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Hindi Story For Kids   हिंदी की कहानियां Hindi Story 

 

 

 

Hindi Story चिट..चिट..चिट..करते हुये गिलहरी नीम के पेड़ पर चढ़ गयी, क्योकि सामने  एक बिल्ली उस पर झपट्टा मारने  की पोज़ीशन बनाए बैठी थी, जिसे गिलहरी ने भाँप लिया था.  

 

 

 

 

अम्मा बिल्ली फिर से गयी कहते हुए हाथ में छोटा सा डंडा लेकर नरेश बिल्ली की तरफ दौड़ा कि उतने में बिल्ली भाग गयी...इतने में विनोद की मां वहां पहुँच गयी और नरेश को देखकर हँसने लगी. नरेश एकदम सैनिक की मुद्रा में बिल्ली को मरने की तैयारी में खड़ा था.

 

 

 

विनोद जमुना देवी का एकलौता पुत्र था और नरेश विनोद का लड़का था, अपने पिता अर्थात विनोद द्वारा जमुना देवी को अम्मा कहने के कारण वह भी जमुना देवी को दादी ना कह कर अम्मा ही कहता थ.

 

 

 

वह गिलहरी कहीं भी किसी ख़तरे का आभास होनी पर चिल्लाने लगती थी, वह कई बार इस परिवार के साथ ही पूरे गांव को प्राकृतिक आपदा से बचा चुकी थी, जिसके गवाह पूरे गांव वाले थे.

 

 

 

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बिल्ली के जाते ही वह गिलहिरी जिसे लोग प्यार से गोलू कहती थे वह आकर नरेश के साथ खेलने लगी. नरेश और गोलू की खूब जमती थी. इनके इस खेल से घरवालों का भी मान बहाल जाता था. लोग कहते थे कि यह कोई पुण्यत्मा है जो इस घर और गांव के वरदान बन कर आई है.

 

 

 

गोलू के मिलने की कहानी भी बहुत ही रोचक है....एक बार एक चील एक गिलहरी के बच्चे को अपने पैरों में दबोचकर उड़ाता हुआ जा रहा था, संयोगवश वह बच्चा उसके पैरों से छूटकर विनोद के उपर गिर पड़ा. उस समय विनोद आफ़िस के लिए निकल रहे थे. उन्होने उस गिलहरी के बच्चे को उठाया और अपनी मां जमुना देवी को सौंप दिया और फिर आफ़िस के लिए निकल गये. 

 

 

 

उसे अब जमुना देवी ने अपने घर के सदस्य की तरह रख लिया. जब से वह गिलहरी का बच्चाविनोद के घर में आया है, विनोद की किस्मत खुल गयी है, आज वे उसी कंपनी के मैनेजर बन गये हैं.

 

 

 

एक बार की बात है नरेश बाहर खेल रहा था...तभी वहां कुछ डोर पर एक सांप निकाला, गोलू की नज़र उस पद गयी...वह यूरांत जमुना देवी के पास पहुँचा और चिट..चिट की आवाज़ ने उन्ही ख़तरे के बारे में आगाह किया...जमुना देवी ने समय रहते ही नरेश को वहां से हटा दिया.

 

 

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गोलू की एक खास आदत थी कि वह हर मौकों पर अलगअलग आवाज निकलता था, जिससे जमुना देवी की परिवार वाले परिचित हो चुके थे. ऐसी ही एक घटना है.

 

 

 

एक बार विनोद के आफ़िस से आने का समाक़ी हो गया था लेकिन विनोद घर नहीं पहुँचे थे और इधर गोलू खूब ज़ोरज़ोर से चिल्लाना शुरू कर दिया..किसी अनहोनी की आशंका से जमुना देवी ने विनोद को फ़ोन किया और सारी बातें बताई...इसके बाद विनोद जल्द घर पहुँचा.

 

 

 

उसके घर पहुँचने के मात्र मिनट के अंदर ही बहुत भयानक तूफान आया..जिसने पूरे राज्य मेन्न भारी तबाही मचाई...जो जहां था वहीं दिन तक फँसा रहा...आज गोलू की वजह से फिर पूरा परिवार सुरक्षित था...लेकिन लोगों को गोलू के इस रहस्य का कभी पता नहीं चला कि यह सब कैसे पता चल जाता था.

 

 

 

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२- अधिकार...अधिकार...अधिकार.....

 

 

धिक्कार  है ऐसे अधिकार को, जो बगैर किसी कर्तव्य के ही किसी को दिया जाता है. लोग आज अपने कर्तव्य को भुलाते चले जा रहे हैं और उन्हें सिर्फ़ अधिकार याद रहता है. .....गुस्से से लालपीला होते हुए प्रमोद चौधरी मोदक वाला बड़बड़ा रहे थे. वहां उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था.

 

 

 

 

थोड़ी देर बाद किसी ने उनके घर का दरवाजा खटखटाया...गुस्से को काबू करते हुए जैसे ही वे दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़े कि ट्रिंगट्रिंग की आवाज के साथ उनका फोन बाज उठा...उन्होने फ़ोन काट कर दिया और दरवाजा खोला तो देखा कि मोहन और विशाल खड़े थे. दोनो ही युवा थे.

 

 

 

 

उन दोनो को सामने पाकर प्रमोद चौधरी ने कहा क्या हुआ...तुम लोग आज काम पर नहीं गये क्या?

 

 

 

 

नहींनहीं हम जा ही रहे थे कि आप तेज आवाज़ में कुछ बोल रहे थे....तो हम वही देखने आए थे कि कोई दिक्कत तो नहीं है ना....विशाल ने कहा.

 

 

 

नही....नहीं कोई बात नहीं है बेटा...सब ठीक है....आगे प्रमोद चौधरी कुछ बोलने जा रहे थे कि फ़ोन की घंटी फिर बजी. फ़ोन उठाते हुए चौधरी जी ने विशाल और मोहन से कहा कि तुम लोग जाओ...हम फिर कभी बात कर लेंगे. चौधरी जी बात करने लगे और दोनो युवा चले गये.

 

 

 

हेलो मै अजीत बोल रहा हूँ...उधर से आवाज़ आई.

 

 

हाँ...हाँ वकील साहब बोलिए क्या हो गया....चौधरी जी ने कहा.

 

 

 

अरे आपके मैनेजर का फ़ोन आया था, कामगारों ने कल सी स्ट्राइक पर जाने का फ़ैसला किया है...अजीत ने कहा.

 

 

 

मेरे मैनेजर ने मुझे फ़ोन किया था.....मैफ़ोन नही रिसीव कर पाया....अच्छा यह बताइए उनका नेता कौन है....चौधरी ने कहा.

 

 

 

 

चौधरी जी का दिमाग़ खराब हो गया...वो टहलते हुए कुछ सोच ही रहे थे कि विशाल और मोहन जाते हुए दिखे...उन्होने आवाज़ लगाकर उन्हें बुलाया और सारी बात बताई और उन्हे तुरंत कंपनी जाने को कहा.

 

 

 

चौधरी जी की स्टील की कंपनी थी. विशाल और मोहन प्राइवेट जासूस का काम करते थे और इसके पहले भी उन्होने चौधरी जी का कई काम किया था....चौधरी से उन्हे मोटी रकम मिलती थी.

 

 

 

हिंदी की शिक्षाप्रद कहानियां 

 

 

 

मोहन और विशाल  कंपनी पहुँच गये...उसी समय वकील साहब का असिस्टेंट भी गया...उसका नाम विराज अग्निहोत्री था...वह बहुत ही तेजतर्रार था. वहां विशाल और मोहन से चौधरी साहब की पूरी बात बता दी.

 

 

 

 

तब विराज ने रमेश रस्तोगी को बुलवाया और कहा कि कल सुबह १० बजे आप सभी लोग पुराने काली मंदिर के पास आइये...वहीं पंचायत के माध्यम से फ़ैसला किया जाएगा...अगर यह सर्वमान्य होगा तो ठीक...नहीं तो दोनो पक्षों को कोर्ट जाने का अधिकार है.

 

 

 

 

अगले दिन १० बजे तक सभी लोग मंदिर प्रांगण में गयी थे. उसमे बहुत सम्मानित लोगों को दोनो पक्षों ने आमंत्रित किया था. तब वकील अजीत की तरफ से विराज अग्निहोत्री ने रनेश से पूछा..सर आपने काम बंद करने का फ़ैसला किया है...आख़िर में आपको कंपनी क्या दिकाट है?

 

 

 

हमें अधिकार चाहिए...रमेश गर कर बोला.

 

 

 

 

ठीक है...लेकींन आपको कौन सा अधिकार चाहिए...आपको हर सुविधाए दी गयी हैं...आपके पूरे परिवार के हास्पिटल का खर्च, आपके हास्पिटल का खर्च, पी.एफ., बोनस, आनेजाने का भाड़ा, रूम का भाड़ा, साल में महीने की अतिरिक्त छुट्टी अर्थात पेड हॉलीडे,....अब कौन सा अधिकार चाहिए आपको...जहां तक मुझे पता है इससे ज्यादा और कुछ नहीं दिया जा सकता...अब क्या चाहिए आपको. 

 

 

 

रमेश चुप रहा.

 

 

अग्निहोत्री ने फिर कहा...सर आपको अपने अधिकार याद हैं पर कर्तव्य नहीं...सर ताली दोनो हाथों से बजती है...अगर चौधरी जी ये सब फ़ैसेलिटीज आपको नहीं देते तो तो आपकी मांग सही थी...जायज़ थी...लेकिन बीना कहे अगर आपकी सारी मांगे पूरी हो गयी हैं तो फिर आपने यह तमाशा खड़ा किया.

 

 

 

अगर आपने इस बखेडे की जगह काम पर ध्यान दिया होता तो कंपनी और भी आगे बढ़ती तो आपको भी और फ़ायदा होता...सर अधिकार दोनो का होता है...अगर आपका अधिकार है तो चौधरी जी का भी अधिकार है...आख़िर चौधरी जी महीने का एडवांस पेमेंट देकर आपको क्यों ना काम से निकल दें.

 

 

 

आप किस अधिकार की बात कर रही थे..हमीं पता चला है कि आप प्रोडक्शन कम करवाना चाहते थे....दूसरी कंपनी आपको इसके लिए पैसे दिए हैं और इसका सबूत भी मेरे पास मौजूद है....उसके बाद अग्निहोत्री ने रमेश की दूसरे कंपनी के मैनेजर संग हुई उस बात को सुना दिया जिसमें रमेश ने हड़ताल करके प्रोडक्शन कम करने की बात कही थी. 

 

 

 

 

रमेश....रमेश रस्तोगी नाम है उसका,यहा मैं अपने असिस्टेंट को भेजता हूँ और आप भी कंपनी पहुंचो...वहीं सारा मैटर समझ में आएगा और हां मै शायद नहीं सकूंगा...ओके, फ़ोन रखता हूँ..और फिर फ़ोन कट गया. 

 

 

अब रमेश की चोरी पकड़ी जा चुकी थी....चौधरी जी ने उसे काम से निकल दिया....उस रिकार्डिंग को लाने के लिए और अपनी बात को पूरे अच्छे से रखने के लिए अग्निहोत्री, विशाल और मोहन को सम्मानित किया गया. 

 

 

 

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३-   इतने दिन से जंगल में भटक रहा हूँ...एक भी शिकार हाथ नहीं लग रहा है......किस्मत एकदम से रूठ गयी है......आज आख़िरी बार जाल डाल रहै, अगर कोई शिकार जाल में नहीं फँसा तो शिकार करना छोड़ दूंगा...जब पूरे दिन जंगल में भटकने पर भी हाथ में कुछ नहीं आएगा तो मेहनत करके क्या फ़ायदा.....चलो यह आख़िरी बार कोशिश करता हूँ....यह कहते हुई रामू बहेलिए ने जाल डाल दिया और सो गया.  

 

 

 

खिलाड़ी चूहा{जैसा नाम वैसा ही काम} अपने घर में बहुत बदमाशी करता था. उससे घरवालों के साथसाथ पूरा चूहों का मुहल्ला परेशान था. एक दिन एक बूढ़ा चूहा खाने के तलाश में कहीं जा रहा था तो खिलाड़ी चूहा ज़ोर से चिल्ला कर बोला दादा जी सामने से बिल्ली मौसी रही है...इतना कहकर वह खुद भी दौड़ कर भागने लगा.

 

 

 

 

यह देख बूढ़ा चूहा डर गया और बहुत ही तेज़ी से भगा.....वह इतनी तेज़ी से भगा कि उसके आगे उसैन बोल्ट भी पीछे पद जाये.....इस दौड़ में उस बूढ़े चूहे का चश्मा गिर कर टूट गया.....यह देख खिलाड़ी चूहा जोरजोर से हँसने लगा.

 

 

 

खिलाड़ी चूहा उस बूढ़े चूहे को बहुत परेशान  करता था...एक दिन वह बूढ़ा चूहा सोया हुआ था....खिलाड़ी चूहे ने   उसकी पूंछ में एक छोटा सा डंडा बाँध दिया और ज़ोर से चिल्लाया बिल्ली मौसी आई.....बिल्ली मौसी आई और बगल में छुप गया. 

 

 

 

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उस दिन सच में बिल्ली गयी...यह देखकर खिलाड़ी चूहे की सिट्टीपिटी गुम हो गयी...वह डरने लगा..... वह बूढ़े चूहे से तो बच सकता था लेकिन अब बिल्ली से कैसे बचे....इतने में उसे एक युक्ति सूझी...मरता क्या ना करता...उसने झट से मरने का स्वांग किया और ज़मीन पर पेट के बल उलट गया.

 

 

 

लेकिन बिल्ली भी बड़ी सयानी थी..... वह हाथ में आए शिकार को ऐसे ही थोड़े छोड़ने वाली थी...वह उसे घूरकर देखी और हमले की तैयारी करने लगी.

 

 

 

इधर खिलाड़ी चूहे को लगा कि उसकी योजना सफल हो गयी.....बिल्ली मौसी भाग गयी...उसने अपनी एक आंख धीरे से खोलकर देखा तो उसे करेंट के जैसा लगा....और वह डर की मारे उछल गया और सीधे बूढ़े चूहे के पास गिरा.

 

 

 

उसने आव देखा ना ताव बूढ़े चूहे की पूंछ से झट से डंडा छुड़ाया और बिल्ली के उपर कूद गया......ऐसे में बिल्ली हड़बड़ा गयी...उसी इसकी ज़रा सी भी उम्मीद नहीं थी....भाग खिलाड़ी भाग कहते हुए खिलाड़ी चूहा सरपट भगा...उसके पीछे पीछे बूढ़ा चूहा भी गिरते पड़ते भाग निकला....बिल्ली सर खुजाते रह गयी.

 

 

 

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इस घटना से खिलाड़ी चूहे को अपनी ग़लती का एहसास हुआ...उसने बूढ़े चूहे से माफी माँगी और दुबारा ऐसी हरकत नही करने की शपथ ली...कोई भी बुरी या अच्छी आदत इतनी जल्दी नहीं ख़त्म होती है...वही हाल खिलाड़ी चूहे का था...रात गयी..बात गयी, नयी सुबह और खिलाड़ी की बदमाशी शुरू.

 

 

 

एक दिन वह जंगल में उछल कूद कर रहा था....इतने में वह घूमते हुए एक गुफा तक पहुँच गया...उसने देखा कि यह शेर की गुफा है और शेर उसमे सोया हुआ है....सोए शेर को देख इसके अंदर का शैतान जाग गया.

 

 

 

वह गुफा में पहुँचा और शेर के उपर उछल कूद करने लगा....इससे शेर को गुदगुदी होने लगी वह और अच्छी निद लेने लगा...इधर खिलाड़ी चूहे का या रोज का खेल हो गया...वह आता और शेर के बदन पर खूब उछल कूद करता और शेर के जागने से पहले ही भाग जाता. 

 

 

 

एक दिन वह कूदते कूदने शेर की नाक पर पहुंच गया...ऐसे में शियर को छींक गयी और उसकी नीद खुल गयी...शेर ने झट से खिलाड़ी को पकड़ लिया....वह गुस्से से बोला चुहे मैं तुझे सज़ा दूंगा

 

 

 

चूहा अपनी इस हरकत पर माफी मांगने लगा.....इस पर शेर को दया गयी...उसने दुबारा ऐसा नहीं करने की हिदायत देकर उसे छोड़ दिया.

 

 

जातेजाते खिलाड़ी चूहे ने कहा.... वनराज मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा...मौका आने पर इसे चुकता करूँगा

 

 

 

शेर को भूख लग रही थी...वह आज जल्दी उठ गया था...वह शिकार की तलाश में बाहर निकला और थोड़ी ही दूर पर बहेलिए द्वारा बिछाए जाल में वह फँस गया.

 

 

 

 

वह जितना छुड़ाने की कोशिश करता, उसमें और भी फँसता चला जाता...तभी उधर से खिलाड़ी चूहा गुजर रहा था...उसने शेर को देखते ही पहचान लिया...और शेर को चुप रहने का इशारा किया.

 

 

 

 

इसके बाद उसने तेजी से जाल को काटकर शेर को आज़ाद करा दिया...छूटने के बाद शेर ने चूहे को धन्यवाद कहा और दोनो दबे पांव चले गये....कुछ देर बाद जब शिकारी उठा तो यह नज़र देख माथा पीटने लगा...और उसके बाद उसने शिकार करना छोड़ मज़दूरी करने लगा. 

 

 

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४– गांव के हनुमान मंदिर पर लोगों का हुजूम लगा हुआ था. अगलबगल के गांव से भी लोग भागते हुए उस स्थान पर पहुंच रहे थे.   कारण.....कारण ठाकुर दीनदयाल के जिंदा रहते हुए, उनका छोटा बेटा घर में बटवारा चाहता था.

 

 

 

 

ठाकुर दीनदयाल बहुत ही सम्मानित व्यक्ति थे. अगल बगल के कई गावों में उनकी धाक थी. इसलिए हनुमान मंदिर मैदान में लोगों का हुजूम डौल पड़ा था. इसमें उनसे जलने वालों की तादाद भी अच्छी ख़ासी थी... जो कि मन ही मन खूब प्रसन्न हो रहे थे. लोगों में बड़ी उत्सुकता थी कि देखते हैं आज ठाकुर साहब क्या फैसला करते हैं.  

 

 

 

 

ठाकुर दीनदयाल सिह की दो लड़के थे ठाकुर जोगिंदर सिंह और ठाकुर परमिंदर सिंह. ठाकुर जोगिंदर सिह का व्यवहार बहुत शांत और मधुर था, जबकि ठाकुर परमिंदर सिंह इसके ठीक उलट बचपन से उदंड स्वभाव का था. समय के साथसाथ उसका व्यवहार और भी खराब होता चला गया.

 

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इसका सबसे बड़ा कारण था उसके मां का  प्यारदुलार......... ठाकुर साहब जब भी उसकी बदमाशियों पर उसे डाँटते थे तो वह भागकर अपनी मां जसवन्ती के पास चला जाता था. छोटा बेटा होने की वजह से उसे खूब प्यार मिला, लेकिन उसने उस प्यार की कद्र नहीं की, बल्कि वह पहले से अधिक उदंड हो गया.

 

 

 

 

ठाकुर साहब कहा करते थे कि ठकुराइन इसका इतना प्यारदुलार समय के साथ बहुत तकलीफ़ देगा. इसके वजह से पूरा परिवार भी परेशान होगा.

 

 

 

\ठाकुर साहब बहुत ही दूरदर्शी थे, ३० साल पहले कही हुई बात आज अक्षरशः सत्य हो रही थी.....यह सोचसोचकर ठकुराइन रोए जा रही कि अगर मैने उसी समय ठाकुर साहब की बात मान ली होती तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता.  

 

 

मंदिर के मैदान में भारी भीड़ जुटी हुई थी...उसमें ठाकुर साहब से संवेदना रखने वाले लोग भी एक अच्छी तादाद में पहुँच गये थे. ठाकुर ठकुराइन और उनका परिवार भी मैदान में पहुँच चुका था.
उधर उनका छोटा बेटा भी अपने परिवार के साथ मैदान में पहुँच गया, उसके परिवार में उसके दो बच्चे और उसकी पत्नी थी. वह ठाकुर साहब से कदम दूर बैठ गया. पूरे मैदान में खामोशी छा गयी थी. सुई गिरने की आवाज़ भी लोगों को सुनाई दे सकती थी.  
खामोशी को चीरते हुए ठाकुर दीनदयाल का स्वर गूँजायमान हुआ.....प्रिय जनता, आप लोगों को इस खानदान के तीन पीढ़ियों का इतिहास पता है. 
हमारे पुरखों ने और हमने खुद दूसरे के घरों के झगड़ों को सुलझाया है और आज हमारे ही घर हमारे ही दीपक से आग लगी हुई है. इससे बड़ी दुख की बात क्या हो सकती है.
इस आग को आप लोग देख भी रहे हैं और समझ भी रहे हैं. मैं आज यह फ़ैसला करता हूँ कि मैं इसे इसका हिस्सा देकर अपने परिवार से बेदखल करता हूँ.

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मैं चाहता तो इसे कुछ भी नहीं देता और इसे बेदखल भी कर देता, लेकिन यह मुझसे नहीं हो सकता....मैं इसके जैसा गद्दार नहीं हूँ..... इस घटना ने मुझे यह सीख मिली कि जब किसी मनुष्य के शरीर में कोई छोटा घाव हो जाता है तो मनुष्य उसे यह समझ कर नजर अंदाज कर देता है कि चलो समय के साथ ठीक हो जाएगा या फिर वह थोड़ी बहुत दवा कर लेता है....और ग़लती बस वहीं हो जाती है....समय बिताने के बाद वही घाव नासूर बन जाता है.....

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