Bhakti Story

kichak vadh . कीचक वध

kichak vadh . कीचक वध
Written by Abhishek Pandey

kichak vadh . कीचक वध द्रौपदी के साथ पांडव वनवास के अंतिम वर्ष के अज्ञातवास में विराट नगर के राजा विराट के यहाँ भेष बदलकर रह रहे थे. द्रौपदी विराट नरेश की रानी सुदेष्णा की दासी बनक किसी प्रकार समय व्यतीत कर रही थीं . राजा विराट का प्रधान सेनापति कीचक सुदेष्णा का भाई था. एक तो वह राजा का साला था, दूसरे सेना उसके अधिकार में थी, तीसरे वह स्वयं प्रख्यात बलवान था और उसके समान ही बलवान उसके एक सौ पांच भाई उसका अनुगमन करते थे. इन सब कारणों के कीचक निरंकुश तथा मदांध हो गया था. वह सदा मनमानी करता था. राजा विराट का भी उसे कोई भय या संकोच नहीं था.

एक बार दुरात्मा कीचक अपनी बहन रानी सुदेष्णा के भवन में एक बार किसी कार्यवश गया. वहां अपूर्व लावण्यवती दासी सैरंध्री को देखकर उस पर आसक्त हो गया. कीचक ने नाना प्रकार के प्रलोभन सैरंध्री को दिए. सैरंध्री ने उसे समझाया, “मैं पतिव्रता हूं| अपने पति के अतिरिक्त किसी पुरुष की कभी कामना नहीं करती. तुम अपना पाप-पूर्ण विचार त्याग दो.”

लेकिन कामांध कीचक ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. इतना ही नहीं उसने अपनी बहन सुदेष्णा को भी तैयार कर लिया कि वे सैरंध्री को उसके भवन में भेजेंगी. रानी सुदेष्णा ने सैरंध्री के अस्वीकार करने पर भी अधिकार प्रकट करते हुए डांटकर उसे कीचक के भवन में जाकर वहां से अपने लिए कुछ सामग्री लाने को भेजा. सैरंध्री जब कीचक के भवन में पहुंची, तब वह दुष्ट उसके साथ बल प्रयोग करने पर उतारू हो गया. उसे धक्का देकर द्रौपदी वहां से भागी और राज्यसभा में पहुंची. परंतु कीचक ने वहां पहुंचकर राजा विराट के सामने ही उसके केश पकड़कर भूमि पर पटक दिया और पैर की एक ठोकर लगा दी. राजा विराट कुछ भी बोलने का साहस न कर सके.

सैरंध्री बनी द्रौपदी ने देख लिया कि इस दुरात्मा से विराट उसकी रक्षा नहीं कर सकते. कीचक और भी धृष्ट हो गया. अंत में व्याकुल होकर रात्रि में द्रौपदी भीमसेन के पास गई और रोकर उसने भीमसेन से अपनी व्यथा कही. भीमसेन ने द्रौपदी आश्वासन दिया कि इसका बदला वे अवश्य ही लेंगे. दूसरे दिन सैरंध्री ने भीमसेन की सलाह के अनुसार कीचक से प्रसन्नतापूर्वक बातें कीं और रात्रि में उसे नाट्यशाला में आने को कह दिया. राजा विराट की नाट्यशाला अंत:पुर की कन्याओं के नृत्य एवं संगीत सीखने में काम आती थी. वहां दिन में कन्याएं गान-विद्या का अभ्यास करती थीं, किंतु रात्रि में वह सूनी रहती थी. कन्याओं के विश्राम के लिए उसमें एक पलंग पड़ा था, रात्रि का अंधकार हो जाने पर भीमसेन चुपचाप आकर नाट्यशाला के उस पलंग पर सो गए. कामांध कीचक सज-धजकर वहां आया और अंधेरे में पलंग पर बैठकर, भीमसेन को सैरंध्री समझकर उसके ऊपर उसने हाथ रखा. उछलकर भीमसेन ने उसे नीचे पटक दिया और वे उस दुरात्मा की छाती पर चढ़ बैठे.

कीचक बहुत बलवान था. भीमसेन से वह भिड़ गया. दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा, किंतु भीमसेन ने उसे शीघ्र ही पछाड़ दिया और उसका गला घोंटकर उसे मार डाला. इस तरह दुरात्मा कीचक का दर्दनाक अंत हो गया. मित्रों यह कहानी kichak vadh . कीचक वध कैसी लगी जरुर बताएं और kichak vadh . कीचक वध इस तरह की कहानी के लिए इस ब्लॉग को लाइक , शेयर और सबस्क्राइब करें और दूसरी कहानी के लिए नीचे की लिंक पर क्लिक करें.

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