Hindi Best Story . भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कथा। कुबेर का अहंकार।

Hindi Best Story in Hindi भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कथा

 

 

 

Hindi Best Story यह एक पौराणिक कथा है।  कुबेर महाराज तीनो लोकों में सबसे धनी थे।  एक दिन  कुबेर ने सोचा, ” मेरे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं है।  इसलिए इसके बारे में लोगों को बताना चाहिए।  ”

 

 

 

उन्होंने विचार कर तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया।  भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे।  इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वे कैलाश पहुंचे और कहा, ” हे भगवन ! मैं तीनो लोकों में सबसे धनवान हूँ।  यह सब आप की कृपा का फल है।  मैं अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ।  आपसे निवेदन है कि आप सपरिवार भोज में पधारने की कृपा करें।  ”

 

 

 

भगवान शिव अन्तर्यामी हैं।  उन्होंने कुबेर के अंदर छुपे अहंकार को पढ़ लिया।  उन्होंने कहा, ” मुझे कहीं अन्यंत्र जाना है।  अतः  इस भोज में नहीं आ सकता।  ”

 

 

 

इस पर कुबेर अनुनय – विनय करने लगे।  तब भगवान शिव ने कहा, ” इसका एक ही उपाय है।  मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। ”

 

 

 

कुबेर संतुष्ट होकर लौट आये।  नियत समय पर भव्य आयोजन हुआ।  तीनों लोको के देवता पहुंच चुके थे।  अंत में गजानन वहाँ पहुंचे और आते ही बोले मुझे भूख लगी है।  कुबेर उन्हें कक्ष में ले गए और सोने की थाली में उनके लिए विभिन्न प्रकार के पकवान परोसे गए।

 

 

 

क्षण भर में परोसा हुआ खाना भोजन गजानन ने ख़त्म कर दिया।  दुबारा खाना परोसा गया और कुछ ही देर में ही वह भी ख़त्म हो गया।  बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते।

 

 

कुबेर का अहंकार 

 

 

थोड़ी ही देर में हजारो लोगो के लिए बना भोजन ख़त्म हो गया परन्तु गणपति का पेट नन्हीं भरा।  वे रसोईघर में पहुंचे हुई वहाँ रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए भूख तब भी नहीं मिटी।

 

 

 

जब सब कुछ ख़त्म हो गया तो वे कुबेर के पास पहुंचे और कहा, ” जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए जबी कुछ नहीं था तो आपने मुझे न्योता क्यों दिया ? कुबेर का सारा अहंकार चूर हो गया।

 

 

 

भगवान विष्णु जी और माता लक्ष्मी जी Thought With Story in Hindi

 

 

 

यह एक लोक कथा है।  एक बार की बात है।  भगवान विष्णु शेष नाग पर बैठे हुए बोर हो रहे थे।  उन्होंने धरती पर घूमने का विचार किया।  वैसे भी कई वर्षों से वे धरती पर नहीं गए थे अतः वे तैयारी में लग गए।

 

 

 

उन्हें तैयार होते देख माता लक्ष्मी ने उनसे पूछा, ” नाथ ! आज सुबह – सुबह कहा प्रस्थान करने वाले हैं ? ” इस वे बोले मैं धरती पर घूमने जा रहा हूँ।  बहुत दिन हो गए हैं।  अपने भक्तों के दुःख दर्द भी देख लूंगा।

 

 

 

तब माता लक्ष्मी ने ने साथ चलने का आग्रह किया।  भगवान विष्णु ने क्षण विचार किया और उसके बाद बोले, ” तुम मेरे साथ चल सकती हो लेकिन इसमें एक शर्त है तुम धरती पर पहुंचकर उत्तर दिशा की तरफ बिलकुल मत देखना।  ”

 

 

 

माता लक्ष्मी ने उत्तर दिशा में ना देखने का वचन भगवान विष्णु को दे दिया।  दोनों लोग धरती पर पधारे।  अभी भगवान सूर्य अपने रथ पर सवार होकर धरा को प्रकाशमान करने के लिए निकल रहे थे।

 

 

 

चारो तरफ हरियाली ही हरियाली थी।  रात को बरसात हुई थी।  धरती बहुत ही खूबसूरत दिख रही थी।  चारो तरफ फूल खिले हुए थे।  माता लक्ष्मी अपनी पति को दिया वचन भूल गयीं और चारो तरफ मंत्रमुग्ध होकर पृथ्वी को निहारने लगीं।

 

 

 

तभी उन्हें फूलों का एक खूबसूरत बगीचा नजर आया।  उस तरफ से भीनी – भीनी खुशबु आ रही थी।  माता लक्ष्मी उस बगीचे से एक सुन्दर फूल तोड़ लाईं।

 

 

 

लेकिन जब वह वापस आयीं तो भगवान विष्णु के आखों में आंसू थे।  भगवान विष्णु ने माँ लक्ष्मी से कहा, ” कभी भी किसी से बिना पूछे उसकी कोई भी वस्तु नहीं लेनी चाहिए।  यह चोरी होती है और साथ उन्होंने अपना वचन भी याद दिलाया कि उत्तर दिशा में नहीं जाना है और वह वह बगीचा उत्तर दिशा में था।  ”

 

 

 

माता लक्ष्मी को अपनी भूल का आभास हुआ तो उन्होंने भगवान विष्णु से अपनी भूल के लिए क्षमा मांग ली।  इस पर भगवान विष्णु ने कहा इस भूल की तुम्हे सजा भुगतनी होगी।

 

 

 

तुमने जिस माली के बगीचे से फूल तोड़ा है यह एक प्रकार की चोरी है।  इसलिए अब तुम्हे तीन वर्ष तक माली के घर नौकरानी बन कर रहना होगा।  उसके बाद ही तुम वैकुण्ठ वापिस आओगी।  माता लक्ष्मी ने हाँ कह दी।  उन्हें पता था इसमें जरूर ही प्रभु की कोई लीला होगी।

 

इसके माँ लक्ष्मी ने एक गरीब औरत का रूप धारण कर उस बगीचे के मालिक के घर गयीं।  उसका नाम रामु था।  उसके झोपड़े में उसकी बीवी, दो बेटे और तीन बेटियां रहती थी।  सभी उस बगीचे में काम करके किसी तरह से गुजरा करते थे।

 

 

 

माँ लक्ष्मी जब उसके झोपड़े पर पहुंची तो उसने पूछा, ” बहन आप कौन हो? तुम्हे क्या चाहिये? ” इस माँ लक्ष्मी ने कहा, ” मैं एक गरीब दुखियारी औरत हूँ।  मेरे घर में कोई नहीं है।  कई दिनों से मैंने भोजन तक नहीं किया है।  मुझे कोई भी काम दे दो।  मैं बस दो वक्त की रोटी और किसी कोने में रहने की जगह पर काम कर लुंगी। ”

 

 

 

पहले तो रामु ने विचार किया, लेकिन उसे उस गरीब औरत पर दया आ गयी।  उसने कहा, ” बहन हम भी बहुत गरीब हैं।  किसी तरह हमारा गुजारा होता है।  जैसा भी रूखा  – सूखा मिलता है हम खा लेते हैं।  अगर तुम मेरी बहन बनकर मेरे साथ रहना चाहती हो तो रह सकती हो।  ”

 

 

 

माँ लक्ष्मी उस झोपड़े में तीन वर्ष तक रहीं।  जिस दिन माता ने उस गरीब के घर में कदम रखा उसकी नसीब ही खुल गयी।  उसकी आमदनी बढ़ने लगी।

 

 

 

उसने जल्द ही एक गाय ले ली।  उसके बाद उसने काफी जमीन खरीद ली।  उसने अपना घर भी बनवा लिया।  वे लोग अच्छे और सभ्य ढंग से रहने लगे।

 

 

रामु हमेशा सोचता यह सब इस महिला का चमत्कार है।  उसके नसीब से ही यह सब कुछ हुआ है।  एक बार की बात है माता लक्ष्मी को आये तीन साल पुरे होने में कुछ दिन शेष रह गए थे।

 

 

 

एक दिन रामु अपने खेतों से काम कर वापस लौटा तो देखा घर के सामने एक देवी स्वरुप, स्वर्ण आभूषण पहने एक औरत खड़ी हैं।  उसने ध्यान से देखा तो पहचान गया कि यह तो वही औरत हैं तो उसके घर पर उसकी बहन बनकर रह रही थीं।

 

 

 

तब उसका परिवार भी आ गए।  सभी विस्मित थे।  रामु माता के चरणों में गिर गया और क्षमा मांगने लगा।  तब माता ने मुस्कुराते हुए कहा, ” ययह सब प्रभु की लीला थी।  तुम नेकदिल और दयालु व्यक्ति हो।  मैं तुम्हे आशीष देती हूँ तुम्हे सारे सुख मिलेंगे।  कभी किसी चीज की कमी नहीं होगी।  ” इसके बाद माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के भेजे हुए रथ पर सवार होकर वैकुण्ठ चली गयीं।

 

 

 

शिव का क्रोध Hindi Best Story Book

 

 

 

महर्षि भृगु ब्रह्मदेव के मानस पुत्र थे।  उनकी धर्मपत्नी का नाम ख्याति था।  वह दक्ष की पुत्री थीं।  महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं।  श्रावण और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं।

 

 

 

एक बार की बात हैं।  सरस्वती नदी के तट पर सभी ऋषि – मुनि एकत्रित हुए।  तभी उनमें यह बहस छिड़ गयी कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कौन सबसे बड़ा हैं?

 

 

 

काफी चर्चा के बाद भी निष्कर्ष नहीं निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निर्णय किया और इसके भगवान ब्रह्मदेव के मानस पुत्र महर्षि भृगु को नियुक्त किया गया।

 

 

 

महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्मा जी के पास गए।  उन्होंने उन्हें ना तो प्रणाम किया और ना ही उनकी स्तुति की।  देख ब्रह्मदेव क्रोधित हो गए।  उनकी आँखों क्रोध से लाल हो गयीं।  उन्होंने महर्षि भृगु से कहा, ” तुमने मेरा घोर अपमान किया है।  अगर तुम मेरे मानस पुत्र ना होते तो तुम्हे  श्राप दे देता।  ”

 

 

 

इसके बाद महर्षि भृगु वहाँ से कैलाश पहुंचे।  भगवान शिव ने देखा कि ब्रह्मदेव के मानस पुत्र महर्षि भृगु कैलाश पर पधार रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका सम्मान किया लेकिन महर्षि भृगु तो उनकी परीक्षा लेने आये थे सो उन्होंने उनका सम्मान अस्वीकार कर दिया।

 

 

 

उन्होंने भगवान शिव को सम्बोधित करते हुए कहा, ” महादेव ! आप  सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका सम्मान कत्तई स्वीकार नहीं कर सकता। ”

 

 

 

महर्षि भृगु की इन बातों से भगवान शिव को बहुत क्रोध आया।  उन्होंने अपना त्रिशूल उठाकर उन्होंने मारना चाहा, लेकिन भगवती पार्वती ने किसी तरह से उन्हें शांत किया।

 

 

 

इसके बाद महर्षि भृगु वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु वहाँ शेषनाग पर सोये हुए थे।  उन्होंने वहाँ आते भगवान विष्णु के वक्ष पर तेज लात मारी।

 

 

 

महर्षि भृगु ने जैसे ही भगवान विष्णु को चोट मारी वैसे ही उनकी नीद टूटी और नींद टूटते ही भगवान विष्णु अपने आसन से उठ खड़े हुये और उन्हें प्रणाम करते हुए उनके चरण सहलाते हुए बोले, ” भगवन ! आपके पैर में चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम करें।  भगवन मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान नहीं था।  इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका।  आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है।  आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।  ”

 

 

 

 

भगवान विष्णु का यह प्रेम – व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आखों से आंसू बहाने लगे।  उसके बाद वे ऋषि – मुनियों के पास लौट आये और पूरी बात विस्तार से बताई।

 

 

 

उनके बात से ऋषि – मुनि बड़े ही हैरान थे और सभी संदेह दूर हो गए।  उसके बाद ही भगवान विष्णु को ऋषि – मुनि सर्वश्रेष्ठ मानकर पूजा – अर्चना करने लगे।

 

 

 

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