Hindi Kahani Moral Story

Kanhaiya hindi kahani

Kanhaiya hindi kahani  स्कूल में क्लास चल रहा था..अध्यापक सुरेश गुप्ता बच्चों को पढ़ा रही थे. जब स्कूल की छुट्टी का समय हुआ तो अति आवश्यक सूचना के लिए  सभी विद्यार्थियों को स्कूल के प्रांगण में इकट्ठा होने की लिए चपरासी सुरेश के द्वारा सभी कक्षाओं में सूचना प्रसारित करवा दिया गया. सभी विद्यार्धियों के इकट्ठा होने के बाद प्रधानाचार्य संपूर्णानंद ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि ” बच्चों हमें यह बताते हुये बड़ी प्रसन्नता हो रही कि हमारे और आपके इस विद्यालय को कल २५ वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस उपलक्ष्य में यहां एक समारोह का आयोजन किया जा रहा है. इसे यादगार बनाने के लिए हम सभी को मिलकर सम्मिलित प्रयास करना होगा. प्रत्येक विद्यार्थी को उसके प्रधान शिक्षक बताएंगे कि किसे क्या सहयोग करना है.

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स्कूल की छुट्टी हो गयी….सभी बच्चे अपने-अपने घर को चले गये..लेकिन रोज की तरह छोटा बच्चा नीलेश आज भी सबसे पीछे रह गया. उस विद्यालय के रास्ते में एक जंगल पड़ता था. सभी बच्चे बड़े होने की कारण एक साथ मिलकर निकल जाते थे, लेकिन नीलेश पीछे ही रह जाता था..ऐसे में उसे जंगल में बहुत ही डर लगता था. उसने यह बात अपनी मां को बताई थी, तो उसकी मां ने कहा था कि तुम आने और जाने के समय अपने “Kanhaiya भैया” को आवाज़ लगाना…वे तुम्हें जंगल पर करा देंगे.
नीलेश बालक था….अबोध था…जब घर जाते समय जंगल के करीब पहुंचा तो उसे मां की बात याद आ गयी. उसने ज़ोर-ज़ोर से Kanhaiya भैया..Kanhaiya भैया चिल्लाने लगा..और वह जंगल पार कर गया. अब यह उसका रोज का कम हो गया. विश्वास में बड़ी ताक़त होती है.

जब वह घर पहुंचा तो बहुत निरास लग रहा था..उसे निरास देखकर उसकी मां ने इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि ” विद्यालय में एक कार्यक्रम रखा गया है. उसामीं सभी बच्चों से फूल लाने को कहा गया है. जिससे विद्यालय में जो भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित है उसे सजाया जा सके.

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इसमें क्या बड़ी बात है …तुम अपने “Kanhaiya भैया” से मांग लीना..वे ज़रूर दे देंगे…इस पर नीलेश एकदम शांत हो गया..और उसकी मां भी चुप हो गयी. लेकिन इस चुप्पी में बहुत ही बड़ा दर्द छुपा था.. नीलेश भले ही बालक था, लेकिन वह अपनी मां की बेबसी को समझता था. उसके पिता को मरे ४ साल हो गये थे..घर में उसकी मां के अलावा कोई नहीं था. उसकी मां किस तरह खीतों में काम करके, दूसरों के घरों में काम घर का खर्चा चलाती थी..उससे वह वाकिफ़ था…उसने कहा ठीक है मां..मैं ” कन्हैया भैया” से बोल दूंगा……उसकी यह बातें सुनकर उसकी मां जो अब तक अपने जज्बातों को दबाए हुए थी..वे आसुओं में परिवर्तित हो गयी…..अपनी मां को रोता देख नीलेश भी रोने लगा….कभी उसकी मां नीलेश को चुप कराती..तो कभी नीलेश अपनी मां..उनके इस करुन क्रंदन से पत्थर का भी दिल पसीज जाता….उन बेसहरों का अब Kanhaiya के अलावा कोई सहारा नहीं था.

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शेखर विद्यालय की ओर निकाला..उसने देखा कि सभी बच्चे तरह-तरह के फूल लिए हुए है…कोई गेंदे का फूल लिया है तो कोई कनैल..तो कोई चमेली का फूल लिया है.  सभी बच्चे बहुत खुश थे और अपने- अपने फूल की तारीफ कर रहे थे. निराश मन से चलता हुआ नीलेश जंगल के पास पहुंचा, सभी बच्चे आगे निकल गये थे. वह वहीं बैठ गया और रोने लगा. तभी एक सावला सा युवक आया, जिसका चेहरा तेज से चमक रहा था…आधारों पर मनमोहक मुस्कान थी..सिर पर मोर पंख विराजमान थे….

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क्या हुआ..क्यों रो रहे हो…उस युवक ने कहा
आप कौन…नीलेश चौक कर बोला और पीछे सरकने लगा
अरे..क्या कर रहे हो..तुम तो मुझे रोज बुलाते थे..आज तुमने मुझे बुलाया ही नहीं तो मुझे खुद आना पड़ा..उस युवक ने कहा
“कन्हैया भैया”…नीलेश खुश होती हुए बोला
हां…लो यह फूल…यह भगवान विघ्नेश्वर को दे देना..वे तुम्हारे सारे कष्ट को ख़त्म कर देंगे..उस युवक ने फूल देते हुए कहा
लेकिन मैने तो आपसे फूल माँगा ही नहीं…फिर आपको कैसे पता चला…नीलेश ने कहा
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तुम मुझे क्या कहते हो..कन्हैया भैया न…यानी कि मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ….तो मुझे अपने छोटे भाई की परेशानी कैसे पता नहीं चलेगी….और विद्यालय से छूटने पर मुझे ज़रूर मिलना…मुस्कुराते हुए उस युवक ने कहा
फिर कन्हैया ने नीलेश को जंगल पर करा दिया. नीलेश विद्यालय पहुंचा और टीचर से बोला कि यह फूल कहां रखना है..टीचर ने कहा कि इसे गणेश जी को अर्पित कर दो…..तभी उनकी नज़र फूल पर गयी. उन्होने देखा कि उस फूल में से एक चमक निकल रही थी….और उसकी सुगंध से पूरा वातावरण सुगंधित होने लगा था.
यह फूल तुम्हे कहा से मिला…टीचर ने नीलेश से पूछा
मेरे “कन्हैया भैया ” ने दिया…नीलेश खुश होते हुए बोला
अच्छा ठीक है…जाओ उसे भगवान गणेश जी को अर्पित कर दो…टीचर ने कहा
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नीलेश ने फूल चढ़ा दिया…उसके बाद पूजा हुई..सबको प्रसाद दिया गया..उसके बाद छुट्टी हो गयी…छुट्टी के बाद नीलेश जब वापस लौटा तो जंगल के पास पहुँच कर अपनी “कन्हैया भैया” को पुकारा….फिर वही सवला सा युवक निकला….नीलीश ने खुशी-खुशी उन्हें प्रसाद दिया..उसके बाद उस युवक ने नीलेश को एक पोटली देते हुए कहा कि जाओ और यह पोटली अपनी मां को दे देना..और कहना कि “कन्हैया भैया” ने दिया है.
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नीलेश घर गया और पोटली देते हुए सारी बात बता दी….उसकी मां ने जब पोटली खोला तो उनकी आंखों में आसू आ गये…लेकिन यह आसू खुशी के, विश्वास और संतोष के थी…उस पोटली में ढेर सारे रुपये और जवाहरात थे. अब उनकी जिंदगी चैन से कटने लगी…

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