hindi panchatantra stories

Hindi story of panchatantra. बुद्धिमान सियार . Panchatantra

hindi story of panchatantra
Written by Abhishek Pandey

hindi story of panchatantra एक समय की बात हैं कि जंगल में एक शेर के पैर में कांटा चुभ गया.  पंजे में जख्म हो गया और शेर के लिए दौडना असंभव हो गया.  वह लंगडाकर मुश्किल से चलता.

 

 

 

शेर के लिए तो शिकार  करने के लिए दौडना जरुरी होता है.  इसलिए वह कई दिन कोई शिकार न कर पाया और भूखों मरने लगा.  कहते हैं कि शेर मरा हुआ जानवर नहीं खाता, परन्तु मजबूरी में सब कुछ करना पडता हैं.  लंगडा शेर किसी घायल अथवा मरे हुए जानवर की तलाश में जंगल में भटकने लगा.  यहां भी किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया.  कहीं कुछ हाथ नहीं लगा.

 

 

 

 

धीरे-धीरे पैर घसीटता हुआ वह एक गुफा के पास आ पहुंचा.  गुफा गहरी और संकरी थी, ठीक वैसी जैसे जंगली जानवरों के मांद के रुप में काम आती हैं.

 

 

 

 

उसने उसके अंदर झांका मांद खाली थी पर चारो ओर उसे इस बात के प्रमाण नजर आए कि उसमें जानवर का बसेरा हैं.  उस समय वह जानवर शायद भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था.  शेर चुपचाप दुबककर बैठ गया ताकि उसमें रहने वाला जानवर लौट आए तो वह दबोच ले.

 

 

hindi story of panchatantra

 

 

सचमुच उस गुफा में सियार रहता था, जो दिन को बाहर घूमता रहता और रात को लौट आता था.  उस दिन भी सूरज डूबने के बाद वह लौट आया.  सियार काफी चालाक था.  हर समय चौकन्ना रहता था.

 

 

 

 

 

उसने अपनी गुफा के बाहर किसी बडे जानवर के पैरों के निशान देखे तो चौंका उसे शक हुआ कि कोई शिकारी जीव मांद में उसके शिकार की आस में घात लगाए न बठा हो.  उसने अपने शक की पुष्टि के लिए सोच विचार कर एक चाल चली.  गुफा के मुहाने से दूर जाकर उसने आवाज दी “गुफा! ओ गुफा.”

 

 

 

गुफा में चुप्पी छायी रही उसने फिर पुकारा “अरी ओ गुफा, तु बोलती क्यों नहीं ?”

 

 

 

भीतर शेर दम साधे बैठा था.  भूख के मारे पेट कुलबुला रहा था.  उसे यही इंतजार था कि कब सियार अंदर आए और वह उसे पेट में पहुंचाए.  इसलिए वह उतावला भी हो रहा था.

 

 

 

सियार एक बार फिर जोर से बोला “ओ गुफा! रोज तु मेरी पुकार का के जवाब में मुझे अंदर बुलाती हैं.  आज चुप क्यों हैं ? मैंने पहले ही कह रखा हैं कि जिस दिन तु मुझे नहीं बुलाएगी, उस दिन मैं किसी दूसरी गुफा में चला जाऊंगा.  अच्छा तो मैं चला.”

 

 

 

यह सुनकर शेर हडबडा गया.  उसने सोचा शायद गुफा सचमुच सियार को अंदर बुलाती होगी.  यह सोचकर कि कहीं सियार सचमुच न चला जाए, उसने अपनी आवाज बदलकर कहा “सियार राजा, मत जाओ अंदर आओ न.

 

 

 

 

मैं कब से तुम्हारी राह देख रही थी. ” सियार शेर की आवाज पहचान गया और उसकी मूर्खता पर हंसता हुआ वहां से चला गया और फिर लौटकर नहीं आया.  मूर्ख शेर उसी गुफा में भूखा-प्यासा मर गया.  इससे यही शिक्षा मिलती है कि सतर्क व्यक्ति जीवन में कभी मार नहीं खाता.

 

 

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2- Hindi short story of panchatantra:– गोलू-मोलू और पक्के दोस्त थे. गोलू जहां दुबला-पतला था, वहीं मोलू मोटा गोल-मटोल. दोनों एक-दूसरे पर जान देने का दम भरते थे, लेकिन उनकी जोड़ी देखकर लोगों की हंसी छूट जाती. एक बार उन्हें किसी दूसरे गांव में रहने वाले मित्र का निमंत्रण मिला. उसने उन्हें अपनी बहन के विवाह के अवसर पर बुलाया था.

 

 

 

उनके मित्र का गांव कोई बहुत दूर तो नहीं था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए जंगल से होकर गुजरना पड़ता था. और उस जंगल में जंगली जानवरों की भरमार थी.

 

 

 

दोनों चल दिए…जब वे जंगल से होकर गुजर रहे थे तो उन्हें सामने से एक भालू आता दिखा. उसे देखकर दोनों भय से थर-थर कांपने लगे. तभी दुबला-पतला गोलू तेजी से दौड़कर एक पेड़ पर जा चढ़ा, लेकिन मोटा होने के कारण मोलू उतना तेज नहीं दौड़ सकता था. उधर भालू भी निकट आ चुका था, फिर भी मोलू ने साहस नहीं खोया.

 

 

 

 

उसने सुन रखा था कि भालू मृत शरीर को नहीं खाते. वह तुरंत जमीन पर लेट गये और सांस रोक ली. ऐसा अभिनय किया कि मानो शरीर में प्राण हैं ही नहीं. भालू घुरघुराता हुआ मोलू के पास आया, उसके चेहरे व शरीर को सूंघा और उसे मृत समझकर आगे बढ़ गया.

 

 

 

जब भालू काफी दूर निकल गया तो गोलू पेड़ से उतरकर मोलू के निकट आया और बोला, ‘‘मित्र, मैंने देखा था….भालू तुमसे कुछ कह रहा था. क्या कहा उसने ?’’

 

 

मोलू ने गुस्से में भरकर जवाब दिया, ‘‘मुझे मित्र कहकर न बुलाओ…और ऐसा ही कुछ भालू ने भी मुझसे कहा. उसने कहा, गोलू पर विश्वास न करना, वह तुम्हारा मित्र नहीं है.’’

 

 

सुनकर गोलू शर्मिन्दा हो गया. उसे अभ्यास हो गया था कि उससे कितनी भारी भूल हो गई थी. उसकी मित्रता भी सदैव के लिए समाप्त हो गई. शिक्षा—सच्चा मित्र वही है जो संकट के काम आए.

 

 

 

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3- panchatantra ki stories :- एक कुएं में बहुत से मेढक रहते थे. उनके राजा का नाम था गंगदत्त. गंगदत्त बहुत झगडालू स्वभाव का था. आसपास दो तीन और भी कुएं थे. उनमें भी मेढक रहते थे. हर कुएं के मेढकों का अपना राजा था. हर राजा से किसी न किसी बात पर गंगदत्त का झगडा चलता ही रहता था.

 

 

 

 

वह अपनी मूर्खता से कोई गलत काम करने लगता और बुद्धिमान मेढक रोकने की कोशिश करता तो मौका मिलते ही अपने पाले गुंडे मेढकों से पिटवा देता. कुएं के मेढकों में भीतर गंगदत्त के प्रति रोष बढता जा रहा था। घर में भी झगडों से चैन न था. अपनी हर मुसीबत के लिए दोष देता.

 

 

 

एक दिन गंगदत्त पडौसी मेढक राजा से खूब झगडा. खूब तू-तू मैं-मैं हुई. गंगदत्त ने अपने कुएं आकर बताया कि पडौसी राजा ने उसका अपमान किया हैं. अपमान का बदला लेने के लिए उसने अपने मेढकों को आदेश दिया कि पडौसी कुएं पर हमला करें सब जानते थे कि झगडा गंगदत्त ने ही शुरु किया होगा.

 

 

 

कुछ स्याने मेढकों तथा बुद्धिमानों ने एकजुट होकर एक स्वर में कहा “राजन, पडौसी कुएं में हमसे दुगने मेढक हैं. वे स्वस्थ व हमसे अधिक ताकतवर हैं. हम यह लडाई नहीं लडेंगे.”

 

 

 

गंगदत्त सन्न रह गया और बुरी तरह तिलमिला गया. मन ही मन में उसने ठान ली कि इन गद्दारों को भी सबक सिखाना होगा. गंगदत्त ने अपने बेटों को बुलाकर भडकाया “बेटा, पडौसी राजा ने तुम्हारे पिताश्री का घोर अपमान किया हैं. जाओ, पडौसी राजा के बेटों की ऐसी पिटाई करो कि वे पानी मांगने लग जाएं.”

 

 

गंगदत्त के बेटे एक दूसरे का मुंह देखने लगे. आखिर बडे बेटे ने कहा “पिताश्री, आपने कभी हमें टर्राने की इजाजत नहीं दी. टर्राने से ही मेढकों में बल आता हैं, हौसला आता हैं और जोश आता हैं. आप ही बताइए कि बिना हौसले और जोश के हम किसी की क्या पिटाई कर पाएंगे?”

 

 

 

अब गंगदत्त सबसे चिढ गया. एक दिन वह कुढता और बडबडाता कुएं से बाहर निकल इधर-उधर घूमने लगा. उसे एक भयंकर नाग पास ही बने अपने बिल में घुसता नजर आया. उसकी आंखें चमकी. जब अपने दुश्मन बन गए हो तो दुश्मन को अपना बनाना चाहिए. यह सोच वह बिल के पास जाकर बोला “नागदेव, मेरा प्रणाम.”

 

 

नागदेव फुफकारा “अरे मेढक मैं तुम्हारा बैरी हूं. तुम्हें खा जाता हूं और तू मेरे बिल के आगे आकर मुझे आवाज दे रहा हैं.

 

 

 

गंगदत्त टर्राया “हे नाग, कभी-कभी शत्रुओं से ज्यादा अपने दुख देने लगते हैं. मेरा अपनी जाति वालों और सगों ने इतना घोर अपमान किया हैं कि उन्हें सबक सिखाने के लिए मुझे तुम जैसे शत्रु के पास सहायता मांगने आना पडा हैं. तुम मेरी दोस्ती स्वीकार करो और मजे करो.”

 

 

 

नाग ने बिल से अपना सिर बाहर निकाला और बोला “मजे, कैसे मजे?”

 

 

 

गंगदत्त ने कहा “मैं तुम्हें इतने मेढक खिलाऊंगा कि तुम मुटाते-मुटाते अजगर बन जाओगे.”

 

 

 

 

नाग ने शंका व्यक्त की “पानी में मैं जा नहीं सकता. कैसे पकडूंगा मेंढक?”

 

 

 

गंगदत्त ने ताली बजाई “नाग भाई, यहीं तो मेरी दोस्ती तुम्हारे काम आएगी. मैने पडौसी राजाओं के कुओं पर नजर रखने के लिए अपने जासूस मेडकों से गुप्त सुरंगें खुदवा रखी हैं. हर कुएं तक उनका रास्ता जाता हैं. सुरंगें जहां मिलती हैं. वहां एक कक्ष हैं. तुम वहां रहना और जिस-जिस मेढक को खाने के लिए कहूं, उन्हें खाते जाना.”

 

 

 

 

नाग गंगदत्त से दोस्ती के लिए तैयार हो गया. क्योंकि उसमें उसका लाभ ही लाभ था. एक मूर्ख बदले की भावना में अंधे होकर अपनों को दुशमन के पेट के हवाले करने को तैयार हो तो दुश्मन क्यों न इसका लाभ उठाए?

 

 

 

 

नाग गंगदत्त के साथ सुरंग कक्ष में जाकर बैठ गया. गंगदत्त ने पहले सारे पडौसी मेढक राजाओं और उनकी प्रजाओं को खाने के लिए कहा. नाग कुछ सप्ताहों में सारे दूसरे कुओं के मेढक सुरंगों के रास्ते जा-जाकर खा गया. जब सब समाप्त हो गए तो नाग गंगदत्त से बोला “अब किसे खाऊं? जल्दी बता. चौबीस घंटे पेट फुल रखने की आदत पड गई हैं.”

 

 

 

 

गंगदत्त ने कहा “अब मेरे कुए के सभी स्यानों और बुद्धिमान मेढकों को खाओ.”

 

 

 

वह खाए जा चुके तो प्रजा की बारी आई. गंगदत्त ने सोचा “प्रजा की ऐसी तैसी. हर समय कुछ न कुछ शिकायत करती रहती हैं. उनको खाने के बाद नाग ने खाना मांगा तो गंगदत्त बोला “नागमित्र, अब केवल मेरा कुनबा और मेरे मित्र बचे हैं. खेल खत्म और मेढक हजम.”

 

 

 

नाग ने फन फैलाया और फुफकारने लगा “मेढक, मैं अब कहीं नही जाने का. तू अब खाने का इंतजाम कर वर्ना हिस्स.”

 

 

गंगदत्त की बोलती बंद हो गई. उसने नाग को अपने मित्र खिलाए फिर उसके बेटे नाग के पेट में गए. गंगदत्त ने सोचा कि मैं और मेढकी जिन्दा रहे तो बेटे और पैदा कर लेंगे. बेटे खाने के बाद नाग फुफकारा “और खाना कहां हैं? गंगदत्त ने डरकर मेढकी की ओर इशार किया. गंगदत्त ने स्वयं के मन को समझाया “चलो बूढी मेढकी से छुटकारा मिला. नई जवान मेढकी से विवाह कर नया संसार बसाऊंगा.”

 

 

 

 

 

मेढकी को खाने के बाद नाग ने मुंह फाडा “खाना.”

 

गंगदत्त ने हाथ जोडे “अब तो केवल मैं बचा हूं. तुम्हारा दोस्त गंगदत्त . अब लौट जाओ.”

 

 

 

नाग बोला “तू कौन-सा मेरा मामा लगता हैं और उसे हडप गया.

 

 

 

सीखः अपनो से बदला लेने के लिए जो शत्रु का साथ लेता हैं उसका अंत निश्चित हैं.

 

 

 

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4- hindi panchatantra kahaniya :- एक बार एक जंगल के निकटदो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा. सेनाएं अपने नगरों को लौट गई। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया. उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भांड व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे.

 

 

युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई. आंधी के जोर में वह ढोल लुढकता-पुढकता एक सूखे पेड के पास जाकर टिक गया. उस पेड की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थी कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थी और ढमाढम ढमाढम की गुंजायमान आवाज होती.

 

 

 

 

एक सियार उस क्षेत्र में घूमता था. उसने ढोल की आवाज सुनी. वह बडा भयभीत हुआ. ऐसी अजीब आवाज बोलते पहले उसने किसी जानवर को नहीं सुना था. वह सोचने लगा कि यह कैसा जानवर हैं, जो ऐसी जोरदार बोली बोलता हैं’ढमाढम’. सियार छिपकर ढोल को देखता रहता, यह जानने के लिए कि यह जीव उडने वाला हैं या चार टांगो पर दौडने वाला.

 

 

 

एक दिन सियार झाडी के पीछे छुप कर ढोल पर नजर रखे था. तभी पेड से नीचे उतरती हुई एक गिलहरी कूदकर ढोल पर उतरी. हलकी-सी ढम की आवाज भी हुई। गिलहरी ढोल पर बैठी दाना कुतरती रही.

 

 

 

सियार बडबडाया “ओह! तो यह कोई हिंसक जीव नहीं हैं. मुझे भी डरना नहीं चाहिए.”

 

 

सियार फूंक-फूंककर कदम रखता ढोल के निकट गया. उसे सूंघा. ढोल का उसे न कहीं सिर नजर आया और न पैर. तभी हवा के झुंके से टहनियां ढोल से टकराईं. ढम की आवाज हुई और सियार उछलकर पीछे जा गिरा.

 

 

 

“अब समझ आया.” सियार उढने की कोशिश करता हुआ बोला “यह तो बाहर का खोल हैं. जीव इस खोल के अंदर हैं. आवाज बता रही हैं कि जो कोई जीव इस खोल के भीतर रहता हैं, वह मोटा-ताजा होना चाहिए. चर्बी से भरा शरीर. तभी ये ढम=ढम की जोरदार बोली बोलता हैं.”

 

 

 

 

अपनी मांद में घुसते ही सियार बोला “ओ सियारी! दावत खाने के लिए तैयार हो जा. एक मोटे-ताजे शिकार का पता लगाकर आया हूं.”

 

 

सियारी पूछने लगी “तुम उसे मारकर क्यों नहीं लाए?”

 

 

सियार ने उसे झिडकी दी “क्योंकि मैं तेरी तरह मूर्ख नहीं हूं. वह एक खोल के भीतर छिपा बैठा हैं. खोल ऐसा हैं कि उसमें दो तरफ सूखी चमडी के दरवाजे हैं. मैं एक तरफ से हाथ डाल उसे पकडने की कोशिश करता तो वह दूसरे दरवाजे से न भाग जाता?”

 

 

चांद निकलने पर दोनों ढोल की ओर गए. जब वह् निकट पहुंच ही रहे थे कि फिर हवा से टहनियां ढोल पर टकराईं और ढम-ढम की आवाज निकली. सियार सियारी के कान में बोला “सुनी उसकी आवाज्? जरा सोच जिसकी आवाज ऐसी गहरी हैं, वह खुद कितना मोटा ताजा होगा.”

 

 

 

दोनों ढोल को सीधा कर उसके दोनों ओर बैठे और लगे दांतो से ढोल के दोनों चमडी वाले भाग के किनारे फाडने. जैसे ही चमडियां कटने लगी, सियार बोला “होशियार रहना. एक साथ हाथ अंदर डाल शिकार को दबोचना हैं.” दोनों ने ‘हूं’ की आवाज के साथ हाथ ढोल के भीतर डाले और अंदर टटोलने लगे. अदंर कुछ नहीं था. एक दूसरे के हाथ ही पकड में आए. दोंनो चिल्लाए “हैं! यहां तो कुछ नहीं हैं.” और वे माथा पीटकर रह गए.

 

 

 

सीखः शेखी मारने वाले ढोल की तरह ही अंदर से खोखले होते हैं.

 

 

 

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5- hindi panchatantra stories :- मिथिला के जंगलों में बहुत समय पहले एक सियार रहता था. वह बहुत आलसी था. पेट भरने के लिए खरगोशों व चूहों का पीछा करना व उनका शिकार करना उसे बडा भारी लगता था. शिकार करने में परिश्रम तो करना ही पडता हैं न.

 

 

 

 

दिमाग उसका शैतानी था. यही तिकडम लगाता रहता कि कैसे ऐसी जुगत लडाई जाए जिससे बिना हाथ-पैर हिलाए भोजन मिलता रहे. खाया और सो गए. एक दिन उसी सोच में डूबा वह सियार एक झाडी में दुबका बैठा था.

 

 

 

बाहर चूहों की टोली उछल-कूद व भाग-दौड करने में लगी थी. उनमें एक मोटा-सा चूह था, जिसे दूसरे चूहे ‘सरदार’ कहकर बुला रहे थे और उसका आदेश मान रहे थे. सियार उन्हें देखता रहा. उसके मुंह से लार टपकती रही. फिर उसके दिमाग में एक तरकीब आई.

 

 

 

जब चूहे वहां से गए तो उसने दबे पांव उनका पीछा किया. कुछ ही दूर उन चूहों के बिल थे. सियार वापस लौटा. दूसरे दिन प्रातः ही वह उन चूहों के बिल के पास जाकर एक टांग पर ख्डा हो गया. उसका मुंह उगते सूरज की ओर था. आंखे बंद थी.

 

 

 

चूहे बोलों से निकले तो सियार को उस अनोखी मुद्रा में खडे देखकर वे बहुत चकित हुए. एक चूहे ने जरा सियार के निकट जाकर पूछा “सियार मामा, तुम इस प्रकार एक टांग पर क्यों खडे हो?”

 

 

 

सियार ने एक आंख खोलकर बोला “मूर्ख, तुने मेरे बारे में नहीं सुना कभी? मैं चारों टांगें नीचे टिका दूंगा तो धरती मेरा बोझ नहीं सम्भाल पाएगी. यह डोल जाएगी. साथ ही तुम सब नष्ट हो जाओगे. तुमहारे ही कल्याण के लिए मुझे एक टांग पर खडे रहना पडता हैं.”

 

 

चूहों में खुसर-पुसर हुई. वे सियार के निकट आकर खडे हो गए. चूहों के सरदार ने कहा “हे महान सियार, हमें अपने बारे में कुछ बताइए.”

 

 

सियार ने ढोंग रचा “मैने सैकडों वर्ष हिमालय पर्वत पर एक टांग पर खडे होकर तपस्या की. मेरी तपस्या समाप्त होने पर एक टांग पर खडे होकर तपस्या की.  मेरी तपस्या समाप्त होने पर सभी देवताओं ने मुझ पर फूलों की वर्षा की. भगवान ने प्रकट होकर कहा कि मेरे तप से मेरा भार इतना हो गया हैं कि मैं चारों पैर धरती पर रखूं तो धरती गिरती हुई ब्रह्मांड को फोडकर दूसरी ओर निकल जाएगी. धरती मेरी कॄपा पार ही टिकी रहेगी. तबसे मैं एक टांग पर ही खडा हूं. मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण दूसरे जीवों को कष्ट हो.”

 

 

 

 

 

सारे चूहों का समूह महातपस्वी सियार के सामने हाथ जोडकर खडा हो गया. एक चूहे ने पूछा “तपस्वी मामा, आपने अपना मुंह सूरज की ओर क्यों कर रखा हैं?”

 

 

 

 

सियार ने उत्तर दिया “सूर्य की पूजा के लिए.”

 

 

“और आपका मुंह क्यों खुला हैं?” दूसरे चूहे ने कहा.

 

 

 

“हवा खाने के लिए! मैं केवल हवा खाकर जिंदा रहता हूं. मुझे खाना खाने की जरुरत नहीं पडती. मेरे तप का बल हवा को ही पेट में भांति-भांति के पकवानों में बदल देता हैं.” सियार बोला.

 

 

 

उसकी इस बात को सुनकर चूहों पर जबरदस्त प्रभाव पडा. अब सियार की ओर से उनका सारा भय जाता रहा. वे उसके और निकट आ गए. अपनी बात का असर चूहों पर होता देख मक्कार सियार दिल ही दिल में खूब हंसा. अब चूहे महातपस्वी सियार के भक्त बन गए. सियार एक टांग पर खडा रहता और चूहे उसके चारों ओर बैठकर ढोलक, मजीरे, खडताल और चिमटे लेकर उसके भजन गाते.

 

 

 

 

 

सियार सियारम् भजनम् भजनम.

 

 

भजन किर्तन समाप्त होने के बाद चूहों की टोलियां भक्ति रस में डूबकर अपने बिलों में घुसने लगती तो सियार सबसे बाद के तीन-चार चूहों को दबोचकर खा जाता. फिर रात भर आराम करता, सोता और डकारें लेता.

 

 

 

सुबह होते ही फिर वह चूहों के बिलों के पास आकर एक टांग पर खडा हो जाता और अपना नाटक चालू रखता. धी चूहों की संख्या कम होने लगी। चूहों के सरदार की नजर से यह बात छिपी नहीं रही. एक दिन सरदार ने सियार से पूछ ही लिया “हे महात्मा सियार, मेरी टोली के चूहे मुझे कम होते नजर आ रहे हैं. ऐसा क्यों हो रहा हैं?”

 

 

 

सियार ने आर्शीवाद की मुद्रा में हाथ उठाया “हे चतुर मूषक, यह तो होना ही था. जो सच्चे मन से मेरी भक्ति लरेगा, वह सशरीर बैकुण्ठ को जाएगा. बहुत से चूहे भक्ति का फल पा रहे हैं.”

 

 

चूहो के सरदार ने देखा कि सियार मोटा हो गया हैं। कहीं उसका पेट ही तो वह बैकुण्ठ लोक नहीं हैं, जहां चूहे जा रहे हैं?

 

 

चूहों के सरदार ने बाकी बचे चूहों को चेताया और स्वयं उसने दूसरे दिन सबसे बाद में बिल में घुसने का निश्चय किया. भजन समाप्त होने के बाद चूहे बिलों में घुसे. सियार ने सबसे अंत के चूहे को दबोचना चाहा.

 

 

चूहों का सरदार पहले ही चौकन्ना था. वह दांव मारकर सियार का पंजा बचा गया. असलियत का पता चलते ही वह उछलकर सियार की गर्दन पर चढ गया और उसने बाकी चूहों को हमला करने के लिए कहा. साथ ही उसने अपने दांत सियार की गर्दन में गढा दिए. बाकी चूहे भी सियार पर झपटे और सबने कुछ ही देर में महात्मा सियार को कंकाल सियार बना दिया. केवल उसकी हड्डियों का पिंजर बचा रह गया.

 

 

 

सीखः ढोंग कुछ ही दिन चलता हैं, फिर ढोंगी को अपनी करनी का फल मिलता ही हैं.

 

 

 

 

 

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