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मध्य प्रदेश का maihar माता मंदिर , जहां पूरी होती हैं हर मुरादें. पढ़ें आल्हा की कहानी

maihar
Written by Abhishek Pandey

maihar  माता का मंदिर मध्यप्रदेश के सतना जिला के त्रिकूट पर्वत पर स्थित है. यहां आने वाला भक्त कभी भी खाली हाथ नहीं जाता. जो भी व्यक्ति यहां जो कुछ माता से मांगता है, माता उसकी मुराद अवश्य पूरी करती हैं.

 

 

 

५२ शक्तिपीठों में मैहर का शारदा मंदिर ही ऐसा मंदिर है जहां अमरत्व का वरदान मिलता है. आपको बता दें कि मैहर का अर्थ होता है मां का हार. मैहर से ५ किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर माता शारदा देवी का वास है.

 

 

 

 

पर्वत की चोटी के मध्य में ही शारदा माता का मंदिर है. पुरे भारत में सतना का मैहर माता मंदिर मां शारदा का अकेला मंदिर है. इसी पर्वत की चोटी पर माता के साथ ही श्री काल भैरव, हनुमान जी, देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, फूलमती माता, ब्रह्म देव और जलापा देवी के भी मंदिर हैं.

 

 

 

मैहर माता के मंदिर में हमेशा ही भक्तों की भारी भीड़ रहती है, लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है. मंदिर तक पहुँचने के लिए १०६३ सीढियां चलनी होती हैं.

 

 

 

पिरामिड के आकार के त्रिकूट पर्वत में स्थापित इस मंदिर का निर्माण ५२२ ईसा पूर्व किया गया था. मान्यता के अनुसार नृपल देव ने चतुर्दशी के दिन यहां सामवेदी की स्थापना की. उसके बाद यहां पूजा – अर्चना शुरू हुई.

 

 

 

आदिगुरू शंकराचार्य  ने भी की हैं यहां पूजा 

 

 

 

विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदिगुरु शंकराचार्य के द्वारा की गयी थी.

 

 

मैहर पर्वत का नाम प्राचीन ग्रन्थ  ” महेंद्र ” में मिलता है. इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है. मां शारदा की प्रतिमा के ठीक नीचे एक शिलालेख है, जो कई पहेलियों को अपने में समेटे हुए है. इसकी लिखावट को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है.

 

 

 

 

जैसा कि आप जानते हैं कि माता रानी के मंदिर अक्सर पहाड़ों की चोटियों पर ही स्थित होते हैं. जैसे मां वैष्णों देवी के दर्शनों के लिए लोग पहाड़ों को पार करते हुए जाते हैं , ठीक उसी तरह माता शारदा के दर्शन के लिए भी लोग सीढ़ियाँ चढते हुए , माता का नाम लेते हुए जाते हैं.

 

 

 

स्थानीय लोगों के अनुसार आल्हा और ऊदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे  माता  के बहुत बड़े भक्त थे. इन्ही दोनों ने सर्वप्रथम जंगलों के बीच  शारदा माता मंदिर की खोज की थी.

 

 

 

इसके बाद आल्हा ने  इस मंदिर में १२ वर्ष तक तपष्या कर माता को प्रसन्न किया था. इस पर माता  ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया.आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे और तभी से मैहर देवी का मंदिर शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

 

 

 

कौन थे आल्हा उदल? aalha udal की कहानी 

 

 

 

aalha udal दो भाई थे. ये बुंदेलखंड के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे. कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खंड नामक एक काव्य की रचना की, जिसमे उन वीरों ने की वीरगाथा वर्णित है.

 

 

 

 

इस ग्रन्थ में आल्हा ऊदल  के ५२ रोमांचकारी लड़ाईयों के बारे विस्तार से वर्णन हैं. आल्हाखंड में इस बात का प्रमाण है कि aalha udal का आखिरी युद्ध पृथ्वीराज चौहान के साथ हुआ था, जिसमे पृथ्वीराज की हार हुई और आल्हा के भाई ऊदल की मृत्यु हो गयी.

 

 

 

 

ऊदल की मृत्यु के बाद आल्हा के अन्दर वैराग्य का भाव आ गया और गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया. आल्हा ऊदल ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी.

 

 

 

 

इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था. माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था और इसी वरदान  के कारण पृथ्वीराज के साथ युद्ध में आल्हा को विजय मिली.

 

 

 

 

इस मंदिर के  तमाम ऐतिहासिक अवशेष aalha udal और पृथ्वीराज के युद्ध की गवाही देते हैं. आज भी यही मान्यता है कि शारदा माता का दर्शन प्रत्येक दिन सर्वप्रथम आल्हा ही करते हैं.

 

 

 

 

 

 

 

मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है. यही नहीं, तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां aalha udal कुश्ती लड़ा करते थे.

 

 

 

 

बुन्देली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान से लिया जाता है. वहाँ का लोकगीत आल्हा ऊदल के नाम पर है जिसे सावन के महीने में हर गली मोहल्ले में गाया  जाता है.

 

 

 

 

मैहर माता की कथा ( Maihar Mata story )

 

 

 

दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान् शिव से विवाह करना चाहती थी. यह बात राजा दक्ष को पसंद नहीं थी. वे  भोलेनाथ  को पसंद नहीं करते थे. वे कहते थे कि शिव हमेशा भूतों और अघोरियों से घिरे रहते हैं.

 

 

 

 

फिर भी सती ने जिद से  नीलकंठ  से विवाह किया. एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया. उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान् शिव को नहीं बुलाया.

 

 

 

 

शंकर जी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुईं. यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से  शिव शंकर को आमंत्रित न करने का कारण पूछा.

 

 

 

इस पर दक्ष प्रजापति ने  भगवन शिव  को अपशब्द कहे. इस अपमान से दुखी होकर सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी. जब भगवान शंकर को जब इस घटना का पता चला, तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया.

 

 

 

उन्होंने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे. ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया.

 

 

 

 

जहां भी सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ. इस तरह से ५२ शक्तिपीठ बनी. अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर  भगवान् भोलेनाथ को फिर से पति रूप में प्राप्त किया.

 

 

 

 

माना जाता है कि यहां मां का हार गिरा था. हालांकि, सतना का मैहर मंदिर शक्ति पीठ नहीं है. फिर भी लोगों की आस्था इतनी अडिग है कि यहां सालों से माता के दर्शन के लिए भक्तों का रेला लगा रहता है.

 

 

 

मैहर माता मंदिर कैसे पहुंचे? How to reach Maihar Mata Temple?

 

 

 

भारत की राजधानी दिल्ली से maihar तक की सड़क से दूरी लगभग १००० किलोमीटर है. ट्रेन से पहुंचने के लिए महाकौशल व रीवा एक्सप्रेस उपयुक्त हैं .

 

 

 

 

इसके साथ ही वाराणसी मुंबई महानगरी से भी आप मैहर जा सकते हैं और दिल्ली से चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस सीधे मैहर ही पहुंचती है.

 

 

 

 

स्टेशन से उतरने के बाद किसी धर्मशाला या होटल में थोड़ा विश्राम करने के बाद चढ़ाई आरंभ की जा सकती है. रीवा एक्सप्रेस से यात्रा करने वाले भक्तजनों को मजगांवां पर उतरना चाहिए. वहां से maiharलगभग 15 किलोमीटर दूर है.

 

 

 

 

त्रिकूट पर्वत पर  शारदा मां  का मंदिर भू-तल से छह सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है.  मंदिर तक जाने वाले मार्ग में तीन सौ फीट तक की यात्रा गाड़ी से भी की जा सकती है.

 

 

 

 

मैहर देवी तक पहुंचने की यात्रा को चार खंडों में विभक्त किया जा सकता है. प्रथम खंड की यात्रा में चार सौ अस्सी सीढ़ियों को पार करना होता है.

 

 

 

मंदिर के सबसे निकट त्रिकूट पर्वत से सटा मंगल निकेतन बिड़ला धर्मशाला है. इसके पास से ही येलजी नदी बहती है. द्वितीय खंड 228 सीढ़ियों का है.

 

 

 

 

इस यात्रा खंड में पानी व अन्य पेय पदार्थों का प्रबंध है. यहां पर आदिश्वरी माई का प्राचीन मंदिर है. यात्रा के तृतीय खंड में एक सौ सैंतालीस सीढ़ियां हैं. चौथे और अंतिम खंड में 196 सीढ़ियां पार करनी होती हैं. इसके बाद आप maihar devi तक पहुँच जायेंगे.

 

 

 

 

जैसा कि आप जानते हैं कि माता रानी के मंदिर अक्सर पहाड़ों की चोटियों पर ही स्थित होते हैं. जैसे मां वैष्णों देवी के दर्शनों के लिए लोग पहाड़ों को पार करते हुए जाते हैं , ठीक उसी तरह माता शारदा के दर्शन के लिए भी लोग सीढ़ियाँ चढते हुए , माता का नाम लेते हुए जाते हैं.

 

 

 

स्थानीय लोगों के अनुसार आल्हा और ऊदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे  माता  के बहुत बड़े भक्त थे. इन्ही दोनों ने सर्वप्रथम जंगलों के बीच  शारदा माता मंदिर की खोज की थी.

 

 

 

इसके बाद आल्हा ने  इस मंदिर में १२ वर्ष तक तपष्या कर माता को प्रसन्न किया था. इस पर माता  ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया.आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे और तभी से मैहर देवी का मंदिर शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

 

 

 

कौन थे आल्हा उदल? aalha udal की कहानी 

 

 

 

aalha udal दो भाई थे. ये बुंदेलखंड के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे. कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खंड नामक एक काव्य की रचना की, जिसमे उन वीरों ने की वीरगाथा वर्णित है.

 

 

 

 

इस ग्रन्थ में आल्हा ऊदल  के ५२ रोमांचकारी लड़ाईयों के बारे विस्तार से वर्णन हैं. आल्हाखंड में इस बात का प्रमाण है कि aalha udal का आखिरी युद्ध पृथ्वीराज चौहान के साथ हुआ था, जिसमे पृथ्वीराज की हार हुई और आल्हा के भाई ऊदल की मृत्यु हो गयी.

 

 

 

 

ऊदल की मृत्यु के बाद आल्हा के अन्दर वैराग्य का भाव आ गया और गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया. आल्हा ऊदल ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी.

 

 

 

 

इसके बाद आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था. माता ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था और इसी वरदान  के कारण पृथ्वीराज के साथ युद्ध में आल्हा को विजय मिली.

 

 

 

 

इस मंदिर के  तमाम ऐतिहासिक अवशेष aalha udal और पृथ्वीराज के युद्ध की गवाही देते हैं. आज भी यही मान्यता है कि शारदा माता का दर्शन प्रत्येक दिन सर्वप्रथम आल्हा ही करते हैं.

 

 

 

 

 

 

 

मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है, जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है. यही नहीं, तालाब से 2 किलोमीटर और आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां aalha udal कुश्ती लड़ा करते थे.

 

 

 

 

बुन्देली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही गर्व और सम्मान से लिया जाता है. वहाँ का लोकगीत आल्हा ऊदल के नाम पर है जिसे सावन के महीने में हर गली मोहल्ले में गाया  जाता है.

 

 

 

maihar 

फोटो साभार :- शकशी.कॉम

 

 

 

 

 

मैहर माता की कथा ( Maihar Mata story )

 

 

 

दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान् शिव से विवाह करना चाहती थी. यह बात राजा दक्ष को पसंद नहीं थी. वे  भोलेनाथ  को पसंद नहीं करते थे. वे कहते थे कि शिव हमेशा भूतों और अघोरियों से घिरे रहते हैं.

 

 

 

 

फिर भी सती ने जिद से  नीलकंठ  से विवाह किया. एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया. उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान् शिव को नहीं बुलाया.

 

 

 

 

शंकर जी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुईं. यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से  शिव शंकर को आमंत्रित न करने का कारण पूछा.

 

 

 

इस पर दक्ष प्रजापति ने  भगवन शिव  को अपशब्द कहे. इस अपमान से दुखी होकर सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी. जब भगवान शंकर को जब इस घटना का पता चला, तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया.

 

 

 

उन्होंने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे. ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया.

 

 

 

 

जहां भी सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ. इस तरह से ५२ शक्तिपीठ बनी. अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर  भगवान् भोलेनाथ को फिर से पति रूप में प्राप्त किया.

 

 

 

 

माना जाता है कि यहां मां का हार गिरा था. हालांकि, सतना का मैहर मंदिर शक्ति पीठ नहीं है. फिर भी लोगों की आस्था इतनी अडिग है कि यहां सालों से माता के दर्शन के लिए भक्तों का रेला लगा रहता है.

 

 

 

मैहर माता मंदिर कैसे पहुंचे? How to reach Maihar Mata Temple?

 

 

 

भारत की राजधानी दिल्ली से maihar तक की सड़क से दूरी लगभग १००० किलोमीटर है. ट्रेन से पहुंचने के लिए महाकौशल व रीवा एक्सप्रेस उपयुक्त हैं .

 

 

 

 

इसके साथ ही वाराणसी मुंबई महानगरी से भी आप मैहर जा सकते हैं और दिल्ली से चलने वाली महाकौशल एक्सप्रेस सीधे मैहर ही पहुंचती है.

 

 

 

 

स्टेशन से उतरने के बाद किसी धर्मशाला या होटल में थोड़ा विश्राम करने के बाद चढ़ाई आरंभ की जा सकती है. रीवा एक्सप्रेस से यात्रा करने वाले भक्तजनों को मजगांवां पर उतरना चाहिए. वहां से maiharलगभग 15 किलोमीटर दूर है.

 

 

 

 

त्रिकूट पर्वत पर  शारदा मां  का मंदिर भू-तल से छह सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है.  मंदिर तक जाने वाले मार्ग में तीन सौ फीट तक की यात्रा गाड़ी से भी की जा सकती है.

 

 

 

 

मैहर देवी तक पहुंचने की यात्रा को चार खंडों में विभक्त किया जा सकता है. प्रथम खंड की यात्रा में चार सौ अस्सी सीढ़ियों को पार करना होता है.

 

 

 

मंदिर के सबसे निकट त्रिकूट पर्वत से सटा मंगल निकेतन बिड़ला धर्मशाला है. इसके पास से ही येलजी नदी बहती है. द्वितीय खंड 228 सीढ़ियों का है.

 

 

 

 

इस यात्रा खंड में पानी व अन्य पेय पदार्थों का प्रबंध है. यहां पर आदिश्वरी माई का प्राचीन मंदिर है. यात्रा के तृतीय खंड में एक सौ सैंतालीस सीढ़ियां हैं. चौथे और अंतिम खंड में 196 सीढ़ियां पार करनी होती हैं. इसके बाद आप maihar devi तक पहुँच जायेंगे.

 

 

 

 

मैहर माता मंदिर के नजदीकी होटल्स { Hotels Near Maihar Temple }

 

 

 

मैहर माता मंदिर के नजदीक कई सारे होटल और सराय हैं जिनमें Hotel Siddharth INN., Maihar Heritage Palace, Yash Palace & Ok Veg Restaurant, प्रमुख हैं.

 

 

मित्रों यह maihar माता की कथा आपको कैसी लगी जरुर बताएं और maihar माता की कथा की तरह और भी कथा के लिए इस ब्लॉग को सबस्क्राइब जरुर करें और दूसरी पोस्ट के लिए नीचे की लिंक पर क्लिक करें.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Abhishek Pandey

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