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गधा गधा ही रह गया

गधा गधा ही रह गया
Written by Abhishek Pandey

गधा गधा ही रह गया एक जंगल में एक शेर रहता था. गीदड उसका सेवक था. जोडी अच्छी थी. शेरों के समाज में तो उस शेर की कोई इज्जत नहीं थी, क्योंकि वह जवानी में सभी दूसरे शेरों से युद्ध हार चुका था, इसलिए वह अलग-थलग रहता था.

 

 

उसे गीदड जैसे चमचे की सख्त जरुरत थी जो चौबीस घंटे उसकी चमचागिरी करता रहे. गीदड को बस खाने का जुगाड चाहिए था. पेट भर जाने पर गीदड उस शेर की वीरता के ऐसे गुण गाता कि शेर का सीना फूलकर दुगना चौडा हो जाता.

 

 

एक दिन शेर ने एक बिगडैल जंगली सांड का शिकार करने का साहस कर डाला. सांड बहुत शक्तिशाली था. उसने लात मारकर शेर को दूर फेंक दिया, जब वह उठने को हुआ तो सांड ने फां-फां करते हुए शेर को सीगों से एक पेड के साथ रगड दिया.

 

 

किसी तरह शेर जान बचाकर भागा. शेर सींगो की मार से काफी जख्मी हो गया था. कई दिन बीते, परन्तु शेर के जख्म टीक होने का नाम नहीं ले रहे थे.

 

 

ऐसी हालत में वह शिकार नहीं कर सकता था. स्वयं शिकार करना गीदड के बस का नहीं था. दोनों के भूखों मरने की नौबत आ गई. शेर को यह भी भय था कि खाने का जुगाड समाप्त होने के कारण गीदड उसका साथ न छोड जाए.

 

 

शेर ने एक दिन उसे सुझाया “देख, जख्मों के कारण मैं दौड नहीं सकता. शिकार कैसे करुं? तु जाकर किसी बेवकूफ-से जानवर को बातों में फंसाकर यहां ला. मैं उस झाडी में छिपा रहूंगा और मौका मिलते ही उसे मार डालूँगा.”

 

 

गीदड को भी शेर की बात जंच गई. वह किसी मूर्ख जानवर की तलाश में घूमता-घूमता एक कस्बे के बाहर नदी-घाट पर पहुंचा. वहां उसे एक मरियल-सा गधा घास पर मुंह मारता नजर आया, वह शक्ल से ही बेवकूफ लग रहा था. गीदड गधे के निकट जाकर बोला “पांय लागूं चाचा. बहुत कमजोर हो अए हो, क्या बात हैं?”

 

 

गधे ने अपना दुखडा रोया “क्या बताऊं भाई, जिस धोबी का मैं गधा हूं, वह बहुत क्रूर हैं. दिन भर ढुलाई करवाता हैं और चारा कुछ देता नहीं.”

 

 

गीदड ने उसे न्यौता दिया “चाचा, मेरे साथ जंगल चलो न, वहां बहुत हरी-हरी घास हैं. खूब चरना तुम्हारी सेहत बन जाएगी.”

 

 

गधे ने कान फडफडाए “राम राम. मैं जंगल में कैसे रहूंगा? जंगली जानवर मुझे खा जाएंगे.”

 

 

“चाचा, तुम्हें शायद पता नहीं कि जंगल में एक बगुला भगतजी का सत्संग हुआ था. उसके बाद सारे जानवर शाकाहारी बन गए हैं. अब कोई किसी को नहीं खाता.” गीदड बोला और कान के पास मुंह ले जाकर दाना फेंका “चाचू, पास के कस्बे से बेचारी गधी भी अपने धोबी मालिक के अत्याचारों से तंग आकर जंगल में आ गई थी. वहां हरी-हरी घास खाकर वह खूब लहरा गई हैं तुम उसके साथ घर बसा लेना.”

 

 

गधे के दिमाग पर हरी-हरी घास और घर बसाने के सुनहरे सपने छाने लगे. वह गीदड के साथ जंगल की ओर चल दिया. जंगल में गीदड गधे को उसी झाडी के पास ले गया, जिसमें शेर छिपा बैठा था.

 

 

 

इससे पहले कि शेर पंजा मारता, गधे को झाडी में शेर की नीली बत्तियों की तरह चमकती आंखे नजर आ गईं. वह डरकर उछला गधा भागा और भागता ही गया. शेर बुझे स्वर में गीदड से बोला “भई, इस बार मैं तैयार नहीं था. तुम उसे दोबारा लाओ इस बार गलती नहीं होगी.”

 

 

गीदड दोबारा उस गधे की तलाश में कस्बे में पहुंचा. उसे देखते ही बोला “चाचा, तुमने तो मेरी नाक कटवा दी. तुम अपनी दुल्हन से डरकर भाग गए?”

 

 

“उस झाडी में मुझे दो चमकती आंखे दिखाई दी थी, जैसे शेर की होती हैं. मैं भागता न तो क्या करता?” गधे ने शिकायत की.

 

 

गीदड झूठमूठ माथा पीटकर बोला “चाचा ओ चाचा! तुम भी निरे मूर्ख हो. उस झाडी में तुम्हारी दुल्हन थी. जाने कितने जन्मों से वह तुम्हारी राह देख रही थी.

 

 

 

 

तुम्हें देखकर उसकी आंखे चमक उठी तो तुमने उसे शेर समझ लिया?” गधा बहुत लज्जित हुआ, गीदड की चाल-भरी बातें ही ऐसी थी. गधा फिर उसके साथ चल पडा.

 

 

 

जंगल में झाडी के पास पहुंचते ही शेर ने नुकीले पंजो से उसे मार गिराया. इस प्रकार शेर व गीदड का भोजन जुटा. इससे यही सीख मिलाती है कि दूसरों की चिकनी-चुपडी बातों में आने की मूर्खता कभी नहीं करनी चाहिए.

 

 

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