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maihar mata mandir

maihar devi
maihar devi
Written by Hindibeststory

maihar mata mandir मध्यप्रदेश के सतना जिला के मैहर त्रिकुट पर्वत पर स्थित है. यहाँ आने वाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाता. जो भी व्यक्ति यहाँ जो कुछ माता से मांगता है, माता उसकी मुराद अवश्य पूरी करती है. ५२ शक्तिपीठों में maihar का शारदा मंदिर ही ऐसा मंदिर है जहां अमरत्व का वरदान मिलता है. आपको को बता दे कि मैहर का अर्थ होता है मां का हार. maihar से 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है. पर्वत की चोटी के मध्य में ही शारदा माता का मंदिर है. पूरे भारत में सतना का maihar mata mandir माता शारदा का अकेला मंदिर है. इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरवी, हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमति माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी के भी मंदिर हैं.

आल्हा और उदल करते हैं maihar mata mandir में सर्वप्रथम दर्शन

स्थानीय लोगों के अनुसार आल्हा और ऊदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे maihar devi के बहुत बड़े भक्त थे. इन्ही दोनों ने सर्वप्रथम जंगलों के बीच maihar devi शारदा माता मंदिर की खोज की थी. इसके बाद आल्हा नी इस maihar mata mandir में १२ वर्ष तक तपश्या कर माता को प्रसन्न किया था. इस पर maihar devi ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया.आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे और तभी से maihar mata mandir शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया. आज भी यहाँ मान्यता है कि हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही माता के दर्शन करते हैं. maihar mata mandir के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है. जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है.यहाँ से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर एक अखाड़ा है. लोगों का कहना है कि आल्हा और ऊदल यहाँ कुश्ती लड़ते थे. maihar mata mandir के पुजारी भी मानते हैं कि आल्हा और ऊदल ही सर्वप्रथम शारदा माता का दर्शन करते हैं.

maihar mata mandir story / मैहर माता मंदिर कहानी

दक्ष प्रजापति की पुत्री सती lord shiva से विवाह करना चाहती थी. यह बात राजा दक्ष को पसंद नहीं थी. वे lord shiva को पसंद नहीं करते थे. वे कहते थे कि शिव हमेशा भूतों और अघोरियों से घिरे रहते हैं.फिर भी सती ने जिद से lord shiva से विवाह किया. एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया. उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता lord shiva को नहीं बुलाया.शंकर जी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुईं.

यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से lord shiva को आमंत्रित न करने का कारण पूछा. इस पर दक्ष प्रजापति ने lord shiva को अपशब्द कहे. इस अपमान से दुखी होकर सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी. जब भगवान शंकर को जब इस घटना का पता चला, तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया.

उन्होंने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे. ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया. जहां भी सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ. इस तरह से ५२ शक्तिपीठ बनी. अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर lord shiva को फिर से पति रूप में प्राप्त किया. माना जाता है कि यहां मां का हार गिरा था. हालांकि, सतना का मैहर मंदिर शक्ति पीठ नहीं है. फिर भी लोगों की आस्था इतनी अडिग है कि यहां सालों से माता के दर्शन के लिए भक्तों का रेला लगा रहता है.

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