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Parikshit Story in Hindi . कैसे हुई परीक्षित की मृत्यु। जनमेजय का नाग यज्ञ।

Parikshit Story in Hindi
Written by Abhishek Pandey

Raja Parikshit ka Janm राजा परीक्षित का जन्म

 

 

 

Parikshit Story in Hindi जब पांडवों को पता चला कि दुर्योधन सरोवर में छिपा है तो उन्होंने जाकर उसे युद्ध के लिए ललकारा… दुर्योधन और भीम में भयंकर युद्ध हुआ… अंत में भीम ने दुर्योधन को पराजित कर दिया और मरणासन्न अवस्था में छोड़कर वहां से चले गए।

 

 

 

उस समय कौरवों के केवल तीन ही महारथी बचे थे-अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा… संध्या के समय जब उन्हें पता चला कि दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में सरोवर के किनारे पड़े हैं, तो वे तीनों वहां पहुंचे।

 

 

 

दुर्योधन उन्हें देखकर अपने अपमान से क्षुब्ध होकर विलाप कर रहा था… अश्वत्थामा ने प्रतिज्ञा की कि मैं चाहे जैसे भी हो, पांडवों का वध अवश्य करूंगा… दुर्योधन ने वहीं अश्वत्थामा को सेनापति बना दिया।

 

 

 

अश्वत्थामा, कृपाचार्य व कृतवर्मा रात के अंधेरे में पांडवों के शिविर में गए, लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि उस समय पांडव अपने शिविर में नहीं हैं।

 

 

 

रात में उचित अवसर देखकर अश्वत्थामा हाथ में तलवार लेकर पांडवों के शिविर में घुस गया, उसने कृतवर्मा और कृपाचार्य से कहा कि यदि कोई शिविर से जीवित निकले तो तुम उसका वध कर देना।

 

 

 

Raja Parikshit Ke Pita Ka Naam 

 

 

 

अश्वत्थामा ने धृष्टद्युम्न, शिखंडी, उत्तमौजा आदि वीरों के साथ द्रौपदी के पांचों पुत्रों का भी वध कर दिया और शिविर में आग लगा दी….जब उसने यह बात दुर्योधन को बतायी तो उसे बड़ा ही कष्ट हुआ….उसने कहा कि सिर्फ पांडवों का वध चाहता था…उनके पुत्रों का नहीं और इस शोक में उसकी मृत्यु हो गई।

 

 

 

जब पांडवों को पता चला कि अश्वत्थामा ने छल पूर्वक सोते हुए हमारे पुत्रों व परिजनों का वध कर दिया है तो उन्हें बहुत क्रोध आया. पांडव अश्वत्थामा को ढूंढने निकल पड़े।

 

 

 

अश्वत्थामा को ढूंढते-ढूंढते पांडव महर्षि व्यास के आश्रम तक आ गए. तभी उन्हें यहां अश्वत्थामा दिखाई दिया. पांडवों को आता देख अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।

 

 

 

इसपर अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का आह्वान कर दिया…..दो ब्रह्मास्त्र के टकराने से सम्पूर्ण पृथ्वी पर संकट आ सकने के डर से श्रीकृष्ण और महर्षि वेदव्यास ने अर्जुन और अश्वत्थामा को अपने-अपने शस्त्र लौटाने के लिए कहा।

 

 

 

अर्जुन ने ऐसा ही किया किंतु अश्वत्थामा को अस्त्र लौटाने का विद्या नहीं आती थी…. तब उसने अपने अस्त्र की दिशा बदल कर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।

 

 

 

ताकि पांडवों के वंश का नाश हो जाए… तब श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को सदियों तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया और पांडवों ने उसके मस्तक की मणि निकाल ली।

 

 

 

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को न्यायपूर्वक शासन करने का उपदेश दिया. सूर्य के उत्तरायण होने के बाद भीष्म अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं…. पांडव पूरे विधि-विधान से भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार करते हैं पुन: हस्तिनापुर लौट आते हैं।

 

 

 

पितामह भीष्म की मृत्यु से युधिष्ठिर जब बहुत व्याकुल हो गए, तब महर्षि वेदव्यास युधिष्ठिर को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह देते हैं. तब युधिष्ठिर कहते हैं कि इस समय यज्ञ के लिए मेरे पास पर्याप्त धन नहीं है।

 

 

 

 

तब महर्षि वेदव्यास ने बताया कि सत्ययुग में राजा मरुत्त थे… उनका धन आज भी हिमालय पर रखा है, यदि तुम वह धन ले आओ तो अश्वमेध यज्ञ कर सकते हो।

 

 

 

युधिष्ठिर ऐसा ही करने का निर्णय करते हैं… शुभ मुहूर्त देखकर युधिष्ठिर अपने भाइयों व सेना के साथ राजा मरुत्त का धन लेने हिमालय जाते हैं। जब पांडव धन ला रहे होते हैं, उसी समय अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा एक मृत शिशु को जन्म देती है… जब यह बात श्रीकृष्ण को पता चलती है तो वह उस मृत शिशु को जीवित कर देते हैं… श्रीकृष्ण उस बालक का नाम परीक्षित रखते हैं।

 

 

 

Raja Parikshit ki Mrityu

 

 

 

जब पांडव धन लेकर लौटते हैं और उन्हें परीक्षित के जन्म का समाचार मिलता है तो वे बहुत प्रसन्न होते हैं… इसके बाद राजा युधिष्ठिर समारोहपूर्वक अश्वमेध यज्ञ प्रारंभ करते हैं।

 

 

 

 

युधिष्ठिर अर्जुन को यज्ञ के घोड़े का रक्षक नियुक्त करते हैं। अंत में बिना किसी रूकावट के राजा युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण होता है। बाद में श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद पांडव भी अत्यंत उदासीन रहने लगे तथा उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया।  उन्होंने हिमालय की यात्रा करने का निश्चय किया।

 

 

 

अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपकर युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों और द्रौपदी के साथ चले गए तथा हिमालय पहुंचे। हिमालय प्रस्थान के समय अर्जुन ने  अपने  पोते परीक्षित को कलयुग के बारे और उसके बुरे प्रभाव के बारे में बता दिया था।

 

 

 

सभी युग और उनका समय 

 

 

 

परीक्षित ने इसका डटकर सामना किया और कलयुग को आत्मसमर्पण कर ब्रह्मा  जी के नियमों का पालन करने को कहा।  तब कलयुग ने कहा, ” हे राजन ! ब्रह्मा जी ने चार युगों का  किया।   सतयुग, त्रेता युग, द्वापर और कलयुग। सतयुग १७,२८, ००० साल, त्रेतायुग १२,९६,००० साल, द्वापर युग ८,६४,००० साल तक रहा।  अब मेरी बारी आयी है।  मुझे ४,३२,००० साल तक रहने के लिए कहा गया है।  मैं तो अपने अधिकार से आया हूँ और आप मुझे आत्मसमर्पण करने के लिए कह रहे हैं। ”

 

 

कलयुग की शुरुआत 

 

 

 

तब परीक्षित को भान हुआ कि यह ब्रह्मदेव का है बनाया हुआ नियम है।  इसे तोड़ा नहीं जा सकता।  तब उन्होंने कलयुग को चेतावनी दी कि वह तब तक मानव जाति को ख़त्म नहीं करेगा, जब तक उनका समय पूर्ण नहीं हो जाता और इसके साथ ही सिर्फ इन पांच जगहों पर ही रहेगा।

 

 

कहाँ – कहाँ होगा कलयुग का स्थान  Where will be the place of Kalyug

 

 

 

१- जहां पर शराब परोसी जाती हो।  लेकिन यहां पर भी तुम  किसी को विवश नहीं कर सकते हो।  तुम केवल यहां वास  करोगे और उस व्यक्ति के ऊपर ही तुम्हारा प्रभाव होगा जो वहाँ अपनी इच्छा से आएगा।

 

२- वेश्यालय – जो लोग यहां आएंगे उन पर तुम्हारा प्रभाव होगा।

 

३- पशुवध गृह –  जहां निर्दोष पशुओं का क़त्ल होगा वहाँ तुम्हारा वास होगा और जो लोग पशुओं के मांस का भक्षण करेंगे और उसका वध करेंगे, उन पर तुम्हारा प्रभाव होगा।

 

४- जुआ- खाना – जो लोग जुआ खेलेंगे उन पर भी तुम्हारा प्रभाव होगा।

 

५- उपरोक्त  सुनकर कलयुग बोला, ” महाराज जो लोग वहाँ जाते हैं वे तो पहले से  पापी होते हैं।  लेकिन जो लोग अच्छे हैं उन्हें मैं कैसे ख़त्म करूंगा।  तब परीक्षित ने कहा लालच ही सबसे बुरी चीज है और लालच का  सबसे बड़ा हथियार सोना है।  अतः  मनुष्य सोना धारण करेगा उस पर तुम्हारा प्रभाव होगा।

 

 

इसके बाद कलयुग ने हर जगह अपना प्रभाव फ़ैलाने लगा।  हर जगह मार – काट, झगड़ा, शोषण बढ़ गए लेकिन परीक्षित के राज्य पर उसका कब्ज़ा नहीं हो सका.

 

 

लेकिन होनी को कौन टाल  सकता है।  एक  दिन  परीक्षित ने अपना मुकुट  धारण किया और जंगल में शिकार खेलने चले  गए।  मुकुट सोने का था।  अतः उनपर कलयुग का प्रभाव हो गया। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से होकर गुजरे।

 

 

 

ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे।  उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया।  इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया।

 

 

 

ऋषि शमीक तो ध्यान में मग्न थें।  उन्हें इसका भान नहीं हुआ, लेकिन जब उनके पुत्र ऋंगी ऋषि को इस बारे में पता चला तो उन्हें   बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दे दिया कि जाओ तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी।   राजा परीक्षित ने इस श्राप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

 

 

 

कुछ समय बाद जब ऋषि शमीक का ध्यान टूटा तो ऋंगी ऋषि ने उन्हें सारी बात बताई तो ऋषि शमीक को बहुत दुःख हुआ।  उन्होंने कहा कि यह बहुत ही बड़ा अनर्थ हो गया।  राजा परीक्षित भगवद्भक्त है।  वे बहुत ही बड़े प्रतापी है।  उनके राज्य में प्रजा बहुत ही खुश है और सुख शान्ति से रहती है।  ऋषि – मुनि बिना किसी परेशानी तप, ध्यान कर रहे हैं।

 

 

Raja Parikshit Ko Mila Shrap 

 

 

अगर राजा की मृत्यु हो जाती है तो राज्य में अजारकता फ़ैल जायेगी।  हर जगह अधर्म का राज हो जाएगा।  राजा ने जो कुछ भी गलती की वह कलयुग के प्रभाव में किया।  वे महान प्रतापी हैं।  वे चाहें तो खुद तुम्हें श्राप दे देंगे। लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि वे ऐसा नहीं करेंगे।

 

 

 

राजा परीक्षित जब राजगृह में पहुंचे और मुकुट उतारा तो कलयुग का प्रभाव समाप्त हो गया और उन्हें ज्ञान की उत्पत्ति हुई। उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था।

 

 

 

तभी वहाँ ऋषि शमीक द्वारा भेजा हुआ एक शिष्य वहाँ आया और उन्हें बताया कि ऋंगी ऋषि ने आपको श्राप दे दिया है और सातवें दिन आपको तक्षक नाग डंसेगा।

 

 

 

राजा ने उस शिष्य को ससम्मान बिठाया और कहा कि, ” ऋषिकुमार ने श्राप देकर मेरे ऊपर उपकार ही किया है। मैंने जो पाप किया है क्षमायोग्य नहीं है। ऋषिकुमार को सन्देश पहुंचा दीजिये कि मैं उनके इस कृपा के लिए अत्यंत आभारी हूँ। ” इस तरह राजा ने उस ऋषि शिष्य का उचित सम्मान कर और क्षमायाचना कर उसे विदा किया।

 

 

 

इसके बाद उन्होंने सात दिन भक्ति भाव में व्यतीत किया।  एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आये। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था।

 

Raja Parikshit Ke Putra Ka Naam 

 

 

 

तक्षक सांपो का राजा था।   मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राजा  परीक्षित को डस लिए।  राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे।  जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे।

 

 

 

 

जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने सर्पमेध  ( कहीं – कहीं इसे सर्पसत्र कहा गया है ) नामक यज्ञ का आयोजन  किया।

 

 

Parikshit Son  Raja Janmejay Story 

 

 

इस यज्ञ के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड में आकर गिर रहे थे… लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया और उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की गति समाप्त हो सकती थी।

 

 

Janmejay Ka Nag Yagya 

 

 

सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए सभी देवता जनमेजय से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे लेकिन जनमेजय किसी भी रूप में अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था।

 

 

 

जनमेजय के यज्ञ को रोकने के लिए अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिनके पिता एक ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या थी… आस्तिक  मुनि की बात जनमेजय को माननी पड़ी और सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक को मुक्त करना पड़ा.

 

 

 

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