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kaner ke phool/kaner ka phool

kaner ke phool/kaner ka phool शेखर जब तीन साल का था तो एक दिन अपने दादा कमल नाथ के साथ घूमने के लिए फूलों के बगीचे में गया. खेलते-खेलते वह  kaner ke phool/kaner ka phoolके पास पहुँच गया. उसके दादा एक परिचित के साथ बात करने में मसगूल थे, उनका शेखर की तरफ धययन ही नहीं गया. करीब एक घंटे बाद उनका ध्यान शेखर की तरफ गया, उन्होने देखा तो शेखर वहां नहीं था. अब कमलनाथ परेशान हो गये, पागलों की तरह पूरे बगीचे में शेखर को ढूढ़ने लगे. कमलनाथ का दिल बैठा जा रहा था, उन्हे यह चिंता सता रही थी कि घर पर कय्या जवाब देंगे. इतने उनकी निगाहkaner ke phool/kaner ka phool पर पड़ी, उसके नीचे बैठकर शेखर कुछ कह रहा था….जैसे किसी से बात कर रहा हो और उस फूल की डाली शेखर के उपर ऐसी झुकी हुई थी मानो कोई मां अपने बच्चे को “गोद” Me lekar “दुलार” रही हो.

शेखर-शेखर की आवाज़ लगाते, कमलनाथ दौड़ते हुए शेखर की ओर आये. उन्हें आता देख शेखर हंसने लगा.
तुम हंस रहे हो. यहां जान निकली जा रही थी. चलो अब घर चलो…कमलनाथ नी कहा
तभी कमलनाथ ने देखा कि शेखर के हटते ही “kaner” की डालियां उपर चली गयी. इस घटना से कमलनाथ आश्चर्यचकित रह गये.वे घर आए और घर वालों को भी सारी बाते बता दी. घर के लोग भी हैरत में पड़ गये. शेखर हमेशा खेलते हुए बगीचे में उस “Kaner ka phool” के पेड़ के पास चला जाता था. समय आने पर जब वह “Kanerका पेड़ फूलों से लड़ जाता था तो शेखर बहुत ही खुश होता था.  
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समय बिता, आज शेखर ८ साल का हो गया था, लेकिन आज भी जो खुशी उसे Kaner ka phool के पेड़ के पास मिलती थी, कहीं और नहीं मिलती थी. गांव के बच्चे शेखर से चिढ़ते थे क्योकि ” जब भी शेखर उस पेड़ के पास बैठता था तो उसकी शाखाएं शेखर सी ऐसे लिपट जाती थीं जैसे कोई मां अपने बेटे को दुलार रही हो.” पर बाकी बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता था.
एक दिन सभी बच्चों ने मिलकर उस पेड़ को जड़ से उखाड़ने की योजना बनाई और उस पेड़ के पास पहुंचे, लेकिन उस पेड़ को कुछ नुकसान पहुँचाते उसके पहले ही पेड़ को इस बात का आभास  हो गया, उसके बाद उस पेड़ ने शरारती बच्चों को ऐसा जकड़ा कि जैसे कोई रस्सी से कस कर बांध दया हो. बच्चे जोर-जोर से चिल्लाने लगे, उनकी आवाज सुनकर गांव वाले आ गये, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी वे बच्चों को छुड़ा नहीं पाए और अंत में शेखर के आने की बाद उन सभी को छुड़ाया जा सका. सभी उस पेड़ से क्षमा मांगी और घर को आए .
बच्चों कल सरस्वती पूजा है. सभी बच्चों को ढेर सारे फूल लाने हैं, जो सबसे अधिक फूल लाएगगा उसे इनाम मिलेगा. …प्रधानाचार्य ने सभी बच्चों को संबोधित करते हुए कहा
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Kaner ka phool

सभी बच्चों ने फूल एकत्रित किया, शेखर ने भी फूल एकत्र किया और उसी लेकर वह विद्यालय की तरफ चल पड़ा, लेकिन गांव के शरारती बच्चों ने उस दिन की बात से कोई सबक नहीं लिया था, उन्होने शेखर से सारे फूल चीन लिये और उसे धक्का देकर आगे निकल गये. शेखर रोने लगा और रोते हुए बगीचे में “कनैल” के पेड़ के पास पहुंचा.
kaner ka phool ने शेखर से रोने का कारण पूछा तो शेखर ने सारी बातें बता दी. पेड़ ने हंसते हुए कहा कोई बात नहीं जाओ अपने प्रधानाचार्य को कहना कि मेरे पास बहुत अधिक फूल हैं, एक बैलगाड़ी की आवश्यकता पड़ेगी.
इधर क्षात्रों ने फूल बहुत ही कम लाये. प्रधानाचार्य इस बात से बहुत खफा थे क्योंकि इन फुलो से ही मां सरस्वती की प्रतिमा बनानी थी, जीसी देखने के लिए कई गणमान्य आने वाले थे. तभी शेखर के खाली हाथ आता देख कर प्रधानाचार्य ने गुस्से मीन उससे फूल ना लाने का कारण पूछा, तो उसने पेड़ की कही हुई बात बता दी. सभी लोग यह बात सुनकर हँसने लगे, शेखर का मज़ाक उड़ाने लगे.

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“चुप” एकदम “चुप” ….कोई और रास्ता है, नहीं ना….तो फिर जाओ, बैलगाड़ी का इंतजाम करो…प्रधानाचार्य ने कहा
“लेकिन मेरी एक शर्त है, उस बैलगाड़ी को रिंकू, सोनू, मोनू, किशन, बनू, भानु ही खीचेंगे”…शेखर ने कहा
यह वही बच्चे थे, जिन्होने शेखर को धक्का मारा था.
ठीक है…लेकिन फूल नहीं मिले तो तुम्हें इस स्कूल के मैदान का बीस चक्कर लगाना होगा…प्रधानाचार्य ने कहा
शेखर- ठीक है
उन ६ बच्चों के ना-ना कहने पर भी उन्हें भेजा गया और आश्चर्य फूलों से लदी गाड़ी स्कूल में आ गयी..सभी लोग यह देख दंग रह गये. उधर उन ६ क्षात्रों का बुरा हाल था. वे पसीने से तर=बतर थे.
सरस्वती प्रतिमा बनाकर पूजा की गयी, सभी लोगों ने खूब तारीफ की. प्रतिमा ऐसी बनी थी मानो अभी बोल ही देगी कि तभी प्रतिमा ने बोल ही दिया ” आज इतने सारे फूल देखकर सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये ना…दरअसल यह फूल नहीं हैं यह है विश्वास, यह है प्रेम , यह है समर्पण….शेखर को विश्वास था कि फूल अवश्य मिलेंगे, तभी उसने मैदान के २० चक्कर लगाने की शर्त को मान लिया.. .यह “कनैल” का प्रेम था, उसका समर्पण था कि उसने शेखर को फूल दे दिया….यही प्यार, विश्वास और समर्पण मनुष्य को आगे ले जाता है और जो विश्वासघात करता है उसका हाल उन ६ क्षात्रों के जैसा होता है.” उसके बाद आवाज बंद हो गयी…सभी लोगों ने शेखर को सम्मानित किया और उसे आशीर्वाद दिया..
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