Biography

rani laxmi bai information in hindi 

rani laxmi bai information in hindi 
Written by Abhishek Pandey

rani laxmi bai information in hindi rani laxmibai का जन्म वाराणसी में १९ नवम्बर १८२८ को हुआ था. हालांकि इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है . कहीं लक्ष्मीबाई का जन्म १९ नवम्बर १८३५ बताया गया है. उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका / manikarnika था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था. उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था. मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे. माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ साल की थी तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी.घर में मनु की देखभाल के लिए किसी के ना होने के कारण मोरोपंत मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे.

 

rani laxmibai name – मनु , मणिकर्णिका , लक्ष्मीबाई

rani laxmibai father name – मोरोपंत तांबे

rani laxmibai mother nname – भागीरथी बाई

rani laxmibai date of birth – १९ नवम्बर १८२८

rami laxmibai birtplace – गोलघर , वाराणसी 


rani laxmibai husband name – गंगाधर राव नेवालकर

rani laxmibai son name – दामोदर राव

rani laxmibai death – १८ जून , १८५८

rani laxmibai death place – कोटा की सराय , ग्वालियर , मध्यप्रदेश

 

जहाँ चंचल और सुन्दर मनु ने अपनी नटखट अदाओं से सबका मन मोह लिया और सभी लोग उसे प्यार से “छबीली” कहकर बुलाने लगे. मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली. सन् १८४२ में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं. विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया. सन् १८५१ में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया. परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी. सन् १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी. पुत्र गोद लेने के बाद २१ नवम्बर १८५३ को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी. दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया.

 

उस समय ब्रिटिश राज की हड़प निति अपने चरम पर थी. वे अपनी इस निति को आगे बढ़ाने के लिए तरह – तरह के कानून बनाते रहते थे औसकी आड़ में अपनी हड़प निति जारी रखते थे. इसी तरह दत्तक पुत्र दामोदर राव ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया. हालांकि मुक़दमे में बहुत बहस हुई, परन्तु इसे ख़ारिज कर दिया गया. ब्रिटिश अधिकारियों ने राज्य का ख़ज़ाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना ख़र्च में से काटने का फ़रमान जारी कर दिया. इसके परिणामस्वरूप रानी को झाँसी का क़िला छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा. पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होनें हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया.

 

झांसी १८५७ के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया था. रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया. इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया. साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया. अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की लहर इतनी तीव्र थी कि क्या बूढ़े , क्या जवान जिससे जो हो सका , जिस तरह हो सका सभी ने मदद की. झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया. १८५७ के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया. रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया. १८५८ के जनवरी माह में ब्रिटिश सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में झांसी को घेर लिया. दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रिटिश सेना ने झांसी पर क़ब्ज़ा कर लिया. उन्होंने पूरी झांसी में बहुत तबाही मचाई. पुरे झांसी को तबाह कर दिया. परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी. रानी झाँसी से निकल कर वे कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिली.

 

तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया. बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया और रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें राखी भेजी थी इसलिए वह भी इस युद्ध में उनके साथ शामिल हुए. १८ जून १८५८ को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में बिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई बुरी तरह घायल हो गयीं . रानी लक्ष्मीबाई की आखिरी ख्वाहिश थी कि अंग्रेज उनके मृत शरीर को भी ना छू सकें और तब उनके कुछ विश्वासपात्र सैनिकों ने उन्हें गंगादास मैथ ले गए जहां उन्हें गंगाजल पिलाया. रानी ने कोटा की सराय , ग्वालियर , मध्यप्रदेश में आखिरी सांस ली.

 

ब्रिटिश हुकूमत ने रानी की मृत्यु के ३ दिन बाद ग्वालियर पर कब्जा कर लिया. उनके पिता मोरोपंत को फांसी दे दी गयी और रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को ब्रिटिश सरकार से पेंशन दी गयी लेकिन उन्हें उनका उत्तराधिकार नहीं मिला . उनका पूरा जीवन अंग्रेजों से अपने अधिकार को प्राप्त करने के प्रयासों में बीता और २८ मई १९०६ को ५८ वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी. मित्रों आपको यह biography rani laxmi bai information in hindi कैसी लगी जरुर बताये और इस तरह की और भी जानकारी, biography , hindi kahani के लिए इस ब्लॉग को लाइक , शेयर और सबस्क्राइब करें और दूसरी बायोग्राफी के लिए इस लिंक mahatma gandhi biography in hindiपर क्लिक करें.

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