Navratri Story in Hindi : मां दुर्गा के उपासना का पर्व. जाने गुप्त नवरात्रि के बारे में
Happy Navratri

Navratri Story in Hindi : मां दुर्गा के उपासना का पर्व. जाने गुप्त नवरात्रि के बारे में

Navaratri 2019 Date Kab Hai?

 

 

Navratri मां दुर्गा के उपासना का पर्व है. जिसमें माता  भवानी के नौ रूपों की पूजा की जाती है. यह त्यौहार पुरे भारत में बहुत  ही श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है.

 

 

Navratri 2019- Sunday, 29 September 

 

Navratri 2019 End – Monday, 07 October   

 

 

 

नवरात्री कितने प्रकार की होती है?

 

 

 

बहुत ही कम लोगों को पता है कि नवरात्रि ४ प्रकार की होती है.  पुरे एक वर्ष में ४ नवरात्रि आते हैं.

 

 

१- वासंतीय नवरात्रि:- हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र यानी मार्च- अप्रैल में पड़ने वाली नवरात्रि को वासंतीय नवरात्रि कहा जाता है.

 

२- शारदीय नवरात्रि :- अश्विन माह यानी सितम्बर- अक्टूबर में पड़ने वाली नवराति को शारदीय नवरात्रि कहते हैं. इसे ही मुख्य नवरात्रिकहा जाता है.

 

३- गुप्त नवरात्रि प्रथम :- यह नवरात्रि आषाढ़ यानी जून- जुलाई में आता है. यह गृहस्थो के लिए होता है.

 

४- गुप्त नवरात्रि द्वितीय:- यह नवरात्रि माघ यानी जनवरी-फ़रवरी में आते हैं और यह भी गृहस्थों के लिए नहीं होते. इसीलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा गया है.

 

 

क्या होती है गुप्त नवरात्रि? What is Gupt Navratri?

 

 

गुप्त नवरात्रि जसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इसे खुले तौर पर नहीं मनाया जाता है और यही कारण है कि इसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते है.

 

 

यह नवरात्रि तंत्र साधकों के लिए होती है. इस नवरात्रि में तांत्रिक अपने तंत्र विद्या को सिद्ध करते हैं. यह तंत्र साधना के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है.

 

 

 

गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है. इस दौरान माता भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं.

 

 

 

इस दौरान तांत्रिक लम्बी और कड़ी साधना कर दुर्लभ शक्तियों को प्राप्त करने का प्रयास करते है. गुप्त नवरात्रि को वरही नवरात्रि भी कहा जाता है.

 

 

यह वाराही देवी को समर्पित है. यह माना जाता है कि इस नवरात्री के दौरान देवी तुरंत भक्तों की प्रार्थनाओं पर ध्यान देती हैं और उनकी इच्छाओं को पूरा करती हैं.

 

 

नवरात्रि की कथा. आखिर क्यों मनाई जाती है नवरात्रि? 

 

 

एक नगर में सुरथ नामक एक राजा था, लेकिन उसका राज्य में मन नहीं लग रहा था. यह देख पड़ोसी राजा ने हमला कर दिया.सुरथ की सेना भी शत्रु से मिल गयी थी.

 

 

 

परिणामस्वरूप राजा सुरथ की हार हुयी और वह जान बचाकर जंगल की तरफ़ भागा.उसी वन में समाधि नामका एक बनिया अपनी स्त्री एवं संतान के दुर्व्यवहार के कारण निवास करता था.

 

 

 

उसी वन में बनिया समाधि और राजा सुरथ की भेंट हुई. दोनो का परस्पर परिचय हुआ..वे दोनो घूमते हुये महर्षि मेघा के आश्रम में पहुंचे . महर्षि मेघा ने उन दोनो के आने का कारण पूंछा.

 

 

 

वे दोनो बोले के हम अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा अपमानित एवं तिरस्कृत होने पर भी हमारे ह्रदय में उनका मोह बना हुआ है.इसका कारण क्या है?

 

 

 

महर्षि मेघा ने उन्हे समझाया कि मन शक्ति के आधीन होता है और आदि शक्ति के अविद्या और विद्या दो रूप है. विद्या ज्ञान स्वरूप है और अविद्या अज्ञान स्वरूप जो व्यक्ति अविद्या (अज्ञान) के आदिकरण रूप में उपासना करते है.

 

 

 

उन्हे वे विद्या स्वरूपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती हैं. इतना सुन राजा सुरथ ने प्रश्न किया- हे महर्षि ! देवी कौन है? उसका जन्म कैसे हुआ? महर्षि बोले- आप जिस देवी के विषय में पूंछ रहे है.वह नित्य स्वरूपा और विश्वव्यापिनी है.

 

 

 

 

उसके बारे में ध्यानपूर्वक सुनो,कल्पांत के समय विष्णु भगवान क्षीर सागर में अनन्त शैया पर शयन कर रहे थे…तब उनके दोनो कानों से मधु और कैटभ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुये.

 

 

 

वे दोनों विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी को मारने दौडे. ब्रह्माजी ने उन दोनो राक्षसों को देखकर विष्णुजी की शरण में जाने की सोची. परन्तु विष्णु भगवान उस समय सो रहे थे. तब उन्होने भगवान विष्णु को जगाने हेतु उनके नयनों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति की.

 

 

 

परिणामस्वरूप तमोगुण अधिष्ठात्री देवी विष्णु भगवान के नेत्र नासिका मुख तथा ह्रदय से निकलकर ब्रह्माजी के सामने उपस्थित हो गयी…योगनिद्रा के निकलते ही विष्णु भगवान उठकर बैठ गये. भगवान विष्णु और उन राक्षसों में पांच हजार साल तक युद्ध चलता रहा. अन्त में मधु और कैटभ दोनो राक्षस मारे गये.

 

 

 

ऋषि बोले- अब ब्रह्माजी की स्तुति से उत्पन्न महामाया देवी की वीरता तथा प्रभाव का वर्णन करता हूँ. उसे ध्यानपूर्वक सुनो.

 

 

 

एक समय देवताओं के स्वामी इन्द्र तथा दैत्यों के स्वामी महिषासुर में सैकडों वर्षों तक घनघोर संग्राम हुआ. इस युद्ध में देवराज इन्द्र की पराजय हुई और महिषासुर इन्द्रलोक का स्वामी बन बैठा.

 

 

 

अब देवतागण ब्रहमा के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गये. देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर क्रोधित हुये.

 

 

 

भगवान विष्णु के मुख तथा ब्रह्माजी और शिवजी तथा इन्द्र आदि के शरीर से एक तेज पुंज निकला…जिससे समस्त दिशायें जलने लगीं और अन्त में यही तेजपुंज एक देवी के रूप में परिवर्तित हो गया.

 

 

 

देवी ने सभी देवताओं से आयुध एवं शक्ति प्राप्त करके उच्च स्वर में अट्टहास किया जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गयी.महिषासुर अपनी सेना लेकर इस सिंहनाद की ओर दौडा उसने देखा कि देवी के प्रभाव से तीनों लोक आलोकित हो रहे है.

 

 

 

महिषासुर की देवी के सामने एक भी चाल सफ़ल नही हुयी और वह देवी के हाथों मारा गया आगे चलकर यही देवी शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों का बध करने के लिये गौरी देवी के रूप में अवतरित हुयी.

 

 

 

इन उपरोक्त व्याख्यानों को सुनाकर मेघा ऋषि ने राजा सुरथ तथा बनिया से देवी स्तवन की विधिवत व्याख्या की.राजा और वणिक नदी पर जाकर देवी की तपस्या करने लगे.

 

 

 

तीन वर्ष तक घोर तपस्या करने के बाद देवी ने प्रकट होकर उन्हे आशीर्वाद दिया. इससे वणिक संसार के मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लग गया और राजा सुरथ ने शत्रुओं पर आक्रमण करके विजय प्राप्त करके अपना वैभव प्राप्त कर लिया

 

 

 

 

Navratri
Navratri

 

 

मां दुर्गा के सभी नाम और अर्थ 

 

 

१- शैलपुत्री     – पहाड़ो की पुत्री.

 

२- ब्रह्मचारिणी  – ब्रह्मचारिणी .

 

३- चंद्रघंटा        – चंद्र की तरह चमकने वालीं .

 

४- कुष्मांडा       – जिसके पैरों में पूरा जगत हो.

 

५- स्कन्दमाता     – कार्तिक स्वामी की माता.

 

६- कात्यायनी       – कात्यायन आश्रम में जन्मीं.

 

७- कालरात्री         – काल का नाश करने वाली.

 

८- महागौरी            – श्वेतवर्ण वाली मां.

 

९- सिद्धिदात्री          – सर्वसिद्धि देने वाली.

 

 

नवरात्रि पूजा विधि  Navratri Puja- Vidhi

 

 

नवरात्रि में  मां महालक्ष्मी… मां महासरस्वती और मां दुर्गा के नव रूपाें की पूजा की जाती है. इन नव रूपाें के नाम इस प्रकार हैं।

 

 

शैलपुत्री -मां दुर्गा के नव रूपाें में मां शैलपुत्री प्रथम स्वरूप में पूजी जातीं हैं.पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। इनका वाहन वृषभ है। मां शैलपुत्री के दाये हाथ में त्रिशूल तथा बायें हाथ में मां ने कमल पुष्प धारण कर रखा है।

 

 

 

ब्रह्मचारिणी– पर्व के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है।  ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तप का आचरण करने वाली।  मां का यह रूप भक्ताे काे अनन्त फल देने वाला है। मां के इस रूप की उपासना से तप, त्याग, सदाचार और संयम की वृद्धि  होती है।

 

 

 

चन्द्रघंटा- माता दुर्गा के तीसरे स्वरूप का नाम मां चन्द्रघंटा है।  नवरात्रि के पर्व में तीसरे दिन के पूजन का बहुत ही महत्व है।  मां दुर्गा के इस स्वरूप के पूजन से मनुष्य काे असीम कृपा मिलती है।  मनुष्य काे दिव्य वस्तुओं के दर्शन हाेते हैं। उन्हें दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं।  मां के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है।  इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथ हैं. मां खड्ग, त्रिशूल, तलवार अन्य अस्त्र शस्त्र धारण किये हुये हैं।

 

 

 

कुष्माण्डा- नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्माण्डा की उपासना की जाती है। अपनी हंसी से ब्रह्मांड काे उतप्न करने के कारण मां काे कुष्माण्डा के नाम से जाना गया। जब हर तरफ अंधकार ही अंधकार था।  सृष्टि की रचना नहीं हुई थी। तब मां ने अपने धीमे हास्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति की। इसलिए इन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है। मां काे कुम्हड़े की बलि बहुत ही प्रिय है और कुम्हड़े काे संस्कृत में कुष्मांड कहा जाता है। इस प्रकार भी मां का नाम कुष्माण्डा पड़ा।

 

 

 

स्कंदमाता – पाचवें दिन मां के स्वरूप स्कंदमाता की उपासना की जाती है। मां की चार भुजायें हैं।  इनका वाहन सिंह है।  मां अपने भक्ताें की समस्त परेशानियाें काे नष्ट कर उनकी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करतीं हैं। इनकी कृपा से अग्यानी मनुष्य भी प्रकाण्ड विद्वान हाे जाता है।

 

 

 

कात्यायनी- छठें दिन मां कात्यायनी की उपासना की जाती है।  मां के इस रूप की उपासना से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्य के समस्त राेज, शाेक, कष्ट, डर नष्ट हो जाते हैं।  मां की चार भुजायें हैं. इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है।  इनका वाहन सिंह है।

 

 

कालरात्रि- मां कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। इस दिन साधक का मन ” सहस्त्रार” चक्र में रहता है। मां कालरात्रि की उपासना से ब्रहमाण्ड की समस्त सिद्धियाें के दरवाजे खुल जाते है।  मां का यह रूप अत्यंत ही भयानक है। मां के इस रूप के स्मरण मात्र से ही भूत पिशाच थर थर कांपने लगते हैं।

 

 

महागौरी- आठवें दिन मां महागाैरी की उपासना की जाती है। मां महागाैरी का रूप गाैर वर्ण है। इनका वाहन वृषभ है। इनकी चार भुजायें हैं. इन्हाेने त्रिशूल और डमरू धारण किया हुआ है। मां के इस रूप की उपासना से भक्ताे सभी पाप धुल जाते हैं और अलाैकिक शक्तियां प्राप्त हाेती हैं।

 

 

 

सिद्धिदात्रि- नाैवें दिन मां सिद्धिदात्रि की  पूजा की जाती है।  इनकी आरधना से मनुष्य अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठाें सिद्धियाें की प्राप्ति कर लेता है। इन देवी का वाहन सिंह हैं,इनकी चार भुजायें हैं। नियम और संयम से नवरात्रि व्रत का पालन करने पर मनुष्य काे समस्त गुणाें की प्राप्ति होती है।

 

 

 

 

 

नवरात्रि का त्यौहार हिन्दू धर्म के मानने वालों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. यह प्रसिद्द Festival of India है. आइये आज नवरात्रि पूजा विधि जानते हैं.

 

१- नवरात्रि पर सुबह जल्दी उठें और नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ कपडे धारण करें और पूजा घर को भी साफ़ करें.

 

२- पूजन से पूर्व सभी पूजन सामग्री एकत्रित कर लें.

 

३- मां दुर्गा की फोटो या मूर्ति को लाल कपडे में ही रखे.

 

४- मिट्टी के पात्र में जौ के बीज बोयें और नौ दिन तक उसपर पानी का छिडकाव करें.

 

५- नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में कलश को लाल कपडे में लपेटकर स्थापित करे.

 

६- कलश में गंगाजल डालें और आम की पत्तियां रखकर उसपर जता नारियल रखें. नारियल में लाल चुनरी को कलावा के माध्यम से बांधे.

 

७- कलश को मिट्टी के बर्तन के पास, जिसमें जौ बोये हैं उसके पास रख दें.

 

८- फूल-माला, रौली, कपूर, अगरबत्ती, अक्षत और ज्योति से मां दुर्गा की पूजा करें और यही प्रक्रिया नौ दिन तक करें.

 

९- दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और सुख – समृद्धि की प्रार्थना करें.

 

१०- अष्टमी या नवमी ( मुहूर्त के अनुसार ) दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्यायों का पूजन करें और भोग लगाएं.

 

११- नवरात्रि के आखिरी दिन पूजा के बाद घाट विसर्जन करें या कलश उठायें.

 

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