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Chhath Puja 2019 . कैसे मनाई जाती है छठ पूजा . छठ पूजा २०१९ हिंदी में

Chhath Puja Story
Written by Abhishek Pandey

Chhath Puja २०१९ Date.  छठ पूजा २०१९ Chhath Puja Story छठ पूजा की कथा

 

 

Chhath Puja उत्तर भारत का महापर्व है. जिसे खासकर बिहार, उत्तरप्रदेश और झारखण्ड में मनाया जाता है. इस  वर्ष २०१९ में छठ २ नवम्बर शनिवार को है.      इस पर्व में जाती-पांति, धर्म, वर्ग, सम्प्रदाय का कोई भेदभाव नहीं होता है. यह महापर्व प्रकृति को समर्पित है. इसमें chhathi maiya  और भगवान सूर्य की उपासना की जाती है.

 

 

chhath  का यह  महापर्व आदिकाल से मनाया जा रहा है. इससे जुडी पौराणिक कथा के अनुसार बहुत समय पहले एक राजा थे जिनका नाम प्रियव्रत था और उनकी पत्नी का नाम मालिनी था.

 

 

 छठ पूजा की कहानी

 

 

 

दोनों को कोई संतान नहीं थी. इससे राजा रानी बहुत निराश रहते थे. एक बार उन्होने महर्षि कश्यप से पुत्र प्राप्ति की ( पुत्रेष्टी ) यज्ञ करवाई, जिसके फलस्वरूप रानी गर्भवती हुईं, लेकिन निश्चित समय पर  मृत बालक का जन्म हुआ.

 

 

इससे राजा बेहद दुखी हुए. और उन्होंने आत्महत्या करने की सोची. जब वे आत्महत्या करने जा रही थे तो वहाँ एक देवी प्रकट हुईं और उन्होने कहा कि मैं ” छठी देवी ” हूँ…जो भी भक्ति भाव और नियम पूर्वक मेरी उपासना करता है मैं उन्हें अवश्य ही पुत्र प्राप्ति का वरदान देती हूँ.

 

 

 

उसके बाद राजा ने देवी के द्वारा बताये गए नियम पूर्वक कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी के दिन पुरे विधि विधान से पूजा की. जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई और तभी से छठ का त्यौहार मनाया जाने लगा.

 

 

मान्यता है कि chhath puja की शुरुवात त्रेता युग में हुई थी. भगवान श्रीराम लंका पर जीत हासिल करने  के बाद जब अयोद्धा वापस लौट रहे थे तब उन्होंने कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को chhathi maiya की पूजा की थी और भगवान आदित्य की पूजा की थी तब से यह पर्व मनाया जाने लगा.

 

 

 

इसके बाद द्वापर में सुर्यपुत्र कर्ण ने भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर उनकी उपासना की. भगवान सूर्य की कृपा से उन्हें बहुत ही सम्मान मिला. भगवान आदित्य की कृपा से कर्ण के एक अजीब तेज था. कई मान्यताओं के अनुसार द्रौपदी ने भी छठी मां का व्रत अपने परिवार की सुख शान्ति के लिए किया था.

 

 

Chhath Puja History छठ पूजा का इतिहास

 

 

उत्तर भारत में खासकर बिहार में मनाया जाने वाला लोकपर्व छठ बिहार का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है. यह लोक आस्था का पर्व है, जिसमें प्रकृति की पूजा होती है.

 

 

 

लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिन छठी मैया की पूजा इस पर्व में की जाती है वे कौन थी…आईये हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से बताते हैं कि छठी मैया कौन थीं.

 

 

 

धार्मिक ग्रन्थ ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार देवी के नौ रूपों में से छठवें रूप को ही छठी मैया के नाम से जाना जाता है. इन्हें भगवान ब्रह्मदेव की मानस  पुत्री कहा जाता है.

 

 

 

कहा जाता है  जिन लोगों को पुत्र की प्राप्ति नहीं हो रही है वे अगर भक्ति  भाव और नियम पूर्वक इन देवी की आराधना करें तो उन्हें अवश्य ही पुत्र प्राप्ति होती हैं.  देवी के नौ स्वरूपों में से छठे रुप को  कात्यायनी कहा  जाता है.

 

 

 

आप लोगों ने यह कभी सोचा है कि छठ मैया के साथ सूर्यदेव की पूजा क्यों होती है. तो आईये आज हम आपको बताते हैं ऐसा क्यों होता है. इसके पीछे कई तरह की मान्यताएं हैं .

 

 

 

कहा जाता है कि छठी मां को ” अंश ” प्रदान करने वाली माना गया है और सूर्य देव प्रक्रति के प्रतीकों में से एक हैं. छठ पर्व में अंश और प्रकृति दोनों को पाने की कामना की जाती है.

 

 

 

इस त्यौहार के लोकगीतों में भी यह दिखाई देता है. छठ पूजा में व्रती मां से संतान भगवान सूर्य से अन्न धन , सुख शान्ति की कामना करते हैं. इससे खुश होकर छठी मैया और भगवान  सूर्य देव व्रतियों की मनिकमाना अवश्य ही पूरा करते हैं.

 

 

Chhath Puja- Bihar’ s Biggest Festival

 

 

यह त्यौहार विशेषकर भारत के बिहार राज्य में मनाया जाता है, लेकिन अब यह उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और झारखण्ड आदि के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाने लगा है.

 

 

 

इसके अलावा इस त्यौहार की पहुँच वहाँ तक है जहां जहां बिहार के लोग रहते  हैं. यह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तथा देश के अन्य भागों में भी मनाया जाता है.

 

 

इन सबके अतिरिक्त विदेशों में बसे बिहार के लोह इसे विदेशों में भी मनाते हैं. यह बिहार का प्रमुख त्यौहार होने के साथ ही वहाँ की सस्कृति का एक हिस्सा भी हो चुका है.

 

 

हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार यह पर्व हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है. इस त्यौहार में भगवान सूर्य देव और chhath maiya की पूजा किया जाता है.

 

 

 

इस त्यौहार को मनाने के लिए भारत के अन्य शहरों में अपनी रोजी रोटी के लिए  गए बिहार के लोग बिहार की तरफ वापस लौटते हैं और इस क्रम में ट्रेनों आदि में बहुत भारी भीड़ रहती है.

 

 

 

 छठ पूजा  की शुरुवात नहाय खाय से शुरू होती है और दुसरे  दिन निर्जला उपवास रखा जाता है अर्थात इस दौरान जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है .

 

 

 

तीसरे दिन के संध्या समय और उसकी अगली सुबह को पवित्र नदी, तालाव में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. कई जगहों पर इसके लिए  कृतिम  तालाव का निर्माण किया जाता है.

 

 

आज के समय में इस त्यौहार पर भी राजनितिक पार्टियों का कब्जा हो गया है, इसमें उनके द्वारा अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया जाता है. कुछ समाजसेवी संस्थाए भी इस त्यौहार को सफल बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान देती हैं.

 

 

 

कहा जाता है कि chhath maiya अपने भक्तों की प्रत्येक मनोकामना को पूरा करती हैं. यह एक मात्र त्यौहार है जिसमें डूबते हुए सूर्य की उपासना की जाती है.

 

 

 

छठ पूजा कैसे मनाते हैं? Chhath Puja Vidhi

 

 

छठ पूजा बिहार का प्रमुख और प्रसिद्ध त्यौहार है. इसे बिहारवासी उन अन्य क्षेत्रों में बनाते हैं जहां वे रहते हैं . आज के समय में यह त्यौहार बिहार के साथ ही दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि शहरों के साथ ही विदेशों में भी मनाया जाता है.

 

 

 

यह लोक आस्था का पर्व है जो कि हर वर्ष कार्तिक माह की चतुर्थी से  शुरू होकर सप्तमी तक चलता है. यह नहाय खाय से शुरू भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही समाप्त होता  है.

 

 

नहाय खाय  इस पर्व की शुरुवात नहाय खाय से होती है. इस दिन लोग अपने घरों और आस पास के जगह को साफ सुथरा करते हैं. उसके बाद स्नान करके तन और मन को शुद्ध करके शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करते है.

 

 

खरना इस पर्व के दुसरे दिन को खरना कहा जाता है. इस दिन निर्जल उपवास रखा जाता है अर्थात पुरे दिन जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है. शाम को गन्ने का जूस या फिर गुड़ की खीर का प्रसाद बांटा जाता है.

 

 

संध्याकाळ का अर्घ्य इस पर्व के तीसरे दिन को संध्याकाळ के समय नदी या तलाव में खड़े होकर भगवान भास्कर  को अर्घ्य दिया जाता है. इस दिन भी उपवास ही रखा जाता है और यह पहला त्यौहार है जिसमें डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

 

 

 

अर्घ्य के बाद रात्री में chhathi maiya के गीत गाय्ये जाते हैं और व्रत की कथा सुनी जाती है. माना जाता है कि ऐसा करने से बहुत अधिक फल प्राप्त होता है.

 

 

 

सुबह का अर्घ्य चौथे दिन भोर में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता  है. उसके बाद chhathi maiya से परिवार में सुख और शान्ति की कामना की जाती है. उसके बाद लोगों को प्रसाद दिया जाता है और व्रती भी प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोल लेती हैं.

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