Hindi Kahaniya . Hindi Best Story की नयी कहानियां हिंदी में
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Hindi Kahaniya for Kids हिंदी कहानियां

 

 

 

Hindi Kahaniya क्यों भाई बिना सोचेसमझे तुम इस खेलने वाले रैकेट से किसी को भी मार देते हो. तुमको यह मालूम होना चाहिए कि इस रैकेट से अगर किसी को मारोगे, तो उसे चोट तो लगेगी ही साथ ही यह रैकेट भी टूट सकता है.

 

 

 

बात पूरी होने से पहले ही लेकिन यह तो सिर्फ़ टेढ़ा ही हुआ है, बिल्कुल तुम्हारी तरह जैसे तुम बिना किसी बात को समझे झट से टेढ़े हो जाते हो..

 

 

 

यह उपरोक्त बातें धर्मा और पिंटू के बीच चल रही थी कि बीच में रानी जो कि पिंटू की छोटी बहन है भी इस वार्तालाप में कूद पड़ी. धर्मा भाई ठीक ही तो कह रहें हैं तुम हमेशा ही थोड़ीथोड़ी बात पर टेढ़े हो जाते हो.  

 

 

 

इसके पहले कि धर्मा कुछ जवाब देता, पिंटू ने अपनी छोटी बहन को रैकेट से एक रैकेट मार दिया और वह भागने की तैयारी में ही था कि धर्मा और रानी ने मिलकर उसे पकड़ लिया और रैकेट छीनने की कोशिश करने लगे, रानी गुस्से में चिल्ला भी रही रही थी कि मैं आज इस रैकेट को ही तोड़ दूँगी...जब देखो सबको रैकेट से मारता रहता है.

 

 

 

 

आखिर में धर्मा के सहयोग से रानी पिंटू से रैकेट छीनने में सफल रही और वो रैकेट को तोड़ने लगी. उसने पूरी कोशिश की लेकिन रैकेट नहीं टूट रहा था, रैकेट को तोड़ने की कोशिश में रानी के हाथों में घाव जरूर हो गया था.

 

 

 

इस कोशिश रैकेट काफी टेढ़ा हो गया ....इस पर रानी गुस्से और चिड़चिनेपन के मिश्रित भाव से धर्मा से बोली...अरे यह रैकेट तो टूट ही नहीं रहा है.

 

 

 

इस पर पिंटू जोरजोर से हंसने लगा और हंसते हुए बोला...यह रैकेट नहीं टूट सकता...यह मेरा दोस्त है. इस पर रानी ने चिढ़ कर उस रैकेट को वही ज़ोर से फेक दिया.

 

 

 

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                                                                               भाग 

 

जूनियर हाईस्कूल, पिथौरागढ़, उत्तराखंड

 

 

पिंटू पढ़ाई में तो एकदम जीरो था लेकिन जब बात खेल की आती थी तो उसका कोई सानी नहीं था. स्कूल में कबड्डी के खिलाड़ियों का चयन किया जा रहा था.

 

 

 

चयनकर्ता जितेंद्र उर्फ जीतू सर खिलाड़ियों का चयन कर रहे थे. सभी खिलाड़ियों का चयन करने के बाद जितेंद्र सर ने खिलाड़ियों को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी टीम हमारी टीम परसों उधमपुर में मैच खेलने जाएगी और बच्चों हमें जीत कर ही आना है. वहाँ और भी टीमें रहेंगी लेकिन हमारी टीम बेस्ट है. इस तरह उन्होने सभी को प्रोत्साहित किया.

 

 

मैच की ठीक एक दिन पहले अर्थात अगले दिन टीम के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में शुमार पदम ठाकुर की तबीयत अचानक सी खराब हो गयी. उसने फोन करके जितेंद्र सर से कहा कि वह मैच खेल पाने असमर्थ है.

 

 

 

उसकी तबीयत बहुत ही ज़्यादा खराब है. अब जितेंद्र सर बहुत ही असमंजस में पड़ गये. अब वे प्रतियोगिता से नाम नहीं वापस ले सकते थे ऐसे में स्कूल की बदनामी होने का डर था.

 

 

 

उसी स्कूल में धर्मा भी पढ़ता था जिसे जितेंद्र सर बहुत मानते थे. जितेंद्र सर बहुत ही चिंतित थे और स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद भी अपने आफिस में बैठे थे. इतनी में धर्मा उनके आफिस के सामने सी गुज़रा यह उसका रोज का काम था क्योंकि उसका क्लास जितेंद्र सर के आफिस के पीछे था.

 

 

 

उसने देख कि सर बहुत ही चिंतित हैं तो वह उनके आफिस के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया लेकिन जितेंद्र सर को इसका तनिक भी आभास नहीं हुआ.

 

 

 

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धर्मा ने हल्के से दरवाजे को खटखटाया, तब जीतू सर कि तंद्रा भंग हुई. उसने जीतू सर से इस से इस चिंता का कारण पूछा तो जीतू सर बड़े ही धीमे स्वर में सारी बाते बता दी. इस पर धर्मा ने चहक कर कहा सर समझो कि आपका काम हो गया. सर मेरा भाई पिंटू जो कि खेलने में बहुत ही उस्ताद है...आप कहें तो मै उससे बात करू...आप निराश नहीं होंगे. 

 

 

 

 

लेकिन..जितेंद्र सर इसके आगे कुछ कहते कि धर्मा उनकी बात को समझ गया और उन्हें बीच में ही टोकते हुये कहा कि सर शायद आप भूल रहे हैं कि पिंटू ने इसके पहले पंचायत स्तर के कबड्डी के खेल में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था और उस मेडल भी मिला था.

 

 

 

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हां....हां याद आया...ठीक है तुम बात करो और अगर वह तैयार होता है तो तुरंत मुझे बताओ....जितेंद्र सर नेथोड़ा मुस्कराते हुए बोला...अब वे थोड़ा बढ़िया फील कर रहे थे.

 

 

 

 

उधमपुर जिले में ही पिंटू का ननिहाल है और किस्मत का खेल देखिये कि उधमपुर जिले की टीम का भी एक खिलाड़ी किसी कारण कम हो गया था.

 

 

 

पिंटू का दोस्त रमेश जो कि पढ़ने में बहुत बढ़िया था और उसका घर पिंटू के नाना के घर के ठीक बगल में था. जिसके कारण वे दोनों दोस्त बन गए थे.

 

 

 

लेकिन पिंटू अब वापस कबड्डी का खेल नहीं खेलना चाहता था. उसने बैटमिंटन को चुन लिया था और उसी में ही अपना कैरियर बनाना चाहता था.

 

 

धर्मा पिंटू से मिलने उसके नाना के घर आया, उस समय पिंटू प्रेक्टिस कर के वापस लौटा था, इतने में रमेश भी गया. पिंटू ने दोनो की बातों को ध्यान से सुना, अब वह बुरी तरह असमंजस में पद गया था. अब वह किसकी बात माने और वह भी तब जब वह खुद इस खेल को नहीं खेलना चाहता था.

 

 

 

अगर वह भाई का साथ देता तो दोस्त बुरा मान जाता और अगर दोस्त की बात मानता तो भाई......वह गहरे सोच में डूब गया. काफी सोचने के बाद वह स्कूल की तरफ से खेलने को राज़ी हो गया.

 

 

 

 

उसने रमेश को समझते हुए कहा कि अगर मैं स्कूल के खिलाफ खेलता हूँ तो भाई की बदनामी होगी और अगर मैं उधमपुर की तरफ से खेलता हूँ और किसी कारणों से उधमपुर टीम हार जाती है तो लोग मेरे उपर आरोप लगा देंगे कि भाई की टीम को जीताने के लिए इसनी बढियाँ नहीं खेला. लेकिन फिर भी मैं दोनों लोगों को एक मौका दे रहा हूँ....मेरी एक शर्त है मेरा रैकेट मेरे साथ ही रहेगा....अब यह जिसको मंजूर हो मई उसकी टीम में जाने को तैयार हूँ.

 

 

 

बच्चों की हिंदी कहानियां Hindi Kahaniya

 

 

 

दोनो ही टीमें मैदान में पहुच गयी. उधमपुर की तरफ से भी दूसरे खिलाड़ी को ले लिया गया था. पूरा मैदान दर्शकों से पट गया था. दर्शकों में गजब का उत्साह था,

 

 

 

सभी टीमें जब मैदान में प्रवेश कर रही थी तो सबकी नज़रें पिंटू पर ही थी, लोग यह सोच रहे थे कि कबड्डी के मैदान में यह रैकेट लेकर क्यों गया...आख़िर माजरा क्या है.

 

 

 

 

मैच शुरू होने के पहले खिलाड़ी एक दूसरे पर छींटाकसी करने लगे, विपक्षी टीम के खिलाड़ी पिंटू का मज़ाक उड़ाने लगे, लेकिन पिंटू कुछ नहीं बोला .

 

 

 

 

उसने रैकेट रेफ़री को दे दिया. मैच आरंभ हो गया....पहले ही चक्कर में पिथौरागढ़ की टीम उधमपुर पर भारी पड़ने लगी और यह सिलसिला अंत तक रुका नहीं, अंत में पिथौरागढ़ उधमपुर को भारी अंतर से हरा दिया.

 

 

 

पिंटू को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया. उसको इनाम लेने के लिए मंच पर बुलाया गया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वह मंच पर पहुंचा. उस इलाक़ेकेविधायक हाथों उसे सम्मानित किया गया.

 

 

 

विधायक जी ने कहा कि आज तुमने बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया.... तुम्हारे इतना बढ़ियाँ प्रदर्शन करने का कारण क्या है और यह रैकेट का क्या राज है, जिसे लेकर तुम मैदान में गये थे. विश्‍वास ...... हां सही सुना आप सभी लोगों ने...कहा जाता है कि भगवान कणकण में रहते हैं...तो मेरा भगवान इसमें रहता है. 

 

अभी रमेश सोच ही रहा था कि धर्मा ने हां कह दी. उसासने सारी बातें जीतू सर को बताई...इस पर उन्होने कहा कि यह कबड्डी का खेल है हम रैकेट की कैसे इजाज़त दे सकते हैं.

 

 

सर इसका भी मेरे पास एक उपाय है. रैकेट को हम मैच रेफ़री के पास रख देंगे.......धर्मा ने खुश होते हुए कहा..

 

 

गुड, वेरी गुड....थैंक यू....अब मेरी चिंता ख़त्म हो गयी.

 

 

 

 

Hindi Kahaniyan For Kids  हिंदी की बेहतरीन कहानियां

 

 

 

दोनो ही टीमें मैदान में पहुच गयी. उधमपुर की तरफ से भी दूसरे खिलाड़ी को ले लिया गया था. पूरा मैदान दर्शकों से पट गया था. दर्शकों में गजब का उत्साह था, सभी टीमें जब मैदान में प्रवेश कर रही थी तो सबकी नज़रें पिंटू पर ही थी, लोग यह सोच रहे थे कि कबड्डी के मैदान में यह रैकेट लेकर क्यों गया...आख़िर माजरा क्या है

 

 

 

 

. मैच शुरू होने के पहले खिलाड़ी एक दूसरे पर छींटाकसी करने लगे, विपक्षी टीम के खिलाड़ी पिंटू का मज़ाक उड़ाने लगे, लेकिन पिंटू कुछ नहीं बोला .

 

 

 

उसने रैकेट रेफ़री को दे दिया. मैच आरंभ हो गया....पहले ही चक्कर में पिथौरागढ़ की टीम उधमपुर पर भारी पड़ने लगी और यह सिलसिला अंत तक रुका नहीं, अंत में पिथौरागढ़ उधमपुर को भारी अंतर से हरा दिया.

 

 

 

पिंटू को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया. उसको इनाम लेने के लिए मंच पर बुलाया गया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच वह मंच पर पहुंचा. उस इलाक़ेकेविधायक हाथों उसे सम्मानित किया गया.

 

 

 

 

विधायक जी ने कहा कि आज तुमने बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया.... तुम्हारे इतना बढ़ियाँ प्रदर्शन करने का कारण क्या है और यह रैकेट का क्या राज है, जिसे लेकर तुम मैदान में गये थे.

 

 

विश्‍वास ...... हां सही सुना आप सभी लोगों ने...कहा जाता है कि भगवान कणकण में रहते हैं...तो मेरा भगवान इसमें रहता है.

 

 

 

 

 

२-  शेखर जब तीन साल का था तो एक दिन अपने दादा कमल नाथ के साथ घूमने के लिए फूलों के बगीचे में गया. खेलतेखेलते वह कनैल के फू के पास पहुँच गया.

 

 

 

उसके दादा एक परिचित के साथ बात करने में मसगूल थे, उनका शेखर की तरफ धययन ही नहीं गया. करीब एक घंटे बाद उनका ध्यान शेखर की तरफ गया, उन्होने देखा तो शेखर वहां नहीं था.

 

 

 

अब कमलनाथ परेशान हो गये, पागलों की तरह पूरे बगीचे में शेखर को ढूढ़ने लगे. कमलनाथ का दिल बैठा जा रहा था, उन्हे यह चिंता सता रही थी कि घर पर क्या जवाब देंगे. 

 

 

 

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इतने उनकी निगाह कनैल के फूल पर पड़ी, उसके नीचे बैठकर शेखर कुछ कह रहा था....जैसे किसी से बात कर रहा हो और उस फूल की डाली शेखर के उपर ऐसी झुकी हुई थी मानो कोई मां अपने बच्चे को गोद में लेकर दुलार रही हो.

 

 

 

शेखरशेखर की आवाज़ लगाते, कमलनाथ दौड़ते हुए शेखर की ओर आये. उन्हें आता देख शेखर हंसने लगा. तुम हंस रहे हो. यहां जान निकली जा रही थी. चलो अब घर चलो...कमलनाथ नी कहा.

 

 

तभी कमलनाथ ने देखा कि शेखर के हटते ही कनैल की डालियां उपर चली गयी. इस घटना से कमलनाथ आश्चर्यचकित रह गये.वे घर आए और घर वालों को भी सारी बाते बता दी. घर के लोग भी हैरत में पड़ गये.

 

 

 

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शेखर हमेशा कहलाते हुए बगीचे में उस ” कनैल ” के पेड़ कके पास चला जाता था. समय आने पर जब वह ” कनैल ” का पेड़ फूलों से लद जाता था तो शेखर बहुत ही खुश होता था.

 

 

 

समय बिता, आज शेखर साल का हो गया था, लेकिन आज भी जो खुशी उसे कनैल के पेड़ के पास मिलती थी, कहीं और नहीं मिलती थी. गांव के बच्चे शेखर से चिढ़ते थे क्योकि जब भी शेखर उस पेड़ के पास बैठता था तो उसकी शाखाएं शेखर सी ऐसे लिपट जाती थीं जैसे कोई मां अपने बेटे को दुलार रही हो. पर बाकी बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता था.

 

 

 

एक दिन सभी बच्चों ने मिलकर उस पेड़ को जड़ से उखाड़ने की योजना बनाई और उस पेड़ के पास पहुंचे, लेकिन उस पेड़ को कुछ नुकसान पहुँचाते उसके पहले ही पेड़ को इस बात का आभास हो गया,

 

 

 

 

उसके बाद उस पेड़ ने शरारती बच्चों को ऐसा जकड़ा कि जैसे कोई रस्सी से कस कर बांध दया हो. बच्चे जोरजोर से चिल्लाने लगे, उनकी आवाज सुनकर गांव वाले गये, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी वे बच्चों को छुड़ा नहीं पाए और अंत में शेखर के आने की बाद उन सभी को छुड़ाया जा सका. सभी उस पेड़ से क्षमा मांगी और घर को आए .

 

 

बच्चों कल सरस्वती पूजा है. सभी बच्चों को ढेर सारे फूल लाने हैं, जो सबसे अधिक फूल लाएगगा उसे इनाम मिलेगा. ...प्रधानाचार्य ने सभी बच्चों को संबोधित करते हुए कहा.

 

 

 

सभी बच्चों ने फूल एकत्रित किया, शेखर ने भी फूल एकत्र किया और उसी लेकर वह विद्यालय की तरफ चल पड़ा, लेकिन गांव के शरारती बच्चों ने उस दिन की बात से कोई सबक नहीं लिया था, उन्होने शेखर से सारे फूल चीन लिये और उसे धक्का देकर आगे निकल गये. शेखर रोने लगा और रोते हुए बगीचे में कनैल के पेड़ के पास पहुंचा.

 

 

 

कनैल ने शेखर से रोने का कारण पूछा तो शेखर ने सारी बातें बता दी. पेड़ ने हंसते हुए कहा कोई बात नहीं जाओ अपने प्रधानाचार्य को कहना कि मेरे पास बहुत अधिक फूल हैं, एक बैलगाड़ी की आवश्यकता पड़ेगी.

 

 

 

इधर क्षात्रों ने फूल बहुत ही कम लाये. प्रधानाचार्य इस बात से बहुत खफा थे क्योंकि इन फुलो से ही मां सरस्वती की प्रतिमा बनानी थी, जीसी देखने के लिए कई गणमान्य आने वाले थे.

 

 

 

तभी शेखर के खाली हाथ आता देख कर प्रधानाचार्य ने गुस्से में उससे फूल ना लाने का कारण पूछा, तो उसने पेड़ की कही हुई बात बता दी. सभी लोग यह बात सुनकर हँसने लगे, शेखर का मज़ाक उड़ाने लगे. 

 

चुप एकदम चुप ....कोई और रास्ता है, नहीं ना....तो फिर जाओ, बैलगाड़ी का इंतजाम करो...प्रधानाचार्य ने कहा.

 

 

लेकिन मेरी एक शर्त है, उस बैलगाड़ी को रिंकू, सोनू, मोनू, किशन, बनू, भानु ही खीचेंगे...शेखर ने कहा.

 

 

 

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यह वही बच्चे थे, जिन्होने शेखर को धक्का मारा था.ठीक है...लेकिन फूल नहीं मिले तो तुम्हें इस स्कूल के मैदान का बीस चक्कर लगाना होगा...प्रधानाचार्य ने कहा .

 

 

शेखर ठीक है .

 

 

उन बच्चों के नाना कहने पर भी उन्हें भेजा गया और आश्चर्य फूलों से लदी गाड़ी स्कूल में गयी..सभी लोग यह देख दंग रह गये. उधर उन  छात्रो का बुरा हाल था. वे पसीने से तर=बतर थे.

 

 

 

सरस्वती प्रतिमा बनाकर पूजा की गयी, सभी लोगों ने खूब तारीफ की. प्रतिमा ऐसी बनी थी मानो अभी बोल ही देगी कि तभी प्रतिमा ने बोल ही दिया आज इतने सारे फूल देखकर सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये ना...दरअसल यह फूल नहीं हैं यह है विश्वास, यह है प्रेम , यह है समर्पण.

 

 

 

 

शेखर को विश्वास था कि फूल अवश्य मिलेंगे, तभी उसने मैदान के २० चक्कर लगाने की शर्त को मान लिया.. .यह कनैल का प्रेम था, उसका समर्पण था कि उसने शेखर को फूल दे दिया....यही प्यार, विश्वास और समर्पण मनुष्य को आगे ले जाता है और जो विश्वासघात करता है उसका हाल उन क्षात्रों के जैसा होता है. उसके बाद आवाज बंद हो गयी...सभी लोगों ने शेखर को सम्मानित किया और उसे आशीर्वाद दिया..

 

 

 

 

 

३- एक बार एक साधु अपने कुछ शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले थे. चलतेचलते दोपहर हो गयी. गर्मी का मौसम था, सूरज आग बरसा रहा था, पृथ्वी आग का गोला बनी हुई थी, ना तो ऊपर से राहत थी और ना ही नीचे से.

 

 

 

साधु और उनके सभी शिष्य पसीने से तरबतर हो गयी थे और उन्हें प्यास भी लगी थी. अचानक उन्हें एक गांव नज़र आया, उन्होने उसी गांव कुछ समय रुक कर विश्राम करने का निर्णय किया. कुछ ही समय में वे गांव के पास गये, वहां एक शिवमंदिर था. उन्होने अपने शिष्यों को इसी मंदिर पर रुकने का आदेश दिया.

 

 

 

शीतल हवा बह रही थी. सभी लोगों ने वहाँ लगी नल से पानी पीया और कुछ देर  विश्राम करने का निर्णय किया. थकान और शीतल हवा के कारण सभी को नींद आ गयी.

 

 

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कुछ समय पश्चात उधर से एक राहगीर गुजरा. उसने जब इतने सारे साधुओं को मंदिर के पास विश्राम करते हुए देखा तो जाकर पुरे गाँव में इसे बता दिया.

 

 

 

गाँव के लोग बहुत ही उत्तम विचार के लोग थे. सदा ही दीं दुखियों की मदद करते थे. आपस में किसी प्रकार का वाद – विवाद नहीं होता था और अगर होता भी था तो उसे आपस में सुलझा लिया जाता था.

 

 

 

यह खबर सुनकर गांव के मुखिया श्री रामविहारी जी अन्य गांव वालों के साथ उन साधुओं के स्वागत के लिए मंदिर की ओर प्रस्थान किए. मंदिर में बढ़ते शोरगुल से साधु और उनके शिष्यों की निद्रा भंग हो गयी,

 

 

 

वे लोग उठ गये. इस पर मुखिया जी हाथ जोड़कर साधु महाराज से क्षमा माँगी और आज रात इसी मंदिर पर रुकने का निवेदन किया. साधु महाराज मान गये.

 

 

 

रात को मंदिर पर पूरा गांव जुट गया. बाटी चोखा का कार्यक्रम रखा गया. देर रात तक भजन कीर्तन होता रहा. बातबात में मुखिया जी कहा कि हे साधु महाराज कल यहां एक मेला लगाने वाला है, जो कि हर साल लगता है,

 

 

 

 

इस बार आप भगवान की कृपा से यहां पधारे हैं तो मेला देखकर ही जाएं. साधु महाराज मुखिया जी और गांव वालों से बड़े प्रसन्न थे, उन्होने हां कह दी.

 

 

 

मेले की तैयारियां तो रात से ही प्रारंभ हो चुकी थी. दूरदूर से बड़ेबड़े व्यापारी आने शुरू हो चुके थे. सुबह हुई बड़ी संख्या में व्यापारी चुके थे और बहुत सारे भी रहे थे. मुखिया जी ने साधु को बताया कि यह मेला दोपहर से शुरू होता है और देर रात तक चलता है.

 

 

 

 

दोपहर का वक्त गया था, मेला पूरी तरह सज चुका था, कहीं पर झूले, कहीं पर पीपिहीरी की पींपीं सुनाई दे रही थी. जैसेजैसे शाम की बेला रही थी, मेले की रौनक बढ़ती ही जा रही थी.

 

 

 

साधु ने मुखिया जी से मेले में घूमने का आग्रह किया, इस पर मुखिया ने कहा कि मैं स्वयं आपको मेले का भ्रमण कराऊंगा. मुखिया जी उनके साथ गांव के कुछ विशिष्ट लोग और साधु तथा उनके शिष्य मेले के भ्रमण के लिए निकल पड़े.

 

 

 

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मेला अपनी भव्यता पर था. मेले में घूमते हुए साधु की नजर एक और साधु पर पड़ी. साधु महाराज ने देखा कि मेले में बैठे साधु आंख बंद करके माला फेर रहे थे, लेकिन माला फेरते हुए वे बारबार आंखें खोलकर देख रहे थे कि लोगों ने चढ़ावा कितना दिया. अगर कोई कम देता तो वे अपना मुंह बिचका लेते थे. यह देख साधु महाराज हंस दिए और बढ़ गये.  

 

 

 

आगे उन्होने देखा की एक पंडित महाराज लोगों की हाथ देख रहे थे. लेकिन उनका हाथ पर कम दक्षिणा पर ज्यादा ध्यान था. वे उन लोगों का भाग्य बहुत बढ़िया बता रहे, जो उन्हें ज्यादा पैसा दे रहा था.

 

 

 

उन्हें देखकर साधु महाराज खिलखिलाकर हंस पड़े. आगे बढ़ने पर उन्होने देखा कि एक स्वयं सेवी संस्था बीमार, लाचार लोगों को मुफ्त में दवा दे रही थी और उनके घाव या अन्य बीमारियों का इलाज भी कर रही थी. साधु महाराज वहां कुछ देर रुके, उनके कार्यों को देखते रहे कि कैसी तल्लिनता और सेवाभाव से अपना कार्य कर रहे थे. यह देख उनकी आंखों में आँसू गये.

 

 

जब पूरे मेले का भ्रमण कर वे वापस मंदिर आए तो मुखिया जी ने मेले में दो जगह हंसने और एक जगह तने शांत भाव से देखने का कारण पूछा,

 

 

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इस पर साधु ने कहा बेटा उन दोनों जगहों पर जहां मैं हंसा वहां तो धर्म के नाम पर बस आडंबर हो रहा था. बगवान के कार्य में भगवान की प्राप्ति के बस वही स्वयंसेवी संस्था और उसके लोग आकुल दिखे. उन सेवा भावना देख कर मेरा हृदय द्रवित हो गया.

 

 

इस पर मुखिया जी उस स्वयंसेवी संस्था के प्रत्येक सभासदों और उससे जुड़ें लोगों को सम्मानित करने का निर्णय लिया और उन्हें साधु महाराज के हाथों सम्मानित किया गया. उसके बाद साधु हराज ने भी गांव वालों से विदा ली और उन्हें बहुत आशीर्वाद देकर वहां से प्रस्थान किया.

 

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