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durvasa maharishi

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durvasa maharishi आज इस पोस्ट में हम आपको ऋषि दुर्वाषा के बारे में बताने जा रहे हैं. ऋषि दुर्वाषा स्वाभाव से बहुत ही क्रोधी थे. क्रोध में अक्सर वह श्राप दे देते थे. लेकिन अगर वह किसी पर प्रसन्न होते थे तो उसकी हर मनोकामना को पूरा करते थे. उनके क्रोध के कारण हर कोई उनसे डरता था. ऋषि दुर्वाषा माता अनुसुइया के पुत्र हैं. उन्हें sati ansuya ने भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्राप्त किया था. महर्षि दुर्वासा का आश्रम उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में है.

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माता अनुसुइया और उनके पति अत्री दुर्वाषा जी के इस व्यवहार से बहुत ही चिंतित और दुखी थे. दुर्वासा जी का जन्म सतयुग के प्रारंभ में ही हुआ था. वे एक महान तपस्वी थे. उनके तपोबल में इतनी शक्ति थी कि उनके द्वारा कही गयी बात को विधाता भी टाल नहीं सकते थे. एक बार की बात है जब शिव जी के विवाह का निमंत्रण मिलाने पर माता अनुसुइया दुर्वाषा जी के साथ कैलाश पर गयीं जहां उन्हें maharshi durvasa  के साथ देख नारद मुनि ने sati ansuya  से कहा की आप दुर्वाशा जी के साथ आई हैं कहीं ये अपने क्रोध के कारण कोई अनिष्ट ना कर दें.

इस पर sati ansuya ने कहा कैसी बात कर रहे हैं मुनिवर….दुर्वाशा भगवान भोले के अनन्य भक्त हैं और वे ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे किसी को कुछ परेशानी हो…लेकिन हुआ वही जिसका नारद जी को डर था. सब कुछ बहुत ही सुखद चल रहा था. सभी देवी देवता आपसी मतभेदों को भुलाकर पुरे हर्ष और उल्लास से महादेव की बरात में शामिल होने पहुंचे थे.

सभी विधियां एक एक कर संपन्न की जा रही थीं. महादेव का पहले भस्म फिर दूध और फिर जल से अभिषेक किया गया और इसके उपरांत भगवान नीलकंठ को भांग का भोग लगाया गया और यही प्रसाद वहाँ मौजूद अन्य लोगों को दिया गया. इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद वहाँ का माहौल एकदम से बदल gaya  और सभी लोग भांग के नशे में झुमने लगे और इसी बीच भगवान के शिव के किसी गण ने maharshi durvasa से अभद्र व्यवहार कर दिया. उसके बाद maharshi durvasa अत्यन्त क्रोधित हो गए और श्राप दे दिया की तुम लोगों ने जिस रूप में मेरा अपमान किया है इस रूप को देखकर कन्यापक्ष के लोग मूर्छित हो जायेंगे और भगवान शिव का इस वैरागी रूप में विवाह नहीं होगा.

तब देवर्षि नारद ने उन्हें इस श्राप का एहसास करवाया…तब उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. उन्होंने कहा हे भगवन मैंने क्रोध में आकर इतना बड़ा अनर्थ कर दिया मुझें क्षमा करें दीनदयाल….क्षमा करें. तब भगवान श्री नारायण ने कहा कि यह सब नियति का खेल है. आप तो मात्र एक साधन हैं. यह नियति ने पहले सी ही तय कर रखा था. मित्रों यह bhakti story  durvasa maharishi आपको कैसी लगी हमें अवश्य ही बताएं और भी अन्य bhakti stories के लिए इस लिंक Swastik ka Rahasya Bhakti kahani पर क्लिक करें.

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