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lok katha भारत की लोक कथा

lok katha
Written by Abhishek Pandey

lok katha  किसी जमाने की बात है .  एक आदमी था .  उसका नाम था  चंद्रनारायण  . वह स्वयं तो देवलोक में रहता था, किंतु उसकी मां और स्त्री इसी लोक में रहती थीं .

 

 

 

चंद्रनारायण  सवा मन कंचन इन दोनों को देता था और सवा मन सारी प्रजा को.  प्रजा चैन से दिन काट रही थी, किंतु मां-बहू के दिन बड़ी मुश्किल से गुजर रहे थे.  दोनों दिनोंदिन सूखती जा रही थीं.

 

 

एक दिन बहू ने अपनी सास से कहा, “सासूजी, और लोग तो आराम से रहते हैं, पर हम भूखों मरे जा रहे हैं.  अपने बेटे से जाकर कहो न, वे कुछ करें.”

बुढ़िया को बहू की बात जंच गई.  वह लाठी टेकती-टेकती देवलोक पहुंची.  चंद्रनारायण दरबार में बैठे हुए थे.  द्वारपाल ने जाकर उन्हें खबर दी, “महाराज! आपकी माताजी आई हैं.”

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चंद्रनारायण ने पूछा “ कैसी हैं    ?”

द्वारपाल ने कहा, “महाराज ! हाल तो कुछ अच्छे नहीं हैं.  फटे-पुराने, मैले-कुचैले कपड़े पहने हैं.  साथ में न कोई नौकर है, न चाकर.”

चंद्रनारायण ने हुक्म दिया, “ जाओ , बाग में ठहरा दो.”

ऐसा ही किया गया.  चंद्रनारायण  काम-काज से निबटकर मां के पास गये, पूछा, “कहो मां, कैसे आईं?”

बुढ़िया बोली, “बेटा, तू सारे जग को पालता है . मगर हम भूखों मरती है .”

चंद्रनारायण  को बड़ा अचरज हुआ.  उसने पूछा, “क्यों मां ! भूखों क्यों मरती हो ? जितनी कंचन तुम को देता हूं, उतना बाकी की दुनिया का देता हूं.  दुनिया तो उतने कंचन में चैन कर रही है.  तुम उसका आखिर करती क्या हो?”

बुढ़िया बाली, “बेटा ! हम कंचन को हांडी में उबाल लेती हैं.  फिर वह उबला हुआ पानी पी लेती हैं.˝

चंद्रनारायण हंसते हुए बाला, “मेरी भोली मां ! कंचन कहीं उबालकर पीने की चीज है .  इसे तुम बाजार में बेचकर बदले में अपनी मनचाही चीजें ले आया करो.  तुम्हारा सारा द:ख दूर हो जायगा.˝

बुढ़िया खुश होती हुई वापस लौटी.  इस बीच बहू शहद की मक्खी बकर देवलोक में आ गई थी.  उसने मां-बेटे की सारी बातचीत सुन ली थी.  चर्चा खत्म होने पर वह बुढ़िया से पहले ही घर पहुंच गई और  चंद्रनारायण ने जैसा कहा था, कंचन को बाजार में बेचकर घी-शक्कर, आटा-दाल सब ले आई.  बुढ़िया जब लाठी टेकती-टेकती वापस आयी तो बहू ने भोली बनकर पूछा, ‘सासू जी ! क्या कहा उन्होंने ?”

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सास घर के बदले रंग-ढंग देखकर बोली, “जो कुछ कहा था, वह तो तूने पहले ही कर डाला.˝

सास-बहू के दिन आराम से कटने लगे.  इनके घर में इतनी बरकत हो गयी कि दानों से लक्ष्मी समेटी नहीं जाती थी.  दोनों घबरा गईं. एक दिन बहू ने सास से कहा, “सासूजी, तुम्हारे बेटे ने पहले तो दिया नहीं, अब दिया तो इतना कि संभाला ही नहीं जाता, उनके पास फिर जाओ, वे ही कुछ तरकीब बतायेंगे.˝

बुढ़िया बहू के कहने से फिर चली.  इस बार बुढ़िया ने नौकर-चाकर, लाव-लश्कर साथ ले लिया.  पालकी में बैठकर ठाठ से चली.  बहू शहद की मक्खी बनकर पहले ही वहां पहुंच गई.

बुढ़िया के पहंचने पर द्वारपाल ने  चंद्रनारायण  को खबर दी, “महाराज ! आपकी मां आई हैं.˝

चंद्रनारायण ने पूछा, “किस हाल में हैं ?”

द्वारपाल ने कहा, “महाराज ! बड़े ठाठ-बाठ से.  नौकर-चाकर, लाव-लश्कर सभी साथ हैं.˝

चंद्रनारायण ने कहा, “महल में ठहरा दो.˝

बुढ़िया को महल में ठहरा दिया गया.

काम-काज से निबटकर चंद्रनारायण महल में आया.  मां से पूछा, “कहो मां ! अभी भी पूरा नहीं पड़ता ?˝

मां बोली, “नहीं बेटा ….. अब तो तूने इतना दे दिया कि उसे संभालना मुश्किल हो गया है.  हम तंग आ गईं हैं। अब हमें बता कि हम उस धन का क्या करें?”

चंद्रनारायण   हंसते हुए कहा, “मेरी भोली मां ! यह तो बड़ी आसान बात है.  खाते-खरचते जो बचे, उससे धर्म-पुण्य करो, कुंए-बावड़ी खुदवाओ.  परोपकार के ऐसे बहुत-से काम हैं.˝

शहद की मक्खी बनी बहू पहले ही मौहूद थी.  उसने सब सुन लिया और फौरन घर लौटकर सदाव्रत बिठा दिया. कुआ, बावड़ी, धर्मशाला आदि का काम शुरू कर दिया.  बुढ़िया जब लौटी तो उसने भोली बनकर पूछा, “उन्होंने क्या कहा, सासूजी?”

बुढ़िया ने घर के बदले रंग-ढंग देखकर कहा, “बहू जो कुछ उसने कहा था, वह तो तूने पहले ही कर डाला.˝

इसी तरह कई दिन बीत गये.  एक दिन चंद्रनारायण को अपने घर की सुधि आई.  उसने सोचा कि चलें, देखें तो सही कि दोनों के क्या हाल-चाल हैं.  इधर मां कई दिनों से आई नहीं.

यह सोच  चंद्रनारायण  साधु का रूप धर कर आया.  आते ही इनके दावाजे पर आवाज लगाई, “अलख निरंजन.  आवाज सुनते ही बुढ़िया मुटठी में आटा लेकर साधु को देने आई.  साधु ने कहा, “माई ! मैं आटा नहीं लेता.  मैं तो आज तेरे यहां ही भोजन करूंगा.  तेरी इच्छा हो तो भोजन करा दे, नहीं तो मैं शाप देता हूं.˝

शाप का नाम सुनते ही बुढ़िया ने गिड़गिड़ाकर कहा, “नहीं-नहीं, बाबा ! शाप मत दो.  मैं भोजन कराऊंगी.”

साधु ने कहा, “माई, हमारी एक शर्त ओर सुन लो. हम तुम्हारी बहू के हाथ का ही भोजन करेंगे.”

बहू ने छत्तीस तरह के पकवान, बत्तीस तरह की चटनी बनाई .  बुढ़िया साधु को बुलाने गई.  साधु ने कहा, “माई ! हम तो उसी पाट पर बैठेंगे, जिस पर तेरा बेटा बैठता था.

  उसी थाली में खायेंगे, जिसमें तेरा बेटा खाता था.  जबतक हम भोजन करेंगे तब तक तेरी बहू को पंखा झलना पड़ेगा.  तेरी इच्छा हो तो बोल, नहीं तो मैं शाप देता हूं.”

बुढ़िया शाप के नाम से कांपने लगी.  उसने कहा, “ठहरो ! मैं बहू से पूछ लूं.”

बहू से सास ने पूछा तो वह बोली, “मैं क्या जानूं? जैस तुम कहो, वैसा करने को तैयार हूं.”

बुढ़िया बोली, “बेटी ! बड़ा अड़ियल साधु है. पर अब क्या करें ?”

आखिर सूर्यनारायण जिस पाट पर बैठता था, वह पाट बिछाया गया, उसकी खानें की थाली में भोजन परोसा गया.  बहू सामने पंखा झलने बैठी. तब साधु महाराज ने भोजन किया.

बुढ़िया ने सोचा-चलो, अब महाराज से पीछा छूटा.  मगर महाराज तो बड़े विचित्र निकले .  भोजन करने के बाद बोले, “माई ! हम तो यहीं सोयंगे और उस पलंग पर जिस पर तेरा बेटा सोता था  और देख, तेरी बहू को हमारे पैर दबाने होंगे.  तेरी राजी हो तो बोल, नहीं तो मैं शाप देता हूं .”

बुढ़िया बड़ी घबराई.  बहू से फिर सलाह लेने गई. बहू ने कह दिया, मैं क्या जानूं.  तुम जानो.”

साधु ने देरी होती देखी तो कहा, “अच्छा माई, चल दिये.”

बुढ़िया हाथ जोड़कर बोली, “नहीं-नहीं, महाराज.  आप जाइए मत. आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा.  बड़ी मुश्किल से हमारे दिन बदले हैं. शाप मत दीजिए.”

चंद्रनारायण जिस पलंग पर सोता था वही  पलंग बिछाया गया.  साधु महाराज ने शयन किया.  बहू उनके पैर दबाने लगी.  तभी छ: महीने  का दिन हो गया .  हर जगह कौतुहल हो गया , क्योंकि समय से पूर्व ही दिन हो गया था .

अब बुढ़िया समझी कि यह तो मेरा ही बेटा है.  उसने कहा, “बेटा ! कभी तो आया ही नहीं और आया तो यों अपने को छिपाकर क्यों आया ? जा, अपना काम-काज संभाल .

चंद्रनारायण  वापस देवलोक लौट गया.  इधर  चंद्रनारायण की पत्नी ने नौ महीने बाद एक सुन्दर तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया.  वह बालक दिनोंदिन बड़ा होने लगा. ए

क दिन वह अपने दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेल रहा था.  खेल-ही-खेल में उसने दूसरे लड़कों की तरह बाप की सौगंध खाई.  उसके साथी उसे चिढ़ाने लगे, “तेरे बाप है कहां? तूने कभी उन्हें देखा है? तू बिना बाप का है?”

लड़का रोता-रोता अपनी दादी के पास आया, बोला, “मां ! मुझे बता कि मेरे पिताजी कहां है ? ”

बुधिया ने कहा रात में बताउंगी . रात होने पर बच्चा फिर जिद करने लगा . तब बुधिया ने चंद्रनारायण की ओर उंगली से संकेत कर कहा, “वे रहे बेटा.  तेरे पिता को तो सारी दुनिया जानती है .”

बालक ने मचलते हुए कहा, “नहीं मां ! सचमुच के पिता बता.”

बालक ने जिद ठान ली.  बुढ़िया उसे लेकर देवलोक चली.  नौकर-चाकर साथ में लेकर पालकी में सवार होकर वहां पहुंचे.  महल में ठहराये गए.  चंद्रनारायण काम-काज से निबटकर महल में आये. बुढ़िया ने उनकी ओर संकेत कर कहा, “ये हैं तेरे पिता”

चंद्रनारायण ने बालक को गोदी में लेकर प्यार किया . बालक का रोना बंद हो गया.  उस दिन से वे सब चैन से रहने लगे.

 

 

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किसी जमाने में एक चोर था.  वह बडा ही चतुर था.  लोगों का कहना था कि वह आदमी की आंखों का काजल तक उडा सकता था.  एक दिन उस चोर ने सोचा कि जबतक वह राजधानी में नहीं जायगा और अपना करतब नहीं दिखायगी, तबतक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी. यह सोचकर वह राजधानी की ओर रवाना हुआ और वहां पहुंचकर उसने यह देखने के लिए नगर का चक्कर लगाया कि कहां कया कर सकता है.

उसने तय कि कि राजा के महल से अपना काम शुरू करेगा.  राजा ने रातदिन महल की रखवाली के लिए बहुतसे सिपाही तैनात कर रखे थे.  बिना पकडे गये परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था.  महल में एक बहुत बडी घडीं लगी थी, जो दिन रात का समय बताने के लिए घंटे बजाती रहती थी.

चोर ने लोहे की कुछ कीलें इकठटी कीं ओर जब रात को घडी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एकएक कील ठोकता गया.  इसतरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीलें लगा दीं, फिर उन्हें पकड पकडकर वह ऊपर चढ गया और महल में दाखिल हो गया. इसके बाद वह खजाने में गया और वहां से बहुत से हीरे चुरा लाया.

अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो मंत्रियों ने राजा को इसकी खबर दी.  राजा बडा हैरान और नाराज हुआ.  उसने मंत्रियों को आज्ञा दी कि शहर की सडकों पर गश्त करने के लिए सिपाहियों की संख्या दूनी कर दी जाय और अगर रात के समय किसी को भी घूमते हुए पाया जाय तो उसे चोर समझकर गिरफतार कर लिया जाय.

जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था, एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था.  उसे सारी योजना की एक एक बात का पता चल गया.  उसे फौरन यह भी मालूम हो यगा कि कौन से छब्बीस सिपाही शहर में गश्त के लिए चुने गये हैं. वह सफाई से घर गया और साधु का बाना धारण करके उन छब्बीसों सिपाहियों की बीवियों से जाकर मिला.  उनमें से हरेक इस बात के लिए उत्सुक थी कि उसकी पति ही चोर को पकडे ओर राजा से इनाम ले.

एक एक करके चोर उन सबके पास गया ओर उनके हाथ देख देखकर बताया कि वह रात उसके लिए बडी शुभ है.  उसक पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा; लेकिन, देखो, चोर की अपने घर के अंदर मत आने देना, नहीं तो वह तुम्हें दबा लेगा.  घर के सारे दरवाजे बंद कर लेना और भले ही वह पति की आवाज में बोलता सुनाई दे, उसके ऊपर जलता कोयला फेंकना.  इसका नतीजा यह होगा कि चोर पकड में आ जायगा.

सारी स्त्रियां रात को चोर के आगमन के लिए तैयार हो गईं. अपने पतियों को उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी.  इस बीच पति अपनी गश्त पर चले गये और सवेरे चार बजे तक पहरा देते रहे.

हालांकि अभी अंधेरा था, लेकिन उन्हें उस समय तक इधर उधर कोई भी दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सोचा कि उस रात को चोर नहीं आयगा, यह सोचकर उन्होंने अपने घर चले जाने का फैसला किया.  ज्योंही वेघर पहुंचे, स्त्रियों को संदेह हुआ और उन्होंने चोर की बताई कार्रवाई शुरू कर दी.

फल वह हुआ कि सिपाही जल गये ओर बडी मुश्किल से अपनी स्त्रियों को विश्वास दिला पाये कि वे ही उनके असली पति हैं और उनके लिए दरवाजा खोल दिया जाय.

सारे पतियों के जल जाने के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया.  दूसरे दिन राजा दरबार में आया तो उसे सारा हाल सुनाया गया.  सुनकर राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने कोतवाल को आदेश दिया कि वह स्वयं जाकर चोर पकड़े.

उस रात कोतवाल ने तेयार होकर शहर का पहरा देना शुरू किया.  जब वह एक गली में जा रहा रहा था, चोर ने जवाब दिया, ‘मैं चोर हूं.″ कोतवाल समझा कि लड़की उसके साथ मजाक कर रही है.

उसने कहा, ″मजाक छाड़ो ओर अगर तुम चोर हो तो मेरे साथ आओ.  मैं तुम्हें काठ में डाल दूंगा. ″ चोर बाला, ″ठीक है.  इससे मेरा क्या बिगड़ेगा″ और वह कोतवाल के साथ काठ डालने की जगह पर पहुंचा.

वहां जाकर चोर ने कहा, ″कोतवाल साहब, इस काठ को आप इस्तेमाल कैसे किया करते हैं, मेहरबानी करके मुझे समझा दीजिए.″ कोतवाल ने कहा, तुम्हारा क्या भरोसा! मैं तुम्हें बताऊं और तुम भाग जाओं तो ?″ चोर बाला, ″आपके बिना कहे मैंने अपने को आपके हवाले कर दिया है.  मैं भाग क्यों जाऊंगा?″ कोतवाल उसे यह दिखाने के लिए राजी हो गया कि काठ कैसे डाला जाता है.  ज्यों ही उसने अपने हाथ-पैर उसमें डाले कि चोर ने झट चाबी घुमाकर काठ का ताला बंद कर दिया और कोतवाल को राम-राम करके चल दिया.

जाड़े की रात थी.  दिन निकलते-निकलते कोतवाल मारे सर्दी के अधमरा हो गया.  सवेरे जब सिपाही बाहर आने लगे तो उन्होंने देखा कि कोतवाल काठ में फंसे पड़े हैं.  उन्होंने उनको उसमें से निकाला और अस्पताल ले गये.

अगले दिन जब दरबार लगा तो राजा को रात का सारा किस्सा सुनाया गया.  राजा इतना हैरान हुआ कि उसने उस रात चोर की निगरानी स्वयं करने का निश्चय किया.

चोर उस समय दरबार में मौजूद था और सारी बातों को सुन रहा था.  रात होने पर उसने साधु का भेष बनाया और नगर के सिरे पर एक पेड़ के नीचे धूनी जलाकर बैठ गया.

राजा ने गश्त शुरू की और दो बार साधु के सामने से गुजरा.  तीसरी बार जब वह उधर आया तो उसने साधु से पूछा कि, ″क्या इधर से किसी अजनबी आदमी को जाते उसने देखा है ?″ साधु ने जवाब दिया कि “वह तो अपने ध्यान में लगा था, अगर उसके पास से कोई निकला भी होगा तो उसे पता नहीं.

यदि आप चाहें तो मेरे पास बैठ जाइए और देखते रहिए कि कोई आता-जाता है या नहीं. ″ यह सुनकर राजा के दिमाग में एक बात आई और उसने फौरन तय किया कि साधु उसकी पोशाक पहनकर शहर का चक्कर लगाये और वह साधु के कपड़े पहनकर वहां चोर की तलाश में बैठे.

आपस में काफ बहस-मुबाहिसे और दो-तीन बार इंकार करने के बाद आखिर चोर राजा की बात मानने को राजी हो गया ओर उन्होंने आपस में कपड़े बदल लिये.  चोर तत्काल राजा के घोड़े पर सवार होकर महल में पहुंचा ओर राजा के सोने के कमरे में जाकर आराम से सो गया, बेचारा राजा साधु बना चोर को पकड़ने के लिए इंतजार करता रहा.

सवेरे के कोई चार बजने आये. राजा ने देखा कि न तो साधु लौटा और कोई आदमी या चोर उस रास्ते से गुजरा, तो उसने महल में लौट जाने का निश्चय किया; लेकिन जब वह महल के फाटक पर पहुंचा तो संतरियों ने सोचा, राजा तो पहले ही आ चुका है, हो न हो यह चोर है, जो राजा बनकर महल में घुसना चाहता है.  उन्होंने राजा को पकड़ लिया और काल कोठरी में डाल दिया.  राजा ने शोर मचाया, पर किसी ने भी उसकी बात न सुनी.

दिन का उजाला होने पर काल कोठरी का पहरा देने वाले संतरी ने राजा का चेहरा पहचान लिया ओर मारे डर के थरथर कांपने लगा.  वह राजा के पैरों पर गिर पड़ा.  राजा ने सारे सिपाहियों को बुलाया और महल में गया.

उधर चोर, जो रात भर राजा के रुप में महल में सोया था, सूरज की पहली किरण फूटते ही, राजा की पोशाक में और उसी के घोड़े पर रफूचक्कर हो गया.

अगले दिन जब राजा अपने दरबार में पहुंचा तो बहुत ही हतरश था.  उसने ऐलान किया कि अगर चोर उसके सामने उपस्थितित हो  जायगा तो उसे माफ कर दिया जायगा और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जायगी, बल्कि उसकी चतुराई के लिए उसे इनाम भी मिलेगा.

चोर वहां मौजूद था ही, फौरन राजा के सामने आ गया ओर बोला, “महाराज, मैं ही वह अपराधी हूं. ″ इसके सबूत में उसने राजा के महल से जो कुछ चुराया था, वह सब सामने रख दिया, साथ ही राजा की पोशाक और उसका घोड़ा भी.

राजा ने उसे गांव इनाम में दिये और वादा कराया कि वह आगे चोरी करना छोड़ देगा . इसके बाद से चोर खूब आनन्द से रहने लगा.

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