Pariyon ki Kahani Pdf / Pari ki Kahani in Hindi / हिंदी परी की कहानी
Pariyon ki kahani

Pariyon ki Kahani Pdf / Pari ki Kahani in Hindi / हिंदी परी की कहानी

 

Pariyon ki kahani in Hindi मित्रों यह एक Moral Story हैं। इसमें परियों की Jadui Kahani In Hindi है।  भवानीपुर के राजा दयाल सिंह बूढ़े हो चुके थे, उनके पांच पुत्र थे, लेकिन कोई बालिग नहीं था. भवानीपुर के बगल की रियासत शंकर गढ़ का राजा चंद्रिका सिंह बहुत कुटिल और चालाक किस्म का था.

 

 

 

 

 

भवानीपुर दयाल सिंह के नेतृत्व में बहुत ही समृद्ध था. शंकर गढ के राजा चंद्रिका सिंह की निगाह में भवानीपुर हमेशा खटकता था. एक दिन दयाल सिंह ने कुछ और रियासतों की मदद से भवानीपुर पर हमला कर दिया.

 

 

 

 

भवानीपुर की सेना वीरता से लदी, लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा. इस लड़ाई में राजा दयाल सिंह वीरगति को प्राप्त हो गये. रियासत पर चंद्रिका सिंह का कब्जा हो गया और रानी पांचों बच्चों के साथ जंगल में चली गयीं.

 

 

Pariyon ki Kahani In Hindi Pdf  परियों की कहानी

 

इसी बीच रानी की तबीययत खराब रहने लगी और दवाइयों के अभाव में उन्होने ने भी इस दुनिया से विदा ले लिया. पांचों लकड़ियाँ तोड़कर उसे बाजार में बेचते, इसी से उनका गुज़ारा चल रहा था. एक दिन सभी भाई खाना खाने बैठे थे तभी सबसे छोटे भाई ने कहा ” यह भी क्या जिंदगी है. आख़िर हम राजा के लड़के हैं”
जब हम राजा के लड़की थे तब की बात दूसरी थी. आज हमारी पहचान एक “लकडहारे ” की है. उसी से हमारा पेट भरता है. दिन में सपने क्यों देखता है.- बड़े भाई ने गुस्से से कहा, “ठीक है, आप लोगों को यह लकड़हारे की जिंदगी मुबारक, लेकिन मैं कुछ बनकर ही वापस आऊंगा . ” सबसे छोटे भाई ने कहा और निकल गया.
उसे किसी ने रोकने की कोशिश भी नहीं की, उन्हें लगा कि वह नाराज़ है, कुछ समय में लौट कर आ जाएगा. लेकिन वह लौट कर नहीं आया. चलते-चलते वह एक जंगल में पहुंच गया. वह बहुत थक चुका था और उसे बहुत तेज प्यास लगी थी. अचानक उसे एक कुँआ दिखाई दिया, उस बाल्टी और रस्सी रखी हुई थी. उसानी कुएँ से पानी निकाला, हाथ मुंह धोकर पानी पिया. तब उसे कुछ राहत महसूस हुई.
अब वह सोचने लगा कि इतने घने जंगल में आखिर किसने यह बाल्टी रखी है. उसने चारो तरफ नजर दौड़ाई तो उसे एक महल नज़र आया. वह महल का निरीक्षण करने लगा तो पाया कि महल चारो तरफ से बंद था, उसमे कोई भी खिड़की या दरवाजे भी नहीं थे, उसके बाहरी दीवार पर खूबसूरत नक्शा बना हुआ था.

बच्चों की कहानी

 

 

 

 

कहीं से भी अंदर जानने का मार्ग ना देख कर वह पुनः कुएं पर आया और पेड़ों से कुछ फल तोड़कर खाये. उसका नाम सूरज था. अब वही उसकी दिनचर्या हो चुकी थी. भाइयों के पास वह नहीं जाना चाहता था, क्योंकि उसे पता था भाई उसे ताना मारेंगे.
एक दिन सुबह कुछ विचित्र सी आवाजें सुनकर वह चौंककर उठा, तो देखा कि ७-८ बंदर उसे घेरे हुए खड़े थे और बार-बार कुएं की तरफ इशारा कर रहे थे. तभी एक बड़ा बंदर जो कि उनका सरदार था, उसने एक गोल सा पत्थर सूरज को दिया. पत्थर को हाथ में लेते ही उसमें से एक अजीब सी रोशनी निकली और उसके बाद सूरज उन बंदरों की हर बात को समझने लगा.
उसके बाद उस बड़े से बंदर ने हाथ जोड़कर कहा कि इस कुएं में उसका बच्चा गिर गया है, कृपया उसे बचा लीजिये. उसके बाद सूरज ने बड़ी मेहनत के बाद बाल्टी की सहायता से उस बंदर के बच्चे को निकाल दिया. बाकी सारे बंदर खुश होते हुये वहां से चले गये, लीकिन वह बंदरों का सरदार वहीं रुका और सूरज से यहां इस घने जंगल मीन आने का कारण पूछा, तब सूरज ने सारी बातें उसे बता दी.
उसके बाद वह सूरज को अपने घर ले आया, वह रोज ताजे, मीठे फल सूरज के लिए लाता था. एक दिन सूरज से उस बंदर से पूछा “सरदार जी आप रोज कहां जाते हो” पहले तो बंदर सकुचाया, लेकिन बार-बार पूछे जाने पर उसने कहा कि ” मैं रोज इंद्र लोक जाता हूँ, वहीं से यह ताजे, मीठे फल लाता हूँ.”
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अरे वाह, मुझे भी ले चलो ना आज….सूरज खुश होते हुये बोला. नहीं..मैं तुम्हें वहां नहीं ले जा सकता, क्योंकि वहां मानव का जाना वर्जित है, हां फिर भी मैं कोशिश ज़रूर करूंगा….बंदर ने कहा.

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कुछ दिन बीते, अचानक एक दिन इंद्र सभा का एक तबला वादक बीमार पड़ गया. अब इंद्रलोक में समस्या खड़ी हो गयी कि तबला कौन बजायेगा. तब बंदर ने चालाकी से सूरज का नाम दे दिया. सभी लोग मान गये. बंदर ने सूरज को एक “चोला” देते हुए सारी बात बताई और उसे वह ” चोला” पहन कर तैयार होने को कहा. तय समय पर वह सूरज को लेकर इंद्रलोक पहुंचा और उसे वही गोला अपने पास रखने को कहा, जिससे वहां की सारी बातें सूरज को समझ आ सके.
बंदर जब सभा में पहुंचा, तो वहां की मुख्य नर्तकी Pari ने द्वार पर ही धीरे से सूरज से पूछा कि ” तबला बजा लेते हो”. जिस पर सूरज ने विनम्रता से कहा “नहीं’
ठीक है, कोई बात नहीं…तुम चाहे जैसा बजाना, मैं सब संभाल लूंगा…बंदर ने कहा और मन ही मन सोचा कि शायद इसे इस अनमोल पत्थर की पूरी जानकारी नहीं हुई है. उस दिन ऐसी समाँ बँधी कि समय का पता ही नहीं चला, सब लोग वाह-वाह का उठे. चलते समय उस नर्तकी के पिता ने कहा कि ” बेटा, आज तुमने पूरे इंद्रलोक को खुश कर दिया. मैं भी इस लोक का वासी हूँ. माँगों क्या माँगते हो, तुम जो मांगोगे मिलेगा…हीरा..मोती…सोने..रत्न, जो चाहो”
नहीं, जाने दीजिए..मैं जो मागुंगा..आप उसे नहीं देंगे…सूरज ने कहा. ऐसी बात नहीं है बेटा, हम ज़बान के पक्के हैं…अगर हमारे बस में है तो हम उसे अवश्य देंगे….नर्तकी के पिता ने कहा.

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ठीक है फिर, मुझे आपकी बेटी का हाथ चाहिए…आपने वचन दिया है और यह आपके हाथ में है और मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं इसे हमेशा खुश रखूँगा…सूरज ने कहा. ठीक है..लेकिन मुझे अपनी बेटी से इस बारे में पूछना पड़ेगा…उसकी राय भी जननी ज़रूरी है…नर्तकी Pari के पिता ने कहा. ठीक फिर…आप पूछ लीजिये..सूरज ने कहा.
नर्तकी के पिता ने सारी बात नर्तकी Pari को बताई, उसका नाम नम्रता था..उसने भी हां कह दी..क्योकि वह भी सूरज को पसंद करने लगी थी. दोनों की धूमधाम से शादी हो गयी. उसके बाद वानरों ने नम्रता के पिता की जादुई शक्तियों से चंद्रिका सिंह पर आक्रमण कर दिया. युद्ध में चंद्रिका सिंह की सेना बुरी तरह हार गयी.
चंद्रिका सिंह को बंदी बना लिया गया. उसके बाद सूरज ने अपने भाइयों का पता लगवाया. उनकी हालत  और हालात दोनों ही पहले की तरह बुरे थे. उनको पुरे सम्मान के साथ महल बुलाया गया. सूरज ने राज्य की गद्दी अपने बड़े भाई को दे दी. वानरों के सरदार को सेनापति बनाया गया. सभी लोग ख़ुशी से रहने लगे.

२- परी की कहानी   Pariyon ki Kahani Jadui एक देश में रजत नामक  राजा राज करते थे।  राजा बहुत ही नेकदिल थे।  उनके राज में प्रजा बहुत ही खुश थी और राज्य बहुत ही प्रगति कर रहा था।

राजा को एक लड़का था जिसका नाम नाहर था।  वह बहुत चतुर और बहादुर था।  किसी भी समस्या को पल भर में ही ख़त्म कर देता था। राजकुमार नाहर को शिकार खेलने का बहुत शौक था।  एक दिन उसने कुछ दिन के लिए आखेट के दौरे पर जाने की योजना बनाई और इसके विषय में राजा से चर्चा की।
राजा ने उसे अनुमति दे दी लेकिन उसे अपने साथ कुछ सैनिकों को ले जाने और समय = समय सूचना देने की हिदायत दी। तय समय पर पर राजकुमार का काफिला जंगल की तरफ प्रस्थान किया।  काफिला जंगल में उचित स्थान देखकर अपना पड़ाव डाल  लेता था।

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समय बीतता गया।  राजकुमार प्रत्येक दिन सूचना राजा तक पहुंचा देता था।  एक दिन की बात राजकुमार शिकार करते हुए जंगल में काफी दूर निकल गया और काफिले से बिछड़ गया। वह बहुत ही परेशान हो गया।  वह इधर – उधर अपने काफिले को ढूंढने लगा।  आवाजें लगाता और इधर काफिले के सैनिक भी उसकी तलाश करने लगे। तभी राजकुमार को प्यास लगी।  अन्धेरा होने लगा था और कहीं भी पानी दिख नहीं रहा था।
उसने भगवान से प्रार्थना की और आगे बढ़ने लगा।  जंगल की सांय – सांय की आवाजें उसके कानों में गूंजने लगी।  कभी उसे लगता कोई उसका पीछा कर रहा है और जैसे ही वह पीछे देखता कोई दिखाई नहीं देता।
धीरे – धीरे आधी रात हो गयी।  घोड़ा भी आगे चलने में आनाकानी करने लगा।  वह भी थक गया था और उसे भी भूख – प्यास लगी थी। तभी सामने एक खुला मैदान दिखाई दिया। चाँदनी रात थी।  आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे।  तभी उसे एक  तालाव दिखाई दिया। वह   ही खुश हुआ।
लेकिन अगले ही पल उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।  वह वहीँ जड़वत हो गया।  राजकुमार ने देखा सफ़ेद सुन्दर कपड़ों में एक लड़की मछलियों से मधुर स्वर में बात कर रही है और मछलियां भी अठखेलियां लेकर उससे बाते कर रहीं हैं।
लेकिन उसे और उसके घोड़े को इतनी अधिक प्यास लगी थी कि अब उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।  वह हिम्मत करके आगे बढ़ा।उसकी आहट  सुनकर वह लड़की मुड़ी।  अहा ! कितनी खूबसूरत लड़की है , राजकुमार ने मन ही मन सोचा।

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नजदीक पहुँचने पर राजकुमार ने अपना परिचय दिया और पानी पीने की अनुमति मांगी।  उस लड़की ने कहा, ” जरूर आप पानी पी  लीजिये ” . उसके बाद राजकुमार ने पानी पीया और अपने घोड़े को भी पानी पिलाया।  उसके बाद उसने कहा, ” आप कौन हैं और इतनी रात को इस तालाव पर क्या कर रहीं हैं ? “
तब उस लड़की ने कहा, ” मैं भी इन मछलियों की तरह एक मछली हूँ।  इस तालाव पर हर पूर्णिमा के एक नन्ही परी और लाल परी आती हैं और यहां नृत्य कराती हैं और हमें सिंड्रेला की कहानी Cinderella ki kahani सुनाती है और कभी – कभी दूसरी परियों की कहानी सुनाती हैं .
हमें भी उनका नाचना बहुत ही अच्छा लगता और हम भी नाचने लगते . एक बार लाल परी का ध्यान मेरे तरफ गया और उन्हें मेरा नृत्य बहुत ही पसंद आया . उन्होंने मुझे परी लोक चलने को कहा . मैं सहर्ष तैयार हो गयी।  वहाँ उसने रानी परी से  बताया और उनसे मुझे  इच्छाधारी परी बनाने को कहा।
रानी परी ने मुझे इच्छाधारी परी बना दिया।  अब मैं जब चाहूँ परी बन सकती हूँ और जब चाहूँ मछली बन सकती हूँ। राजकुमार बड़े ही ध्यान से पूरी बात सुनता रहा।  इच्छाधारी परी बात  पूरी की और राजकुमार से इतनी रात को जंगल में आने का कारण पूछा।
राजकुमार से सारी बात बता दी।  तब इच्छाधारी परी ने कहा, ” राजकुमार चिंता मत करो।  मैं तुम्हे तुम्हारे काफिले तक पहुंचा देती हूँ।  ” उसके बाद परी अपनी छड़ी से उड़नखटोले को बुलाया और फिर राजकुमार और उसके घोड़े को काफिले तक पहुंचा दिया। राजकुमार को देखकर सारे सैनिक बहुत प्रसन्न हुए और राजकुमार ने परी का धन्यवाद किया।
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