hindi suspense story

hindi crime story कब्रिस्तान

hindi crime story
Written by Abhishek Pandey

hindi crime story कब्रिस्तान के मुफलिसों के घेरे में पत्तियों से ढकी और बारिश तथा हवा के ढेर से बनी समाधियों के बीच एक सूती पोशाक पहने और सर पर काला दुशाला डाले , दो सूखे वृक्षों की छाया में एक स्त्री बैठी है.

उसके सिर के सफेद बालों की एक लट उसके कुम्हलाये गाल पर पड़ी है .  उसके मजबूती से बंद होठों के सिरे कुछ फूले हुए-से हैं, जिससे मुहं के दोनों ओर शोक-सहूचक रेखाएं उभर आई है .  आंखों की उसकी पलके सूजी हुई हैं, जैसे वह खूब रोई हो और कई लम्बी रातें उसकी जागते बीती हों .

मैं उससे कुछ ही फासले पर खड़ा देख रहा था, पर वह गुमसुम बैठी रही और जब मैं उसके नजदीक पहुंच गया तब भी उसमें कोई हलचल पैदा नहीं हुई .  महज अपनी बुझी हुई आंखों को उठाकर उसने मेरी ओर देखा और मेरे पास पहुंच जाने से जिस उत्सुकता, झिझक अथवा भावावेग की आशा की जाती थीं, उसे तनिक भी दिखाये बिना वह नीचे की ओर ताकती रही .

 

 

मैंने उसे नमस्कार किया। पूछा, “क्यों बहन, यह कब्र  किसकी है?”

 

“मेरे लड़के की .” उसने बहत ही बेरुखी से जवाब दिया.

 

“क्या वह बहुत बड़ा था?”

 

“नहीं, बारह साल का था .”

 

“उसकी मौत कब हुई?”

 

“चार साल पहले .”

 

स्त्री ने दीर्घ निश्वास छोड़ी और अपने बालों की लट को दुशाले के नीचे कर लिया . उस दिन बड़ी गर्मी थी . मुर्दो की उस नगरी पर सूरज बड़ी बेरहमी से चमक रहा था . कब्रिस्तान  के कब्रो पर जो थोड़ी बहुत घास उग आई थी .

 

 

वह मारे गर्मी और धूल के पीली पड़ गई थी और सलीबों के बीच यत्र-तत्र धूल से भरे पेड़ ऐसे चुपचाप  खड़े थे, मानों मौत ने उन्हें भी अपने साये में ले लिया हो .

 

लड़के की सामधि की ओर सिर से इशारा करते हुए मैने पूछा, “उसकी मौत कैसे हुई?”

 

 

“घोड़ो की टापों से कुचलने से .” उसने गिने-चुने शब्दों में उत्तर दिया और समाधि को जैसे सहलाने के लिए झुर्रियों से भरा अपना हाथ उस ओर बढ़ा दिया .

 

“ऐसा कैसे हुआ?”

 

जानता था कि मैं अभद्रता दिखा रहा था, लेकिन उस स्त्री को इतना गुमसुम देखकर मेरा मन कुछ उत्तेजित और कुद खीज से भर उठा था . मेरे अन्दर सनक पैदा हुई कि उसकी आंखों में आंसू देखूं .

 

 

 

उसकी उदासीनता में अस्वाभाविकता थी पर मुझे लगा कि वह उस ओर से बेसुध थी . मेरे सवाल पर उसने अपनी आंखें ऊपर उठाई और मेरी ओर देखा . फिर सिर से पैर तक मुझे पर निगाह डालकर उसने धीरे-से आह भरी और बड़े मंद स्वर में अपनी कहानी कहनी शुरू की .

 

“घटना इस तरह घटी .  इसके पिता गबन के मामले में डेढ़ साल के लिए जेल चले गये थे .  हमारे पास जो जमा पूंजी थीं वह इस बीच खर्च हो गई .  बचत की कमाई ज्यादा तो थी नहीं .

 

 

 

 

जिस समय तक मेरा आदमी जेल से छूटा हम लोग घास जलाकर खाना पकाते थे . एक माली गाड़ी भर वह बेकार घास मुझे दे गया था . उसे मैंने सुखा लिया था और जलाते समय उसमें थोड़ा बुरादा मिला लेती थी . उसमें बड़ा ही बुरा धुआं निकलता था और खाने के स्वाद को खराब कर देता था . कोलूशा स्कूल चला जाता था.

 

 

 

वह बड़ा तेज लड़का था और बहुत ही किफायतशार था .  स्कूल से घर लौटते समय रास्ते में जो भी लट्ठे- लकड़ी मिल जाते थे, ले आता था .  वंसत के दिन थे . बर्फ पिघल रही थी और कोलूशा के पास पहनने को सिर्फ किरमिच के जूते थे . जब वह उन्हें उतारता था तो उसके पैर मारे सर्दी के लाल-सुर्ख हो जाते थे.

 

“उन्हीं दिनों उन लोगों ने लड़के के पिता को जेल से रिहा कर दिया और गाड़ी में घर लाये .  जेल में उसे दिल का दौरा पड़ गया था.  वह बिस्तर पर पड़ा मेरी ओर ताक रहा था .

 

 

 

उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट थी.  मैंने उस पर निगाह डाली और मन-ही मन सोचा, ‘तुमने मेरी यह हालत कर दी है और अब मैं तुम्हारा पेट कैसे भरूंगी ?

तुम्हें कीचड़ में पटक दूं .  हां, मैं ऐसा ही करना चाहूंगी.

 

” लेकिन कोलूशा ने उसे देखा तो बिलख उठा .  उसका चेहरा जर्द हो गया और बड़े बड़े आंसू उसके गालों पर बहने लगे .  मॉँ, इनकी ऐसी हालत क्यों है?’ उसने पूछा . मैंने कहा, यह अपनी जिंदगी जी चुके हैं ‘

 

“उस दिन के बाद से हमारी हालत बदतर होती गई .  मैं रात दिन मेहनत करती, लेकिन अपना खून सुखा करके भी बीस कापेक से ज्यादा न जुट पाती और वह भी रोज नहीं, खुशकिस्मत दिनों में .  यह हालत मौत से भी  बदतर  थी और मैं अक्सर अपनी जिन्दगी का खात्मा कर देना चाहती .

 

“कोलूशा यह देखता और बहुत परेशान होकर इधर-से-उधर भटकता .  एक बार जब मुझे लगा कि यह सब मेरी बर्दाश्त से बाहर है तो मैंने कहा, ‘आग लगे मेरी इस जिंदगी को! मैं मर क्यों नहीं जाती! तुम लोगों में से भी किसी की जान क्यों नहीं निकल जाती?’ मेरा इशारा कोलूशा और और उसके पिता की ओर था .

 

 

आप पढ़ रहे हैं hindi crime story 

“उसके पिता ने सिर हिलाकर बस इतना कहा, मैं जल्दी ही चला जाऊंगा . थोड़ा धीरज रक्खो .’

 

“लेकिन कोलूशा देर तक मेरी ओर ताकता रहा, फिर मुड़ा और घर से बाहर चला गया .

 

“वह जैसे ही बाहर गया, मुझे अपने शब्दों पर अफसोस होने लगा, पर अब हो क्या सकता था! तीर छूट चुका था.

 

“एक घंटा भी नहीं बीता होगा कि घोड़े पर सवार एक सिपाही आया . ‘क्या आप गौसपोजा शिशीनीना हैं ?’ उसने पूछा . मेरा दिल बैठने लगा . उसने आगे कहा, ‘तुम्हें अस्पताल में बुलाया है. सौदागर नोखिन  के घोड़ों ने तुम्हारे बेटे को कुचल डाला है .’

 

“मैं फौरन गाड़ी में अस्पताल के लिए रवाना हो गई .  मुझे लग रहा था, मानो किसी ने गाड़ी की सीट पर जलते कोयले बिछा दिये हैं” मैं अपने को कोस रही थी—अरी कम्बख्त, तुने यह क्या कर डाला .’

 

 

“आखिर हम अस्पताल पहुंचे . कोलूशा बिस्तर पर पड़ा था .  उसके सारे बदन पर पट्टियां बंधी थीं .  वह मेरी तरफ देखकर मुस्कराया! उसके गालों पर आंसू बहने लगे! धीमी आवाज में उसने कहा, ‘मां, मुझे माफ करो . पुलिस के आदमी पैसे ले लिये हैं .’

 

“तुम किन पैसों की बात कर रहे हो, कोलूशा ?” मैंने पूछा.

 

 

“वह बोला, अरे, वे पैसे, जो लोगों ने और एनोखिन ने मुझे दिये थे .’

 

“मैने पूछा, ‘उन्होंने तुम्हें पैसे क्यों दिये?’

 

“उसने कहा, ‘इसलिए…’

 

 

“उसने धिरे से आह भरी .  उसकी आंखें तश्तरी जैसी बड़ी हो रही थीं .

 

‘कोलूशा!’ मैंने कहा, ‘यह क्या हुआ कि तुमने घोड़े आते हुए नहीं देखे .’

 

 

“उसने साफ आवाज में कहा , ‘मां मैंने घोड़े आते देखे थे, लेकिन मेरे ऊपर से निकल जायंगे तो लोग मुझे जयादा पैसे देंगे, और उन्होंने दिये भी .’

 

 

“ये उसके शब्द थे .  मैं सबकुछ समझ गई, सबकुछ समझ गई कि उस फरिश्ते लाल ने ऐसा क्यों किया; लेकिन अब तो कुछ भी नहीं किया जा सकता था .

 

“अगले दिन सबेरे ही वह मर गया .  आखिरी सांस लेने तक उसकी चेतना बनी रही और वह बार-बार कहता रहा ‘डैडी के लिए यह खरीद  लेना, वह खरीद  लेना और मां अपने लिए भी, ‘जैसे कि उसके सामने पैसा-ही पैसा हो.  वास्तव में ५०  रूबल थे.

 

“मैं एनोखिन के पास गई .  लेकिन मुझे कुल जमा पांच रूबल दिये और उसपर उसने कहा, ‘लड़के ने अपने को घोड़े के बीच झोंक दिया . बहुत-से लोगों ने देखा .  इसलिए तुम किस बात की भीख मांगने आई हो ? मैं फिर कभी घर वापस नहीं गई . भैया, यह है सारी दास्तान .

 

कब्रिस्तान में खामोशी और सन्नटा छाया था.  सलीब, रोगी-जैसे पेड़, मिट्टी के ढेर और कब्र पर इतने दुखी भाव से गुमसुम बैठी वह स्त्री—इस सबसे मैं मृत्यु और इन्सानी दुख के बारे में सोचने लगा .

 

 

लेकिन आसमान साफ था और धरती पर ढलती गर्मी की वर्षा कर रहा था.

 

 

मैंने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उस स्त्री को ओर बढ़ा दिये, जिसे तकदीर ने मार डाला था, फिर भी वह जिये जा रही थी .

 

 

उसने सिर हिलया और बहुत ही रुकते-रुकते कहा, “भाई, तुम अपने को क्यों हैरान करते हो! आज के लिए मेरे पास बहुत हैं . अब मुझे ज्यादा की जरूरत भी नहीं है . मैं अकेली हूं-दुनिया में बिलकुल अकेली.”

 

उसने एक लम्बी सांस ली और फिर मुंह पर वेदना से उभरी रेखाओं के बीच अपने पतले होंठ बन्द कर लिये.

 

मित्रों यह hindi crime story कब्रिस्तान आपको कैसी लगी जरुर बताएं और hindi crime story   की तरह की और भी कहानी के लिए इस  ब्लॉग को लाइक , शेयर और सबस्क्राइब जरुर करें और hindi crime story  की तरह की और भी स्टोरी के लिए नीचे की लिंक पर क्लिक करें.

About the author

Abhishek Pandey

1 Comment

Leave a Comment