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Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी

Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी
Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी
Written by Hindibeststory

Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी आज हम इस hindi jankari में आपको naga sadhu के बारे में बताने जा रहे हैं कि यी नागा साधू कहां से आते हैं , कहां चले जाते हैं. इनके तौर- तरीके क्या है. वैसे तो naga sadhu हमेशा से ही एक रहस्य रहे हैं.उनके बारे में कोई अधिक नहीं जनता हैं. naga sadhu और aghori sadhu में बहुत फर्क है. दोनों ही hindu dharm को मानते हैं, लेकिन उनके तौर तरीके भिन्न होते हैं.

नागा साधू हिन्दू धर्मावलम्बी साधू है. ये नग्न रहने और युद्ध कला में पारंगत होने के लिए मशहूर हैं. इन्हें इसके लिए विभिन्न तरह की परीक्षाओं से होकर गुजरना होता है. naga baba बनने में ६ से १२ वर्ष तक का समय लगता है. नागा साधू को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. जब उनके गुरु समझते हैं कि अब वह दीक्षा लायक हो गए हैं तो अगली प्रक्रिया की शुरुआत होती है.

naga sanyasi सुबह ४ बजे विस्तर छोड़ने के बाद नित्यकर्म और स्नान के बाद सबसे पहले श्रृंगार करते हैं. इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल व् नौली क्रिया करते हैं. पुरे दिन में मात्र एक बार वे रात में भोजन करते हैं. naga sanyasi बहुत ही कड़ी साधना करते हैं. ये हमेशा ही जमीन पर सोते हैं. ये हमेशा ही अपनी पहचान गुप्त रखते हैं. इन्हें अपनी पहचान सार्वजनिक करने अ अधिकार नहीं होता है. नागा सन्यासी भगवान शिव के भक्त होते हैं. इनके पास रहस्यमयी ताकते हैं.जिन्हें वे अपने कठोर तप से प्राप्त करते हैं.

Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी
Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी

naga sadhu आम जनजीवन से अधिकतर दूर ही रहते हैं. kumbh snan के बाद वे अपने स्थान को लौट जाते हैं. नागा साधू ज्यादातर हिमालय की तलहटी में बनी गुफाओं में रहते हैं. इनके वेश-भूषा के कारण लोग इन्हें क्रोधित मानते हैं. लेकिन ये कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, लेकिन अगर कोई इन्हें बेवजह छेड़ता है तो इनका क्रोध भयानक हो उठता है. ये आम sadhu baba से बहुत अलग होते हैं. नागा साधू को अपने विचार और खानपान दोनों पर ही संयम रखना होता है. अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिण्डदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है . सामान्यतः नागा साधू पुरुष ही होते हैं, लेकिन उनमें कुछ महिलायें भी नागा साधू होती हैं जो सार्वजनिक रूप में एक गेरुआ वस्त्र लपेटे रहती हैं.

naga sadhu इतिहास Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी

मैं इस पोस्ट Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी के माध्यम से आपको Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी जानकारी दे रहा हूँ. भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरुप की नींव आदि गुरु शंकराचार्य ने रखी थी. उनका जन्म ८वी शताब्दी के मध्य में हुआ था. उस भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बेहतर नहीं थी. भारत की धनसंपदा से मोहित तमाम आक्रमणकारी भारत आ रहे थे. जिनमें कुछ यहां के खजाने को ले गए तो कुछ यहाँ के वैभव से मोहित होकर यहीं बस गए. जब वे ही शाशक बन गए तो अपने तौर तरीके थोपने लगे. धर्म और धर्म को मानाने वालों पर कुचक्र किये जाने लगे. ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति को बचाने के लिए अनेकों कार्य किये, जिसमें उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य था देश के चारो कोनो पर चार पीठों का निर्माण करना.

इन चारो पीठों का नाम क्रमशः गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ है. इसके साथ ही आदिगुरू ने आतताइयों से मुकाबले की लिए सनातन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना शुरू की. आदिगुरू यह समझ गए थे कि आतताइयों से केवल आध्यात्मिक लड़ाई से नहीं जीता जा सकता है क्योंकि इनका आध्यात्म से कोई लेना देना नहीं है अतः उन्होंने ऐसी मठों की स्थापना की जहां पर साधू शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान ले सके और धर्म रक्षा में भाग लें. ऐसे मठों को अखाडा कहा जाने लगा. उसकी बाद और भी कई अखाड़े अस्तित्व में आये.

आदिगुरू शंकराचार्य ने उन्हें सुझाव दिया कि मठ, मंदिर और श्रद्धालुओ की सुरक्षा के लिए जरुरत पड़ने पर शक्ति का प्रयोग करें. इसके बाद कई बाहरी आक्रमणों पर इन अखाड़ों ने सुरक्षा कवच का काम किया. कई बार स्थानीय रजा – महाराजा भी विदेशी आक्रान्ताओं से लड़ने के लिए नागा योद्धा साधुओ का सहयोग लेते थे. अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के दौरान नागा साधुओं से उसकी सेना से मुकाबला करते हुए गोकुल की रक्षा की. इतिहास में इस तरह के कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिसमें अनेकों नागा साधुओ ने वीरतापूर्वक भाग लिया.

भारत की आज़ादी के बाद नागा साधुओं ने अपना सैन्य चरित्र त्याग दिया और भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करने लगे. इस समय नागा साधुओं के लगभग १३ अखाड़े हैं . आइये उनके बारे में जानते हैं.

naga sadhu के प्रमुख अखाड़े Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी

१-श्री निरंजनी अखाड़ा –  यह अखाडा ८२६ ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ था. इनके इष्ट देव बाबा भोले के पुत्र कार्तिकेय हैं. इन अखाड़ों में दिगंबर, साधू, महंत, महामंडलेश्वर होते हैं. इनकी शाखाए उज्जैन , प्रयागराज, हरिद्वार, उदयपुर और त्रयेब्केश्वर में हैं.

२- श्री जूना अखाड़ा- इसकी स्थापना उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में ११४५ में हुई. इसे भैरव या जुनादत्त अखाडा भी कहा जाता है. इनके इष्ट भगवान दत्तात्रेय हैं. इनका केंद्र व्वारानासी के हनुमान घाट पर माना जाता है.

३-श्री महानिर्वाण अखाडा- इसकी स्थापना ६७१ इस्वी में हुई. इसके स्थान को लेकर मतभेद है. कुछ लोगों का मानना है कि इनका मूल स्थान बिहार-झारखंड का बैजनाथ धाम है, जबकि कुछ लोग इसका स्थान हरिद्वार में नील धरा को मानते हैं. इनके इष्ट कपिल महामुनि हैं.

४- श्री अटल अखाड़ा – इसकी स्थापना ५६९ ईस्वी में गोंडवाना में हुई थी.इनके ईष्ट भगवान गणेश  हैं. यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है. इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में भी हैं.

५-श्री आह्वान अखाड़ा – इसकी स्थापना ६४६ में हुई और इसे १६०३ में पुनर्संयोजित किया गया. इनके इष्ट श्री दत्तात्रेय और भगवान गणेश हैं. इसका केंद्र काशी है और आश्रम ऋषिकेश में भी है.

६-श्री आनंद अखाडा- यह अखाड़ा ८५५ ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में स्थापित हुआ था.इसका केंद्र वाराणसी में है. इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं.

७-श्री पंचाग्नि अखाडा- इस अखाड़े की स्थापना ११५५ में हुई. इनके ईष्ट गायत्री है. इनका मुख्य केंद्र वाराणसी है.इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं. परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं.

८-श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा- यह अखाड़ा ईस्वी ८६६ में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं. इनका ईष्ट गोरखनाथ हैं. इनमें बारह पंथ हैं. यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है. इनकी त्र्यंबकेश्वर शाखा त्र्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है.

९= श्री वैष्णव अखाड़ा – इसकी स्थापना १५९५ में दारागंज में श्री मध्य्मुरारी में हुई. समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने. इनका अखाड़ा त्र्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था. १८४८ तक शाही स्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था. परंतु १८४८ में शैव  और वैष्णव साधुओं में पहले स्नान करने के मुद्दे पर झगड़े हुए, तब श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाय और उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्थ पर स्नान किया. १९३२ से ये नासिक में स्नान करने लगे. आज भी यह स्नान नासिक में ही होता है.

१०- श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाडा- इस अखाड़े की स्थापना १७१० में हुई. इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं. इनमें सांप्रदायिक भेद हैं. इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है.उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है.

११-श्री उदासीन नया अखाड़ा- यह अखाड़ा १९१० में स्थापित हुआ. इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया.इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे.

१२- श्री निर्मल पंचायती अखाडा- इस अखाड़े को १७८४ में हरिद्वार कुम्भ मेले में एक बड़ी सभा में विचार करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने की.इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रंथ साहिब है.इनकी शाखाये प्रयाग, हरिद्वार,उज्जैन,त्रंबकेश्वर में है.

१३ निर्मोही अखाडा- इस अखाड़े की स्थापना रामनन्दाचार्य ने १७२० में की थी. इसकी शाखाये उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड में है.

मित्रों naga sadhu, naga sanyasi की यह जानकारी Naga sadhu के बारे में पूरी जानकारी आपको कैसी लगी अवश्य ही बताएं. और भी hindi kahani के लिए इस लिंक https://www.hindibeststory.com/matsyaavatar-ki-bhakti-pauranik-katha/पर क्लिक करें.



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