Krishna Birth Story in Hindi . श्रीकृष्ण की कहानी हिंदी में. Krishna Stories Hindi
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Krishna Birth Story in Hindi . श्रीकृष्ण की कहानी हिंदी में. Krishna Stories Hindi

Krishna Birth Story in Hindi Pdf  श्रीकृष्ण की कथा

 

 

 

Krishna: इस पोस्ट में आज हम आपको कृष्ण जन्मोत्सव की कथा बता रहा हूँ. मुझे उम्मीद है कि यह कथा आपको जरुर पसंद आएगी. जय श्री कृष्णा.

 

 

मथुरा…एक पवित्र नगर. जहां भगवान् श्री कृष्ण का जन्म हुआ. जब भविष्यवाणी से कंस को पता चला की उसकी मृत्यु वसुदेव और देवकी की संतान से होगी तो उसने वसुदेव और देवकी को कारागार में बंद कर दिया. कंस ने वहाँ कडा  पहरा लगा और दोनों की उत्पन्न संतान को कंस तुरंत ही मार डालता था.

 

 

 

भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिन क्या है?

 

 

 

 

भविष्यवाणी के अनुसार भगवान् श्री हरी को देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना था. भगवान् श्री नारायण ने अपने आठवें अवतार के रूप में आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के २८वें द्वापर में भाद्रपक्ष के कृष्ण पक्ष की रात्री १२ बजे  ( उस वक्त शून्य काल था ) जन्म लिया.

 

 

 

उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की ही दृष्टि थी. रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के संय्योग से जयन्ती नामक योग में लगभग ३११२ ईसा पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म हुआ.

 

 

 

जब कृष्ण का जन्म हुआ तो कारागार के सभी संतरी माया द्वारा गहरी नींद में सो गए. कारागार के दरवाजे स्वतः ही खुल गए. उस वक्त भारी वर्षा हो रही थी. यमुना जी पुरे उफान पर थीं.

 

 

 

जन्म से पूर्व भगवान् श्री हरी ने वसुदेव और देवकी को अपने चतुर्भुज रूप का दर्शन दिया और उसके बाद उनकी  योगमाया ने वसुदेव को बताया कि कंस के आने से पूर्व इस बालक को लेकर गोकुल चले जाओ. वहाँ यशोदा और नंदराय के घर एक बालिका ने जन्म लिया है. उसे वहाँ से उठाकर यहां ले आओ.

 

 

 

Krishna Story in Hindi Written भगवान् श्रीकृष्ण की कथा

 

 

 

इस पर वसुदेव ने योगमाया से कहा, ” मैं कैसे जाऊंगा. मेरे हाथ- पैर बेड़ियों से बंधे है और चारो तरफ कंस के सैनिक फैले हुए हैं. ”

 

 

तब योगमाया ने कहा, ” आप चिंता ना करें. अब आप मुक्त हैं.” उसके बाद बेड़ियाँ अपने आप टूट गयीं. सभी सैनिक सो गए. दरवाजा स्वतः ही खुल गया.

 

 

भारी वर्षा के बीच  वसुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उस टोकरी को लेकर वे जेल से बाहर निकल आए.  कुछ दूरी पर ही यमुना नदी थी.  उन्हें उस पार जाना था लेकिन कैसे ?

 

 

 

तब वसुदेव ने नदी में प्रवेश करके जाने का निश्चय किया. नदी के भीतर प्रवेश करते ही नदी और भी विकराल होने लगी. जलस्तर लगातार बढ़ने लगा. तेज वर्षा हो रही थी.

 

 

तब शेषनाग ने छत्र के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण को ढँक लिया और उनके साथ पीछे-पीछे चलने लगे. नदी स्टार बढ़ाते हुए वसुदेव के गले तक आ पहुंचा. तब श्रीकृष्ण ने अपने पैर टोकरी से नीचे किये और यमुना का जल उनके चरण को छूकर एकदम शांत हो गया.

 

 

Little Krishna Story in Hindi

 

 

 

उसके बाद वे नंदगोप के पास पहुंचे और उस कन्या को लेकर और कृष्ण को वहीँ सुलाकर वापस लौट आये. .  गोकुल मां यशोदा का मायका था और नंदगांव में उनका ससुराल.

 

 

 

वसुदेव के वापस आते ही फिर से उनके हाथ – पैर में हथकड़ी लग गयी, दरवाजे बंद हो गये और पहरेदार जाग गए. उन्होंने बच्चे के पैदा होने की सूचना कंस तक पहुंचाई.

 

 

कंस को दाई ने बताया की, ” लड़की हुई है. ” लेकिन कंस को इसका विश्वास नहीं हो रहा था. उसने कहा  सिपाहियों और दाई से कहा  तुम  लोगों ने अवश्य ही छल किया है. बालक को कहीं छुपा दिया है.

 

 

सबने कहा ऐसा नहीं है. हम आपसे विश्वासघात नहीं कर सकते. इसपर कंस ने कहा, ” तब यह अवश्य ही विष्णु की चाल है. वह किसी भी रूप में आ सकता है. मुझे इस बालिका का वध करना ही होगा.”

 

 

उसने बालिका को देवकी से छीन लिया. देवकी मिन्नतें करती रहीं लेकिन वह नहीं माना. जब वह बालिका को जमीन पर पटकने जा रहा था, तभी बालिका उसके हाथ से उड़कर दूर जा पहुंची और फिर मां शक्ति के रूप मेनन अवतरित होकर कहा, ” पापी तुझे मारने वाला इस दुनिया में जन्म ले चुका है.”

 

 

भगवान् श्रीकृष्ण की कथा

 

 

 

श्रीकृष्ण का लालन-पालन यशोदा व नंद ने किया. गोकुल यमुना के तट पर बसा एक गांव है, जहां सभी नंदों की गायों का निवास स्थान था.  नंद मथुरा के आसपास गोकुल और नंदगांव में रहने वाले आभीर गोपों के मुखिया थे.

 

 

 

 

यहीं पर वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी ने बलराम को जन्म दिया था.  बलराम देवकी के ७ वें गर्भ में थे जिन्हें योगमाया ने आकर्षित करके रोहिणी के गर्भ में डाल दिया था.  यह स्थान गोप लोगों का था.  मथुरा से गोकुल की दूरी महज १२ किलोमीटर है.

 

 

 

अब कंस को यह ज्ञात हो चुका था की उसे मारने वाला इस धरती पर अवतरित हो चुका है तो उसने अपने अनुचरों को चारो दिशाओं में भेज दिया और उस समय जन्मे सभी नव शिशुओं का वध करने का आदेश दे दिया.

 

 

 

पहली बार में ही कंस के अनुचरों को पता चल गया कि हो न हो वह बालक यमुना के उस पार ही छोड़ा गया है.  बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने मामा के द्वारा भेजे गए अनेक राक्षसों को मार डाला और उसके सभी कुप्रयासों को विफल कर दिया.  सबसे पहले उन्होंने पूतना को मारा.  पूतना को उन्होंने नंदबाबा के घर से कुछ दूरी पर ही मारा.  उसके बाद नन्द बाबा वृन्दावन आ गए.

 

 

 

Krishna श्रीकृष्ण

 

 

 

कंस के बढ़ाते खतरों की वजह से नन्दबाबा गोकुल से वृन्दावन आ गए. विन्दावान्न वहाँ से लगभग १४ किलोमीटर दूर है. वे वहाँ अपने सबंधियों के साथ रहने लगे.

 

 

वृन्दावन में ही कृष्णा ने कालिया  नाग का दमन किया. उसके बाद ताल वन में धनुक नामक अत्याचारी का बलराम ने वध किया. फिर उन्होंने यमलार्जुन, शकटासुर, प्रलंब और अरिष्ट का वध किया. इससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलती गयी.

 

 

 

वृंदावन में ही श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे. यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे.

 

 

 

कृष्ण की इन्ही शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है. यहाँ बांकेबिहारी का मंदिर है. यहाँ के प्रत्येक यमुना घाट से भगवान् कृष्ण की कथा जुडी हुई है.

 

 

 

वृन्दावन के पास ही गोवर्धन पर्वत है. यहीं पर भगवान् श्रीकृष्ण ने लोगों को इन्द्रदेव के क्रोध से बचाया था. कालिया नाग दमन  और धनुक तथा अन्य के वध से कंस को इस बात का यकीन हो गया कि उसकी मृत्यु के कारण यही बनाने वाले है.

 

 

 

तब कंस ने दोनों भाइयों को दंगल का निमंत्रण दिया. कंस की योजना थी की इन्हें दंगल में पहलवानों के मरवा दिया जाए. लेकिन दोनों भाइयों ने पहलवान शिरोमणि चारुण और मुष्टिक का वध कर दिया. उसके बाद कंस का भी वध हो गया.

 

 

 

कंस के वध के बाद भगवान् कृष्ण के कंस के पिता उग्रसेन को पुनः राजा बना दिया. कंस के वध के भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम को अस्त्र, शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा के लिए संदीपनी ऋषि के आश्रम में भेजा गया.

 

 

 

वह भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा ग्रहण की. इसके बाद दोनों मतिरा लौटे और सेना तथा शासन का कार्य देखने लगे. कंस के मारे जाने के बाद उसका श्वसुर और मगध का सम्राट जरासंध क्रुद्ध हो चला था.

 

 

 

 

जरासंघ कंस का श्वसुर था.  कंस की पत्नी मगध नरेश जरासंघ को बार-बार इस बात के लिए उकसाती थी कि कंस का बदला लेना है.  इस कारण जरासंघ ने मथुरा के राज्य को हड़पने के लिए १७  बार आक्रमण किए.  हर बार उसके आक्रमण को असफल कर दिया जाता था.  फिर एक दिन उसने कालयवन के साथ मिलकर भयंकर आक्रमण की योजना बनाई.

 

 

 

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कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया. उसने मथुरा नरेश सन्देश भेजकर युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया. इस पर भगवन श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया यह युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, व्यर्थ में सेना क्यों लडे?

 

 

दोनों में भीषण युद्ध हुआ. उसके बाद श्रीकृष्ण रणभूमि से भागने लगे. भागते हुए वे एक गुफा में पहुंचे. उनके पीछे कालयवन भी गुफा में पहुंचा.

 

 

वहाँ उसने एक मनुष्य को सोते हुए देखा. उसने उस मनुष्य को कृष्ण समझकर एक जोरदार लात मारी. इससे वह मनुष्य उठ गया और उसने अपने सामने कालयवन को देखा.

 

 

 

उसके द्वारा कालयवन के देखे जाते ही कालयवन तुरंत ही जलकर भस्म हो गया. कालयवन को पुरुष मिले वे  इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे.  उनके देखते ही कालयवन भस्म हो गया.  मुचुकुन्द को वरदान था कि जो भी उन्हें उठाएगा वह उनके देखते ही भस्म हो जाएगा.

 

 

 

 

कालयवन के मारे जाने के बाद हड़कंप मच गया था.  अब विदेशी भी श्रीकृष्ण के शत्रु हो चले थे.  तब अंतत: कृष्ण ने अपने १८ कुल के सजातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया.  वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए.

 

 

 

उग्रसेन, अक्रूर, बलराम सहित लाखों की संख्या में कृष्ण कुल के यादव अपने पूर्व स्थान द्वारका लौट गए. मथुरा के अन्य लोग जो कृष्ण कुल के नहीं थे उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण को रोकने का भरपूर प्रयास किया.

 

 

 

सभी  के आखों में आसू थे. लेकिन कृष्ण  को जाना ही था. उनके जाने के बाद मथुरा पर जरासंध का शासन हो गया. उस समय वहाँ की आबादी बहुत कम रह गयी थी.

 

 

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द्वारिका में रहकर कृष्ण ने सुखपूर्वक जीवन बिताया.  यहीं रहकर उन्होंने हस्तिनापुर की राजनीति में अपनी गतिविधियां बढ़ाईं और ८ स्त्रियों से विवाह कर एक नए कुल और साम्राज्य की स्थापना की.  द्वारिका वैकुंठ के समान थी.  कृष्ण की 8 पत्नियां थीं:- रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, मित्रवन्दा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी.  इनसे उनका कई पुत्र और पुत्रियों की प्राप्ति हुई.

 

 

 

इसके बाद कृष्ण भगवान् ने नरकासुर के द्वारा बंधक बनाई गयी लगभग १६ हजार स्त्रियों को मुक्त कराकर उन्हें द्वारिका में शरण दी. नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर उनको उनकी नगरी से बाहर निकाल दिया था.

 

 

 

नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे.  वह वरुण का छत्र, अदिति के कुण्डल और देवताओं की मणि छीनकर त्रिलोक विजयी हो गया था.  वह पृथ्वी की हजारों सुन्दर कन्याओं का अपहरण कर उनको बंदी बनाकर उनका शोषण करता था.

 

 

 

 

एक दिन पांचाल के राजा द्रुपद द्वारा द्रौपदी- स्वयंबर का आयोजन किया गया. Draupadi पांचाल राज की पुत्री थीं. भगवान् श्रीकृष्ण भेष बदले हुए पांडवों के साथ उस स्वयंबर में उपस्थित हुए.

 

 

 

महावीर Arjun मत्स्य की आँख को भेदकर द्रौपदी को प्राप्त कर लिया. भगवान् श्रीकृष्ण इससे बहुत ही प्रसन्न थे. उसके बाद श्रीकृष्ण और पांडवों की मित्रता बढ़ी.

 

 

 

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उसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण मगध की राजधानी गिरिब्रिज पहुंचे और भीम के द्वारा जरासंध मल्लयुद्ध में मारा गया. जरासंध की मृत्यु के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उसके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बना दिया और वहाँ बंदी सभी राजाओं को मुक्त करा लिया.

 

 

 

सभी राजाओं ने युधिष्ठिर की मित्रता स्वीकार की. उसके बाद भगवान् विश्वकर्मा ने इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया. भगवान् इंद्र के नाम पर इसका नाम इन्द्रप्रस्थ रखा गया.

 

 

 

 

इसके बाद कृष्ण द्वारका लौट गए.  फिर एक दिन अर्जुन तीर्थाटन के दौरान द्वारिका पहुंच गए.  वहां कृष्ण की बहन सुभद्रा को देखकर वे मोहित हो गए.  कृष्‍ण ने दोनों का विवाह करा दिया और इस तरह कृष्ण की अर्जुन से प्रगाढ़ मित्रता हो गई और वे रिश्तेदार हो गए.

 

 

 

इन्द्रप्रस्थ के निर्माण के बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया और आवश्यक परामर्श के लिए भगवान् कृष्ण को बुलाया. कृष्ण इंद्रप्रस्थ आए और उन्होंने राजसूय यज्ञ के आयोजन का समर्थन किया.

 

 

 

 

इसके बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया.  यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेद व्यास, भारद्वाज, सुनत्तु, गौतम, असित, वशिष्ठ, च्यवन, कण्डव, मैत्रेय, कवष, जित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिन, क्रतु, पैल, पाराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतहोत्र, मधुद्वंदा, वीरसेन, अकृतब्रण आदि सभी को आमंत्रित किया. इसके अलावा सभी देशों के राजाधिराज को भी बुलाया गया.

 

 

 

इसी यज्ञ में कृष्ण भगवान् का शत्रु और जरासंध का मित्र शिशुपाल भी आया हुआ था. वह भगवान् श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी के भाई का मित्र था.

 

 

 

यह Krishna की दूसरी बुआ का पुत्र था इस नाते यह कृष्‍ण का भाई भी था.  अपनी बुआ को श्रीकृष्ण ने उसके १०० अपराधों को क्षमा करने का वचन दिया था.  इसी यज्ञ में कृष्ण का उसने १००वीं बार अपमान किया जिसके चलते भरी यज्ञ सभा में कृष्ण ने उसका वध कर दिया.

 

 

 

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द्वारिका में रहकर कृष्ण ने धर्म, राजनी‍ति, नीति आदि के कई पाठ पढ़ाए और धर्म-कर्म का प्रचार किया, लेकिन वे कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को नहीं रोक पाए और अंतत: महाभारत में वे अर्जुन के सारथी बने.  उनके जीवन की ये सबसे बड़ी घटना थी.  कृष्ण की Mahabharat में भी बहुत बड़ी भूमिका थी.

 

 

 

 

 

श्रीकृष्ण ने  युद्ध से पहले अर्जुन को गीता का उपदेश दिया . महाभारत युद्ध को पांडवों के पक्ष में करने के लिए कृष्‍ण को युद्ध के पूर्व कई तरह के छल, बल और नीति का उपयोग करना पड़ा.

 

 

 

अंतत: उनकी नीति के चलते ही पांडवों ने युद्ध जीत लिया. क्योंकि पांडव सत्य पर थे और सत्य की विजय होती है. इस युद्ध में भारी संख्या में लोग मारे गए.  सभी कौरवों की लाश पर विलाप करते हुए गांधारी ने शाप दिया कि- ‘हे कृष्‍ण, तुम्हारे कुल का नाश हो जाए.’

 

 

 

 

इसके बाद यादव आपस में ही लड़ मरे और द्वारिका समुद्र में डूब गयी.  उसके बाद एक बहेलिये के तीर से भगवान् कृष्ण की मृत्यु हो गयी.       मित्रों यह कथा Krishna Story in Hindi आपको कैसी लगी जरुर बताएं और दूसरी Krishna Story in Hindi  की कहानी नीचे पढ़ें.

 

 

1- भगवान् कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई? जानिये उसके बारे में

2- पढ़िए सम्पूर्ण महाभारत कथा हिंदी में.

3- Moral Story

 

 

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