Ganga Story in Hindi . जानिये कैसे और क्यूँ हुई मां गंगा की उत्पत्ति

Ganga Story Hindi माँ गंगा की कहानी

 

 

 

Ganga Story in Hindi ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना प्रारंभ किया, ” पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमती और सर्वगुण संपन्न दो कन्याएं थीं।  हिमालय की बड़ी पुत्री का नाम गंगा और छोटी पुत्री का नाम उमा था।  ”

 

 

 

गा अत्यंत प्रभावशाली और असाधारण दैवीय गुणों से संपन्न थीं।  वह किसी बंधन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थीं।  उनकी इसी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता विश्व कल्याण हेतु उन्हें हिमालय से मांग लाये।

 

 

 

पर्वतराज हिमालय की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थीं।  उन्होंने कठोर तप कर भगवान् महादेव को वर के रूप में प्राप्त किया।  विश्वामित्र के इतना कहने पर प्रभु राम ने कहा, ” हे भगवन ! जब पापनाशिनी गंगा स्वर्गलोक चली गयीं तो वह पृथ्वी कर कैसे अवतरित हुईं और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहा जाता है?”

 

 

 

इस पर ऋषि विश्वामित्र जी बोले, ” महादेव जी का विवाह तो उमा के साथ हो गया किन्तु सौ वर्षों तक भी उन्हें कोई संतान की  उत्त्पति नहीं हुई। एक बार महादेव जी के मन संतान उत्पत्ति का विचार आया।  जब उनके इस विचार की सूचना ब्रह्मदेव सहित अन्य देवताओं को मिली तो वे विचार करने लगे कि महादेव के इस पुत्र का तेज कौन संभाल सकेगा।  ”

 

 

 

सभी देवताओं ने यह शंका भगवान् शिव के समक्ष प्रस्तुत की।  उनके कहने पर अग्नि ने यह भार ग्रहण किया और परिणामस्वरुप अग्नि के सामान महान तेजस्वी स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ।

 

 

 

इस बीच सुरलोक में विचरण करती हुई गंगा से उमा की भेंट हुई। गंगा ने उमा से कहा कि मुझे सुरलोक में विचरण करत हुये बहुत दिन हो गये हैं।  मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मातृभूमि पृथ्वी पर विचरण करूँ। उमा ने गंगा आश्वासन दिया कि वे इसके लिये कोई प्रबन्ध करने का प्रयत्न करेंगी।

 

 

कैसे धरती पर आयीं गंगा?

 

 

 

उसके बाद विश्वामित्र जी बोले, ” वत्स राम ! अयोध्यापुरी में सगर नाम के एक राजा थे।  उनके कोई पुत्र नहीं था।  सगर की पटरानी केशिनी विदर्भ प्रांत के राजा की पुत्री थी। केशिनी सुन्दर, धर्मात्मा और सत्यपरायण स्त्री थी।  सगर की दूसरी रानी का नाम सुमति था।  वह राजा अरिष्टनेमि की कन्या थी।  दोनों रानियों के साथ महाराजा सगर हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में जाकर पुत्र प्राप्ति के लिये तपस्या करने लगे।  ”

 

 

 

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वर दिया कि तुम्हे बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी।  दोनों रानियों में से एक का केवल एक ही पुत्र होगा जो वंश को आगे बढ़ाएगा और दूसरी साठ हजार पुत्र होंगे।

 

 

 

कौन सी रानी कितने पुत्र चाहती है वह निरनय आप लोग कर लें।  केशिनी ने वंश बढ़ाने वाले पुत्र की कामना की और सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की कामना की।

 

 

 

उचित समय पर रानी केशनी ने असमंजस नामक पुत्र कको जन्म दिया और रानी सुमति के गर्भ से एक तुंबा निकला जिसे फोड़ने पर उसमें से साठ हजार पुत्र निकले।

 

 

 

उन सभी का  पालन पोषण घी के घड़ों में रखकर किया गया। कालचक्र बीतता गया और सभी राजकुमार युवा हो गए।  सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमजस बहुत ही दुराचारी था।

 

 

 

वह नगर के बालकों को सरयू नदी में फेक देता था और उन्हें डूबते देख उसे बहुत ही आनन्द आता था।  इससे दुखी होकर राजा ने उसे राज्य से निर्वासित कर दिया।

 

 

 

असमंजस के अंशुमान नाम का एक पुत्र हुआ।  अंशुमान अत्यंत सदाचारी और पराक्रमी था।   एक दिन राजा सगर के मन में अश्वमेघ यज्ञ करवाने का विचार आया। शीघ्र ही इस पर विचार कर इसे परिणित कर दिया गया।

 

 

 

Ganga Story in Hindi गंगा के धरा पर आने की कथा 

 

 

 

महाराजा सगर ने हिमालय और विंध्याचल के बीच हरी भरी भूमि पर एक विशाल यज्ञ मंडप का निर्माण करवाया।  उसके बाद अश्वमेघ यज्ञ के लिए श्यामकर्ण घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिए अंशुमान को सेना के साथ उसके पीछे भेज दिया।

 

 

 

 

यज्ञ की संभावित सफलता के परिणाम की  आशंका   से भयभीत होकर इंद्रदेव ने एक एक राक्षस का रूप धारण करके उस घोड़े को चुरा लिया।

 

 

 

घोड़े की चोरी की सूचना पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि घोड़ा चुराने को मारकर या फिर पकड़कर घोड़ा वापस लाओ।

 

 

 

 

पूरी पृथ्वी में खोजने पर भी जब घोड़ा नहीं मिला तो, इस आशंका से कि किसी ने घोड़े को तहखाने में न छुपा रखा हो, सगर के पुत्रों ने सम्पूर्ण पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया.

 

 

 

उनके इस कार्य से असंख्य भूमितल निवासी प्राणी मारे गए।  भूमि खोदते हुए वे पातळ तक जा पहुंचे।  उनके इस नृशंस कृत की देवताओं ने ब्रह्मा जी से शिकायत की तो ब्रह्मदेव ने कहा कि ये राजकुमार अपने क्रोध और मद में अंधे होकर ऐसा कर रहे हैं।  पृथ्वी की रक्षा का दायित्व कपिल पर है।  वे जरूर कुछ ना कुछ करेंगे।

 

 

 

पूरी पृथ्वी को खोदने के बाद भी जब घोड़ा और उसको चुराने वाला चोर नहीं मिला तो निराश होकर राजकुमारों ने इसकी सूचना अपने पिता को दी।

 

 

 

रुष्ट होकर सगर ने आदेश दिया कि घोड़े को पाताल में जाकर ढूंढो।  पिता कके आदेश पर सगरपुत्र घोड़े को ढूंढते हुए कपिल के आश्रम में पहुँच गए।

 

 

 

उन्होंने देखा कपिलदेव आँखें बन्द किये बैठे हैं और उन्हीं के पास यज्ञ का वह घोड़ा बँधा हुआ है।  उन्होंने कपिल मुनि को घोड़े का चोर समझा और उन्हें दुर्वचन कहे और मारने के लिए दौड़े।

 

 

सगरपुत्रों को मिला श्राप Ganga Story in Hindi

 

 

 

सगरपुत्रों के इन कुकृत्यों से कपिल मुनि की समाधि भांग हो गयी।  उन्होंने क्रोधित होकर सभी राजकुमारों को भस्म कर दिया। जब सगर को बहुत दिनों तक अपने पुत्रों की सूचना नहीं मिली तो अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान को अपने पुत्रों तथा घोड़े का पता लगाने का आदेश दिया।

 

 

 

वीर अंशुमान अश्त्र – शस्त्र से सुसज्जित होकर अपने चाचाओं द्वारा बनाये हुए मार्ग पर चल पड़ा। मारह में जो भी ऋषि मुनि मिले उसने सभी का उचित सम्मान किया और अपने लक्ष्य के विषयी में पूछता हुआ उस स्थान तक पहुँच गया जहां उनके चाचाओं के भस्मीभूत शरीरों की राख पड़ी थी और पास ही यज्ञ का घोड़ा चर रहा था।

 

 

 

अपने चाचाओं के भस्मीभूत  शरीर को देखकर उसे बहुत दुःख हुआ। उसने तरपान करने के लिए जलाशय की खोज की परन्तु उसे कहीं भी जलाशय दिखाई नहीं दिया।

 

 

 

तभी उसकी नजर अपने चाचाओं के मामा गरुड़ पर पड़ी।  उसने उन्हें प्रणाम किया और पूछा मैं इन सभी का तर्पण  करना चाहता हूँ।  यदि पास में कोई जलाशय हो तो कृपा कर बताइये और साथ ही इनके साथ क्या हुआ यदि आप इसके बारे में जानते है तो बताइये।

 

 

 

इसपर गरुड ने साड़ी कहानी बता दी और उसके बाद गरुड़ ने कहा कि इन्हे अलौकिक दिव्य पुरुष ने भस्म किया है अतः लौकिक जल से तरपान करने से इनका उद्धार नहीं होगा।  इनका उद्धार हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के जल से ही होगा।

 

 

 

गरुड़ ने तुम इस घोड़े को लेकर लौट जाओ जिससे तुम्हारे पितामह यज्ञ पूर्ण कर सकें। गरुड़ की आज्ञा से अंशुमान वापस अयोध्या लौट आये और सगर को सारा वृतांत कह सुनाया।

 

 

 

राजा सगर इससे बड़े ही दुखी हुए।  दुखी मन से उन्होंने यज्ञ पूर्ण किया।  वे अपने पुत्रों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे।  पर ऐसा करने के लिए कोई युक्ति नहीं सूझी।

 

 

 

महाराज सगर के देहांत के बाद अंशुमान बड़ी ही न्यायप्रियता से शासन करने लगे।  अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए जो कि महाप्रतापी हुए। दिलीप  के वयस्क होने के बाद अंशुमान राज्य का भार दिलीप को सौप कर हिमालय की कंदराओं में जाकर गंगा को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगे।  लेकिन उन्हें सफलता नहीं प्राप्त हुई और उनका स्वर्गवास हो गया।

 

 

Bhagirath ki Katha भगीरथ की कहानी 

 

 

 

दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए।  वे बहुत बड़े धर्मात्मा थे।  जब भगीरथ बड़े हुए तो राजा दिलीप उन्हें राज्यभार सौप कर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या करने चले गए। परन्तु उन्हें भी सफलता नहीं मिली।

 

 

 

भगीरथ न्यायप्रिय और धर्मात्मा थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी।  इस पर वे अपने राज्य का भार मंत्रियों को सौंपकर स्वयं गंगावतरण के लिए गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर तपस्या करने लगे।

 

 

 

उनकी अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उन्हें वर माँगने को कहा।  तब भगीरथ ने ब्रह्मा जी कहा, ” प्रभु! अगर आप मुझ पर प्रसंन्न है तो वरदान दीजिये कि सगरपुत्रों को गंगा का जल प्राप्त हो, जिससे उनका उद्धार हो सके और मुझे संतान प्राप्ति का भी वर दें जिससे इक्ष्वाकु वंश आगे बढ़ सके।

 

 

 

इस पर ब्रहदेव ने कहा, ” वत्स, तुम्हें संतान की प्राप्ति जल्द होगी लेकिन तुम्हारे प्रथम मांग में कठिनाई यह है कि जब गंगा जी वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगी तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी।  गंगाजी के वेग को संभालने की क्षमता महादेव जी के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है।  अतः तुम्हें महादेव शिवशंकर को प्रसन्न करना होगा।  ” यह कहकर महादेव ब्रह्मलोक चले गए।

 

 

गंगा कहलायीं भागीरथी 

 

 

 

भगीरथ ने साहस नहीं छोड़ा और एक वर्ष तक पेअर के अंगूठे के सहारे खड़े होकर भगवान् शिव की तपस्या करने लगे। वायु के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य वस्तु का भक्षण नहीं किया।

 

 

 

महादेव भगीरथ के इस तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देकर वरदान माँगने को कहा।  इसपर भगीरथ ने प्रयोजन बता दिया। तब भगवान् शिव ने कहा कि, ” तथास्तु! हम गंगा जी को मस्तक पर धारण करेंगे। ”

 

 

 

इसकी सूचना पाकर विवश होकर गंगाजी को सुरलोक का परित्याग करना पड़ा। उस समय वे सुरलोक से कहीं नहीं जाना चाहती थीं इसलिए वे प्रचंड वेग से अवतरित हुईं। भगवान् शिव ने उनके अहंकार को भांप लिया।

 

 

 

भगवान महादेव ने गंगा की वेगवती धाराओं को अपनी जटा में उलझा लिया। गंगा जी अपने समस्त प्रयासों के बाद भी भगवान भोले की जटाओं से निकल ना सकीं।

 

 

 

गंगा जी के अहंकार को चूर किया भगवान् शिव ने Ganga Story in Hindi

 

 

 

गंगाजी के इस प्रकार  इस प्रकार शिव जी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की।  भगीरथ के इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ा।

 

 

 

छूटते ही गंगा जी सात धाराओं में बंट गयीं।  गंगा जी की तीन धाराएँ ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुईं।   सुचक्षु, सीता और सिन्धु नाम की तीन धाराएँ पश्चिम की ओर बहीं और सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे पीछे चली।

 

 

 

जिधर – जिधर भगीरथ जाते थे, उधर – उधर गंगा जी जाती थीं। स्थान – स्थान पर देव, यक्ष, किन्नर, ऋषि – मुनि आदि उनके स्वागत के लिए एकत्रित हो रहे थे। जो भी उस पावन जल को स्पर्श करता, भाव – बाधाओं से मुक्त हो जाता था।

 

 

 

चलते चलते गंगा जी उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी अपने वेग से उनके यज्ञशाला को सम्पूर्ण सामग्री के साथ बहाकर ले जाने लगीं।  इससे ऋषि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रुद्ध होकर गंगा का सारा जल पी लिया।

 

 

 

गंगा जी कहलायी जान्हवी Ganga Story in Hindi

 

 

 

यह देख कर समस्त ऋषि मुनियों को बड़ा विस्मय हुआ और वे गंगा जी को मुक्त करने के लिये उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर जह्नु ऋषि ने गंगा जी को अपने कानों से निकाल दिया और उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।

 

 

 

तब से गंगा जान्हवी कहलाने लगीं। इसके पश्चात् वे भगीरथ के पीछे चलते हुए समुद्र तक पहुँच गयीं  और वहाँ सगरपुत्रों का उद्धार करने के लिए पातळ चली गयीं।  उनके जल के स्पर्श से भस्मीभूत हुये सगर के पुत्र निष्पाप होकर स्वर्ग गये.  उस दिन से गंगा के तीन नाम हुये, त्रिपथगा, जाह्नवी और भागीरथी।

 

 

 

 

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