hindi god story

Narasimha god Story in Hindi

narasimha god
Written by Abhishek Pandey

narasimha god   नृसिंह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से चतुर्थ अवतार हैं जो वैशाख में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अवतरित हुए. पृथ्वी के उद्धार के समय भगवान ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया. उसका बड़ा भाई हिरण्यकशिपु बड़ा रुष्ट हुआ. उसने अजेय होने का संकल्प किया. सहस्त्रों वर्ष बिना जल के वह सर्वथा स्थिर तप करता रहा. ब्रह्मा जी सन्तुष्ट हुए। दैत्य को वरदान मिला. उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया. लोकपालों को मार भगा दिया. स्वत सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया.

 

 

 

देवता निरूपाय थे. असुर को किसी प्रकार वे पराजित नहीं कर सकते थे. हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थें .एक दिन सहज ही अपने चारों पुत्रों में सबसे छोटे प्रह्लाद से पूछा -बेटा, तुझे क्या अच्छा लगता है ?

 

 

प्रह्लाद ने कहा – इन मिथ्या भोगों को छोड़कर वन में श्री हरि का भजन करना …..ये सुनकर हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हो गया , उसने कहा – इसे मार डालो. यह मेरे शत्रु का पक्षपाती है…..असुरों ने आघात किया. भल्ल-फलक मुड़ गये, खडग टूट गया, त्रिशूल टेढ़े हो गये पर वह कोमल शिशु अक्षत रहा. दैत्य चौंका.

 

 

 

प्रह्लाद को विष दिया गया पर वह जैसे अमृत हो. सर्प छोड़े गये उनके पास और वे फण उठाकर झूमने लगे. मत्त गजराज ने उठाकर उन्हें मस्तक पर रख लिया. पर्वत से नीचे फेंकने पर वे ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों. समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर दो क्षण पश्चात ऊपर आ गये. घोर चिता में उनको लपटें शीतल प्रतीत हुई. गुरु पुत्रों ने मन्त्रबल से कृत्या (राक्षसी) उन्हें मारने के लिये उत्पन्न की तो वह गुरु पुत्रों को ही प्राणहीन कर गयी. प्रह्लाद ने प्रभु की प्रार्थना करके उन्हें जीवित किया.

 

 

 

अन्त में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बाँध दिया और स्वयं खड्ग उठाया. और कहा – तू किस के बल से मेरे अनादर पर तुला है , कहाँ है वह ?

 

 

प्रह्लाद ने कहा – सर्वत्र? इस स्तम्भ में भी .

 

 

प्रह्लाद के वाक्य के साथ दैत्य ने खंभे पर घूसा मारा. वह और समस्त लोक चौंक गये. स्तम्भ से बड़ी भयंकर गर्जना का शब्द हुआ. एक ही क्षण पश्चात दैत्य ने देखा- समस्त शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का, बड़े-बड़े नख एवं दाँत, प्रज्वलित नेत्र, स्वर्णिम सटाएँ, बड़ी भीषण आकृति खंभे से प्रकट हुई. दैत्य के अनुचर झपटे और मारे गये अथवा भाग गये. हिरण्यकशिपु को भगवान नृसिंह ने पकड़ लिया.

 

 

 

मुझे ब्रह्माजी ने वरदान दिया है! छटपटाते हुए दैत्य चिल्लाया. दिन में या रात में न मरूँगा, कोई देव, दैत्य, मानव, पशु मुझे न मार सकेगा. भवन में या बाहर मेरी मृत्यु न होगी. समस्त शस्त्र मुझ पर व्यर्थ सिद्ध होंगे. भुमि, जल, गगन-सर्वत्र मैं अवध्य हूँ.

 

 

नृसिंह बोले- देख यह सन्ध्या काल है. मुझे देख कि मैं कौन हूँ. यह द्वार की देहली, ये मेरे नख और यह मेरी जंघा पर पड़ा तू. अट्टहास करके भगवान ने नखों से उसके वक्ष को विदीर्ण कर डाला.

 

 

वह उग्ररूप देखकर देवता डर गये, ब्रह्मा जी अवसन्न हो गये, महालक्ष्मी दूर से लौट आयीं, पर प्रह्लाद-वे तो प्रभु के वर प्राप्त पुत्र थे. उन्होंने स्तुति की. भगवान नृसिंह ने गोद में उठा कर उन्हें बैठा लिया और स्नेह करने लगे.

 

 

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