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Durvasa Rishi ki Jivni . महर्षि दुर्वासा की कथा . सती अनसुइया की कथा .

Maharshi Durvasa
Written by Abhishek Pandey

Durvasa Rishi ka Shraap कौन थे दुर्वासा ऋषि

 

 

Durvasa  महर्षि दुर्वासा एक महान ऋषि थे और उन्हें इसीलिए “महर्षि ” की उपाधि प्राप्त थी. महर्षि दुर्वासा माता अनुसुइया और ऋषि अत्री के पुत्र थे.

 

 

 

महर्षि दुर्वासा सतयुग, द्वापर और त्रेता तीनो ही युगों में थे. उनके दिए हुए श्राप और आशीर्वाद से कई घटनाएं हुई, जो की बड़े परिवर्तन का कारण बनी. आईये हम उनसे जुडी कुछ घटनाओं के बारे में जानते हैं.

 

 

ऋषि दुर्वाषा स्वाभाव से बहुत ही क्रोधी थे. क्रोध में अक्सर वह श्राप दे देते थे. लेकिन अगर वह किसी पर प्रसन्न होते थे तो उसकी हर मनोकामना को पूरा करते थे.

 

 

 

उनके क्रोध के कारण हर कोई उनसे डरता था. ऋषि दुर्वाषा माता अनुसुइया के पुत्र हैं. उन्हें सती अनसूया ने भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्राप्त किया था. महर्षि दुर्वासा का आश्रम उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में है.

 

 

 

माता अनुसुइया और उनके पति अत्री दुर्वाषा जी के इस व्यवहार से बहुत ही चिंतित और दुखी थे. दुर्वासा जी का जन्म सतयुग के प्रारंभ में ही हुआ था.

 

 

 

Maharshi Durvasa Story in Hindi जब सुदर्शन चक्र पड़ा महर्षि दुर्वासा के पीछे 

 

 

 

इक्ष्वाकु वंश के एक राजा थे अम्बरीश. अम्बरीष बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय राजा थे. उनके शासन में प्रजा बहुत ही खुश थी. वे प्रजा के हर सुख दुःख का ख्याल रखते थे. इसके साथ ही राजा अम्बरीश भगवान श्री हरी के परम भक्त थे.

 

 

 

 

उनकी भक्ति से भगवान नारायण बहुत अधिक प्रसन्न हुए और अपने sudarshan chakra का नियंत्रण राजा अम्बरीश के हाथ में सौंप दिया. यह भी भगवान की एक लीला थी. भगवान के प्रत्येक कार्य में भविष्य का सार छुपा होता है.

 

 

 

एक बार की बात है राजा अम्बरीश और उनकी धर्मपत्नी ने एकादसी का व्रत किया और उस व्रत के पारण में ब्राह्मणों को भोजन के लिये आमंत्रित किया गया था और उस निमंत्रण में महर्षि दुर्वासा भी आये थे.

 

 

 

भोजन करने के पहले महर्षि दुर्वासा यमुना जी में स्नान करने चले गए. इधर बहुत देर तक इन्तजार करने के बाद राजा अम्बरीश ने अन्य ब्राह्मणों से इस बारे में पूछा तो ब्राह्मणों ने कहा कि राजान आप पानी पी लीजिये या खाना खाने और ना खाने के बराबर होगा. ब्राह्मणों की बात मानकर राजा ने ऐसा ही किया.

 

 

 

 

जब राजा ने व्रत खोल लिया तो उसके कुछ देर बाद महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँछे और यह देख कि राजा ने उनके अनुपस्थिति में ही व्रत खोल लिया है बहुत क्रोधित हुए और क्रोध में उन्होंने कृत्या राक्षसी की रचना की और उसे राजा अम्बरिश पर आक्रमण का आदेश दे दिया.

 

 

 

अपने बचाव के लिए  राजा अम्बरीश ने sudarshan chakra का आह्वान किया और उसी क्षण सुदर्शन प्रकट हुआ और कृत्या राक्षसी का वध कर दिया और उसके बाद वह दुर्वासा ऋषि की तरफ बढ़ा.

 

 

 

अब durvasa अपने प्राण बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे…भागते भागते वे इंद्र देव के पास पहुंचे और अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं, लेकिन इन्द्रदेव ने इसमे अपनी असमर्थता जताते हुए उन्हें भगवान ब्रह्मा के पास भेज दिया. भगवान ब्रह्मदेव ने भी इसमे असमर्थता जताई और उन्हें भगवान भोलेनाथ के पास भेज दिया और बाबा भोले ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया.

 

 

 

भगवान विष्णु के पास पहुँचने पर महर्षि दुर्वासा ने पूरी बात बताई. तब भगवान विष्णु ने कहा की हर जगह क्रोध ठीक नहीं होता है. इसमें मैं भी कुछ करने में असमर्थ हूँ क्योंकि इस समय सुदर्शन चक्र का नियंत्रण राजा अम्बरीश के पास है अतः आपको वहीँ जाना होगा.

 

 

 

दुर्वासा जी को अपनी भूल का एहसास हो चुका था. वे तुरंत ही राजा के पास पहुंचे और सारी बात बताते हुए सुदर्शन को रोकने को कहा, तब राजा ने तुरंत ही सुदर्शन को रोक दिया.

 

 

 

Durvasa Rishi Ka Janam 

 

 

महर्षि दुर्वासा ऋषि अत्री और sati ansuya के पुत्र थे. वे स्वाभाव से बहुत ही क्रोधी थे. वे सतयुग, द्वापर और त्रेता तीनों ही युगों में रहे. ऋषि दुर्वासा एक महान तपस्वी थे और तपोबल से उनमें असीम शक्तियां थीं. उनकी कही गयी बात कभी भी खाली नहीं जाती थी. maharshi durvasa का आश्रम यु पी के आज़मगढ़ जिले के फूलपुर में स्थित है.

 

 

 

mata ansuya एक पतिव्रता स्त्री थीं और उन्हें इस बात का विश्वास था कि उनसे बड़ी पतिव्रता इस संसार में कोई नहीं है. जबकि तीनों देवियों मां लक्ष्मी, मां सरस्वती अकुर मां पारवती ने कहा कि उनसे बड़ी पतिव्रता कोई नहीं हो सकता.

 

 

 

इसी विषय पर विवाद चल रहा था. तब तीनों ही देवताओं ने माता अनुसुइया की परीक्षा लेने की सोची और उनकी परीक्षा लेने भगवान ब्रह्मदेव, भगवान शिव और भगवान नारायण उनके पास आये. तीनों ही देवताओं ने भिक्षुक का रूप बनाया और माता अनुसुइया से भिक्षा की मांग की और जब sati ansuya मिक्षा लेकर आयीं तो उन्होंने यह शर्त रख दी कि वे तभी भिक्षा ग्रहण करेंगे जब वे पूर्ण रूप ने निर्वस्त्र होकर भिक्षा देंगी.

 

 

 

यह मांग बहुत ही विचित्र थी और इससे सती अनसुइया का पतिव्रत टूट जाता. sati ansuya को इसमे अवश्य ही कोई कारण समझ आया. तब उन्होंने अपने पतिदेव महर्षि अत्री को यह बात बताई और जब महर्षि अत्री ने ध्यान लगाया  तो देखा कि तीनों ही देवता भिक्षुक बन कर आये हुए हैं.

 

 

 

तब ऋषि अत्री ने कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है आप उन्हें भिक्षा दे दो. उसके बाद जब सती अनसुइया भिक्षा लेकर आयीं और उन्होंने कहा कि आप लोग बालक बन जाएँ और उनके पतिव्रत के तेज से तीनों ही देवता बालक बन गए.

 

 

 

 

अब इधर तीनों ही देवियाँ बड़ी परेशान होने लगीं कि आखिर तीनों देवता वापस क्यों नहीं आये और जब उन्हें ढूढते हुए वे maharshi अत्री के आश्रम में आयीं तो देखा तीनों ही देवता बालक बने खेल रहें हैं.

 

 

 

उन तीनों ही देवियों ने अपने अपने पतियों को सती अनसुइया  से माँगा तब सती अनसुइया  ने कहा कि नहीं अब ये तीनों बालक यहीं रहेगे…हाँ यह अवश्य होगा की तीनों देवताओं के मूल स्वरुप आपके साथ रहें लेकिन यह बालक स्वरुप अब यही रहेंगे. तीनों देवियों को उनकी गलती का एहसास हो गया था. उन्होने सती अनसुइया  की बात को मान लिया. तीनों ही रूपों में भगवान महेश के  स्वरुप ही महर्षि दुर्वासा हुए.

 

 

Durvasa Rishi Ka Shraap

 

 

 

वे एक महान तपस्वी थे. उनके तपोबल में इतनी शक्ति थी कि उनके द्वारा कही गयी बात को विधाता भी टाल नहीं सकते थे. एक बार की बात है जब शिव जी के विवाह का निमंत्रण मिलाने पर माता अनुसुइया दुर्वाषा जी के साथ कैलाश पर गयीं जहां उन्हें महर्षि दुर्वासा  के साथ देख नारद मुनि ने सती अनुसुइया से कहा की आप दुर्वाशा जी के साथ आई हैं कहीं ये अपने क्रोध के कारण कोई अनिष्ट ना कर दें.

 

 

 

इस पर सती अनुसुइया ने कहा कैसी बात कर रहे हैं मुनिवर….दुर्वाशा भगवान भोले के अनन्य भक्त हैं और वे ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे किसी को कुछ परेशानी हो…लेकिन हुआ वही जिसका नारद जी को डर था. सब कुछ बहुत ही सुखद चल रहा था. सभी देवी देवता आपसी मतभेदों को भुलाकर पुरे हर्ष और उल्लास से महादेव की बरात में शामिल होने पहुंचे थे.

 

 

 

सभी विधियां एक एक कर संपन्न की जा रही थीं. महादेव का पहले भस्म फिर दूध और फिर जल से अभिषेक किया गया और इसके उपरांत भगवान नीलकंठ को भांग का भोग लगाया गया और यही प्रसाद वहाँ मौजूद अन्य लोगों को दिया गया.

 

 

महर्षि दुर्वासा की कहानी

 

 

 

इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद वहाँ का माहौल एकदम से बदल gaya  और सभी लोग भांग के नशे में झुमने लगे और इसी बीच भगवान के शिव के किसी गण ने महर्षि दुर्वासा से अभद्र व्यवहार कर दिया.

 

 

 

उसके बाद  महर्षि दुर्वासा  अत्यन्त क्रोधित हो गए और श्राप दे दिया की तुम लोगों ने जिस रूप में मेरा अपमान किया है इस रूप को देखकर कन्यापक्ष के लोग मूर्छित हो जायेंगे और भगवान शिव का इस वैरागी रूप में विवाह नहीं होगा.

 

 

तब देवर्षि नारद ने उन्हें इस श्राप का एहसास करवाया…तब उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. उन्होंने कहा हे भगवन मैंने क्रोध में आकर इतना बड़ा अनर्थ कर दिया मुझें क्षमा करें दीनदयाल….क्षमा करें. तब भगवान श्री नारायण ने कहा कि यह सब नियति का खेल है. आप तो मात्र एक साधन हैं. यह नियति ने पहले सी ही तय कर रखा था.

 

जब तीनो लोक हुए श्री हीन 

 

 

महर्षि दुर्वासा अपने क्रोध के लिए विख्यात थे. एक बार की बात है महर्षि दुर्वासा ने पारिजात पुष्पों की एक माला देवराज इंद्रा को भेंट में दिए. इन्द्रदेव अपने धन-वैभव और ऐश्वर्य में मग्न उस माला को अपने वाहन ऐरावत को पहना दिया और ऐरावत ने उसे अपने सूंड से छत-विछत कर दिया.

 

 

इतने आदर से भेंट दी हुई माला का इसद प्रकार अपमान देख दुर्वासा जी क्रोधित हो गए और उन्होंने इन्द्रदेव को श्राप दे दिया कि आज से तुम लक्ष्मी विहीन हो जाओगे.

 

 

देवराज इंद्र तीनो लोकों के अधिपति थे और इस श्राप के कारण तीनों लोग श्री हीन हो गए. इससे यही सीख मिलती है कि कभी किसी के द्वारा प्रेमभाव से दी गयी वस्तु का अपमान नहीं करना चाहिए.

 

 

जब महर्षि दुर्वासा ने दिया मां गंगा को श्राप 

 

 

कहा जाता है कि एक दिन ऋषि दुर्वासा ब्रह्मलोक पहुंचे. वहाँ अपनी बाल्यवस्था में गंगा जी भी थीं. महर्षि दुर्वासा जब वहाँ स्नान करने लगे तभी हवा का एक तेज झोंका आया और महर्षि के कपडे उड़ गए.

 

 

यह देख पास ही खड़ी गंगा अपनी हंसी नहीं रोक पायीं और जोर से हंस पड़ी. इससे महर्षि दुर्वासा को बहुत क्रोध आया और उन्होंने गंगा को श्राप दे दिया कि वह अपना जीवन धरती पर एक नदी के रूप में व्यतीत करेंगी और लोग खुद को शुद्ध करने के लिए उसमें डुबकी लगायेंगे.

 

 

जब महर्षि  Durvasa ने दिया यदुवंश के नाश का श्राप 

 

 

एक बार की बात है जब ऋषि विश्वामित्र, असित, कश्यप, वशिष्ठ और नारद आदि बड़े – बड़े ऋषि – महर्षि पिन्न्दारक क्षेत्र में निवास कर रहे थे. उसी समय भगवान् कृष्ण और जामवंती के पुत्र साम्ब को अन्य किशोर खेल – खेल में स्त्री वेश में सजाकर उन ऋषियों के पास ले गए.

 

 

वहाँ पर उन किशोरों ने ऋषियों से पूछा कि इस स्त्री को बालक कब उत्पन्न होगा. इस पर रिषियों को क्रोध आ गया. किशोरों द्वारा किये गए इस विनोद पर दुर्वासा जी ने श्राप दिया कि इसके पेट से मुसल होगा और वह समस्त यादव कुल का नाश करेगा. केवल बलराम और श्रीकृष्ण ही इससे बचेंगे, लेकिन यदुवंश के सर्वनाश के बाद बलराम स्वयं ही शरीर का परित्याग कर समुद्र में प्रवेश कर जायेंगे और श्रीकृष्ण जब एक जंगल में ध्यानस्थ होंगे तो ज़रा नामक बहेलिया उन्हें अपने बान्नों से बींध देगा और वह बाण भी इसी मुसल के लोहे से बना होगा.

 

 

 

महर्षि दुर्वासा की बात सुनकर किशोर डर गए और जब उन्होंने साम्ब का पेट जो की गर्भ दिखाने के लिए बनाया गया था उसे खोला तो उसमें एक मूसल मिला.

 

 

इसके बाद उन्होंने मूसल का चूर्ण बनवाकर उसे समुद्र में फिंकवा दिया. लेकिन उसके एक तुकडे को एक मछली निगल गयी और बाकी चूरे समुद्र किनारे एरक नामक घास के रूप में उग गए.

 

 

यह बात भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम को भी पता थी और बलराम के कहने पर ही मूसल का चूर्ण करवाया गया था. तब श्रीकृष्ण ने कहा था ऋषियों की बात सत्य होगी.

 

 

उसके बाद भगवान् कृष्ण ने  यदुवंशियों  को तीर्थ पर चलने को कहा. वहाँ उनमें किसी बात पर लड़ाई हो गयी और वे एक दुसरे को उसी एरक नामक घास से मारने लगे.

 

 

इसके बाद बलराम ने समुद्र में समाधि ले ली. उधर मछली के पेट से मिले लोहे को एक बहेलिये ने अपने बाण के नोक पर लगा लिया. एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण सोमनाथ के पास एक वन में पीपल के पेड़ के नीचे ध्यानस्थ लेटे हुए थे.

 

 

तभी ज़रा नामक बहेलिये ने दिग्भ्रमित होकर उनके पैर को हिरन की आँख समझ बैठा और विषयुक्त बाण चला दिया और वहीँ श्रीकृष्ण की मृत्यु हो गयी. चूँकि यह भगवान् श्रीकृष्ण का यह पैर वीर बर्बरीक के बाण से कमजोर हो गया था.

 

 

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