hindi moral story

Moral Stories in Hindi . हिंदी की १३ प्रेरक कहानियां . जीवन बदलने वाली कहानी

moral stories in hindi
Written by Abhishek Pandey

moral stories in hindi  इस पोस्ट में  १३  कहानियां दी जा रही हैं.  मुझे उम्मीद है कि यह सभी hindi kahaniya आपको जरुर पसंद आयेंगी. यह कहानियां इस प्रकार है .    

 

 

 

1- पत्थर के सिक्के    

 

 

2- बकरी की कहानी  

 

 

3 – जिंदगी का सबक  

 

 

4- अहंकार का नाश  

 

 

5- बुद्धिमान सियार 

 

6- किसान की सीख

 

7- जीवन का गणित 

 

8- तिरस्कार 

 

9- दुनिया का सुख 

 

10- तीन गुरु 

 

11- संत कबीर का सुझाव 

 

12- मित्रता एक समर्पण 

 

13- हमदर्दों का दर्द 

 

१- रामप्रताप और श्यामप्रताप नाम के मित्र थे. दोनों बहुत ही परम मित्र थे. अपने हर सुख दुःख को आपस में बात लेते थे. वे उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके थे जहां प्यार, स्नेह , सम्मान मिलना बहुत म लोगों को नसीब होता  है.      

 

 

 

रामप्रताप ने तो जवानी के दिनों में कुछ पैसे  रख  थे जिसके लालच में उसकी सेवा हो  थी …..लेकिन शामप्रताप ने जवानी के दिनों में खूब पैसे  उडाये ….उसने पैसे नहीं बचाए …फलस्वरूप उसका बुढापा कष्टों से कट रहा था.  

 

 

 

पैसों के कारण रामप्रताप की परिवार पर पूरी पकड़ थी..वहीँ श्यामप्रताप की स्थिति ठीक उसके विपरीत थी…किसी ने ठीक ही कहा है की जैसा पेड़ बोवोगे..वैसा ही फल खाओगे.

 

 

 

यह कहावत आज श्यामप्रताप पर चरितार्थ हो रही थी. इससे श्यामप्रताप बहुत दुखी रहने लगा था. जब बहु और बेटे उसी ताना मारते तो उसका दुःख और भी बढ़ जाता.

 

 

 

एक दिन जब दोनों मित्र मिले तो दोनों ने अपनी सुख दुःख कही….श्यामप्रताप की स्थिति पर रामप्रताप को बड़ा दुःख हुआ….उसने कहा कि मैं तुम्हे पहले भी समझाया था कि बुढ़ापे के लिए कुछ पैसे रख लो , लेकिन तुमने मेरी एक ना सुनी लो अब भुगतो.        

 

 

 

 

 

भैया रामप्रताप अब जो होना था वह तो हो गया….अब कुछ उपाय बताओ…अब और सहा नहीं जाता….श्यामप्रताप बहुत ही दुखी होकर बोला .        

 

 

 

 

एक काम करो…कुछ पत्थर के सिक्के इकठ्ठा कर लो…राम प्रताप बात पूरी   करता कि श्याम्प्रताप ने उसे टोकते हुए कहा पत्थर के सिक्के इसका क्या तात्पर्य है.        

 

 

 

 

अरे तुम एक काम करो कुछ छोटे छोटे पत्थर ले लो और उसे  रात को किसी बरतन में रखकर खनखनाया  करो….इससे तुम्हारे बहु बेटे समझेंगी कि तुम्हारे पास बहुत सारे सिक्के हैं. फिर वी तुम्हारी सेवा करेंगे और हर कहा मानेंगे.        

 

 

 

श्यामप्रताप ने वही किया और उसकी तक़दीर बदल गयी. जब वह रात को पत्थर के सिक्के को बरतन में रखकर बजाया तो उसकी बहु को विश्वास नहीं हुआ…वह दौड़कर अपने   पति के पास  और साड़ी बात बतायी .        

 

 

 

इस पर उसके   विश्वास नहीं हुआ तो श्यामप्रताप की बहु ने कहा कि चलो खुद ही सुन लो कि ससुर जी  पैसे गिन रहे हैं कि नहीं…..जब वह पति के साथ आई तो वैसी ही आवाज आ रही थी….यह सुनकर श्यामप्रताप के बेटे ने आवाज लगाईं ” बाबूजी “.      

 

 

 

 

ठीक उसी समय श्यामप्रताप नेपत्थर के सिक्के गिनना बंद कर दिया और सोने  का नाटक    करने लगा. अब तो उसके बेटे और बहु को यह विश्वास हो कि श्यामप्रताप के पास पैसा है. अब उसकी खूब सेवा होने लगी .          

 

 

 

 

एक बार जब वह बहुत बीमार पडा तो उसके बेटे ने अच्छे से दवा करवाई ….खूब सेवा की…लेकिन शायद श्यामप्रताप का समय खत्म हो गया था. वह इस दुनिया को छोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद एक दिन बहु बेटे ने सोचा कि चलो   देखते हैं कि बापू ने कितने पैसे रखे हैं.

 

 

 

 

आवाज तो बहुत आती थी…पैसे ज्यादा ही होने चाहिए….श्यामप्रताप की बहु मन ही मन खुश होते हुए सोच रही थी. दोनों ने पूरा कमरा छान मारा कही कुछ नहीं मिला…अचानक उसकी बहु की नजर चारपाई के निचे रखे बर्तन पर गयी.        

 

 

 

 

वह ख़ुशी से चीखी मिल गया पैसा और जब उसने उस बरतन के ढक्कन को हटाया तो देखा की उसमे तो पत्थर रखे थे   …..उसे एक पल के लिए विश्वास नहीं हुआ.वे वही एकदम से बैठ गए. इसी पत्थर के सिक्के कारण श्यामप्रताप का बुढ़ापा आराम से कट गया.        

 

 

 

 

२- एक बार की बात है. एक किसान था. उसने ढेर सारी बकरियां पाल राखी थी. यही उसका व्यापार था. उसके घर के सामने दो कुआं था. एक कुएं में पानी था, जबकि एक कुआं सुख गया था.        

 

 

 

 

वे दोनों ही कुए थोड़ी ही दूर पर थे.  वह दिनभर बकरियों को चराता और फिर घर लौटने पर उसी कुएं से पानी निकाल कर बकरियों को पिलाता था.      

 

 

 

 

उनमें से एक बकरी बहुत ही नटखट थी. एक बार की  बात है सभी बकरियां चर कर आई और उसके बाद किसान से उन्हें पानी पिलाया, लेकिन उस नटखट बकरी ने पानी ना पीकर सूखे कुएं में ही छलांग लगा दी.        

 

 

 

 

अब कुएं में गिरते ही उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम  हो गयी. वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी. उसे लगा था कि वह आराम से इसमें से पानी पीयेगी.

 

 

 

 

अब किसान को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उसने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका. तब उसने गांव के अन्य लोगों को बुलाया, सभी ने तमाम कोशिशें कीं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.        

 

 

 

 

उधर बकरी गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही थी. उसकी इस हालत से किसान को बहुत दर्द हो रहा था. अंत में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि इस कुएं में मिटटी डालकर बकरी को दफना दिया जाए, जिससे उसे इस पीड़ा से मुक्ति मिले. अब वही किया जाने लगा.        

 

 

 

 

अब जब बकरी ने देखा कि यई लोग उसे दफना रहे हैं तो उसके होश उड़ गए. उसने चिल्लाना बंद कर दिया और उसके ऊपर जीतनी बार मिटटी डाली जाती वह उसे झाड़कर उसके ऊपर खड़ी हो जाती .        

 

 

 

 

बकरी की चालाकी  काम आने लगी. कुछ ही देर में वह काफी ऊपर आ गयी और फिर वह कूदकर कुएं से निकल गयी…इस तरह बकरी ने अपनी चालाकी से अपनी जान बचा ली.      

 

 

 

Moral :- जीवन में कितनी भी परेशानी आ जाए, कभी हार नहीं माननी चाहिए. अंतिम समय तक लड़ाई लड़नी चाहिए.        

 

 

 

 

3- राहुल, विवेक, विनोद तीनो बहुत ही गहरे मित्र थे. तीनों की दोस्ती की चर्चा पुरे गांव के साथ-साथ दूसरों गांव में होती थी. तीनों गहरे मित्र के साथ ही निठल्ले  भी थे.      

 

 

 

कुछ भी काम धंधा नहीं करते थे…तीनों की आदत एक बराबर थी…यूँ कह लो कि तीनों एक दुसरे से बढ़कर थे.इसीलिए इनकी खूब जमती थी.एक दिन तीनों दोस्त मेला देखने गए.        

 

 

 

 

मेले से लौटने काफी रात हो गयी…लेकिन इन्हें कोई भी फर्क नहीं था…ये तीनों अपनी ही मस्ती में चले आ रहे थे. इन्हें विश्वास था कि इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, लेकिन शायद आज होनी को कुछ और ही मंजूर था.        

 

 

 

 

“तुम तीनों रुको…इतनी रात को कहाँ जा रहे हो” एक कड़क आवाज़ गूंजी.       तीनो ठिठक गए और पीछे मुड़कर देखा तो ७ लोग हथियार के साथ खड़े थे…कुछ ही देर में उन लोगों ने इन तीनों को घेर लिया.      

 

 

 

 

ये लोग तीन…वो लोग ….माहौल को देखते हुए विवीक ने डराने का अभिनय करते हुए साड़ी बात बता दी और कहा कि हमें छोड़ दो…जाने दो.      

 

 

 

ऐसे कैसे जाने दूं..तुम लोगों के पास जो कुछ भी है तुरंत निकालो…उन ७ आदमियों से एक ने गरज कर कहा.       लेकिन हमारे पास तो कुछ नहीं है….आपको विश्वास ना हो तो आप तलासी ले सकते हो…..विनोद ने कहा.        

 

 

 

 

चुप….एकदम चुप…मुझे पता है …..तुम भिखारियों के पास कुछ नहीं है….तुम्हे यह पैकेट गाँव के लास्ट में पीपल के पेड़ के निचे रखना है.,,,उन ७ में से एक आदमी ने कहा.      

 

 

 

ले..लेकिन इनमें क्या है….विनोद हकलाते हुए कहा.      

 

 

 

सवाल नहीं…..तुम्हे सिर्फ यह पैकेट वहाँ रखना है….और हाँ कोई चालाकी नहीं….मुझे तुम लोगों के सारे काले कारनामे पता है….उनमे से एक ने कहा.        

 

 

 

नहीं..हम नहीं रखेंगे…..पहले बताओ इसमें क्या है…विवेक ने थोड़ी ढीठता से कहा.         ठीक है फिर…आज तुम लोग मेला गए थे न…लेकिन मेले में तुमने क्या किया उसका नमूना दिखाऊं ….. ओये दिखा तो फोटो इसे….उन ७ में से  एक ने दुसरे को कहा.        

 

 

 

 

कहते ही मोबाइल से फोटो दिखाई देने लगे….कि किस तरह ये तीनों लोगों को परेशान कर रहे थे…कुछ सामन भी चुरा रहे थे …..अब तो इन तीनों के पैरों तले जमीं खिसक गयी….मरता क्या न करता…उन्होंने हां कह दिया और पैकेट्स लेकर चल दिए.        

 

 

 

 

आज ये तीनों बहुत ही बुरी तरह फंस गए थे….. इनका दिमाग चक्करघिन्नी हो गया था…इनकी समझ में  कुछ नहीं आ रहा था…ये तीनों चुपचाप चल रहे थे…कि इतने में पुलिस की गाडी आती दिखी….अब तो बेचारे और भी बुरी तरह फंस गए…..कुछ ही पल में पुलिस की गाडी इनके पास आकर रुकी…..ये तीनों थर-थर कापने लगे.          

 

 

 

 

 

कहां से आ रहे हो तुम लोग..कौन सा गांव है तुम लोग का….इतनी रात को कहा गए थे….इन पैकेट्स में क्या है…..पुलिस सिपाही की रौबदार आवाज़ में इतने सारे सवाल सुनकर तीनों की बोलती बंद हो गयी.      

 

 

 

 

क..क..कुछ नहीं साहेब..बस थोड़ा सामान है…राहुल ने हकलाते हुए कहा.       दिखाओ…पैकेट्स दिखाओ कहकर सिपाही ने पैकेट्स उनके हाथ से छीन लिया….अब तो इनकी जान आफत में आ गयी….अब जैसे ही सिपाही ने पैकेट्स को तो सभी अवाक रह गए….उन पैकेट्स में मिटटी थी.        

 

 

 

 

अब सिपाही गुस्सा हो गया…..कहा तुम लोग पुलिस का मजाक उडाते हो.         रहने दो साहेब….इनके किये का दंड इन्हें मिल गया है….अब यह अवश्य ही सुधर जायेंगे….इन पैकेट्स को हम लोग ही दियी थे….इन लोगों की रात भर घुमने की आदत छुड़ाने के लिए.        

 

 

 

 

इन्हें शर्म नहीं आती ये निठल्लों जैसे घुमाते रहे हैं…..इन तीनों लोग राहूल, विवेक और विनोद ने जब पीछे मुड़कर देखा तो वही ७ लोग खड़े थे…लेकिन अब सभी के चेहरे सामने थे.        

 

 

 

 

उनमें से एक सरपंच और इन तीनों के पिताओं के अलावा गाँव के कुछ लोग थे….इन तीनों को अपनी गलती का एहसास हो गया….तीनों ने आगे से मेहनत करके कमाने की कसम खायी .फिर पुलिस ने भी इन्हीं हिदायत देकर छोड़ दिया…..अब ये तीनों मेहनत करके कमाने लगे…इन्हें सबक मिल गया था.        

 

 

 

 

४- जानती हो हमारे सामने किसी की हिम्मत नहीं होती है कि हमसे बात करे.  हमसे ही बड़े-बड़े राजाओं को सम्मान मिलता है. हमसे ही पुरे देश की सुरक्षा होती है.

 

 

 

हम  जिसके साथ नहीं रहे वह समर में एक मिनट भी ठहर नहीं सकता है, ऐसी ही ना जाने कितनी खूबियाँ हैं मुझमें. अगर मैं अपनी पूरी खूबी गिनाने लागु तो एक छोटी सी किताब बन जायेगी….तलवार ने बड़ी ही रौबदार आवाज में अहंकार में  सुई से कहा.

 

 

 

अब सुई बेचारी क्या करती, वह चुपचाप तलवार की धौंस सुन रही थी. इतने में डमरू ने “डम-डम” की अपनी मधुर आवाज में बोला कि तलवार कहती तो तुम ठीक हो, लेकिन तुम अपने घमंड और अहंकार में चूर हो.

 

 

 

क्या कभी यह सोचा है कि तुम जिस राजा-महाराजा के हाथ की शोभा बढ़ाती हो, तुम्हें देखकर बड़े से बड़े दुश्मन का कलेजा काँप जाता है…विजय तुम्हारे कदमों में रहती है.

 

 

 

 

लेकिन यहाँ तुम अपनो को ही धौंस दिखा रही हो…आपनो पर ही रौब झाड़ रही हो…..तुम्हें शर्म नहीं आती है…..यह सुनकर तलवार शर्म से झुक गयी और फिर बोली कि मैं आदत से मजबूर हूँ…मैं कभी भी जोखिम नहीं लेती…मैं किसी को भी ढील नहीं देती हूँ.

 

 

 

ओ सब ठीक है लेकिन यह लड़ाई का मैदान नहीं है ना….हमें हर किसी का सम्मान करना चाहिए…सबका अपना वजूद होता है…अपना महत्व होता है..इस दुनिया में कोई भी चीज बेकार नहीं होती है…हर कोई एक दुसरे से जुड़ा हुआ है….डमरू ने कहा.

 

 

 

 

ऐसा कुछ भी नहीं होता….जो कमजोर है वह बेकार है…तलवार ने घमंड से कहा.

 

 

 

वह तो समय ही बताएगा  कि कैसे तुम्हारे अहंकार का नाश  होता है…..डमरू ने मुस्कुराते हुये कहा.

 

 

 

 

यह सब बातें सुई के दिल पर लगी…उसने ठान लिया कि मौक़ा आने पर वह तलवार से इस अपमान का बदला अवश्य ही लेगी. उसके अहंकार का नाश  अवश्य ही होगा.

 

 

 

एक दिन राजा के पांव में काँटा चुभ गया…बहुत कोशिशे की गयीं लेकिन वह नहीं निकला….राजा दर्द से छटपटा रहा था. राजा ने तुरंत ही सुई मंगवाई , लेकिन यह क्या सुई ने अपना मुंह टेढा कर लिया….जिससे काँटा नहीं निकल सका….राजा दर्द से तड़प रहा था.

 

 

 

 

यह देख कर तलवार को बहुत तकलीफ हुई….लेकिन वह कुछ कर भी नहीं पा रही थी. तब राजा ने सुई से पूछा कि क्या हुआ है…ऐसी क्या बात है जो तुम गुस्सा हो गयी हो.

 

 

 

तब डमरू ने साड़ी बात राजा को बता दी….फिर राजा ने तलवार को बहुत डांटा और उसे त्याग देने की धमकी दी….फिर तलवार ने हाथ जोड़कर सुई से क्षमा मांगी और कहा कि सही बात है इस संसार में कोई भी चीज बेकार नहीं है.

 

 

 

उसके बाद सुई ने राजा का कांटा निकाल दिया…सुई को अपना सम्मान मिल चुका था और तलवार को भी सीख मिल गयी थी कि हर काम हर कोई नहीं कर सकता है.

 

 

 

 

५- एक जंगल में एक शेर रहता था…. उम्र बढ़ जाने की वजह से उसे कही आने जाने में परेशानी हाेती थी…जिससे वह शिकार नहीं कर पाता था… छाेटे छाेटे जानवर भी उसके आगे से गुज़र जाते लेकिन वह कुछ नहीं कर पाता.

 

 

 

वह भूक से व्याकुल हाेने लगा… तभी उसे एक उपाय सूझा… उसने पूरे जंगल में घाेषणा करवा दी कि इतने दिनाे तक वह तप कर रहा था… इसीलिए उसने किसी जानवर काे नहीं मारा… वह भी तब जब जानवर उसके सामने से गुजर गये…. लेकिन अब उसका तप पुर्ण हाे गया है… उसके पास जादुई शक्तियां आ गयी हैं .
 
 
 
 
 
 
साे जंगल से एक जानवर राेज उसकी गुफा में आ जाये…. अन्यथा वह सभी जानवरों काे जादुई शक्ति से मार देगा… लेकिन सिर्फ छाेटे जानवर ही आयें… बडे़ जानवरों काे ना खाने की शपथ ली हेै.
 
 
 
 
 
 
उसके इस फरमान से जंगल में कोलाहल मच गया… एक ताे जंगल का राजा और जादुई शक्ति से उसके और बलशाली होने की खबर से जंगल में अफरा तफरी का माहौल हाे गया.
 
 
 
 
 
 
 
बड़े जानवर ताे इस बात से खुश हाे गये कि जंगल के राजा शेर ने उन्हें ना खाने की शपथ ली है….लेकिन छाेटे जानवराे की शामत आ गयी… इस परिस्थिति काे देख छाेटे जानवर पलायन करने लगे.
 
 
 
 
 
 
उनके पलायन की खबर सुनते ही सारे बड़े जानवरो ने तत्काल एक सभा का आयोजन किया….. आयाेजन में एकमत से पारित किया गया बड़े जानवर स्वयं छाेटे जानवरों काे पकड़ कर राजा शेर तक पहुंचायेंगे…. नहीं तो छाेटे जानवरों के पलायन के बाद राजा शेर के क्रोध का प्रकाेप हम बड़े जानवराे काे सहना पड़ सकता है….साथ ही जान से भी हाथ धाेना पड़ सकता है.
 
 
 
 
 
 
अब इस डर से बड़े जानवर स्वयं छाेटे जानवराे काे पकड़ कर शेर तक पहुंचाने लगे…. शेर की याेजना काम कर गयी… वह मजे से बिना मेहनत किये राेज जानवराे काे मार कर खाने लगा और जानवराे के छाेटे हाेने से उसे काेई परेशानी नही हाेती थी…. वह खूब माेटा ताजा हाे गया…लेकिन कहते हैं न सबका दिन आता है.
 
 
 
 
 
 
 
 
अब एक दिन एक सियार का नम्बर आया… वह बहुत ही बुद्धिमान सियार था… जब एक बड़ा जानवर उसे शेर के पास ले जा रहा था.. ताे उस बुद्धिमान सियार ने एक बहाना बनाया.
 
 
 
 
 
 
उसने उस जानवर से कहा कि अब ताे मेरा मरना निश्चित है… और हर मरने वाले की आखिरी ख़्वाहिश पूरी की जाती है… साे आपसे निवेदन है कि मुझे थाेड़ा अपना पेट भर लेने दिजीये.
 
 
 
 
 
 
 
उसके बाद ताे भाेजन कभी नसीब में नही रहेगा… और महाराज शेर भी जब मुझे खायेंगे… ताे बढ़िया स्वाद मिलेगा… वह जानवर मान गया.
 
 
 
 
 
सियार आराम से भाेजन करने लगा और काफी देर बाद वापस आया… इधर देर हाे जाने की वजह से शेर भूक से व्याकुल हाे उठा था… उसे राेज ताजे खाने की आदत थी साे वह गुस्से में दहाड़ लगाने लगा.
 
 
 
 
 
 
जब बड़ा जानवर सियार के साथ वहां पहुंचा ताे शेर की दहाड़ से दूर जा छुपा…सियार काे गुफा के द्वार पर खड़ा देख शेर ने क्रोध से कहा.. दुष्ट सियार कहा रह गया था… आने में इतनी देर क्याें लगा दी… आज मैं तुझे ठीक वैसे ही तड़पा कर खाउंगा जैसे मैं भूक से तड़पा हूं.
 
 
 
 
 
 
 
तब सियार ने विनम्रता से कहा हे महाराज क्षमा करें… मैं समय से आ रहा था… भला काेई आपके आदेश की अवहेलना कर सकता है भला…. वह ताे रास्ते में पड़ने वाले कुये के पास एक नया शेर आया है.. उसने मुझे राेक लिया.
 
 
 
 
 
 
 
उसने गुस्से में से पूछा कहा जा रहा है… ताे मेरे साथ वाले बड़े जानवर ने सारी बात बता दी… इसपर वह शेर बहाेत क्रोधित हाे गया.. और उसने बड़े जानवर काे वहीं मार डाला… आप देख सकते हाे कि मेरे साथ काेई बड़ा जानवर नही है… जब शेर ने बाहर झांककर देखा ताे बात सही थी.
 
 
 
 
 
सियार ने गरम लाेहे पर फिर हथाैड़ा मारा… उसने कहा महाराज कल से काेई जानवर यहा नही आयेगा… उसने मुझसे कहा कि जाकर कह दे कि कल से जानवराे काे मै खाउंगा… महाराज आज मुझे खाकर भूक शांत कर लें कल से ताे आपके नसीब में कुछ नहीं है.
 
 
 
 
 
 
 
इसपर शेर ने क्रोध में भरकर कही कि चल बता कहा है वह शेर आज मै सर्वप्रथम उसे मारुंगा… तब मेरा भूक शांत हाेगी… शेर और सियार दाेनाे कूयें की तरफ चल दिये… उन्हें साथ जाता देख झाड़ियों में छुपे हुये बड़े जानवर काे बड़ा आश्चर्य हुआ… वह भी धीरे धीरे छुपकर उनके पीछे चल दिया.
 
 
 
 
 
 
कूयें पर पहुंच कर सियार ने कहा महाराज इसी कूये मे बैठा है वह शेर.. आप कूयें में दहाड़ लगाइये… तब वह आयेगा…. जैसे ही शेर ने कूयें में दहाड़ लगायी… उसकी परछाई ने भी दहाड़ लगायी… इसपर शेर काे गुस्सा आ गया और उसने कूयें में छलाँग लगा दी…. छपाक और खेल ख़त्म.
 
 
 
 
 
 
वह कूयें मे से बचाने की गुहार लगाता रहा और कुछ देर बाद आवाज़ बंद हाे गयी…. इधर बडे़ जानवर ने जंगल में आकर सारी कहानी बता दी… सारे वन में उत्सव मनाया जाने लगा….और सियार का खूब स्वागत सत्कार किया गया…. इस तरह बुद्धिमान सियार ने खुद के साथ कइयाें की जान बचा ली.
 
 
 
 
 

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६- शीतलहर चल रही थी. मंगलवार का दिन था. मीलों चलकर एक किसान मंदिर पहुंचा तो देखा कि दरवाजा बंद था. किसान ने ऊँची आवाज लगाई ” अरे कोई है.पुजारी जी कहा हो ?”

 

 

 

 

पुजारी जी बाहर आये तो किसान को देखकर हैरान थे. वे बोले ” आज ठण्ड बहुत अधिक थी. मुझे तनिक भी भी उम्मीद नहीं थी कि आज कोई प्रार्थना के लिए आएगा. अतः मैंने कोई तैयारी नहीं की.केवल भगवान की धूप अगरबत्ती ही दिखाई.”

 

 

अब तुम ही बताओ केवल एक आदमी के लिए इतना सबकुछ तैयारी करना ठीक रहेगा क्या ? क्यों ना आज हम बाकी पूजा रहने दें और घर जाकर आराम करें.

 

 

 

इसपर किसान बोला ” पुजारी जी ! मैं तो एक साधारण  किसान  हूँ. मैं रोज कबूतरों को दाना खिलाने आता हूँ . अगर एक भी कबूतर होता है तो भी मैं दाना जरुर खिलाता हूँ.”

 

 

 

 

पुजारी जी यह बात सुनकर थोड़े शर्मिंदा हुए और मन ही मन भगवान से क्षमा मांगी और तैयारी में लग गए. पूरा मंदिर साफ किया. आरती की थाली सजाई. प्रसाद तैयार किये.

 

 

 

अन्य पूजा के सामान तैयार करने के बाद पुरे विधि-विधान से पूजा की. इस सबमें २-३ घंटे का समायी लग गया. पूजा खत्म होने के बाद पुजारी जी ने किसान कर्त्तव्य का भान कराने के लिए धन्यवाद दिया.

 

 

 

इसपर किसान  कुछ नहीं बोला और चुपचाप वहाँ से जाने लगा. इसपर पुजारी जी बोले ” क्या हुआ, पूजा में कोई कमी रह गयी है क्या ?”

 

 

 

 

 

इसपर किसान बोला ” मैं क्या बताऊँ पुजारी जी, मैं तो एक साधारण सा  किसान  हूँ. लेकिन जब मैं कबूतरों को दाना डालने आता हूँ और अगर एक ही कबूतर आता है तो मैं सारा दाना एक ही कबूतर को नहीं खिला देता हूँ. “

 

 

 

 

 

पुजारी जी को अपनी गलती का एहसास हो गया था कि सिर्फ कर्त्तव्य निभाना ही जरुरी नहीं है बल्कि परिस्थिति के हिसाब से खुद को ढालना भी आवश्यक है.

 

 

 

 

उन्होंने सोचा कि मुझे एक आदमी के हिसाब से ही तैयारी करके पूजा शुरू कर देनी चाहिए थी, जबकि मैं तमाम लोगों के हिसाब से तैयारी करने लगा.

 

 

 

 

७- एक बहुत ही प्रसिद्ध साधू थे. उनके प्रवचन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी. एक दिन उन्होंने देखा कि प्रवचन के समाप्ति के बाद भी एक मनुष्य बड़े ही निराश मन से वहाँ बैठा हुआ था.

 

 

 

जब साधू ने उसका कारण पुछा तो उस युवक ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. तब साधू ने उसे एक अन्य साधू के पास भेजा और कहा कि जाओ और उनकी दिनचर्या देखो. उससे ही तुम्हारी समस्या का निदान हो जाएगा.

 

 

 

जब वह युवक उन साधू के पास गया तो देखा वह एक सराय की रखवाली करते थे. उस युवक ने वहाँ रहकर कुछ दिन तक उनकी दिनचर्या को देखा लेकिन उसे कुछ खास नहीं दिखा .

 

 

 

 

वह साधू एकदम शांत और साधारण थे. उनमें कोई ज्ञान के लक्षण भी नहीं दिखाई पड़ते थे. हाँ, उनका व्यवहार शिशु जैसा निर्दोष और निर्मल था ….इसके अतिरिक्त उनकी दिनचर्या में कुछ और खास नहीं था.

 

 

 

 

उस युवक ने उन साधू की पूरी दिनचर्या देखि लेकिन रात्री में सोने से पहले और सुबह जागने के बाद वह साधू क्या करते थे , वह उसे ज्ञात नहीं था.

 

 

 

 

तब उसने उन साधू से इस बारे में विचार किया तो उन साधू ने कहा कि कुछ नहीं, रात्री को मैं सारे बर्तन माजता हूँ और चूँकि रात्री भर में थोड़ी बहुत धूल पुनः जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें पुनः धो देता हूँ. बर्तन गंदे व धूल भरे ना हों इसका ध्यान रखना अतिआवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूँ.

 

 

 

 

वह युवक इस साधू के पास से अत्यंत ही निराश होकर दुसरे साधू के पास लौटा और सारे बातचीत और घटनाक्रम को विस्तार से बताया. इस पर उन साधू ने कहा कि जो जानने योग्य था उसे तुम जान और सुनकर आये , लेकिन समझ नहीं सके. उनका कहने का अर्थ था कि रात्री तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह फिर से धो लो.

 

 

 

 

 

धीरे – धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. प्रत्येक मनुष्य एक दर्पण है . सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है, जो मनुष्य इस धूल को ज़मने देते हैं , वे दर्पण नहीं रह पाते हैं और जैसा स्वयं का दर्पण होता है वैसा ही स्वाभाव होता है, वैसा ही ज्ञान होता है . अतः अगर दर्पण अगर स्वच्छ होगा तभी विचार भी शुद्ध होंगे. अब युवक को सारी बात समझ में आ गयी थी.

 

 

 

 

८- वंश बेल तो लड़को से ही बढती है…..सदियों से निरंतर चलती आ रही इस सोच से बूढी मालती भी मुक्त नहीं हो पायी थी. जब उसकी बहु विमला ने बेटी को जन्म दिया तो उसे बड़ी ही निराशा हुई.

 

 

 

 

लेकिन उसने खुद को यह कहते हुए समझा लिया कि अभी कोई देरी नहीं हुई है. अपनी इस इच्छा को मालती ने जिद में बदल लिया. बहु दूसरी बार गर्भवती हो उसके पहले उसने पुजारी से ताबीज बनवाकर बहु और बेटे को पहना दिया.

 

 

 

डाक्टर्स के मना करने पर भी उसने बहु सी व्रत भी करवाए और खुद भी कई सारे व्रत किया. लेकिन  शायद प्रकृति ने भी जिद कर रखी थी…इस बार भी बेटी का ही जन्म हुआ.

 

 

 

 

इधर बेटी का जन्म हुआ और उधर मालती का भगवान,पूजा, पाठ से विश्वास ही उठ गया. अब उसकी जिद नफ़रत में बदल गयी थी. लेकिन वह जीतनी नफ़रत अपनी पोती धनलक्ष्मी से करती…..धनलक्ष्मी उतना ही अपनी दादी से प्यार करती…..मालती उसे अपने से दूर रखने का लेकिन जब तक धनलक्ष्मी उसके गोद में ना आ जाए..वह चुप ही न होती थी.इससे मालती और भी चिढती थी.

 

 

 

धीरे धीरे समय बीता और धनलक्ष्मी बड़ी होनी लगी…और उसकी साथ ही उसका नटखटपना भी बढ़ने लगा. …..वह हर बात पर जिद करती और अपनी दादी से ही उसे पूरा करवाने का भरपूर प्रयास करती…..हांलाकि यह बात अलग है कि वह अपने ज्यादातर प्रयासों में असफल ही रहती….उसकी इन हरकतों से तंग आकर मालती ने उसका नाम डायन रख दिया था. 

 

 

 

 

 

विमला तीसरी बार गर्भवती हुई…..इस बार मालती ने ना कोई मन्नत मांगी..ना कोई पूजा पाठ करवाए..यहां तक की बहु को ज्यादा आराम भी दिया.

 

 

 

 

लेकिन इस बार चमत्कार हो गया….विमला ने पुत्र को जन्म दिया….आज तो मालती मानो ख़ुशी से पागल हो गयी थी….उसने खुद भाग भागकर पुरे गाँव में यह खबर दी.

 

 

 

आज पहली बार मालती ने धनलक्ष्मी को प्यार से देखा….पुरे गांव को दावत दी गयी…सब कुछ अच्छे से चलने लगा…लेकिन धनलक्ष्मी के प्रति मालती का व्यवहार उस दिन के अतिरिक्त कभी नहीं बदला.

 

 

 

वह अपने पोते सुकेस धनलक्ष्मी से दूर ही रखती थी…ठण्ड अपने बचपन में थी….गुनगुनी धूप खिली थी. विमला और उसका पति थोड़ी ही दूर खेतों में कुछ काम करने गए थे.

 

 

 

 

मालती ने सुकेस को बाहर चादर बिछाकर लिटा दिया था और वह उसके लिए दूध लेने चली गयी…तभी बगल में मौजूद झाड़ियों में कुछ सरसराहट की आवाज को सुनकर पास में खेल रही धनलक्ष्मी की नजर उस पर पड़ी.

 

 

 

 

उसने देखा कि एक नाग सुकेस की ओर बढ़ रहा है….धनलक्ष्मी ने आव देखा ना ताव तुरंत ही उस सर्प को वहाँ पास में पड़ी एक लकड़ी से भगानी लगी.

 

 

 

 

लेकिन एक छोटी सी नादान बच्ची उस नाग को कब तक रोक सकती थी…सांप से उसे डंस लिया और उसके पैरों से लिपट गया…..तब तक मालती वहां पहुंची और यह दृश्य देखकर उसकी चीख निकल गयी.

 

 

 

उसकी चीख सुनकर आस पास के लोग और खेतों में काम कर रहे मालती के बहु और बेटे भी दौड कर वहा पहुँच गए. तब तक धनलक्ष्मी बेहोश हो चुकी थी….सभी लोग उसे लेकर पास के दवाखाने भागे.

 

 

 

यह मर चुकी है…..डाक्टर ने उसकी नब्ज को टटोलकर देखने के बाद कहा.

 

 

 

 

ऐसे कैसे मर सकती है…..नहीं..डाक्टर आप झूट बोल रहे हैं….हे भगवान क्या हो गया…..मैंने कभी भी उसे प्यार से नहीं देखा….उससे दो शब्द भी प्यार से नहीं बोले.

 

 

 

 

जिस सुकेस को उससे छुपाती रही कि डायन है खा जायेगी..आज उसी सुकेस को बचाने के लिए उसने अपनी जान दांव पर लगा दी…..मालती के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे….रोते हुए बडबडाती जा रही थी…..हमेशा मैंने उसका तिरस्कार किया….उसके जगह मुझे मर जाना चाहिए था .

 

 

 

आज धनलक्ष्मी के  प्रति सारी  कड़वाहट उसके आंसुओ के साथ बह निकली…….लेकिन अब क्या अब तो सब कुछ खत्म हो चुका था….वाह रे नसीब …..हमेशा तिरस्कार सहती बिटिया मरने के बाद प्यार पा रही थी.

 

 

 

 

९- एक जंगल में एक कौवा रहता था. वह अपनी दुनिया में मस्त था. दिन भर जंगल में घुमता और फिर शाम को अपने घोसले में आकर आराम करता. सब कुछ अच्छे से चल रहा था.

 

 

 

 

एक दिन उसने एक हंस को देखा, तो उसके मन में इर्ष्या हुई कि हंस कितना सुन्दर है, एकदम सफ़ेद और मैं कितना काला. अब वह अपने जीवन से दुखी रहने लगा.

 

 

 

एक दिन की बात है कौवा निराश मन से हंस के पास गया  और सारी बात बता दी कि तुम तो दुनिया के सबसे सुखी पक्षी हो, तब हंस ने कहा नहीं ऐसी बात नहीं है पहले मैं भी ऐसा ही सोचता था , लेकिन जब मैंने तोते को देखा तो मेरी यह गलतफहमी दूर हो गयी.

 

 

 

तोता कितना रंग बिरंगा होता और. उसकी बोली कितनी ही मधुर होती है. अब कौवा और हंस तोता के पास गए और सारीबात का दी. तब तोते ने कहा कि नहीं भाई ऐसी बात नहीं है, मुझसे तो खुबसूरत सुन्दर मोर होता है. वही दुनिया का सबसे खुबसूरत पक्षी है.

 

 

 

अब तीनो कौवा, हंस और तोता मोर को मिलने गए. वहाँ उन्होंने सारी बात मोर से कह दी तो मोर बहुत ही निराश स्वर मीन कहा भाई हमें दुनिया की ख़ुशी कहा मिलती है.

 

 

 

 

हमें ही क्यों सच कहूँ तो सिर्फ कौवा ही असली सुखी पक्षी है. हम तीनों को तो इन्सान बंदी बनाकर अपने पास रख लेता है. सिर्फ कौवा ही आजीवन इस खुली हवा में स्वांस लेता है. आज़ादी से बड़ा सुख कुछ नहीं हो सकता है. इसके आगे दुनिया का हर सुख फीका हो जाता है.

 

 

 

 

१० -एक नगर में एक बहुत ही प्रभावशाली, पहुंचे हुये साधू रहते थे. उनके पास शिक्षा लेने के लिए बहुत से शिष्य आते थे. एक दिन एक शिष्य ने उन महाराज से कहा ‘ महाराज आपके गुरु कौन है ? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है ? ‘ महंत शिष्य की बात सुन मुस्कुराए और बोले ‘ मेरे हजारों हरु हैं. यदि मैं उनके नाम गिनाऊं तो महीनों लग जायेंगे फिर भी मैं अपने तीन गुरुओं के बारे में अवश्य बताऊंगा.

 

 

 

 

एक चोर था. एक बार मैं कहीं जा रहा था और रास्ता भटक गया. चलते – चलते मैं दूर एक गांव में पहुंचा. तब तक बहुत देर हो गयी थी. सारी दुकाने बंद हो गयी थी.

 

 

 

अन्धेरा हो गया चुका था. कहीं पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था. आखिरकार मुझे एक आदमी मिला , जो कि एक दुकान में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था.

 

 

 

मुझे देख कर वह चौंक गया, लेकिन शायद मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था और उससे पूछा कि मैं कहा रह सकता हूँ, क्या यहाँ पर कोई रहनी या ठहरने की जगह है ?

 

 

इस पर वह बोला रात काफी हो चुकी है . इस समय आपको कहीं आसरा मिलना मुश्किल है, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हैं. लेकिन मैं एक चोर हूँ.

 

 

 

वह इतना प्यारा आदमी था कि मैं उसके साथ एक महीने तक रहा . वह हर रात मुझे कहता कि मैं अपने काम पर जाता हूँ , आप आराम करो, प्रार्थना करो.

 

 

 

जब वह काम से वापस आता तो मैं उससे पूछता कि ब्कुछ मिला तुम्हें ? तो इस पर वह कहता नहीं, आज तो कुछ नहीं मिला….लेकिन अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा.

 

 

 

इससे मुझे एक ताक़त मिली . ‘ जब मुझे ध्यान करते हुए सालों – साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था ऐसे कई बार ऐसे क्षण आते थे जब बिलकुल हताश और निराश हो जाता था और मेरे मन में नकारात्मक ख्याल आते, तब उस चोर की बात याद आती कि भगवान जरुर ही मेरी तपस्या का फल देंगे.

 

 

 

मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था. गर्मी के दिन थे. भीषण गर्मी पड रही थी. मैं पानी तलाश में इधर – उधर घूम रहा था. तभी एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया. वह भी प्यासा था.

 

 

 

आगे एक नदी थी. उस कुत्ते ने पास जाकर नदीं में झाँका तो उसे एक और कुत्ता नजर आया , जो कि उसकी परछाई थी. वह परछाई देख भौकता और पीछे हट जाता. अंततः वह डर के बावजूद नदी में कूद पड़ा और उसके साथ ही उसकी परछाई भी खत्म हो गयी. इससे मुझे यह सीख मिली की ” डर के आगे जीत है. “सफलता उसे ही मिलाती है जो डर का साहस के साथ मुकाबला करता है.

 

 

 

मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा था. मैं एक गाँव से गुजर रहा था तो देखा कि एक छोटा बच्चा जलती हुई मोमबत्ती पास के गिरिजाघर में लेकर जा रहा था.

 

 

 

मजाक में मैने पूछा कि यह मोमबत्ती आपने जलाई ? तो उसने कहा हाँ , मैंने जलाई. तब मैंने उससे कहा कि एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और दूसरा एक क्षण था जब मोमबत्ती जल चुकी थी , तो क्या तुम वह स्रोत दिखा सकते हो, जहां से यह ज्योति आई?

 

 

 

इस पर वह बच्चा जोर से हंसा और मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझाते हुए बोला क्या आपने ज्योति को जाते हुए देखा ? क्या आप बता सकते हैं कि वह ज्योति कहा गयी ? आप ही मुझे बताये. ‘ मेरा अहंकार चकनाचूर हो चुका था.

 

 

 

मेरा ज्ञान जाता रहा और उस क्षण मुझे मेरी अज्ञानता का एहसास हुआ.’ यही मेरे तीन गुरु थे, जिनके वजह से मैं बहुत कुछ सीख सका. अगर आप सिखाना चाहो तो हर किसी से शिक्षा ले सकते हैं. बस उसके अवगुणों को छोड़ना और उसके गुणों को खुद में समाहित करना होगा.

 

 

 

११-संत कबीर रोज सत्संग करते थे. उसमें बहुत सारे भक्त आते थे और उसको अमल करके अपने जीवन को सफल बनाते थे. एक दिन की बात है रोज की तरह ही संत कबीर प्रवचन दे रहे थे.
 
 
 
 
 
सत्संग के खत्म होने र सभी भक्त गण अपने अपने घरों की ओर चल दिए, लेकिन एक व्यक्ति वहीँ बैठा रहा. जब कबीर ने उससे पूछा कि क्या हुआ, क्यों परेशान हो… सभी लोग चले गए लेकिन तुम क्यों नहीं गए…किस बात की परेशानी है.

 

 

 

तब उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे आपसे कुछ पूछना है. मैं एक गृहस्थ हूँ. घर में हमेशा ही आपस मीन झगडा होता रहता है जिससे घर का माहौल हमेशा ही ख़राब रहता है. मैं आपसे इसका हल जानना चाहता हूँ कि कैसे इसे सुलझाया जा सके.

 

 

 

कबीर जी कुछ समय तक शांत रहे. फिर उसके बाद अपनी पत्नी को कहा की लालटेन जलाकर लाओ. इस पर कबीर की पत्नी ने लालटेन जलाकर ले आयीं. इस पर वह आदमी एकदम से हैरान रह गया की इस भरी दोपहरी में कबीर जी ने लालटेन क्यों मंगवाई.

 

 

 

 

इसके बाद संत कबीर ने अपनी पत्नी से कहा कि कुछ मीठा लेकर आओ. इसपर उनकी पत्नी ने मीठे की जगह नमकीन लाकर दे दिया . इस पर उस आदमी ने मन ही मन कहा कि कैसे लोग हैं मीठे के बदले नमकीन और दिन में यहाँ तक की भरी दोपहर में लालटेन.

 

 

 

 

इस पर उस आदमी ने खीझकर कहा कि यह सब क्या है. मैं तो अपनी समस्या के समाधान के लिए यहाँ आया था और आपने यह सब दिखा दिया .

 

 

 

इससे तो मैं और भी परेशान हो गया. इस पर संत कबीर मुस्कुराए अकुर कहा कैसे ही मैंने लालटेन मंगवाई तो मेरी पत्नी कह सकती थी की तुम्हें हो क्या ग्या है भरी दोपहरी में लालटेन मगवां रहे हो, लेकिन उसने कुछ नहीं.

 

 

 

 

चुपचाप लालटेन लाकर रख दी. उसी तरह जब मैंने मीठा मंगवाया तो उसने नमकीन ला दी तो मैं यह सोचकर चुप रहा कि हो सकता है घर में कोई मीठा ना हो.

 

 

 

 

अब वह व्यक्ति सबकुछ समझ गया. कबीर ने कहा गृहस्थी में आपसी विश्वास से ही तालमेल बनता है. आदमी से गलती हो तो औरत संभाल ले और जब औरत से गलती हो तो आदमी संभाल ले. यही गृहस्थी का मूल मन्त्र है.

 

 

 

१२- वैसे तो मित्रता पर आज तक बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन आज के कलयुग के समय में इसे बार बार रिफ्रेश करने , पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है.

 

 

 

जीवन के सबसे सुन्दर, सबसे सुखद और सबसे प्यारे रिश्ते मित्रता के बारे में इंसान या तो निशब्द रहकर इसके सुखद एह्सास की गहराईयों ण खोया रहता है और यदि बोलता है तो ऐसे बोलता है कि थामे का नाम ही नहीं लेता है. क्योकि यह रिश्ता है ही ऐसा सुखद और सलोना कि इस पर अपने भाव और विचार  अभिव्यक्त करने वाला कभी थकता ही नहीं है.

 

 

 

 

मित्रता किसी प्रयोजन से या आयोजन से नहीं होती है, यह तो बस हो जाती है. इस दुनिया में जितने भी रिश्ते उदात्त भावों से जुड़े हैं , वे स्वयं घटित हुए हैं , कभी प्रायोजित नहीं किये गए. दुनिया के अन्य रिश्ते भी जैसे माँ-बेटी, मां बेटा, पिता – पुत्री, पिता – पुत्र, भाई -बहन, पति – पत्नी जब मित्रता के भाव में उतर जाते हैं तो बड़े गरिमामय और महिमामय हो जाते हैं.

 

 

 

 

दो व्यक्तियों का एक -दुसरे के प्रति संवेदना , सम्मान, प्यार, समान प्रवृति, समान सोच, समान नजरिया, सामान प्रतिक्रया यह सब मिलकर मित्रता को जन्म देती है.

 

 

 

 

ये सारे विन्दु मित्रता को फुल की तरह पंखुड़ी दर पंखुड़ी विकसित करते और महकाते चले जाते हैं. जब दो लोगों के बीच मित्रता अ बिज पड़ता है तो पता ही नहीं चलता है कि इसका बीजारोपण कब हुआ, कब इसकी कोपलें फूटी, कब वह फुल बना कब वह महका, कब वह मीठे भावों से तरंगायित हुआ , कब मधुर संगीत सी उसमें समाहित हुई.

 

 

 

 

बस एक पावन और मनभावन प्रक्रिया के तहत यह सब घटित होता जाता है और एक दिन दो लोग अपने को , एक दुसरे के सबसे अच्छे मित्र की रूप में पाते हैं.

 

 

 

 

१३- एक्सीडेंट के पश्चात जब मेरी आँख खुली, तो मैंने अपने आपको एक बिस्तर पर पाया. इर्द-गिर्द कुछ परिचित अपरिचित चहरे खड़े थे.मेरी आँख खुलते ही उनके चहरे पर उत्साह व प्रसन्नता की लहर दौड़ पड़ी. मैंने कराहते हुए कहा “मैं कहां हूँ “

 

 

 

 

“आप सरकारी अस्पताल में हैं आपका एक्सीडेंट हो गया था. घबराने की कोई बात नहीं है, केवल पैर ही फैक्चर हुआ है” एक चहरे ने बड़ी ही तेजी से जवाब देता है, जैसे वह मेरे होश में आने का ही इन्तजार कर रहा था.

 

 

 

 

अब मैं अपनी टांग की ओर देखता हूं तो एक टांग तो अपने जगह सही सलामत थी और दूसरी टांग रेती की थैली के साथ एक स्टैंड के सहारे लटक रही थी. मेरे दिमाग में नये मुहावरे का जन्म हुआ. ” टांग टूटना ” अर्थात सरकारी अस्पताल में कुछ दिन मर-मरकर जीना .

 

 

 

 

सरकारी अस्पताल का नाम सुनते ही मैं तो काँप उठा. वैसे तो अस्पताल ही एक खतरनाक आइटम है ऊपर से सरकारी तो समझो आत्मा से परमात्मा का सीधा मिलन.

 

 

 

 

 

 

अब मुझे यह बात समझ आ चुकी थी कि टांग टूटना तो एक घटना थी, दुर्घटना तो सरकारी अस्पताल में भर्ती होना है. टांग टूटने से ज्यादा फ़िक्र मुझे उन लोगों की हुई, जो हमदर्दी जताने मुझसे मिलने आये थे.

 

 

 

ये मिलने वाले कभी कभी इतने ज्यादा आते हैं और कभी-कभी इतना परेशान करते हैं कि मरीज का आराम हराम हो जाता है, जिसकी मरीज को खास जरुरत होती है.

 

 

 

अब सबसे पहले मिलने वे आये जिनकी टांग टूटने मे मैं गया था..मानो वे भगवान से प्रार्थना ही कर रहे थे कि इसकी भी टांग टूटे और हम इस ऋण से मुक्त हों.

 

 

 

दर्द के मारे मरीज की वैसे ही हालत खराब होती और उसकी रही सही कसर ये लोग जगाकर पूरी कर देते हैं. अब मैंने सोचा कि कोई भी अगर देखने आता है तो मैं आँख नहीं खोलूँगा और चुपचाप पडा रहूँगा.

 

 

 

कुछ समय के बाद मेरे गाव के बब्लू चचा आये और बोले बेटा कैसे हो….अब कैसा लग रहा है. लेकिन मैं चुप रहा….अपने अपनी सोच पर अटल रहा…मैं यह सोच ही रहा था कि चचा कुछ देर बाद यह सोच कर चले जायेंगे कि मैं सो रहा हूँ कि उतने में ही चाचा ने मेरे पैर के टूटे हुए हिस्से को जोर से दबाया.

 

 

 

 

मैं उससे भी दोगुने जोर से चिल्लाते हुए आँख खोली ……बेटा कैसे हो…बब्लू चाचा ने कहा…..अब ऐसे हमदर्दों से तो भगवान ही बचाए , यह सोचते हुए मैंने कहा ” ठीक ही हूँ “

 

 

 

जब तक मैं हास्पिटल में रहा..इस तरह के हमदर्दों का दर्द को सहता रहा. खैर इस दर्द में भी प्यार था, अपनापन था.

 

 

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Abhishek Pandey

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