panchtantra story

panchatantra

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Written by Abhishek Pandey

panchatantra आपसी फूट बहुत समय पहले की बात है . एक जंगल में विचित्र पक्षी रहता था. उसका धड तो एक ही था , लेकिन सिर दो थे. उसका नाम था भारुन्द. धड एक होने के बावजूद भी दोनों सिरों में एकता नहीं थी. दोनों सिर हर समय एक दुसरे को नीचा दिखने के फ़िराक में रहते थे.

 

सभी जिव जंतु , पशु पक्षी , मानव प्रत्येक प्राणी सोचने के लिए दिमाग का इस्तेमाल करता है और दिमाग होता है सिर में . इस तरह से दो सिर होने के कारण भारुन्द के पासा दिमाग भी दो था. इस तरह उसका एक दिमाग पूरब जाने की सोचता तो दूसरा पश्चिम और इस खीच तान की वजह से भारुन्द खडा भी नहीं हो पाता था.

कहते हैं जब भूख लगती है तब अक्ल ठिकाने आती है . वही हुआ भारुन्द के साथ. जब उसे भूख लगी तो दोनों सिरों का पेट एक होने की वजह से दोनों को ही खाने का ध्यान आया . अतः दोनों इस मामले में एकजुट हुए और भारुन्द भोजन की तलाश में एक तालाव के किनारे पहुंचा.

 

वहा उसके एक सिर को एक फल गिरा दिखाई दिया . उसंने चोंच मारकर उसे चखकर देखा तो जीभ चटकाते हुए बोला ” वाह , ऐसा स्वादिष्ट फल तो मैंने आज तक नहीं खाया. भगवान ने दुनिया में क्या – क्या चीजें बने है.”

 

“अच्छा ! जरा मई भी चख देखू .” कहकर दुसरे सिर ने अपनी चोंच उस फल की और बढ़ाई ही थी कि पहले सिर ने झटककर दुसरे सिर को दूर फेंका और गुस्से से बोला ” खबरदार! जो अपनी गन्दी चोंच से यह फल खाया तो , यह फल मैंने पाया है और इसे मैं ही खाऊंगा.”

 

भाई हमारा पेट तो एक ही है ना…कम से कम खाने पीने में तो हमें ऐसा नहीं करना चाहिए…दुसरे सिर ने दलील दी.

 

ठीक है …हमारा पेट एक ही है तो मैं खाऊंगा तो तुम्हारा भी पेट भरेगा ही न…..तो इसमें झगड़ा किस बात का…..पहले सिर ने कहा

 

अरी खाने का मतलब सिर्फ पेट भरना ही थोड़े ही होता है. जीभ का स्वाद भी तो कोई चीज है. इससे ही तो स्वाद का परम आनंद मिलता है. खाने का असली मजा तो मुंह में ही है…..दुसरे सिर ने कहा

 

मैंने तुम्हारे स्वाद और आनंद का ठेका थोड़े ही ले रखा है. फल खाने के बाद पेट से डकार आएगी ना . वह डकार तुम्हारे मुंह से भी निकलेगी. उसी से गुजरा कर लियो….पहले सिर ने दुसरे सिर को चिढाते हुए बोला

 

वे दोनों आपस में ऐसे ही लड़ रहे थे कि इतने में एक दूसरा पक्षी आया और इन्हें लड़ते देख तेजी से फल लेकर चलते बना और भारुन्द ताकता ही रह गया. इस तरह से फल किसी को भी नहीं मिला. इससे यही सिख मिलाती है कि आपस की फूट सदा ही भारी पड़ती है.

 

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