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shaikh chilli . शेख चिल्ली की ५ मजेदार हिंदी कहानी . फनी स्टोरी

shaikh chilli
Written by Abhishek Pandey

Story Of  Shaikh chilli  शेख चिल्ली की मज़ेदार कहानियां

 

 

 

इस पोस्ट में हम आपको shaikh chilli की ५ कहानिया दे रहें हैं. मुझे उम्मीद है कि सभी कहानियां आपको जरुर पसंद आएँगी.

 

 

1- Shaikh Chilli  शाही हुक्का

 

2- शेख चिल्ली की सड़क

 

3- कौन थे शेखचिल्ली

 

4- शेख चिल्ली कहानी

 

5- शिकार

 

 

१- हाफिज नूरानी, शेखचिल्ली के पुराने दोस्त थे.  नारनौल में उनका कारोबार था.  बीवी थी नहीं.  बड़ी हवेली में बेटे और बहू के साथ रहते थे.  बेटे को दूल्हा बने सात बरस बीत चुके और बहू की गोद न भरी, तो हाफिज साहब को फिक्र हुई कि या खुदा, खानदान का नाम आगे कैसे चलेगा?

 

 

 

उन्होंने एक ख़त sheikh chilli को लिखकर राय माँगी.  शेखचिल्ली कुरूक्षेत्र के किसी पीर के मुरीद थे.  कोसों दूर होने के बावजूद थोड़े-थोड़े अरसे बाद वहां जाते-आते रहते थे.

 

 

 

बस, एक दिन हाफिज नूरानी को बेटे-बहू के साथ ले गए पीर साहेब के पास.  पीर भी काफी पहुंचे हुए थे.  उन्होंने बहू को कुछ पढ़कर पानी पिलाया और एक तावीज उसके बाजू पर बांधकर बोले—परवरदिगार ने चाहा, तो इस बरस आरजू पूरी हो जाएगी.

 

 

 

पीर साहब की दुआ का असर हुआ.  एक बरस बीतते-न-बीतते बहू के पाँव भारी हो गए.  वक्त आने पर चाँद-से बेटे ने जन्म लिया.  हाफिज साहब का आँगन खुशियों से भर उठा.

 

 

 

 

हाफिज नूरानी की खुशियों का पारावार न था.  तुरंत जश्न का इंतजाम होने लगा.  उसमें  shaikh chilli  को खासतौर से बुलाया गया. शेखचिल्ली को दावतनामा मिला, तो बड़े खुश हुए.

 

 

 

बेगम से बोले—तुरंत चलने की तैयारियां करो.  तैयारियां क्या ख़ाक करूं बेगम तुनककर बोलीं—न ढंग के कपडे हैं, न तन पर एक गहना.  तुम्हारे पास तो फटी-पुरानी जूतियाँ भी हैं, मेरे पास तो वह भी नहीं.  अगर ऐसे हाल में वहां गए, तो खासी हंसाई होगी.

 

 

Shaikh Chilli ki Nayi Kahani शेख चिल्ली की कहानी

 

 

 

shaikh chilli खामोश हो गए.  बेगम की एक-एक बात सच थी.  हाफिज नूरानी नारनौल के बड़े रईस थे.  उनका जश्न भी छोटा-मोटा न होगा. बड़े-बड़े अमीर-उमरा भी आएँगे.

 

 

 

चूंकि यह दिन  shaikh chilli की वजह से देखना नसीब हुआ है, इसलिए हाफिज साहब उनको सभी से मिलाएंगे भी….. ऐसी सूरत में वहां फटेहाल पहुंचना क्यों कर मुनासिब होगा ?

 

 

 

 

शेखचिल्ली को खुदा पर गुस्सा आने लगा कि आखिर क्या सोचकर उसने उन्हें इस हालत में छोड़ रखा है ?—मगर वक्त गुस्से का नहीं, कुछ तरकीब भिडाने का था.

 

 

 

 

नवाब साहब का धोबी shaikh chilli को बहुत मानता था.   कुछ ही दिन पहले शेखचिल्ली ने उसे नवाब के गुस्से से निजात दिलाई थी.  बस, जा धमके उसके पास.  बोले एक काम के लिए आया हूँ.

 

 

 

 

मना मत करना …. धोबी ने शेखचिल्ली के मांगने पर जान तक देने की बात कही, तो शेखचिल्ली ने सारी उलझन उसे बताकर अपने और बेगम के लिये कुछ कपडे मांगे.  बोले नारनौल से लौटते ही वापस कर दूंगा.

 

 

 

 

धोबी इस अनोखी मांग से कुछ घबराया तो, मगर वायदा कर चुका था.  जी कडा करके शेखचिल्ली के मनपसंद कपडे उसे दे दिए.  बोला ये कपडे नवाब और उनकी भांजी के हैं.  सही-सलामत वापस कर देना .

 

 

 

 

shaikh chilli उन्हें ले घर लौटे.  बेगम ने देखे, तो बड़ी खुश हुईं.  फिर बोलीं कपडे तो मिल गए, मगर जूतियों का क्या करोगे ? नारनौल पैदल तो जाएंगे नहीं.  सवारी का क्या होगा ? शेखचिल्ली पहुंचे मोची के यहाँ.

 

 

 

 

 

बोले दो जोड़ी जूतियाँ चाहिएं.  एक मेरे लिये, एक बेगम के लिये.  मोची ने तरह-तरह की जूतियाँ दिखाईं.  शेखचिल्ली ने सबसे कीमती जूतियाँ पसंद कर लीं .  बोले इन्हें बेगम को और दिखा लाऊँ.  तब खरीदूंगा. मोची मान गया.  शेखचिल्ली जूतियाँ ले घर सटक गए. अब सवाल रहा सवारी का.

 

 

 

सबसे अच्छी घोड़ा-गाडी झज्जर के बनी घनश्याम के पास थी.  वह उसे किराए पर भी चलाता था.  shekh chilli उसके पास पहुंचे.  बोले मुझे नवाब साहब के काम से नारनौल जाना है.

 

 

 

 

नवाब साहब की बग्घी का एक घोड़ा बीमार है…… सो अपनी घोड़ा-गाडी दे दो.  किराया नवाब साहब से दिला दूंगा. अच्छा किराया मिलने के लालच में घनश्याम ने बिना हील-हुज्जत के अपनी घोड़ा-गाडी उनके हवाले कर दी  और शेखचिल्ली बेगम को ले नारनौल रवाना हो गए.

 

 

 

 

नारनौल उस वक्त रियासत झज्जर ही का एक कस्बा था.  शाही ठाठ-बाट से शेखचिल्ली माय बेगम वहां पहुंचे, तो हलचल मच गई.  वे जश्न से एक दिन पहले पहुंचे थे, इसलिए पहले मेहमान थे.  बड़ी आवभगत हुई.

 

 

 

 

पूरे कसबे में शेखचिल्ली की अमीरी के चर्चे गूंजने लगे.  उन्हें हर मौके पर जाफरानी तम्बाकू वाला हुक्का पेश किया जाने लगा. शेखचिल्ली यूं हुक्का बहुत पहले छोड़ चुके थे, मगर यहाँ मुफ्त का जो हुक्का मिला तो कश पर कश लगाने लगे, जैसे ठेठ नवाबी खानदान के हों.  मगर इन जश्न के मौके पर सारा गुड गोबर हो गया.

 

 

 

 

हाफिज नूरानी के कुछ दोस्त नवाब के घराने से भी जुड़े थे.  शेखचिल्ली को सबसे मिलवाया गया, तो नवाब साहब के जो कपडे वह पहने हुए थे, पहचान लिए गए.  उस समय तो किसी ने कुछ न कुछ कहा, मगर बाद में जो फुसफुसाहटें फैलीं, तो शेखचिल्ली को भनक लग गई।.बस, हुक्का पकडे-पकडे भागे जनानखाने की ओर.

 

 

 

बेगम से बोले जल्दी करो यहाँ से तुरंत चल देने में ही भलाई है.  कपड़ों की बात फूट गई है.  ऐसा ना हो कि नवाब को पता चल जाए और धोबी के साथ-साथ हम भी रगड़े जाएं.

 

 

 

बस, दोनों जश्न के बीच से जो खिसके, तो नारनौल के बाहर आकर ही दम लिया.  सत्यानाश जाए उन लोगों का कीड़े पड़ें निगोड़ों की आँखों में बेगम तुनतुनाकर बोलीं कितना मजा आ रहा था सारी औरतें मुझे सिर-आँखों पर बिठाए थीं….. तभी उनका ध्यान गया हुक्के पर, जो अभी भी शेखचिल्ली के हाथ में था.

 

 

 

 

बोलीं यह हुक्का क्यों उठा लाए ? नूरानी भाई ढूंढते फिरेंगे कि हुक्का कहाँ गया ? मगर shaikh chilli भी ऐसे बने बैठे थे, जैसे वह उन लोगों को अभी फाड़ खाएंगे, जिन्होंने नवाब के कपडे पहचाने थे.

 

 

 

 

बेगम की बात उनके कानों में पहुँची ही नहीं काश मेरे बस में होता कि जिसको चाहूँ फांसी पर चढ़ा दूं.  कमबख्तों से कोई पूछे कि नवाब के कपड़ों पर क्या उसका नाम लिखा है कि गुनगुनाने लगे कपडे तो नवाब के-से लगते हैं .

 

 

shekh chilli kahani शेख चिल्ली कहानी

 

 

 

मैं अल्लाहताला का इतना नेक बन्दा.  दिलो-जान से उसकी इबादत करने वाला.  पाँचों वक्त नमाज अदा करने वाला.  पीरों और फकीरों की कदमबोसी से पेट भरने वाला.

 

 

 

 

 

फिर भी पता नहीं, मेरी इतनी बेइज्जती उसे कैसे गवारा होती है ? अता क्यों नहीं फरमा देता मुझे कोई ऐसी गैबी ताकत कि जिसकी ओर टेढ़ी नजर से देखूं, वह ख़ाक हो जाए अल्लाह, अगर ऐसी गैबी ताकत मुझे मिल जाए, तो तो फिर मैं इन सबकों देख लूंगा.

 

 

 

 

सबसे पहले हाफिज नूरानी के जशन में वापस जाऊंगा.  उन सारे बेहूदा लोगों को ऐसी टेढ़ी नजर से देखूंगा कि सर से पाँव तक शोला बन जाएंगे कमबख्त.

 

 

 

 

इधर-उधर भागेंगे.  शोर मच जाएगा पानी डालो रेत डालो लपटों में घिरे वे वहशी पंडाल में इधर-उधर भागेंगे.  दूसरे लोग उनसे बचने की लिये भागेंगे.  पंडाल में आग लग जाएगी.  न न पंडाल तो बेचारे हाफिज नूरानी का है.  उसमें आग क्यों लगेगी ? मगर वे भागते-दौड़ते हुए आकर मुझसे लिपट गए तो ? अरे कैसे लिपट जाएंगे ? मैं उन्हें टेढ़ी नजरों से देखूंगा ही छत पर चढ़कर.

 

 

 

 

अगर वे जनानखाने में जा घुसे तो ? वहां भी बुरी तरह भगदड़ मच जाएगी.  सारी औरतें भाग-भागकर कमरों में जा छिपेंगी.   अंदर से सांकल चढ़ा लेंगी.  मगर बेगम ? बेगम कैसे भागेंगी ?

 

 

 

 

वह तो बिना किसी की मदद के उठ भी नहीं सकेंगी. या परवरदिगार खैर करना, वरना बेगम को कबाब बनने में देर नहीं लगेगी.  दो-चार बाल्टी पानी तो उनके कोहकाफ जैसे बदन पर दस-पांच बूँद जैसा साबित होगा.

 

 

 

 

मगर तीस-चालीस बाल्टियां पानी लाएगा कौन ? लोग तो जश्न में मशगूल होंगे.  उन्हें हादसे की खबर देने के लिए मुझे ही चिल्लाना होगा आग लग गई हाय, बेगम आग में घिर गई दौड़ो और तभी बेगम की धौल उनके सिर पर पडी.

 

 

 

 

जैसे धरती पर गिरने से जागे शेखचिल्ली.  देखा हुक्का उन दोनों के बीच गिर पडा है.  घोड़ा-गाडी में धुंआ भरा है और धोबी से उधार मांगे कपड़ों में चिंगारियां उठ रही हैं.

 

 

 

shekh chilli story in hindi मजेदार हिंदी कहानियां

 

 

 

२- एक दिन शेखचिल्ली कुछ लड़को के साथ  , अपने कस्बे के बाहर एक पुलिया पर बैठा था. तभी एक सज्जन शहर से आए और लड़कों से पूछने लगे, क्यों भाई, शेख साहब के घर को कौन-सी सड़क गई है ?

 

 

 

 

शेखचिल्ली के पिता को सब शेख साहब कहते थे. उस गाँव में वैसे तो बहुत से शेख थे, परंतु शेख साहब चिल्ली के अब्बाजान ही कहलाते थे. वह व्यक्ति उन्हीं के बारे में पूछ रहा था. वह शेख साहब के घर जाना चाहता था.

 

 

 

 

 

परन्तु उसने पूछा था कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है.. शेखचिल्ली को मजाक सूझा. उसने कहा, क्या आप यह पूछ रहे हैं कि शेख साहब के घर कौन-सा रास्ता जाता है?  हाँ-हाँ, बिल्कुल उस व्यक्ति ने जवाब दिया.

 

 

 

 

इससे पहले कि कोई लड़का बोले, शेखचिल्ली बोल पड़ा, इन तीनों में से कोई भी रास्ता नहीं जाता. तो कौन-सा रास्ता जाता है?  कोई नहीं.

 

 

 

 

क्या कहते हो बेटे? शेख साहब का यही गाँव है न? वह इसी गाँव में रहते हैं न? हाँ, रहते तो इसी गाँव में हैं. मैं यही तो पूछ रहा हूँ कि कौन-सा रास्ता उनके घर तक जाएगा.

 

 

 

साहब, घर तक तो आप जाएँगे. शेखचिल्ली ने उत्तर दिया, यह सड़क और रास्ते यहीं रहते हैं और यहीं पड़े रहेंगे.  ये कहीं नहीं जाते.  ये बेचारे तो चल ही नहीं सकते.

 

 

 

 

इसीलिए मैंने कहा था कि ये रास्ते, ये सड़कें कहीं नहीं जाती.  यहीं पर रहती हैं.  मैं शेख साहब का बेटा चिल्ली हूँ.  मैं वह रास्ता बताता हूँ, जिस पर चलकर आप घर तक पहुँच जाएँगे.

 

 

 

 

अरे बेटा चिल्ली, वह आदमी प्रसन्न होकर बोला, तू तो वाकई बड़ा समझदार और बुद्धिमान हो गया है.  तू छोटा-सा था जब मैं गाँव आया था. मैंने गोद में खिलाया है तुझे.  चल बेटा, घर चल मेरे साथ.

 

 

 

 

तेरे अब्बा शेख साहब मेरे लंगोटिया यार हैं….. और मैं तेरे रिश्ते की बात करने आया हूँ. मेरी बेटी तेरे लायक़ है.  तुम दोनों की जोड़ी अच्छी रहेगी. अब तो मैं तुम दोनों की सगाई करके ही जाऊँगा. शेखचिल्ली उस सज्जन के साथ हो लिया और अपने घर ले गया. आगे चलकर वह सज्जन शेखचिल्ली के ससुर बन गए.

 

 

 

 

shaikh chilli

 

Who was Shekh Chilli? कौन थे शेख चिल्ली?

 

 

 

३- आज तक हमने शेख चिल्ली पर तमाम कहानिया पढ़ी, जिन्हें पढ़ कर हमारे चेहरे पर मुस्कराहट आई. लेकिन उस मुस्कराहट को देने वाले शख्श शेख चिल्ली आखिर कौन थे, कहाँ के रहने वाले थे, आईये आज उनके बारे में सबकुछ जानते हैं. शीख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान के एक खानाबदोश कबीले में हुआ था.

 

 

 

यह ऐसा कबीला होता है जो एक जगह से दूसरी जगह भ्रमण करता है. निरंतर घुमक्कड़ी का जीवन जीने के कारण शेखचिल्ली पढ़ न सके. हाँ, आये दिन की परेशानियों और अभावों ने इनको आवश्यकता से अधिक हवाई किलेबाजी अता फरमा दी.

 

 

 

 

बचपन ही से शेखचिल्ली चमत्कारों की तलाश में पीर-फकीरों के दीवाने रहे. घुमक्कड़ी का जीवन इन्हें रास नहीं आया. रात-दिन ऐशो-आराम के साधन पा लेने के सपने और तुनकमिजाज अधिकारियों और सामंतों की तरह अपने को पेश करने के हवाई पुल बांधना इनकी नियति बनती गई.

 

 

 

वह जमाना ही अंधविश्वासों, झाड-फूंक और गंडे-तावीजों का था. फिर जिस कबिलियाई परवेश में शेखचिल्ली गोदी से उतर ककर धरती पर चलने लायक बने , उसमें तो अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी थी कि कोई भी इंसान उसमें जकड सकता है. अभावों में पलता भावुक बाल शेखचिल्ली इन्हीं अंधविश्वासों की परिणति में काल्पनिक चमत्कारों के रंग भरना सीख गया.

 

 

 

एक किवदंती के अनुसार शेखचिल्ली की इन बे-सिर-पैर की हरकतों से तंग आकर एक रात उसके कबीले वाले किसी ‘सूखे करेजे’ (सूखी झाड़ियों का झुण्ड) के पास इन्हें सोता छोड़कर आगे निकल गए.

 

 

 

शेखचिल्ली के जीवन का यह एक नया मोड़ था. अब वह नितांत अकेला रह गया था. अकेलेपन की इस भावना ने उसकी कल्पना में पंख लगा दिए. जो उससे दूर था, अप्राप्य था, उसके पास होने के सुखद सपने और भटकना ही उसका जीवन बन गया.

 

 

 

 

मनचाहा पा लेने की इच्छा से उसने फकीरों, ओझाओं और टोने-टोटके करने वाले नाजूमियों के दामन पकड़ने चाहे. न जाने क्यों, ऐसी सूरतों में अक्सर होता है, उसमें कुंठा के या कमतरी के भाव नहीं हुए. हो जाते तो आज न शेखचिल्ली होता, न उसकी कहानियां.

 

 

 

शेखचिल्ली क्वेटा की बंजर धरती से कुरुक्षेत्र के हरियल इलाके में कैसे और कब आये, कोई नहीं जानता. केवल यह सोचा ही जा सकता है की वह उन दिनों सीमा पार से आने वाले किसी जन-प्रवाह में बहकर कुरुक्षेत्र आ पहुंचे. कुरुक्षेत्र उन दिनों हिन्दू साधू-संतों के साथ-साथ मुस्लिम फकीरों और पीरों की शरण-स्थली बन चूका था.

 

 

 

 

शेखचिल्ली भी चटकारों की चाह में वहाँ वहाँ के एक फ़क़ीर कके मुरीद बन गए . उन दिनों झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी. पंजाब के अधिकाँश भाग से मराठों का शासन समाप्त हो चुका था और मुस्लिम शासकों की हर जगह तूती बोलनी शुरू हो गयी थी. शेखचिल्ली को कुरुक्षेत्र में नयी जिंदगी तो मिल गयी, मगर उसकी कल्पनाशीलता कम होने की उपेक्षा और अधिक निखरती गयी.

 

 

 

 

उन्हीं दिनों नारनौल के रईस हाफिज नूरानी से उनकी मुलाक़ात हुई. हाफिज नूरानी शेखचिल्ली की न जाने किस अदा पर फ़िदा हुए की उन्हें साथ ली आये .

 

 

 

 

झज्जर के नवाबी घराने से हाफिज नूरानी की ख़ास जान – पहचान थी. उन्होंने शेखचिल्ली को नवाब के दरबार में नौकरी दिलवा दी. शादी भी करा दी कि शेखचिल्ली के भटकावों में थोडा ठहराव आ जाए.

 

 

 

shekh chilli story हिंदी की कामेडी कहानिया

 

 

 

झज्जर एक छोटी-सी रियासत थी. जितनी आमदनी थी, लगभग उतने ही खर्चे थे. इसलिये शेखचिल्ली को उस नौकरी से इतना तो कभी नहीं मिल सका की नवाब के दुसरे मुलाजिमों के तरह मजे से खा-पी सकें. हाँ, नवाब का मुलाजिम होने के कारण लाख खामियां होने के बावजूद भी, रियासत में उनकी इज्जत थी. कहा जाता है की सन १८०० के आसपास शेखचिल्ली झज्जर रियासत छोड़कर फिर कुरुक्षेत्र वापस चले गए.

 

 

 

 

फ़क़ीर बन गए .उस समय उनकी उम्र करीब ८० वर्ष हो चुकी थी. उनके दोस्त हाफिज नुरानी का इंतकाल हो चुका था और शेखचिल्ली की बेगम भी इस दुनिया से विदा ले चुकी थी. रियासत पर भी दुर्भाग्य के बादल उड़ने शुरू हो गए थे और अंग्रेजों ने अवध को हड़पने की तैयारियों के साथ-साथ पंजाब की और हाथ बढाने शुरू कर दिए थे.

 

 

 

 

आजादी की पहली लड़ाई से लगभग पचास वर्ष पूर्व ही कुरुक्षेत्र में शेखचिल्ली की मृत्यु हो गयी. उस समय तक उनको मानने वालों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी थी.

 

 

 

कुरुक्षेत्र में मौजूद शेखचिल्ली का मकबरा आज भी इस बात को मानने पर मजबूर करता है की उस शेखचिल्ली की कितनी शाख रही होगी. शेखचिल्ली को अक्सर हवाई किलेवाजी में दक्ष एक कामचोर मूर्ख की तरह चित्रित किया जाता है.

 

 

 

हवाई किलेबाज वह बेशक थे, किन्तु अगर गंभीरता से मनन किया जाए तो शेखचिल्ली की हवाई किलेबाजी में अनेक सामाजिक असमानताओं और अहं के बंधनों को तोड़ डालने की तड़प सहज ही महसूस की जा सकती है शेखचिल्ली का व्यक्तित्व समाज के शाशन और तिरस्कार का प्रतिबिंब है

 

 

शेख चिल्ली की कामेडी

 

 

 

४- नौकरी की तलाश में शेख चिल्ली समुद्र किनारे बंदरगाह पर पहुंचे. वहाँ उन्हें एक विदेशी जहाज में काम मिल गया. वह जहाज एक दिन लन्दन के लिए रवाना हुआ और शेख चिल्ली लन्दन पहुँच गए.

 

 

 

लन्दन पंहुच कर उन्होंने स्नान आदि किया और फिर शहर घुमाने निकल पड़े. कुछ दूर चलने पर उन्हें एक अंग्रेज दिखाई दिया . उसके पास एक पेटी राखी हुई थी, जिसमें शराब की बोतलें भरी हुई थी.

 

 

 

 

शेख जी को देखकर वह अंग्रेज समझ गया कि शायद यह आदमी कुली है तो उसने shekh chilli से अंग्रेजी में इशारे के पूछा कि तुम कुली हो. अब sheakh chilli तो अंग्रेजी जानते नहीं थे, लेकिन इशारे से वह समझ गए ही यह सामान पहुंचाने की बात कर रहा है उन्होंने कहा ” हाँ, बताओ कहाँ चलू”

 

 

 

 

उन्होंने सामन उठाया और चल दिए . कुछ दूर अंग्रेज रुक गया और पेटी लेकर शेखजी को कुछ पैसे दिए और बोला ” थैंक यू ” . अब shekh chilli से समझ लिया उल्टा . उन्हें लगा कि अंग्रेज कर रहा है फेंक दूँ .

 

 

 

अब क्या उन्होंने जल्दी से पेटी उठाकर फेंक दी और सारी बोतल टूट गयी. अब उस अंग्रेज ने डंडा लेकर shekh जी को दौड़ा लिया . शेख जी आगे – आगे और अंग्रेज पीछे – पीछे भागे जा रहे थे, भागते – भागते वे एक इंडियन होटल में घुस गए और जब मालिक ने देखा यह तो इंडियन है तो उसने पूछा मियाँ क्या हो गया. क्यों भाग रहे हो ?

 

 

 

शेख चिल्ली  ने उसे पूरी कहानी फ़टाफ़ट बता दी. मालिक को माजरा समझ में आ गया. उसने उन्हें मेज के नीचे छुपा लिया. कुछ देर में अंग्रेज आया और शेख चिल्ली को ना पाकर बडबडाते हुए चला गया.

 

 

 

 

उसके चले जाने के बाद शेख बाहर निकले और खाना ऑर्डर किया . खाना खाने के बाद मालिक से पान माँगा और पान मुंह में दबाये चल दिए. थोड़ी देर में वे एक चौराहे पर पहुंचे तो पीक मार दी.

 

 

 

वे ठुक कर पलटे ही थे कि बहुत से लोगों ने उन्हें घेर लिया और उन्हें अस्पताल ले गए और बोला की इनके मुंह से खून निकलने की वजह से इन्हें खून की कमी हो गयी है. शेख जी को अस्पताल में दाखिल कर लिया गया और जब वे अस्पताल से मोटे – ताजे हो गए थे. वे मन ही मन सोचे यार लन्दन तो बड़ा बढियां है . अब यही रुक जाता हूँ.

 

 

 

एक दिन वे एक होटल पहुंचे और खाना आर्डर किया. तभी उन्होंने देखा कि वेटर शरबत रख गया है. उन्होंने आव देखा न ताव झट से पूरी ग्लास खाली कर दी. वे सोचने लगे अरे वाह …आज तो मुझे हर चीज डबल दिखाई दे रही है.

 

 

 

 

अरे वहाँ एक बत्ती की दो बत्ती , एक लड़की की दो लड़की . तभी वे एक गाना गाते हुए ठुमक – ठुमक कर नाचने लगे. होटल में बैठे लोग शेख जी को नाचता देखकर तालियाँ बजाने लगे. थोड़ी देर में काफी भीड़ जुट गयी. शेख जी मदमस्त होकर नाच रहे थे. भीड़ बढ़ने के साथ ही होटल की बिक्री भी बढ़ गयी.

 

 

 

होटल के मालिक ने मैनेजर से की इस डांसर को नौकरी पर रख लो. ओके सर डांस समाप्त होने पर इससे बात करूँगा. तभी वहाँ दो इन्डियन भी पहुँच गए. उन्होंने शेख जी नाचता देकहकर बोला ” यह तो लौंडा नाच है ” .

 

 

 

 

यह सुनते ही शेख जी उनपर भड़क गए . अब क्या उन दोनों ने शेख जी की ठुकाई कर दी. होटल में भगदड़ मच गयी. बहुत सारे सामान टूट गए. शेख जी को बड़ी मार पड़ी.

 

 

 

अगले दिन जब उन्हें होश आया तो वे समुद्र किनारे पड़े थे. वे इधर उधर देखने लगे . तभी उन्हें एक जहाज नजर आया जो इंडिया के लिए निकलने वाला था.

 

 

 

 

उन्होंने दौड़कर जहाज का रस्सा पकड लिया और सामन के ढेर में छिपकर बैठ गए. किसी तरह वे इंडिया आये और कभी भी भूलकर विदेश नहीं जाने की कसम खायी.

 

शेख चिल्ली का शिकार

 

 

 

5- एक बार कार्यक्रम बना, नवाब साहब जंगलों में शिकार खेलने जाएंगे….कालेसर के जंगल खूंखार जानवरों के लिये सारे भारत में मशहूर थे.

 

 

 

ऐसे जंगलों में अकेले शिकारी कुत्तों के दम पर शिकार खेलना निरी बेवकूफी थी… अतः वजीर ने बड़े पैमाने पर इंतजाम किए. पानीपत से इस काम के लिये विशेष रूप से सधाए गए हाथी मंगाए गए.

 

 

 

 

पूरी मार करने वाली बंदूकें मुहैया की गईं. नवाब साहब की रवानगी से एक हफ्ता पहले ही शिकार में माहिर चुनिंदा लोगों की एक टोली कालेसर रवाना कर दी गई कि वे सही जगह का चुनाव करके मचान बांधें, ठहरने का बंदोबस्त करें और अगर जरूरत समझें, तो हांका लगाने वालों को भी तैयार रखें. इस तरह हर कोशिश की गई कि नवाब साहब कम-से-कम वक्त में ज्यादा-से-ज्यादा शिकार कर सकें.

 

 

 

 

अब सवाल उठा कि नवाब साहब के शिकार पर कौन-कौन जाएगा? जाहिर था कि शेखचिल्ली में किसी की दिलचस्पी न थी. हो भी कैसे सकती थी? एक तो माशाअल्ला खुदा ने उनको दिमाग ही सरकसी अता फरमाया था कि पता नहीं, किस पल कौन-सी कलाबाजी खा जाए.

 

 

 

 

 

ऊपर से बनाया भी उन्हें शायद बहुत जल्दबाजी में था…. हड्डियों पर गोष्ट चढ़ाना तो अल्लाह मियाँ जैसे भूल ही गए थे. मगर शेखचिल्ली इसी बात पर अड़े थे कि मैं शिकार पर जरूर जाऊंगा. राजी से ले जाना हो, तो ठीक; वरना गैर-राजी पीछा करता-करता मौके पर पहुँच जाऊंगा.

 

 

 

 

नवाब ने सुना, तो शेख्चिल्ल्ली की ओर ज़रा गुस्से से देखा। बोले-तुम जरूरत से ज्यादा बदतमीज होते जा रहे हो. एक चूहे को तो मार नहीं सकते, शिकार क्या ख़ाक करोगे?

 

 

 

 

मौक़ा मिलेगा, तभी तो कर पाऊंगा हुजूर! शेखचिल्ली ने तपाक उत्तर दिया चूहे जैसे दो अंगुल की शै पर क्या हथियार उठाना? मर्द का हथियार तो अपने से दो अंगुल बड़ी शै पर उतना चाहिए.

 

 

 

 

नवाब साहब ने उनका जवाब सुनकर उन्हें अपने शिकारी लश्कर में शामिल कर दिया. काफिला पूरी तैयारी के साथ कालेसर के बियाबान जंगलों में जा पहुंचा. वहां पहले से ही सारा इंतजाम था.

 

 

 

तय हुआ कि रात को तेंदुए का शिकार किया जाए. दिन छिपने से पहले ही सारे लोग पानी, खाना और बंदूकें ले मचानों पर जा बैठे. चांदनी रात थी. मचानों पर बैठे सब लोगों की निगाहें सामने बंधे चारे के आसपास लगी थीं.

 

 

 

shaikh chilli शेख फारूख एक मचान पर थे. हालांकि वजीर चाहता था कि शेखचिल्ली को अकेला ही एक मचान पर बैठा दिया जाए, ताकि रोज-रोज की झक-झक ख़त्म हो.

 

 

 

मगर नवाब नहीं चाहते थे कि शेखचिल्ली को कुछ हो, या वह अपनी हवाई झोंक में कुछ ऐसा-वैसा कर बैठे कि शिकार हाथ से निकल जाए, इसलिए उनकी तजवीज पर शेख फारूख को पलीते की तरह उनकी दम से बाँध दिया गया था. न पलीते में आग लगेगी, न बन्दूक चलेगा.

 

 

 

तेंदुए का इंतज़ार करते-करते तीन घंटे बीत गए. शेखचिल्ली का धीरज छूटने लगा. वह शेख फारूख से फुसफुसाकर बोले अजीब अहमक है यह तेंदुआ भी! इतना बढ़िया शिकार पेड़ से बंधा है और कमबख्त गायब है.

 

 

 

 

 

शिकार में ऐसा ही होता है शेख फारूख ने शेखचिल्ली को चुप रहने का इशारा करते हुए बेहद धीमी आवाज में कहा. ख़ाक ऐसा होता है.  shaikh chilli फुसफुसाकर बोले मेरा तो जी चाहता है, बन्दूक लेकर नीचे कूद पडूं और वह नामुराद शिकार को जहाँ भी है, वहीं हलाल कर दूं.

 

 

 

शेख फारूख ने उन्हने फिर चुप रहने को कहा. शेखचिल्ली मन मसोसकर एक तरफ बैठ गए. सोचने लगे कमबख्त सब डरपोक हैं. एक अदद तेंदुए के पीछे बारह आदमी पड़े हैं. ऊपर के सारे-के-सारे पेड़ों पर छिपे बैठे हैं.

 

 

 

 

यह कौन-सी बहादुरी है. बहादुर हैं तो नीचे उतारकर करें तेंदुए से दो-दो हाथ. वह जानवर ही तो है! हैजा तो नहीं कि हकीम साहेब भी कन्नी काट जाएं! कमबख्त मेरी बहादुरी पर शक करने चले थे. अरे, तेंदुआ कल का आता, अभी आ जाए. नीचे उतारकर वह थपेड दूंगा कि कमबख्त की आँखें बाहर निकल आएंगी.

 

 

 

स्टोरी ऑफ़ शेख चिल्ली

 

 

मगर सुना है, वह छलांग बड़े गजब की लगाता है. मेरे नीचे उतरते ही उसने मुझ पर छलांग लगा दी तो? तो क्या हुआ! बन्दूक को छतरी की तरह सिर पर सीधा तान दूंगा.

 

 

 

 

ससुरा गिरेगा तो सीधा बन्दूक की नाल पर गिरेगा. पेट में धंस जाएगी नाल! हो जाएगा ठंडा! और छलांग का भरोसा भी क्या? कुछ अधिक ऊंचा उचल गया, तो जाकर गिरेगा सीधा मचान पर.

 

 

 

उठाकर भाग जाएगा शेख फारूख को. सारे लोग अपने-अपने मचान पर से चिल्लाएंगे शेखचिल्ली, पीछा करो उस शैतान तेंदुए का! शेख फारूख को ले भागा! मैं बन्दूक तानकर तेंदुए के पीछे भागूंगा.

 

 

 

 

तेंदुआ आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे… शेख फारूख चिल्ला रहे होंगे शेखचिल्ली, बचाओ! शेखचिल्ली, मुझे बचाओ! आखिर तेंदुआ जानवर है, कोए जिन्न तो नहीं? कमबख्त भागता-भागता कभी तो थकेगा! थककर सांस लेने के लिये कहीं तो रूकेगा .

 

 

 

बस, मैं अपनी बन्दूक को उसकी ओर तानकर यूं लबलबी दबा दूंगा और ठांय! – तभी तेज आवाज गूंजी. सब चौंक उठे…. शेखचिल्ली ने जोर से चिल्लाकर पूछा क्या हुआ? तेंदुआ मारा गया.

 

 

 

शेख फारूख बोले कमाल है शेखचिल्ली! चारे पर मुंह मारने से पहले ही तुमने उसके परखच्चे उड़ा दिए. सच? shaikh chilli ने चारे की ओर देखा तो यकी न आया. पर यह सच था.

 

 

 

दूसरे लोग निशाना साध भी न पाए थे कि शेखचिल्ली की बन्दूक गरज उठी थी. मचान से नीचे उतारकर नवाब साहेब ने सबसे पहले शेखचिल्ली की पीठ ठोंकी.

 

 

 

 

फिर वजीर की ओर देखकर कहा शेखचिल्ली जो भी हो, है बहादुर, मगर shaikh chilli जानते थे कि असलियत क्या थी! वह चुप रहे.चुप रहने में ही भलाई जो थी.

 

 

 

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Abhishek Pandey

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