Nachiketa story . यमराज नचिकेता की कहानी . ऋषि कुमार नचिकेता की कहानी
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Nachiketa story . यमराज नचिकेता की कहानी . ऋषि कुमार नचिकेता की कहानी

Nachiketa Story in Hindi नचिकेता की कहानी

 

 

 

Nachiketa आज हम आपको यमराज और ऋषिकुमार नचिकेता के सावद के बारे में बताने जा रहे हैं. इस प्रसंग का वर्णन हिन्दू धर्मग्रन्थ कठोपनिषद में मिलता है. 

 

 

इसके अनुसार Nachiketa महान ऋषि वाजश्रवस (उद्दालक) के पुत्र थे. एकक बार उन्होंने विश्वजीत नामक ऐसा यज्ञ किया, जिसमें सब कुछ दान किया जाता है.

 

 

दान के वक्त Nachiketa यह देखकर बेचैन हुए कि  उनके पिता स्वस्थ गायों के बजाय कमजोर और बीमार गायें दान कर रहे हैं. नचिकेता धार्मिक प्रवित्ति के और बुद्धिमान थे. वे तुरंत ही समझ गए कि पिताजी मोह के कारण ऐसा कर रहे हैं.

 

 

 

पिता के मोह को दूर करने के लिए नचिकेता ने पिता से सवाल किया की वे अपने पुत्र को किसे दान करेन्गे. ऋषि ने पहले इस सवाल को ताल दिया, लेकिन नचिकेता के बार- बार पूछने पर वे क्रोधित हो गए और उन्होंने क्रोध में कह दिया, ” तुझे मृत्यु ( यमराज ) को दान करूँगा.

 

 

 

नचिकेता की कहानी

 

 

 

पिता के वाक्य से Nachiketa को दुःख हुआ. लेकिन सत्य की रक्षा के लिए नचिकेता ने मृत्यु को दान करने का सकल्प भी पिता से पूरा करवा लिया. उसके बाद नचिकेता यमराज को ढूँढते हुए यमलोक पहुँच गये.

 

 

 

यम के दरवाजे पर पहुंचने पर नचिकेता को पता चला कि यमराज वहाँ नहीं हैं, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और तीन दिन तक बिना कुछ खाए-पिए वहीँ बैठे रहे.

 

 

 

यम ने लौटने पर नचिकेता के बारे में द्वारपाल से पूछा और बालक की पितृभक्ति और कठोर संकल्प से वे बड़े खुश हुए. यमराज ने नचिकेता की पिता की आज्ञा के पालन और तीन दिन के कठोर प्रण करने के लिए तीन वर माँगने के लिए कहा.

 

 

 

तब नचिकेता ने पहला वर पिता का स्नेह माँगा. दूसरा वर अग्नि विद्या जानना माँगा और तीसरा वर मृत्यु रहस्य और आत्मज्ञान को लेकर था. यम ने आखिरी वर को टालने की भरपूर कोशिश की और नचिकेता को आत्मज्ञान के बदले कई सांसारिक सुख-सुविधाओं को देने का लालच दिया.

 

 

 

लेकिन अडिग रहे. उन्हें मृत्यु का रहस्य जानना था. उन्होंने सभी सुख-सुविधाओं को नाशवान जानते हुए नकार दिया. अंत में विवश होकर यमराज ने जन्म- मृत्यु से जुड़े रहस्य बताये.

 

 

 

यमराज-नचिकेता संवाद Nachiketa Story

 

 

 

किस तरह शरीर से होता है ब्रह्म का ज्ञान व दर्शन?

 

 

 

मनुष्य शरीर दो आँख,  दो कान, नो नाक के छिद्र, एक मुंह, ब्रह्मरंध्र, नाभि, गुदा और शिश्न के रूप में ११ दरवाजे वाले नगर की तरह है, जो की ब्रह्म की नगरी ही है.

 

 

 

 

वे मानव के ह्रदय में रहते हैं. इस रहस्य को समझकर जो मनुष्य ध्यान और चिंतन करता है. उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता है. ऐसा ध्यान और चिंतन करने वाले लोग मृत्यु के बाद जन्म- मृत्यु के बंधन से भी मुक्त हो जाता है.

 

 

 

क्या आत्मा मरती या मारती है?

 

 

 

जो लोग आत्मा को मारने या मरने वाला मानते हैं, वे असल में आत्मा को नहीं जानते और भटके हुए हैं. उनकी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए. क्योंकि आत्मा  न तो मारती है और ना ही मरती है.

 

 

 

कैसे हृदय में माना जाता है परमात्मा का वास?

 

 

 

मनुष्य का ह्रदय ब्रह्म को पाने का स्थान माना जाता है. यमदेव ने बताया मनुष्य ही परमात्मा को पाने का अधिकारी माना गया है. उसका ह्रदय अंगूठे की मापका होता है.

 

 

 

इसलिए इसके अनुसार ब्रह्म को अंगूठे के आकर का कहा जाता है. अपने ह्रदय में भगवान् का वास मानने वाला व्यक्ति यह मानता है कि दूसरों के ह्रदय में भी इसी तरह ब्रह्म विराजमान है. इसलिए दूसरों की बुराई या घृणा से दूर रहना चाहिए.

 

 

 

आत्मा का रूप क्या है? Nachiketa Story in Hindi

 

 

यमदेव के अनुसार शरीर के नाश होने के साथ ही जीवात्मा का नाश नहीं होता. आत्मा का भोग-विलास, नाशवान, अनित्य और जड़ शरीर से कोई लें-दें नहीं है.  यह अनंत, अनादी और दोष रहित है.  ना कोई कार्य यानी इसका जन्म  होता और ना ही मरती है.

 

 

 

यदि कोई व्यक्ति आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को नहीं जानता तोउसे कैसे फल भोगने पड़ते हैं?

 

 

 

जिस तरह से वर्षा का जल एक ही होता है, लेकिन ऊंचे पहाड़ों पर बरसने से वह एक जगह नहीं रुकता और नीचे की और बहता है. कई प्रकार के रंग-रूप और गंध बदलता है.

 

 

 

उसी प्रकार एक ही परमात्मा से जन्म लेने वाले देव, असुर और मनुष्य भी भगवान् को अलग-अलग मानते हैं और अलग मानकर ही पूजा करते हैं. उनकी पूजा पद्धति अलग होती है. बारिश के जल की तरह ही सुर-असुर और मनुष्य कई योनियों भटकते हैं.

 

 

 

 

ब्रह्म का स्वरुप कैसा है और वे कहाँ और कैसे प्रकट होते हैं?

 

 

 

ब्रह्म प्राकृतिक गुणों से एकदम अलग हैं. वे स्वयं प्रकट होने वाले देवता हैं. इनका नाम वसु है. वे ही मेहमान बनकर हमारे घरों में आते हैं. यज्ञ में पवित्र अग्नि और उसमें आहुति देने वाले भी वासु देवता ही होते हैं.

 

 

 

इसी तरह सभी मनुष्यों, श्रेष्ठ देवताओं, पितरों, आकाश और सत्य में स्थित होते हैं. जैम में मछली हो या शंख, पृथ्वी पर पेड़- पौधे, अंकुर, अनाज, औषधि हो या पर्वतों में नदी, झरने और यज्ञ फल के तौर पर भी ब्रह्म ही प्रकट होते हैं. इस प्रकार ब्रह्म प्रत्यक्ष देव हैं.

 

 

 

आत्मा के निकलने के बाद शरीर में क्या रह जाता है?

 

 

 

जब आत्मा शरीर से निकल जाती है तो उसके साथ ही प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी निकल जाता है. मृत शरीर में क्या बाकी रहता है, यह नजर तो कुछ नहीं आता, लेकिन वह परब्रह्म उस शरीर में रह जाता है, जो हर चेतन और जड़ प्राणी में विद्यमान है.

 

 

 

 

मृत्यु के बाद आत्मा को क्यों और कौन सी योनियाँ मिलती हैं?

 

 

 

यमदेव के अनुसार अच्छे और बुरे कर्मों और शास्त्र, गुरु, संगति, शिक्षा और व्यापार के माध्यम से देखी- सुनी बातों के आधार पर पाप-पुण्य होते हैं.

 

 

 

इनके आधार पर ही आत्मा मनुष्य या पशु के रूप में नया जन्म प्राप्त करती है. जो लोग बहुत अधिक पाप करते हैं, वे मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त पेड़-पौधे, पहाड़, तिनके  आदि जैसे अन्य किसी योनि में जन्म लेते हैं.

 

 

 

 

 

 

क्या है आत्मज्ञान और परमात्मा का स्वरुप? Nachiketa ki Kahani

 

 

मृत्यु से जुड़े रहस्यों को जानने की शुरुआत बालक नचिकेता ने यमदेव से धर्म- अधर्म से सम्बन्ध रहित, कार्य-कारण रूप प्रकृति, भूत भविष्य औए वर्तमान से परे परमात्म तत्व के बारे में जिज्ञासा कर दी.

 

 

 

यमदेव ने नचिकेता को ” ॐ ” को प्रतीक रूप में परब्रह्म का स्वरुप बताया. उन्होंने बताया कि अविनाशी प्रणव यानी ओंकार ही परमात्मा का स्वरुप है.

 

 

 

ओंकार ही परमात्मा को पाने के सभी आश्रयों मेनन सबसे  सर्वश्रेष्ठ और अंतिम माध्यम है. सारे वेद,  कई तरह के छंदों व् मंत्रो में यही रहस्य बताये गए हैं. जगत में परमात्मा के इस नाम व् स्वरुप की शरण लेना ही सबसे बेहतर उपाय है.

 

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