृत्यु हो गयी. इससे क्रोधित अंग्रेजी हुकूमत ने सैकड़ों लोगो को अभियुक्त बनाया.

इस घटना के कारण गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन को वापस ले लिया. जिससे गरम दल के क्रांतिकारी गांधीजी से अलग हो गए और जैसे को तैसा की निति पर काम करना शुरू कर दिया. इस घटना के लिए gorakhpur सत्र न्यायलय ने १७२ अभियुक्तों को मौत की सजा, दो को दो साल की कैद और ४७ को संदेह के लाभ में बरी कर दिया. इस फैसले के खिलाफ जिला कांग्रेस कमिटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दाखिल की . अभियुक्तों का केस मदन मोहन मालवीय ने लड़ा.


मुख्य न्यायाधीश सर ग्रिमउड पीयर्स तथा न्यायमूर्ति पीगट ने सुनवाई शुरू की. ३० अप्रेल १९२३ को आये इसके फैसले में १९ को मृत्युदंड, १६ को काला पानी, ८ को ५ और २ साल की सजा और ३ को दंगा भड़काने के आरोप में ३ साल की सजा सुनाई गयी. इसमें ३८ को बरी कर दिया गया.

इस घटना को मुख्या रूप से अंजाम देने के लिए अब्दुल्ला, भगवान, विक्रम, दुदही, काली चरण, लाल मुहम्मद, लौटी, महादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रूदाली, सहदेव, सम्पत , संपत, श्याम सुंदर व सीताराम को घटना के लिए दोषी मानते हुए फांसी दे दी गई. चौरी चौरा काण्ड indian freedom incident  की संभवतः ऐसी पहली घटना है जिसमें अपनी डयूटी को निष्ठापूर्वक करते हुए सिपाहियों ने अपनी जान गवाई और देश की आज़ादी के दीवाने देश के लिए शहीद हुए. आज भी इस दिन थाने के पास बनी समाधि पर पुलिसकर्मी उनकी निष्ठा के लिए श्रद्धांजलि देते हैं और शहीदों को पूरा देश नमन करता है. इस घटना के बाद से ही chauri chaura incident इतिहास के पन्नो में सदा के लिए अमर हो गया. मित्रों यह जानकारी चौरी चौरा काण्ड आपको कैसी लगी, अवश्य बताएं और भी जानकारी की लिए इस ब्लॉग को सबस्क्राइब करें और दूसरी जानकारी के लिए इस लिन्क पर क्लिक https://www.hindibeststory.com/biography-of-maharana-pratap-panna-dhay-part-2/ करें.

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