Moral Story

Manavata ek dharm moral stories

Manavata ek dharm moral stories यह एक मोरल स्टोरी है. आईये इस शिक्षा कि कहानी Manavata ek dharm moral stories के बारे में पढ़ते हैं.

एक बार एक साधु अपने कुछ शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले थे. चलते-चलते दोपहर हो गयी. गर्मी का मौसम था, सूरज आग बरसा रहा था, पृथ्वी आग का गोला बनी हुई थी, ना तो ऊपर से राहत थी और ना ही नीचे से. साधु और उनके सभी शिष्य पसीने से तरबतर हो गयी थे और उन्हें प्यास भी लगी थी. अचानक उन्हें एक गांव नज़र आया, उन्होने उसी गांव कुछ समय रुक कर विश्राम करने का निर्णय किया. कुछ ही समय में वे गांव के पास आ गये, वहां एक शिवमंदिर था. उन्होने अपने शिष्यों को इसी मंदिर पर रुकने का आदेश दिया.
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शीतल हवा बह रही थी. सभी लोगों ने वहाँ लगी नल से पानी पीया और कुछ देर विश्राम करने का निर्णय किया. थकान और शीतल हवा के कारण सभी को नीद आ गयी. कुछ समय पश्चात उधर से एक राहगीर गुजरा. उसने जब इतने सारे साधुओं को मंदिर के पास विश्राम करते हुए देखा तो जाकर पूरे गांव में बता दिया. गांव के लोग बहुत ही उत्तम विचार के लोग थे. सदा ही दीन दुखियों की मदद करते थे. आपस में किसी भी प्रकार का वाद-विवाद नहीं होता था और अगर होता भी था उसे बैठकर सुलझा लिया जाता था.
यह खबर सुनकर गांव के मुखिया श्री रामविहारी जी अन्य गांव वालों के साथ उन साधुओं के स्वागत के लिए मंदिर की ओर प्रस्थान किए. मंदिर में बढ़ते शोरगुल से साधु और उनके शिष्यों की निद्रा भंग हो गयी, वे लोग उठ गये. इस पर मुखिया जी हाथ जोड़कर साधु महाराज से क्षमा माँगी और आज रात इसी मंदिर पर रुकने का निवेदन किया. साधु महाराज मान गये. रात को मंदिर पर पूरा गांव जुट गया. बाटी चोखा का कार्यक्रम रखा गया. देर रात तक भजन कीर्तन होता रहा. बात-बात में मुखिया जी कहा कि हे साधु महाराज कल यहां एक मेला लगाने वाला है, जो कि हर साल लगता है, इस बार आप भगवान की कृपा से यहां पधारे हैं तो मेला देखकर ही जाएं. साधु महाराज मुखिया जी और गांव वालों से बड़े प्रसन्न थे, उन्होने हां कह दी.

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मेले की तैयारियां तो रात से ही प्रारंभ हो चुकी थी. दूर-दूर से बड़े-बड़े व्यापारी आने शुरू हो चुके थे. सुबह हुई बड़ी संख्या में व्यापारी आ चुके थे और बहुत सारे आ भी रहे थे. मुखिया जी ने साधु को बताया कि यह मेला दोपहर से शुरू होता है और देर रात तक चलता है.
दोपहर का वक्त आ गया था, मेला पूरी तरह सज चुका था, कहीं पर झूले, कहीं पर पीपिहीरी की पीं-पीं सुनाई दे रही थी. जैसे-जैसे शाम की बेला आ रही थी, मेले की रौनक बढ़ती ही जा रही थी.

साधु ने मुखिया जी से मेले में घूमने का आग्रह किया, इस पर मुखिया ने कहा कि मैं स्वयं आपको मेले का भ्रमण कराऊंगा. मुखिया जी उनके साथ गांव के कुछ विशिष्ट लोग और साधु तथा उनके शिष्य मेले के भ्रमण के लिए निकल पड़े. मेला अपनी भव्यता पर था. मेले में घूमते हुए साधु की नजर एक और साधु पर पड़ी. साधु महाराज ने देखा कि मेले में बैठे साधु आंख बंद करके माला फेर रहे थे, लेकिन माला फेरते हुए वे बार-बार आंखें खोलकर देख रहे थे कि लोगों ने चढ़ावा कितना दिया. अगर कोई कम देता तो वे अपना मुंह बिचका लेते थे. यह देख साधु महाराज हंस दिए और आ बढ़ गये.

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साधू

 आगे  उन्होने देखा की एक पंडित महाराज लोगों की हाथ देख रहे थे. लेकिन उनका हाथ पर कम दक्षिणा पर ज्यादा ध्यान था. वे उन लोगों का भाग्य बहुत बढ़िया बता रहे, जो उन्हें ज्यादा पैसा दे रहा था. उन्हें देखकर साधु महाराज खिल-खिलाकर हंस पड़े. आगे  बढ़ने पर उन्होने देखा कि एक स्वयं सेवी संस्था बीमार, Lachar लोगों को मुफ्त में दवा दे रही थी और उनके घाव या अन्य बीमारियों का इलाज भी कर रही थी. साधु महाराज वहां कुछ देर रुके, उनके कार्यों को देखते रहे कि कैसी तल्लिनता और सेवाभाव से अपना कार्य कर रहे थे. यह देख उनकी आंखों में आँसू आ गये.
जब पूरे मेले का भ्रमण कर वे वापस मंदिर आए तो मुखिया जी ने मेले में दो जगह हंसने और एक जगह इतने शांत भाव से देखने का कारण पूछा, इस पर साधु ने कहा बेटा उन दोनों जगहों पर जहां मैं हंसा वहां तो धर्म के नाम पर बस आडंबर हो रहा था. बगवान के कार्य में भगवान की प्राप्ति के बस वही स्वयंसेवी संस्था और उसके लोग आकुल दिखे. उन सेवा भावना देख कर मेरा हृदय द्रवित हो गया.
इस पर मुखिया जी उस स्वयंसेवी संस्था के प्रत्येक सभासदों और उससे जुड़ें लोगों को सम्मानित करने का निर्णय लिया और उन्हें साधु महाराज के हाथों सम्मानित किया गया. उसके बाद साधु महराज ने भी गांव वालों से विदा ली और उन्हें बहुत आशीर्वाद देकर वहां से प्रस्थान किया.
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