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Mulla Nasruddin Stories in Hindi. मुल्ला नसरुद्दीन की १७ मजेदार कहानियां

mulla nasruddin stories in hindi
Written by Abhishek Pandey

Story of Nasruddin Story  मुल्ला नसरुद्दीन की कहानी

 

 

 

मित्रों इस पोस्ट में मुल्ला नसरुद्दीन की  17  कहानियां दी जा रही है . मुझे उम्मीद है की ये सभी मजेदार कहानियां आपको जरुर पसंद आएँगी.

 

 

1-  कौन समझदार

 

2- नसरुद्दीन का इंटरव्यू

 

3- मुल्ला का इम्तिहान

 

4- लालटेन की लड़ाई

 

5- नसरुद्दीन गए फिल्म देखने

 

6- मसरुद्दीन की बीवी पानी में गिरी

 

7-  घर का मालिक कौन

 

8- नसुरुद्दीन के घर में घुसे चोर

 

9- मुल्ला नसरुद्दीन के बेगम के पैर

 

10- नसीब

 

11- मुल्ला नसरुद्दीन की दावत

 

12- कहानी

 

13 – प्रवचन

 

14- नसीरुद्दीन की मुसीबत

 

15- जवाब

 

16- चुटकुले

 

17- मजार

 

1- एक रात मुल्ला सोते हुए अचानक उठ गया और अपनी पत्नी को उठाते हुए बोला, ’’ जल्दी करो, मुझे चश्मा लाकर दो।’’ मुल्ला की पत्नी ने कहा, ’’ चश्मे का क्या करोगे.’’

 

 

 

मुल्ला ने कहा, ’’ मैंने अभी अभी बहुत संुदर और हसीन सपना देखा है, पर सपना फिर भी बहुत अधिक साफ नहीं दिखा, इसलिए कहा रहा हूं, जाओ जल्दी और चश्मा लाकर दो.’’

 

 

 

मुल्ला के दोस्त ने मुल्ला से पूछा, ’’ कौन ज्यादा समझदार है, गधा या आदमी’’ मुल्ला ने कहा, ’’ गधा’’ मुल्ला के दोस्त ने कहा, ’’ कैसे, मुल्ला ने कहा, ’’ गधे पर जब बोझ लादा जाता है तो वह और अधिक बोझ के लिए नहीं कहता, पर इंसान पर जब जिम्मेदारियों का बोझ पड़ता है तो वह मूर्ख कहता है और अधिक जिम्मेदारियां मिले, इसलिए.’’

 

 

 

मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियां    Nasruddin Stories

 

 

 

2- एक बार मुल्ला नसरूदीन ने जाॅब के लिए अप्लाई किया.  अपनी क्वालीफिकेशन के बारे में मुल्ला ने खूब बढ़ाचढ़ाकर लिखा. मुल्ला ने लिखा, ’’ मैंने यूनिवर्सिटी टाॅप किया है, मुझे नेशनल बैंक का वाईंस-प्रेसिडेंट बनने के लिए भी कहा गया था.

 

 

 

मैंने मना कर दिया, क्योंकि मुझे पैसे से इतना प्यार नहीं है. मैं सच्चा इंसान हूं, मुझमें लालच बिलकुल भी नहीं है. मुझे सैलेरी की बिलकुल चिंता नहीं है. आप मुझे जो भी देंगे मैं रख लूंगा और मुझे काम करना बहुत पसंद है.

 

 

 

इंटरव्यू लेने वाले व्यक्ति ने कहा, ’’ तुममें इतनी सारी खासियत हैं, पर कोई एक बुराई भी तो अपने बारे में बताओ. मुल्ला ने कहा, ’’ मैं झूठ बहुत बोलता हूं.’’

 

 

 

३- एक बार मुल्ला अपने कुछ दोस्तों के साथ गांव की चौपाल  पर बैठा था. उनके बीच इस बात पर विचार हो रहा था कि जवानी से लेकर अब तक उनके अंदर ताकत को लेकर कितना परिवर्तन आया है, कोई बात कर रहा था कि वह कितना समझदार था, कोई बात कर रहा था कि वह कितना कमजोर था.

 

 

 

तब नसरूदीन ने कहा, ’’ न केवल मैं उस समय समझदार था, बल्कि आज भी हूं, और न केवल मैं उस समय ताकतवर था, बल्कि आज भी हूं. मुल्ला के दोस्तों ने कहा, ’’ क्या वाकई’’ मुल्ला ने कहा, ’’ हां, मैं तो इसे आजमा भी चुका हूं.’’

मुल्ला के दोस्तों ने कहा, ’’ वो कैसे?’’ मुल्ला ने कहा, ’’ मेरे घर के बाहर एक चट्टान है, मैं अपनी जवानी में भी उसे नहीं उठा पाता था और आज भी उसे नहीं उठा पाता हूं.

Mulla Nasruddin ki Kahani

४- एक रात मुल्ला और उसकी बीवी सो रहे थे.  दोनो ने बाहर दो आदमियों के लड़ने की आवाज़ सुनी.  मुल्ला ने कहा, ’’ मैं देखकर आता हूं कि क्या बात है.’’

मुल्ला की बीवी ने कहा, ’’ नहीं, तुम सो जाओ . ’’ मुल्ला ने कहा, ’’ठीक है’’ पर बाहर लड़ाई बढ़ती देख मुल्ला ने अपनी लालटेन उठाई और घर से बाहर गया .
जैसे ही मुल्ला उनके पास पहुंचा तो उनमें से एक आदमी मुल्ला की लालटेन लेकर भाग गया. नसरूदीन वापस अपने कमरे में आ गया. मुल्ला की बीवी ने मुल्ला से पूछा, ’’ आखिर किसलिए लड़ाई कर रहे थे वे?’’ मुल्ला ने कहा, ’’ मेरी लालटेन के लिए.’’
५- एक बार मुल्ला अपनी बीवी के साथ फिल्म देखने गया, फिल्म में रोमांटिक सीन को देखकर मुल्ला की वाइफ मुल्ला से बोली, ’’ क्या तुम मुझे इस तरह प्यार करते हो, क्या तुम मुझे इस तरह गले लगाते हो, जैसे ये हीरो लगा रहा है.’’

 

 

 

मुल्ला ने कहा, ’’ इसे तो ऐसा करने के पैसे मिलते हैं, और मुझे कुछ नहीं.’’ मुल्ला की पत्नी ने फिर कहा, ’’ पर ये असल जिंदगी में भी पती पत्नी हैं मुल्ला ने कहा, ’’ फिर तो ये सच में ही बहुत अच्छा एक्टर है.’’

 

 

 

६- मुल्ला नसरूदीन अपने घर के बाहर बैठा था . बारिश हो रही थी और अचानक एक आदमी भागता हुआ आया और मुल्ला से कहा,’’ तुम्हारी बीवी पानी में गिर गई है, जल्दी चलो .

 

 

 

 

मुल्ला भागता हुआ नदी किनारे गया, वहां बहुत भीड़ जमा थी .नदी की प्रचंड धारा को देखते हुए कोई कोई भी नदी में कूदने का साहस नहीं कर पा रहा था.

 

 

 

 

मुल्ला ने यह देखा और कूद गया नदी में, पर मुल्ला नदी की धारा के विपरीत तैरने लगा, ऐसा देख लोगों ने कहा, ’’तुम नदी की धारा के विपरीत क्यों तैर रहे हो.’’

 

 

 

मुल्ला ने कहा, ’’ मैं मेरी पत्नी को जानता हूं, उसने कभी कोई कार्य सीधा करना नहीं सीखा, निश्चिता तौर पर वह नदी की धारा के विपरीत ही गई होगी.’’

 

 

 

Mulla Nasruddin jokes नसरुद्दीन के चुटकले

 

 

 

7- एक बार मुल्ला को दोस्त मुल्ला को देखने के लिए गया, पर मुल्ला अपने बैड के नीचे छुपा बैठा था. मुल्ला के दोस्त ने कहा, ’’ मुल्ला, तुम बैड के नीचे छुपकर क्यों बैठे हो.’’

 

 

मुल्ला ने कहा,’’ यह मेरा घर है और मैं अपने घर का मालिक हूं, मैं चाहे कहीं बैठूं तुम्हें क्या.’’ तभी मुल्ला की पत्नी बाहर निकलकर आई और मुल्ला से कहा, ’’

 

 

 

अरे कायर, बैड के नीचे कहां छिपकर बैठे हो, बाहर निकलो तो मैं बताऊं कि घर का मालिक कौन है. मुल्ला की पत्नी बहुत मोटी थी और बैड के नीचे नहीं जा सकती थी, इसलिए मुल्ला के दोस्त ने मुल्ला की पत्नी से कहा, ’’

 

 

 

अब तुम क्या करोगी’’ मुल्ला की पत्नी ने कहा, ’’ लंच टाइम में तो इसे बाहर आना ही पड़ेगा, अभी तो बड़ी बड़ी मालिकपने की बातें कर रहा है. जब यह बाहर आएगा फिर बताऊंगी कि मालिक कौन है?’’

 

 

८- मुल्ला नसरूदीन और उसकी पत्नी रात को अपने बैड पर सो रहे थे. मुल्ला की पत्नी चैंकते हुए उठी और कहा ’’सुनो जी, लगता है घर में कोई चोर घुस आया है’’ मुल्ला ने बड़ी ही शांति से उत्तर दिया, ’’ मुझे लगता है चोर को अपना काम करने दो, वैसे भी हमारे घर कुछ ऐसा सामान नहीं है जिसे चोर चुराए.’’

 

 

 

मुल्ला की पत्नी ने मुल्ला को डांटते हुए कहा, ’’मूर्खोंवाली बातें मत करो, ऐसा नहीं हैं,’’ इसलिए जाओ और उसे पकड़ों.

 

 

 

फिर मुल्ला ने सोचते हुए कहा, ’’ अच्छा-ऐसा है, ठीक है, तो पहले उसे घर का कुछ अच्छा सामान चुराने दो, फिर मैं उससे वह सामान चुरा लूंगा. आखिर मुझे भी तो पता चले घर में अच्छा क्या रखा है.’’

 

 

 

मुल्ला नसरुद्दीन की मजेदार कहानियां

 

 

 

९- बात उन दिनों की है, जब महेंद्रगढ़ झज्जर के नवाब के अधीन था.  उत्तर-पश्चिम भारत पर विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण हो रहे थे और रोहतक, पानीपत और रेवाड़ी, दिल्ली के रास्ते में पड़ने के कारण इन काक्रान्ताओं की निर्दयता के शिकार होते थे.

 

 

 

नवाब उन दिनों झज्जर के बुआवाल तालाब को ठीक कराने में लगे थे, ताकि संकट के समय रिवाय को पानी का कष्ट न हो, अचानक दुर्राने के तेज हमले की खबर आई.

पता चला कि दुर्रानी के सेना रेवाड़ी के पास पहुँचने वाली है.  तुरंत नवाब ने रियासत के जांबाज सिपहसालारों और वजीरों मनसबदारों की एक बैठक बुलाई.

अहम मसला था कि अगर दुर्रानी झज्जर का रूख करे, तो उसासे कैसे निबटा जाए ? और अगर हमले की सूरत में रोहतक या रेवाड़ी से मदद की गुहार आए, तो क्या किया जाए ?

सभी का कहना था कि रियासतों  को तुरंत आगाह कर दिया जाए कि हमले की सूरत में उसे अपना बचाव कैसे करना है और दुश्मन से जूझने के लिये पूरी तैयारी की जाएं.   दूसरी रियासतों की भी भरपूर मदद की जाए.

उसी दिन पूरी रियासत में नवाब की ओर से डुग्गी पिटवा दी गई कि हमले की सूरत में रियासत के कमजोर और बीमार लोग, औरतें और बच्चें भागकर पास के जंगल में छिप जाएं.  नौजवान, दुश्मन का मुकाबला करने में फ़ौज का साथ दें.

डुग्गी शेखचिल्ली ने भी सुनी.  उनकी बेगम  निहायत मोटे किस्म की थीं.  उन्हें देखकर अक्सर लोग यह मान ही नहीं पाते थे कि शेखचिल्ली के घर फाके भी होते होंगे.

वह एकदम हक्के-बक्के और परेशान हो उठे- अब कोई समझाए नवाब को कि हमला हुआ, तो इतनी मोटी बेगम भागकर इतने दूर जंगलों में कैसे जाएँगी ?

बीच ही में न धर ली जाएं….. फिर खुदा न खास्ता, दुर्रानी की फ़ौज आदमखोर हुई, तो बेगम  उनका एक दिन का नाश्ता साबित होंगी. धत तेरे की मैं भी क्या उलटा-सीधा सोचने लगा कमबख्तों की धजियाँ न उड़ा दूंगा, अगर उन्होंने बेगम  की ओर देखा मगर रास्ते ही में पकडे जाने पर वे उन्हें देखेंगे नहीं, तो क्या आँखें बंद कर लेंगे ? अंधे भी तो नहीं होंगे वे.  हाँ, शेख फारूख एक दिन कह तो रहे थे दुर्रानी एकदम अंधा है.

मैदान में उतरता है तो अपने-पराए में फर्क नहीं कर पाता.  मगर दुर्रानी अंधा है, तो क्या उसके सिपाही भी अंधे होंगे ? बड़ी मुसीबत में जान फंस गई.  मेरा क्या है, मैं तो उसकी फ़ौज के गुबार से ही उड़कर कहीं का कहीं जा पहुंचूंगा.

मगर सवाल तो बेगम  का है.  वह तो जन्नत में भी मेरे बिना सबको फटकार लगाएंगी.  अल्लाह मियाँ को भी नहीं बख्शेंगी.  उफ़, अगर कहीं से उड़ने वाला कालीन मिल जाए तो मैं भी कितना अहमक हूँ नवाब साहब ने घोड़ा दे रखा है, फिर भी नाहक परेशान हो रहा हूँ.  बेगम  को घोड़े पर बैठाकर दौड़ा दूंगा.  दुर्रानी की कमबख्त सारी फ़ौज हाथ मालती रह जाएगी.

मगर घोड़ा भी तो जानवर है.  पता नहीं, बेगार का बोझ सह पाएगा या नहीं ? ऐसा न हो कि बीच में पिचक जाए या खुदा, ऐसा हुआ, तो क्या होगा ? घोड़ा कहीं गिरेगा, बेगम कहीं बिरंगी उनसे तो गिरकर उठा भी नहीं जाएगा.

फिर घोड़ा नवाब का है.  क्या पता, सीधा जंगल में जाएगा या लड़ने क जोश में कमबख्त दुर्रानी की फ़ौज में ही जा घुसेगा बेगम बेचारी तो जोर-जोर से फटकार लगाने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकतीं.

माना कि उनके अब्बा हजूर एक जांबाज सिपाही थे, तलवार ऐसी चलाते थे कि दुश्मन को छठी का दूध याद आ जाता था, मगर धुल पड़े उनके दकियानूसी ख्यालात पर बेगार को जबान चलाना तो सिखा दिया, तलवार चलानी नहीं सिखाई.  सिखा देते, तो उस समय काम न आती जब घोड़ा उन्हें लिये दुर्रानी की फ़ौज में जा घुसता .

मगर यह माना कि घोड़ा दुर्रानी के फ़ौज में घुस जाएगा, मगर बेगार क पास तलवार कहाँ से आएगी ? अल्लाह मियाँ आसमान से तो टपका नहीं देंगे कि लो मेरे बन्दे शेखचिल्ली की बेगम , तलवार लो और काट डालो दुर्रानी की गर्दन अल्लाह मियाँ इतने मेहरबान होंगे, तो बेगम दुर्रानी की गर्दन जरूर काट डालेगी.

कितना मजा आएगा उस दिन दुर्रानी की फ़ौज में दहशत छा जाएगी.  उसके सारे सिपाही मैदान छोड़कर भाग जाएंगे.  नवाब उन्हें हैरानी से भागता देखेंगे.  पूछेंगे—यह अनहोनी कैसे हुई ? किस आसमानी ताकत ने यह सब किया?

तभी भेदिया आकर नवाब को बताएगा— हुजूर, एक मोटी औरत ने तलवार से दुर्रानी की गर्दन उड़ा दी. नवाब और हैरान होंगे. तपाक से कहेंगे वह औरत है या फरिश्तों की मलिका ? उसे पूरी इज्जत के साथ दरबार में पेश करो .

पेश करो नहीं-नहीं, नवाब कहेगा कि हम खुद उसकी कदमपोसी करेंगे. फिर वह घोड़े से उतारकर नागे पैर बेगम की तलाश में निकलेगा, वैसे ही जैसे शहंशाह अकबर नंगे पैर वैष्णो देवी की जियारत पर निकले थे.  बेगम, दुर्रानी का खून से लथपथ सिर तलवार की नोक पर टाँगे मैदाने-जंग में खडी होंगी.  नवाब उसकी कदमबोसी करेगा।. बार-बार सजदे में झुकेगा.

अपने सभी अमीर-उमराव को बेगम के पैरों की धुल माथे से लगाने को कहेगा.  पैर चूमने को कहेगा.  सभी बेगम के पैर चूमेंगे. नवाब मुझसे भी उनके पैर चूमने को कहेगा.  भला अपनी बेगम क पैर मैं कैसे चूम सकता हूँ ? मैं कहूंगा नहीं.

नवाब जोर से चिल्लाएगा चूमो . मैं फिर कहूंगा नहीं.

नवाब बौखला उठेगा.  सिपाहियों से कहेगा पकड़ लो इस मरदूद को और डाल दो इस आसमानी ताकत के पैरों पर .नवाब के सिपाही मुझे पकड़ लेंगे और फिर और जोर से धाम की आवाज हुई तो शेखचिल्ली ने देखा वह चारपाई से लुढ़ककर नीचे सब्जी छीलती बेगम के पैरों में गिर पड़े हैं.

आग लगे इस बौडमपने में बेगम जोर से चीखीं अच्छा हुआ, दरांती पर नहीं गिरे.  हो जाती  गर्दन अलग और शेखचिल्ली बेचारे क्या कहते खिसियाना हो, चुपचाप छत पर चले गए.  हाँ, अलबत्ता दुर्रानी के हमले का डर उन्हें और ज्यादा सताने लगा था कि कहीं सचमुच में बेगम के पैर ही चूमने न पड़ जाएं.

 

 

Mulla Nasruddin Story

 

 

१०- एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन जी कहीं जा रहे थे कि उसने सड़क पर एक दुखी आदमी को देखा जो ऊपरवाले को अपने खोटे नसीब के लिए कोस रहा था. मुल्ला जी ने उसके करीब जाकर उससे पूछा – “क्यों भाई, इतने दुखी क्यों हो?”

 

 

 

वह आदमी मुल्ला जी को अपना फटा-पुराना झोला दिखाते हुए बोला – “इस द्नुनिया में मेरे पास इतना कुछ भी नहीं है जो मेरे इस फटे-पुराने झोले में समा जाये.”

 

 

 

“बहुत बुरी बात है” – मुल्ला नसरुद्दीन जी बोले और उस आदमी के हाथ से झोला झपटकर सरपट भाग लिया.

 

 

 

अपना एकमात्र माल-असबाब छीन लिए जाने पर वह आदमी रो पड़ा. वह अब पहले से भी ज्यादा दुखी था. अब वह क्या करता. वह अपनी राह चलता रहा.

 

 

 

दूसरी ओर, मुल्ला जी उसका झोला लेकर भागते हुये सड़क के एक मोड़ पर आ गये और मोड़ के पीछे उसने वह झोला सड़क के बीचोंबीच रख दिया ताकि उस आदमी को ज़रा दूर चलने पर अपना झोला मिल जाए.

 

 

 

दुखी आदमी ने जब सड़क के मोड़ पर अपना झोला पड़ा पाया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा . वह ख़ुशी से रो पड़ा और उसने झोले को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और बोला – “मेरे झोले, मुझे लगा मैंने तुम्हें सदा के लिए खो दिया” झाड़ियों में छुपा मुल्ला जी यह नज़ारा देख रहे थे . वह हंसते हुए खुद से बोले … “ये भी किसी को खुश करने का शानदार तरीका है.”

 

 

 

Mulla Nasruddin short Stories

 

 

 

११- एक दिन ऐसा हुआ कि किसी ने किसी से कुछ कहा, उसने किसी और से कुछ कहा और इसी कुछ-के-कुछ के चक्कर में ऐसा कुछ हो गया कि सब और यह बात फ़ैल गई कि nasruddin बहुत ख़ास आदमी हैं .

 

 

 

जब बात हद से भी ज्यादा फ़ैल गई तो नसरुद्दीन  को पास के शहर में एक दावत में ख़ास मेहमान के तौर पर बुलाया गया. नसरुद्दीन  को दावत का न्योता पाकर बड़ी हैरत हुई.

 

 

 

 

खैर, तय समय पर नसुरुद्दीन दावतखाने पहुँच गये. अपने रोज़मर्रा के जिस लिबास में वे रहते थे वैसे ही वे पहुँच गये . नसरुद्दीन  धुल से सनी पोशाक पहनकर वैसे ही चल दिए. उसे साफ़ करने की जहमत भी नहीं उठाई. जब वे वहाँ पहुंचे तो दरबान ने मुझे भीतर आने से मना कर दिया.

 

 

 

“लेकिन मैं तो नसरुद्दीन हूँ! मैं दावत का ख़ास मेहमान हूँ!”

 

 

 

“वो तो मैं देख ही रहा हूँ” – दरबान हंसते हुए बोला. वह मुल्ला की तरफ झुका और धीरे से बोला – “और मैं खलीफा हूँ.” यह सुनकर उसके बाकी दरबान दोस्त जोरों से हंस पड़े. फिर वे बोले – “दफा हो जाओ बड़े मियां, और यहाँ दोबारा मत आना!”

 

 

 

कुछ सोचकर नसरुद्दीन वहां से चल दिये. दावतखाना शहर के चौराहे पर था और उससे थोड़ी दूरी पर उनके एक दोस्त का घर था. वे अपने दोस्त के घर गये.

 

 

 

“नसरुद्दीन! तुम यहाँ!” – दोस्त ने उन्हें गले से लगाया और हमने साथ बैठकर इस मुलाक़ात के लिए अल्लाह का शुक्र अदा किया. फिर नसरुद्दीन काम की बात पर आ गये.

 

 

 

“तुम्हें वो लाल कढ़ाईदार शेरवानी याद है जो तुम मुझे पिछले साल तोहफे में देना चाहते थे?” – नसरुद्दीन ने दोस्त से पूछा.

 

 

“बेशक! वह अभी भी आलमारी में टंगी हुई तुम्हारा इंतज़ार कर रही है. तुम्हें वह चाहिए?

 

 

“हाँ, मैं तुम्हारा अहसानमंद हूँ. लेकिन क्या तुम उसे कभी मुझसे वापस मांगोगे? – नसरुद्दीन ने पूछा.

 

 

“नहीं, मियां! जो चीज़ मैं तुम्हें तोहफे में दे रहा हूँ उसे भला मैं वापस क्यों मांगूंगा?

 

 

 

“शुक्रिया मेरे दोस्त” – नसरुद्दीन वहां कुछ देर रुके और फिर वह शेरवानी पहनकर वहां से चल दिये. शेरवानी में किया हुआ सोने का बारीक काम और शानदार कढ़ाई देखते ही बनती थी.

 

 

 

उसके बटन हाथीदांत के थे और बैल्ट उम्दा चमड़े की. उसे पहनने के बाद नसरुद्दीन खानदानी आदमी लगने लगे थे. दरबानों ने नसरुद्दीन को देखकर सलाम किया और बाइज्ज़त से उन्हें दावतखाने ले गए.

 

 

 

दस्तरखान बिछा हुआ था और तरह-तरह के लज़ीज़ पकवान अपनी खुशबू फैला रहे थे और बड़े-बड़े ओहदेवाले लोग मेरे लिए ही खड़े हुए इंतज़ार कर रहे थे.

 

 

 

किसी ने नसरुद्दीन को ख़ास मेहमान के लिए लगाई गई कुर्सी पर बैठने को कहा. लोग फुसफुसा रहे थे – “सबसे बड़े आलिम मुल्ला नसरुद्दीन यही हैं”. नसरुद्दीन बैठे और सारे लोग उनके बैठने के बाद ही खाने के लिए बैठे.

 

 

 

वे सब नसरुद्दीन की ओर देख रहे थे कि नसरुद्दीन क्या करने वाले हैं. खाने से पहले नसरुद्दीन को बेहतरीन शोरबा परोसा गया. वे सब इस इंतज़ार में थे कि नसरुद्दीन अपना प्याला उठाकर शोरबा चखें….. नसरुद्दीन शोरबा का प्याला हाथ में लेकर खड़े हो गये और फिर एक रस्म के माफिक नसरुद्दीन शोरबा अपनी शेरवानी पर हर तरफ उड़ेल दिया.

 

 

 

सभी लोग सन्न रह गए…. किसी का मुंह खुला रह गया तो किसी की सांस ही थम गई. फिर वे बोले – “आपने ये क्या किया, हज़रत! आपकी तबियत तो ठीक है ?”

 

 

 

नसरुद्दीन ने चुपचाप उनकी बातें सुनी. उन्होंने जब बोलना बंद कर दिया तो नसरुद्दीन ने अपनी शेरवानी से कहा – “मेरी प्यारी शेरवानी. मुझे उम्मीद है कि तुम्हें यह लज़ीज़ शोरबा बहुत अच्छा लगा होगा. अब यह बात साबित हो गई है कि यहाँ दावत पर तुम्हें ही बुलाया गया था, मुझे नहीं.”

 

 

 

१२- एक सूफी रहस्यवादी ने मुल्ला नसरुद्दीन और उसके एक शागिर्द का रास्ता रोक लिया. यह जांचने के लिए कि मुल्ला के भीतर आत्मिक जागृति हो चुकी है या नहीं, सूफी ने अपनी उंगली उठाकर आसमान की ओर इशारा किया. इस इशारे से सूफी यह प्रदर्शित करना चाहता था कि ‘एक ही सत्य ने सम्पूर्ण जगत को आवृत कर रखा है’.

 

 

 

मुल्ला का शागिर्द आम आदमी था. वह सूफी के इस संकेत को समझ नहीं सका. उसने सोचा – “यह आदमी पागल है. मुल्ला को होशियार रहना चाहिए”.

 

 

 

सूफी का यह इशारा देखकर मुल्ला ने अपने झोले से रस्सी का एक गुच्छा निकाला और शागिर्द को दे दिया……शागिर्द ने सोचा – “मुल्ला वाकई समझदार है. अगर पागल सूफी हमपर हमला करेगा तो हम उसे इस रस्सी से बाँध देंगे”.

 

 

 

सूफी ने जब मुल्ला को रस्सी निकालते देखा तो वह समझ गया कि मुल्ला कहना चाहता है कि ‘मनुष्य की क्षुद्र बुद्धि सत्य को बाँध कर रखने का प्रयास करती है जो आकाश पर रस्सी लगाकर चढ़ने के समान ही व्यर्थ और असंभव है’.

 

 

दूसरी कहानी जंगली फूल

 

 

सर्दियों का पूरा मौसम नसरुद्दीन ने अपने बगीचे की देखरेख में बिताया. वसंत आते ही हर तरफ मनमोहक फूलों ने अपनी छटा बिखेरी. बेहतरीन गुलाबों और दूसरे शानदार फूलों के बीच नसरुद्दीन को कुछ जंगली फूल भी झांकते दिख गए……नसरुद्दीन ने उन फूलों को उखाड़कर फेंक दिया. कुछ दिनों के भीतर वे जंगली फूल और खरपतवार फिर से उग आये.

 

 

 

नसरुद्दीन ने सोचा क्यों न उन्हें खरपतवार दूर करनेवाली दवा का छिडकाव करके नष्ट कर दिया जाए. लेकिन किसी जानकार ने नसरुद्दीन को बताया कि ऐसी दवाएं अच्छे फूलों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुंचाएंगी. निराश होकर नसरुद्दीन ने किसी अनुभवी माली की सलाह लेने का तय किया.

 

 

 

“ये जंगली फूल, ये खरपतवार…”, माली ने कहा, “यह तो शादीशुदा होने की तरह है, जहाँ बहुत सी बातें अच्छीं होतीं हैं तो कुछ अनचाही दिक्कतें और तकलीफें भी पैदा हो जातीं हैं”.

 

 

 

“अब मैं क्या करूं?”, नसरुद्दीन ने पूछा.

 

 

“तुम अगर उन्हें प्यार नहीं कर सकते हो तो बस नज़रंदाज़ करना सीखो. इन चीज़ों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नहीं की थी लेकिन अब वे तुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गयीं हैं.”

 

 

Mulla Nasruddin ka Pravachan

 

 

 

१३- एक बार mulla को प्रवचन देने के लिए बुलाया गया. mulla nasruddin इस बात से बड़े खुश थे.

 

 

वे समय से कार्यक्रम में पहुँच गए और तत्काल ही मंच पर चढ़ गए और उपस्थित लोगों से पूछा कि ” क्या आप जानते हैं कि मैं क्या बताने वाला हूँ ? लोगों का जवाब नहीं था.

 

 

इस पर वे बड़े नाराज हो गए और बोले जब आप लोगों को पता ही नहीं कि मैं क्या बोलने वाला हूँ तो आपके सामने बोलने का क्या फायदा ?

 

 

यह कहते हुए वे मंच से चले गए. इससे वहाँ मौजूद लोगों को थोड़ी शर्मिंदगी हुई और अगले दिन उनको  को फिर से बुलाया गया और जब फिर से  मुल्ला जी  ने वही प्रश्न दोहराया तो इस पर वहाँ मौजूद लोगों ने कहा ” हाँ, हमें पता है “.

 

 

 

इस पर नसरुद्दीन    ने कहा कि जब आपको सब पता ही जब आपको सब पता ही है तो फिर मन यहाँ अपना समय बर्बाद क्यों करूँ. यह कहकर मुल्ला वहा से निकल लिए.

 

 

उनके इस कृत्य पर लोग थोड़ा क्रोधित हुए और उनके खिलाफ नारेबाजी हुई. आयोजको ने किसी तरह माहौल को संभाला और लोगों को कुछ समझाया.

 

 

 

 

एक बार फिर से उन्हें  को कार्यक्रम में बुलाया गया और इस बार फिर से उन्होंने  ने वही प्रश्न दुहाराया , लेकिन इस बार योजना के अनुसार आधे लोगों ने हाँ में सिर हिलाया और आधे लोगों ने ना में सिर हिलाया.

 

 

 

इस पर पहले तो  nasruddin हिचकिचाये लेकिन अगले ही पल उन्होंने कहा कि इन सब चीजों से समय बर्बाद होता है. अतः जिन लोगों ने हाँ कहा है वे ना कहने वालों को इस बारे में बता दे और यह कहते ही mulla तेजी से वहाँ से निकल लिए और पब्लिक आयोजकों के खिलाफ और उनके खिलाफ नारेबाजी करती रही.

 

 

mulla nasruddin stories in hindi

 

 

 

Nasruddin ki Kahaniya नसरुद्दीन की कहानियां

 

 

 

१४- नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, “तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो-तीन मित्रों को मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो”.

 

 

 

जलाल ने कहा, “मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा”.

 

 

 

नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े. जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, “मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल. और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं”.

 

 

 

जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, “कैसी बात करते हो, नसरुद्दीन! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना”.

 

 

 

वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं”.
जलाल फिर हैरान हुआ.

 

 

 

बाहर निकलकर उसने कहा, “तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?”

 

 

 

नसरुद्दीन ने कहा, “मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं”. जलाल ने कहा, “अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए”.

 

 

 

वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “ये हैं मेरे दोस्त जलाल. रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है”. नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, “ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है”.

 

 

 

बाहर निकलकर जलाल ने कहा, “अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?”

 

 

 

नसरुद्दीन बोला, “मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा.

 

 

 

 

तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना”.

 

 

 

 

 

यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.

 

 

नसरुद्दीन का  उधार

 

 

 

१५- एक बार मुल्ला नसीरूद्दीन ने एक आदमी से कुछ उधार लिया था. मुल्ला नसरुद्दीन समय पर उधार चुका नहीं पाये और उस आदमी ने इसकी शिकायत बादशाह से कर दी. बादशाह ने मुल्ला  को दरबार में बुलाया.

 

 

 

मुल्ला  बेफिक्री के साथ दरबार पहुंचे…. मुल्ला नसरुद्दीन के दरबार पहुंचते ही वह आदमी बोला – बादशाह सलामत, मुल्ला जी ने बहुत महीने पहले मुझसे 500 दीनार बतौर कर्ज लिए थे और अब तक नहीं लौटाए… मेरी आपसे दरख्वास्त है कि बिना किसी देरी के मुझे मेरा उधार वापस दिलाया जाए.

 

 

 

यह सुनने के बाद मुल्ला जी ने जवाब में कहा – हुजूर, मैंने इनसे पैसे लिए थे मैं यह बात मानता हूं और मैं उधार चुकाने का इरादा भी रखता हूं. अगर जरूरत पड़ी तो मैं अपनी गाय और घोड़ा तथा और भी सामान  बेचकर भी इनका उधार चुकाऊंगा.

 

 

 

तभी वह आदमी बोला – यह झूठ कहता है हुजूर इसके पास न तो कोई गाय है और न ही कोई घोड़ा… अरे इसके पास ना तो खाने को है और न ही एक फूटी कौड़ी है.

 

 

इतना सुनते ही मुल्ला नसीरूद्दीन बोला – जहांपनाह! जब यह जानता है कि मेरी हालत इतनी खराब है, तो मैं ऐसे में जल्दी इसका उधार कैसे चुका सकता हूं…

 

 

 

जब मेरे पास खाने को ही नहीं है तो मैं उधार दूंगा कहां से…..बादशाह ने यह सुना तो मामला रफा-दफा कर दिया. अपनी हाजिर जवाबी से मुल्ला नसीरूद्दीन एक बार फिर बच निकलने में कामयाब हो गया.

 

 

मुल्ला नसरुद्दीन और उसका गधा

 

 

 

१६- एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर बैठकर किसी दूसरे शहर से अपने गाँव आया. लोगों ने उसे रोककर कहा – “मुल्ला, तुम अपने गधे पर सामने पीठ करके क्यों बैठे हो ?” नसरुद्दीन   ने कहा – “मैं यह जानता हूँ कि मैं कहाँ जा रहा हूँ लेकिन मैं यह देखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से आ रहा हूँ.

 

 

 

 

उसी शाम मुल्ला रसोई में कुछ बना रहा था. वह अपने पड़ोसी के पास गया और उससे एक बरतन माँगा और वादा किया कि अगली सुबह उसे वह बरतन लौटा देगा.

 

 

 

 

अगले दिन मुल्ला    पड़ोसी के घर बरतन लौटाने के लिए गया. पडोसी ने  उन्हें  से अपना बरतन ले लिया और देखा कि उसके बरतन के भीतर वैसा ही एक छोटा बरतन रखा हुआ था.

 

 

 

पड़ोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! यह छोटा बरतन किसलिए ?” मुल्ला ने कहा – “तुम्हारे बरतन ने रात को इस बच्चे बरतन को जन्म दिया इसलिए मैं तुम्हें दोनों वापस कर रहा हूँ.”

 

 

 

 

 

पड़ोसी को यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई और उसने वे दोनों बरतन मुल्ला से ले लिए. अगले ही दिन मुल्ला दोबारा पड़ोसी के घर गया और उससे पहलेवाले बरतन से भी बड़ा बरतन माँगा.

 

 

 

पडोसी ने ख़ुशी-ख़ुशी उसे बड़ा बरतन दे दिया और अगले दिन का इंतज़ार करने लगा.एक हफ्ता गुज़र गया लेकिन मुल्ला बरतन वापस करने नहीं आया.

 

 

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17- मुल्ला और पडोसी बाज़ार में खरीदारी करते टकरा गए. पडोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! मेरा बरतन कहाँ है?” मुल्ला ने कहा – “वो तो मर गया!” पडोसी ने हैरत से पूछा – “ऐसा कैसे हो सकता है? बरतन भी कभी मरते हैं!” मुल्ला बोला – “क्यों भाई, अगर बरतन जन्म दे सकते हैं तो मर क्यों नहीं सकते ?”

 

 

 

१७- मुल्ला नसरुद्दीन इबादत की नई विधियों की तलाश में निकला. अपने गधे पर जीन कसकर वह भारत, चीन, मंगोलिया गया और बहुत से ज्ञानियों और गुरुओं से मिला पर उसे कुछ भी नहीं जंचा.

 

 

 

उसे किसी ने नेपाल में रहनेवाले एक संत के बारे में बताया. वह नेपाल की ओर चल पड़ा. पहाड़ी रास्तों पर नसरुद्दीन का गधा थकान से मर गया. नसरुद्दीन ने उसे वहीं दफ़न कर दिया और उसके दुःख में रोने लगा.

 

 

 

तभी कोई व्यक्ति उसके पास आया और उससे बोला – “मुझे लगता है कि आप यहाँ किसी संत की खोज में आये थे. शायद यही उनकी कब्र है और आप उनकी मृत्यु का शोक मना रहे हैं.”

 

 

 

 

“नहीं, यहाँ तो मैंने अपने गधे को दफ़न किया है जो थकान के कारण मर गया” – मुल्ला ने कहा.

 

 

 

“मैं नहीं मानता. मरे हुए गधे के लिए कोई नहीं रोता. इस स्थान में ज़रूर कोई चमत्कार है जिसे तुम अपने तक ही रखना चाहते हो!”

 

 

 

 

नसरुद्दीन ने उसे बार-बार समझाने की कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. वह आदमी पास ही गाँव तक गया और लोगों को दिवंगत संत की कब्र के बारे में बताया कि वहां लोगों के रोग ठीक हो जाते हैं. देखते-ही-देखते वहां मजमा लग गया.

 

 

 

 

संत की चमत्कारी कब्र की खबर पूरे नेपाल में फ़ैल गयी और दूर-दूर से लोग वहां आने लगे. एक धनिक को लगा कि वहां आकर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गयी है इसलिए उसने वहां एक शानदार मज़ार बनवा दी जहाँ नसरुद्दीन ने अपने ‘गुरु’ को दफ़न किया था……

 

 

 

यह सब होता देखकर नसरुद्दीन ने वहां से चल देने में ही अपनी भलाई समझी. इस सबसे वह एक बात तो बखूबी समझ गया कि जब लोग किसी झूठ पर यकीन करना चाहते हैं तब दुनिया की कोई ताकत उनका भ्रम नहीं तोड़ सकती.

 

 

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Abhishek Pandey

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