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Moral Stories in Hindi. हिंदी की नयी नैतिक कहानियां . Hindi Best Story

Top 10 Moral Stories in Hindi
Written by Abhishek Pandey

New Moral Stories in Hindi हिंदी की नयी कहानियां 

 

 

Moral Stories in Hindi एक बहुत ही प्रसिद्ध साधू थे. उनके प्रवचन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी. एक दिन उन्होंने देखा कि प्रवचन के समाप्ति के बाद भी एक मनुष्य बड़े ही निराश मन से वहाँ बैठा हुआ था.      

 

 

जब साधू ने उसका कारण पुछा तो उस युवक ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. तब साधू ने उसे एक अन्य साधू के पास भेजा और कहा कि जाओ और उनकी दिनचर्या देखो. उससे ही तुम्हारी समस्या का निदान हो जाएगा.      

 

 

 

जब वह युवक उन साधू के पास गया तो देखा वह एक सराय की रखवाली करते थे. उस युवक ने वहाँ रहकर कुछ दिन तक उनकी दिनचर्या को देखा लेकिन उसे कुछ खास नहीं दिखा .        

 

 

 

वह साधू एकदम शांत और साधारण थे. उनमें कोई ज्ञान के लक्षण भी नहीं दिखाई पड़ते थे. हाँ, उनका व्यवहार शिशु जैसा निर्दोष और निर्मल था ….इसके अतिरिक्त उनकी दिनचर्या में कुछ और खास नहीं था.    

 

 

 

उस युवक ने उन साधू की पूरी दिनचर्या देखि लेकिन रात्री में सोने से पहले और सुबह जागने के बाद वह साधू क्या करते थे , वह उसे ज्ञात नहीं था.        

 

 

 

साधू और शिष्य की कहानी 

 

 

 

तब उसने उन साधू से इस बारे में विचार किया तो उन साधू ने कहा कि कुछ नहीं, रात्री को मैं सारे बर्तन माजता हूँ और चूँकि रात्री भर में थोड़ी बहुत धूल पुनः जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें पुनः धो देता हूँ. बर्तन गंदे व धूल भरे ना हों इसका ध्यान रखना अतिआवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूँ.        

 

 

 

वह युवक इस साधू के पास से अत्यंत ही निराश होकर दुसरे साधू के पास लौटा और सारे बातचीत और घटनाक्रम को विस्तार से बताया. इस पर उन साधू ने कहा कि जो जानने योग्य था उसे तुम जान और सुनकर आये , लेकिन समझ नहीं सके. उनका कहने का अर्थ था कि रात्री तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह फिर से धो लो.          

 

 

 

धीरे – धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. प्रत्येक मनुष्य एक दर्पण है . सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है, जो मनुष्य इस धूल को ज़मने देते हैं , वे दर्पण नहीं रह पाते हैं और जैसा स्वयं का दर्पण होता है वैसा ही स्वाभाव होता है, वैसा ही ज्ञान होता है . अतः अगर दर्पण अगर स्वच्छ होगा तभी विचार भी शुद्ध होंगे. अब युवक को सारी बात समझ में आ गयी थी.    

 

 

 

New Moral Stories in Hindi

Moral Stories in Hindi

 

 

 

Top 10 Moral Stories in Hindi

 

 

2- वंश बेल तो लड़को से ही बढती है…..सदियों से निरंतर चलती आ रही इस सोच से बूढी मालती भी मुक्त नहीं हो पायी थी. जब उसकी बहु विमला ने बेटी को जन्म दिया तो उसे बड़ी ही निराशा हुई.        

 

 

 

लेकिन उसने खुद को यह कहते हुए समझा लिया कि अभी कोई देरी नहीं हुई है. अपनी इस इच्छा को मालती ने जिद में बदल लिया. बहु दूसरी बार गर्भवती हो उसके पहले उसने पुजारी से ताबीज बनवाकर बहु और बेटे को पहना दिया.    

 

 

 

  डाक्टर्स के मना करने पर भी उसने बहु सी व्रत भी करवाए और खुद भी कई सारे व्रत किया. लेकिन  शायद प्रकृति ने भी जिद कर रखी थी…इस बार भी बेटी का ही जन्म हुआ.        

 

 

 

 

इधर बेटी का जन्म हुआ और उधर मालती का भगवान,पूजा, पाठ से विश्वास ही उठ गया. अब उसकी जिद नफ़रत में बदल गयी थी. लेकिन वह जीतनी नफ़रत अपनी पोती धनलक्ष्मी से करती…..धनलक्ष्मी उतना ही अपनी दादी से प्यार करती…..मालती उसे अपने से दूर रखने का लेकिन जब तक धनलक्ष्मी उसके गोद में ना आ जाए..वह चुप ही न होती थी.इससे मालती और भी चिढती थी.  

 

 

 

 

 

 

Moral Stories in Hindi For Class 7

Moral Stories in Hindi

 

Infographic Source- Infographic

 

 

 

धीरे धीरे समय बीता और धनलक्ष्मी बड़ी होनी लगी…और उसकी साथ ही उसका नटखटपना भी बढ़ने लगा. …..वह हर बात पर जिद करती और अपनी दादी से ही उसे पूरा करवाने का भरपूर प्रयास करती…..हांलाकि यह बात अलग है कि वह अपने ज्यादातर प्रयासों में असफल ही रहती….उसकी इन हरकतों से तंग आकर मालती ने उसका नाम डायन रख दिया था.      

 

 

 

 

विमला तीसरी बार गर्भवती हुई…..इस बार मालती ने ना कोई मन्नत मांगी..ना कोई पूजा पाठ करवाए..यहां तक की बहु को ज्यादा आराम भी दिया.        

 

 

 

लेकिन इस बार चमत्कार हो गया….विमला ने पुत्र को जन्म दिया….आज तो मालती मानो ख़ुशी से पागल हो गयी थी….उसने खुद भाग भागकर पुरे गाँव में यह खबर दी.      

 

 

 

आज पहली बार मालती ने धनलक्ष्मी को प्यार से देखा….पुरे गांव को दावत दी गयी…सब कुछ अच्छे से चलने लगा…लेकिन धनलक्ष्मी के प्रति मालती का व्यवहार उस दिन के अतिरिक्त कभी नहीं बदला.      

 

 

 

वह अपने पोते सुकेस धनलक्ष्मी से दूर ही रखती थी…ठण्ड अपने बचपन में थी….गुनगुनी धूप खिली थी. विमला और उसका पति थोड़ी ही दूर खेतों में कुछ काम करने गए थे.        

 

 

 

 Moral Stories In Hindi For Class 10 

 

 

मालती ने सुकेस को बाहर चादर बिछाकर लिटा दिया था और वह उसके लिए दूध लेने चली गयी…तभी बगल में मौजूद झाड़ियों में कुछ सरसराहट की आवाज को सुनकर पास में खेल रही धनलक्ष्मी की नजर उस पर पड़ी.        

 

 

 

उसने देखा कि एक नाग सुकेस की ओर बढ़ रहा है….धनलक्ष्मी ने आव देखा ना ताव तुरंत ही उस सर्प को वहाँ पास में पड़ी एक लकड़ी से भगानी लगी.        

 

 

 

 

लेकिन एक छोटी सी नादान बच्ची उस नाग को कब तक रोक सकती थी…सांप से उसे डंस लिया और उसके पैरों से लिपट गया…..तब तक मालती वहां पहुंची और यह दृश्य देखकर उसकी चीख निकल गयी.      

 

 

 

 

उसकी चीख सुनकर आस पास के लोग और खेतों में काम कर रहे मालती के बहु और बेटे भी दौड कर वहा पहुँच गए. तब तक धनलक्ष्मी बेहोश हो चुकी थी….सभी लोग उसे लेकर पास के दवाखाने भागे.  यह मर चुकी है…..डाक्टर ने उसकी नब्ज को टटोलकर देखने के बाद कहा.        

 

 

 

 

ऐसे कैसे मर सकती है…..नहीं..डाक्टर आप झूट बोल रहे हैं….हे भगवान क्या हो गया…..मैंने कभी भी उसे प्यार से नहीं देखा….उससे दो शब्द भी प्यार से नहीं बोले.        

 

 

Moral Stories in Hindi For Class 10

Moral Stories in Hindi

 

 

 

जिस सुकेस को उससे छुपाती रही कि डायन है खा जायेगी..आज उसी सुकेस को बचाने के लिए उसने अपनी जान दांव पर लगा दी…..मालती के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे….रोते हुए बडबडाती जा रही थी…..हमेशा मैंने उसका तिरस्कार किया….उसके जगह मुझे मर जाना चाहिए था .      

 

 

 

 

 

 

आज धनलक्ष्मी के  प्रति सारी  कड़वाहट उसके आंसुओ के साथ बह निकली…….लेकिन अब क्या अब तो सब कुछ खत्म हो चुका था….वाह रे नसीब …..हमेशा तिरस्कार सहती बिटिया मरने के बाद प्यार पा रही थी.      

 

 

 

 

3- एक नगर में एक बहुत ही प्रभावशाली, पहुंचे हुये साधू रहते थे. उनके पास शिक्षा लेने के लिए बहुत से शिष्य आते थे. एक दिन एक शिष्य ने उन महाराज से कहा ‘ महाराज आपके गुरु कौन है ?      

 

 

 

आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है ? ‘ महंत शिष्य की बात सुन मुस्कुराए और बोले ‘ मेरे हजारों गुरु हैं. यदि मैं उनके नाम गिनाऊं तो महीनों लग जायेंगे फिर भी मैं अपने तीन गुरुओं के बारे में अवश्य बताऊंगा.        

 

 

 

एक चोर था. एक बार मैं कहीं जा रहा था और रास्ता भटक गया. चलते – चलते मैं दूर एक गांव में पहुंचा. तब तक बहुत देर हो गयी थी. सारी दुकाने बंद हो गयी थी.      

 

 

 

 

अन्धेरा हो गया चुका था. कहीं पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था. आखिरकार मुझे एक आदमी मिला , जो कि एक दुकान में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था.      

 

 

 

मुझे देख कर वह चौंक गया, लेकिन शायद मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था और उससे पूछा कि मैं कहा रह सकता हूँ, क्या यहाँ पर कोई  रहने या ठहरने की जगह है ?    

 

 

 

इस पर वह बोला रात काफी हो चुकी है . इस समय आपको कहीं आसरा मिलना मुश्किल है, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हैं. लेकिन मैं एक चोर हूँ.      

 

 

 

वह इतना प्यारा आदमी था कि मैं उसके साथ एक महीने तक रहा . वह हर रात मुझे कहता कि मैं अपने काम पर जाता हूँ , आप आराम करो, प्रार्थना करो.      

 

 

 

जब वह काम से वापस आता तो मैं उससे पूछता कि ब्कुछ मिला तुम्हें ? तो इस पर वह कहता नहीं, आज तो कुछ नहीं मिला….लेकिन अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा.      

 

 

 

Story in Hindi

 

 

 

इससे मुझे एक ताक़त मिली . ‘ जब मुझे ध्यान करते हुए सालों – साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था ऐसे कई बार ऐसे क्षण आते थे जब बिलकुल हताश और निराश हो जाता था और मेरे मन में नकारात्मक ख्याल आते, तब उस चोर की बात याद आती कि भगवान जरुर ही मेरी तपस्या का फल देंगे.      

 

 

 

 

मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था. गर्मी के दिन थे. भीषण गर्मी पड रही थी. मैं पानी तलाश में इधर – उधर घूम रहा था. तभी एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया. वह भी प्यासा था.      

 

 

 

आगे एक नदी थी. उस कुत्ते ने पास जाकर नदीं में झाँका तो उसे एक और कुत्ता नजर आया , जो कि उसकी परछाई थी. वह परछाई देख भौकता और पीछे हट जाता.      

 

 

 

 

अंततः वह डर के बावजूद नदी में कूद पड़ा और उसके साथ ही उसकी परछाई भी खत्म हो गयी. इससे मुझे यह सीख मिली की ” डर के आगे जीत है. “सफलता उसे ही मिलाती है जो डर का साहस के साथ मुकाबला करता है.      

 

 

 

 

मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा था. मैं एक गाँव से गुजर रहा था तो देखा कि एक छोटा बच्चा जलती हुई मोमबत्ती पास के गिरिजाघर में लेकर जा रहा था.      

 

 

Moral Story in Hindi हिंदी नैतिक कहानी 

 

 

 

मजाक में मैने पूछा कि यह मोमबत्ती आपने जलाई ? तो उसने कहा हाँ , मैंने जलाई. तब मैंने उससे कहा कि एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और दूसरा एक क्षण था जब मोमबत्ती जल चुकी थी , तो क्या तुम वह स्रोत दिखा सकते हो, जहां से यह ज्योति आई?  

 

 

 

 

इस पर वह बच्चा जोर से हंसा और मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझाते हुए बोला क्या आपने ज्योति को जाते हुए देखा ? क्या आप बता सकते हैं कि वह ज्योति कहा गयी ? आप ही मुझे बताये. ‘ मेरा अहंकार चकनाचूर हो चुका था.      

 

 

 

मेरा ज्ञान जाता रहा और उस क्षण मुझे मेरी अज्ञानता का एहसास हुआ.’ यही मेरे तीन गुरु थे, जिनके वजह से मैं बहुत कुछ सीख सका. अगर आप सिखाना चाहो तो हर किसी से शिक्षा ले सकते हैं. बस उसके अवगुणों को छोड़ना और उसके गुणों को खुद में समाहित करना होगा.

 

 

 

 

४- संत कबीर रोज सत्संग करते थे. उसमें बहुत सारे भक्त आते थे और उसको अमल करके अपने जीवन को सफल बनाते थे. एक दिन की बात है रोज की तरह ही संत कबीर प्रवचन दे रहे थे.

 
 
 
 
 
 
सत्संग के खत्म होने पर सभी भक्त गण अपने अपने घरों की ओर चल दिए, लेकिन एक व्यक्ति वहीँ बैठा रहा. जब कबीर ने उससे पूछा कि क्या हुआ, क्यों परेशान हो… सभी लोग चले गए लेकिन तुम क्यों नहीं गए…किस बात की परेशानी है.
 
 
 
 
 
 
 
 तब उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे आपसे कुछ पूछना है. मैं एक गृहस्थ हूँ. घर में हमेशा ही आपस मीन झगडा होता रहता है जिससे घर का माहौल हमेशा ही ख़राब रहता है. मैं आपसे इसका हल जानना चाहता हूँ कि कैसे इसे सुलझाया जा सके.
 
 
 
 

हिंदी शिक्षाप्रद कहानियां 

 
 
 
 

कबीर जी कुछ समय तक शांत रहे. फिर उसके बाद अपनी पत्नी को कहा की लालटेन जलाकर लाओ. इस पर कबीर की पत्नी ने लालटेन जलाकर ले आयीं. इस पर वह आदमी एकदम से हैरान रह गया की इस भरी दोपहरी में कबीर जी ने लालटेन क्यों मंगवाई.  

 

 

 

 

इसके बाद संत कबीर ने अपनी पत्नी से कहा कि कुछ मीठा लेकर आओ. इसपर उनकी पत्नी ने मीठे की जगह नमकीन लाकर दे दिया . इस पर उस आदमी ने मन ही मन कहा कि कैसे लोग हैं मीठे के बदले नमकीन और दिन में यहाँ तक की भरी दोपहर में लालटेन.  

 

 

 

इस पर उस आदमी ने खीझकर कहा कि यह सब क्या है. मैं तो अपनी समस्या के समाधान के लिए यहाँ आया था और आपने यह सब दिखा दिया .      

 

 

 

 

इससे तो मैं और भी परेशान हो गया. इस पर संत कबीर मुस्कुराए अकुर कहा कैसे ही मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी पत्नी कह सकती थी की तुम्हें हो क्या ग्या है भरी दोपहरी में लालटेन मगवां रहे हो, लेकिन उसने कुछ नहीं.        

 

 

 

 

चुपचाप लालटेन लाकर रख दी. उसी तरह जब मैंने मीठा मंगवाया तो उसने नमकीन ला दी तो मैं यह सोचकर चुप रहा कि हो सकता है घर में कोई मीठा ना हो.        

 

 

 

 

 

अब वह व्यक्ति सबकुछ समझ गया. कबीर ने कहा गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है. आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और जब औरत से गलती हो तो आदमी संभाल ले. यही गृहस्थी का मूल मन्त्र है.      

 

 

 

 

५- वैसे तो मित्रता पर आज तक बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन आज के कलयुग के समय में इसे बार बार रिफ्रेश करने , पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है.      

 

 

 

 

जीवन के सबसे सुन्दर, सबसे सुखद और सबसे प्यारे रिश्ते मित्रता के बारे में इंसान या तो निशब्द रहकर इसके सुखद एह्सास की गहराईयों ण खोया रहता है और यदि बोलता है तो ऐसे बोलता है कि थामे का नाम ही नहीं लेता है. क्योकि यह रिश्ता है ही ऐसा सुखद और सलोना कि इस पर अपने भाव और विचार  अभिव्यक्त करने वाला कभी थकता ही नहीं है.        

 

 

 

मित्रता किसी प्रयोजन से या आयोजन से नहीं होती है, यह तो बस हो जाती है. इस दुनिया में जितने भी रिश्ते उदात्त भावों से जुड़े हैं , वे स्वयं घटित हुए हैं , कभी प्रायोजित नहीं किये गए. दुनिया के अन्य रिश्ते भी जैसे माँ-बेटी, मां बेटा, पिता – पुत्री, पिता – पुत्र, भाई -बहन, पति – पत्नी जब मित्रता के भाव में उतर जाते हैं तो बड़े गरिमामय और महिमामय हो जाते हैं.        

 

 

 

 

दो व्यक्तियों का एक -दुसरे के प्रति संवेदना , सम्मान, प्यार, समान प्रवृति, समान सोच, समान नजरिया, सामान प्रतिक्रया यह सब मिलकर मित्रता को जन्म देती है.        

 

 

 

ये सारे विन्दु मित्रता को फुल की तरह पंखुड़ी दर पंखुड़ी विकसित करते और महकाते चले जाते हैं. जब दो लोगों के बीच मित्रता अ बिज पड़ता है तो पता ही नहीं चलता है कि इसका बीजारोपण कब हुआ, कब इसकी कोपलें फूटी, कब वह फुल बना कब वह महका, कब वह मीठे भावों से तरंगायित हुआ , कब मधुर संगीत सी उसमें समाहित हुई.        

 

 

 

 

बस एक पावन और मनभावन प्रक्रिया के तहत यह सब घटित होता जाता है और एक दिन दो लोग अपने को , एक दुसरे के सबसे अच्छे मित्र की रूप में पाते हैं.    

 

 

 

६- एक्सीडेंट के पश्चात जब मेरी आँख खुली, तो मैंने अपने आपको एक बिस्तर पर पाया. इर्द-गिर्द कुछ परिचित अपरिचित चहरे खड़े थे.मेरी आँख खुलते ही उनके चहरे पर उत्साह व प्रसन्नता की लहर दौड़ पड़ी. मैंने कराहते हुए कहा “मैं कहां हूँ ”        

 

 

 

“आप सरकारी अस्पताल में हैं आपका एक्सीडेंट हो गया था. घबराने की कोई बात नहीं है, केवल पैर ही फैक्चर हुआ है” एक चहरे ने बड़ी ही तेजी से जवाब देता है, जैसे वह मेरे होश में आने का ही इन्तजार कर रहा था.        

 

 

 

Hindi Kahani हिंदी की कहानी 

 

 

 

 

अब मैं अपनी टांग की ओर देखता हूं तो एक टांग तो अपने जगह सही सलामत थी और दूसरी टांग रेती की थैली के साथ एक स्टैंड के सहारे लटक रही थी. मेरे दिमाग में नये मुहावरे का जन्म हुआ. ” टांग टूटना ” अर्थात सरकारी अस्पताल में कुछ दिन मर-मरकर जीना .  

 

 

 

सरकारी अस्पताल का नाम सुनते ही मैं तो काँप उठा. वैसे तो अस्पताल ही एक खतरनाक आइटम है ऊपर से सरकारी तो समझो आत्मा से परमात्मा का सीधा मिलन.    

 

 

 

अब मुझे यह बात समझ आ चुकी थी कि टांग टूटना तो एक घटना थी, दुर्घटना तो सरकारी अस्पताल में भर्ती होना है. टांग टूटने से ज्यादा फ़िक्र मुझे उन लोगों की हुई, जो हमदर्दी जताने मुझसे मिलने आये थे.      

 

 

 

 

ये मिलने वाले कभी कभी इतने ज्यादा आते हैं और कभी-कभी इतना परेशान करते हैं कि मरीज का आराम हराम हो जाता है, जिसकी मरीज को खास जरुरत होती है.      

 

 

 

 

अब सबसे पहले मिलने वे आये जिनकी टांग टूटने मे मैं गया था..मानो वे भगवान से प्रार्थना ही कर रहे थे कि इसकी भी टांग टूटे और हम इस ऋण से मुक्त हों.      

 

 

 

 

दर्द के मारे मरीज की वैसे ही हालत खराब होती और उसकी रही सही कसर ये लोग जगाकर पूरी कर देते हैं. अब मैंने सोचा कि कोई भी अगर देखने आता है तो मैं आँख नहीं खोलूँगा और चुपचाप पडा रहूँगा.      

 

 

 

 

कुछ समय के बाद मेरे गाव के बब्लू चचा आये और बोले बेटा कैसे हो….अब कैसा लग रहा है. लेकिन मैं चुप रहा….अपने अपनी सोच पर अटल रहा…मैं यह सोच ही रहा था कि चचा कुछ देर बाद यह सोच कर चले जायेंगे कि मैं सो रहा हूँ कि उतने में ही चाचा ने मेरे पैर के टूटे हुए हिस्से को जोर से दबाया.        

 

 

 

 

मैं उससे भी दोगुने जोर से चिल्लाते हुए आँख खोली ……बेटा कैसे हो…बब्लू चाचा ने कहा…..अब ऐसे हमदर्दों से तो भगवान ही बचाए , यह सोचते हुए मैंने कहा ” ठीक ही हूँ ”   जब तक मैं हास्पिटल में रहा..इस तरह के हमदर्दों का दर्द को सहता रहा. खैर इस दर्द में भी प्यार था, अपनापन था.                    

 

 

 

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