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शनिवार वाड़ा 

शनिवार वाड़ा 
Written by Abhishek Pandey

शनिवार वाड़ा भारत के महाराष्ट्र के पुणे में स्थित है. लेकिन इस किले के साथ एक काला अध्याय भी जुड़ा है १८ वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के विस्तार के समय यह किला मराठा साम्राज्य के मुख्य किलो में से एक था. यह फोर्ट अपनी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है. इसका निर्माण १८वीं शताब्दी में पेशावावों ने कराया था . इस किले की नींव १० जनवरी १७३० को शनिवार के दिन रखी गयी थी और इसका उद्घाटन २२ जनवरी १७३२ को किया गया. उस समय मराठा साम्राज्य पर पेशवाओं का राज था. हालाकि उद्घाटन के बाद भी इसमे कुछ शेष निर्माण को पूरा किया गया. यह किला १८१८ तक पेशवाओं की प्रमुख गद्दी रहा था. शनिवार वाड़ा किले का निर्माण राजस्थान के ठेकेदारो ने किया था जिन्हे की काम पूर्ण होने के बाद पेशवा ने नाईक की उपाधि से नवाज़ा था .इस किले में लगी टीक की लकड़ी जुन्नार के जंगलो से, पत्थर चिंचवड़ की खदानों से तथा चूना जेजुरी ( की खदानों से लाया गया था. इस महल में २७ फ़रवरी १८२८ को अज्ञात कारणों से भयंकर आग लगी थी. आग को पूरी तरह बुझाने में सात दिन लग गए थे. इस से किले परिसर में बनी कई इमारते पूरी तरह नष्ट हो गई थी. उनके अब केवल अवशेष बचे है. अब यदि हम शनिवार वाड़ा किले की संरचना की बात करे तो किले में प्रवेश करने के लिए पांच दरवाजे हैं.

 

दिल्ली दरवाजा

 

यह इस किले का सबसे प्रमुख गेट है जो उत्तर दिशा दिल्ली तरफ खुलता है इसलिए इसे दिल्ली दरवाजा कहते है. यह इतना ऊँचा और चौड़ा की है पालकी सहित हाथी आराम से आ जा सकते है। हमले के वक़्त हाथियों से इस गेट को बचाने लिए इस गेट के दोनों पलड़ो में 12 इंच लम्बे 72 नुकीले कीले लगे हुए है जो कि हाथी के माथे तक की ऊँचाई पर है. दरवाज़े के दाहिने पलड़े में एक छोटा सा गेट और है जो की सैनिको के आने जाने के काम आता था.

 

मस्तानी दरवाजा

 

यह दरवाज़ा दक्षिण दिशा की और खुलता है. बाजीराव की पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जाती तो इस दरवाजे का उपयोग करती थी. इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाजा है , लेकिन इसे अलीबहादुर दरवाजा भी कहा जाता है.

 

खिड़की दरवाजा

 

यह दरवाजा पूर्व दिशा की और खुलता है. इस दरवाजे में खिड़कियाँ लगी होने के कारण इसे खिड़की दरवाजा कहते हैं.

 

गणेश दरवाजा

 

यह दरवाजा दक्षिण पूर्व दिशा की तरफ खुलता है. यह दरवाजा परिसर में स्थित गणेश रंग महल के पास स्थित है, इसिलियी इसे गणेश दरवाजा कहा जाता है.

 

नारायण दरवाजा

 

इसे जम्भुल दरवाजा भी कहा जाता है. यह दरवाजा दक्षिण दिशा में खुलता है और मुख्यतः दासियों के आने जाने के काम में आता था . लेकिन नारायण राव पेशवा की हत्या के बाद उसकी लाश के टुकड़ो को इसी रास्ते से किले के बाहर ले जाया गया था इसलिए इसे नारायण दरवाजा भी कहा जाता है.

 

अब यदि किले के अंदर की इमारतों की बात करे तो इस किले में मुख्यतः तीन महल थे और तीनो ही १८२८ में लगी आग में नष्ट हो गए. अब केवल उनके अवशेष है. इसके अलावा किले में एक ७ मंजिला ऊंची इमारत भी थी जिसकी सबसे ऊंची चोटी से १७ किलो मीटर दूर, आलंदी में स्थ्ति संत ज्ञानेश्वर के मंदिर का शिखर दिखाई देता था. यह इमारत भी आग में नष्ट हो गई थी. अब किले में कुछ छोटी इमारते ही सही सलामत है.

 

लोटस फाउंटेन

 

शनिवार वाड़ा किले का मुख्य आकर्षण कमल की आकार का एक फाउंटेन (फव्वारा) है. जिसे हजारी करंजे भी कहते हैं. इससे एक दुखद इतिहास जुदा हुआ है. इसमें गिरकर एक राजकुमार के घायल होने के बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी. जून १८१८ में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर जॉन मैलकम को यह गद्दी सौप दी और इस तरह पेशवाओ की शान रहे इस किले पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया.

 

नारायण राव की हत्या

 

पेशवा नाना साहेब के तीन पुत्र थे विशव राव, महादेव राव और नारायण राव. सबसे बड़े पुत्र विशव राव पानीपत के युद्ध में मारे गए थे. नाना साहेब की मृत्यु के उपरान्त महादेव राव को गद्दी पर बैठाया गया. पानीपत की तीसरी लड़ाई में महादेव राव पर ही रणनीति बनाने की पूरी जिम्मेदारी थी लेकिन उनकी बनाई हुई कुछ रणनीतियां बुरी तरह विफल रही थी फलस्वरूप इस युद्ध में मराठों की बुरी तरह हार हुई थी. कहा जाता है कि इस युद्ध में मराठा साम्राज्य के ७०००० सैनिक मारे गए थे. महादेव राव युद्ध में अपनी भाई की मृत्यु और मराठो की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते थे. जिसके कारण वो बहुत ज्यादा तनाव में रहते थे और इसी कारण गद्दी पर बैठने के कुछ दिनों बाद ही उनकी बिमारी से मृत्यु हो गई.

 

उनकी मृत्यु के पश्चात मात्र १६ साल की उम्र में नारायण राव पेशवा बने. नाना साहेब के एक छोटे भाई रघुनाथ राव भी थे जिन्हे की सब राघोबा कहते थे. नारायण राव को पेशवा बनाने से काका राघोबा और काकी अनादीबाई खुश नहीं थे. वो खुद पेशवा बनना चाहते थे उनको एक बालक का पेशवा बनना पसंद नहीं आ रहा था. दूसरी तरफ नारायण राव भी अपने काका को पसंद नहीं करते थे क्योकि उन्हें लगता था कि उनके काका ने एक बार उनके बड़े भाई महादेव राव की ह्त्या का प्रयास किया था. इस तरह दोनों एक दूसरे को शक की नजर से देखते थे. हालात तब और भी विकट हो गए जब दोनों के सलाहकारों ने दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध भड़काया. इसका परिणाम यह हुआ कि नारायण राव ने अपने काका को घर में ही नजरबन्द करवा दिया.

 

इससे अनादिबाई बहुत नाराज हुई. उधर राघोबा ने नारायण राव को काबू में करने का उपाय सोचा . उन्होंने साम्राज्य के भीलों जो की गार्दी कहलाते थे. वो बहुत ही मारक लड़ाके थे . उनके नारायण राव से संबंध काफी खराब थे, लेकिन वे राघोबा को पसंद करते थे और इसी का फायदा राघोबा ने उठाया. राघोबा ने भीलों के सरदार सुमेर सिंह गारदी को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने नारायण राव को पकड़ने के लिए कहा और पत्र अनादिबाई के पास भिजवा दिया और जब अनादिबाई ने पत्र देखा तो तो उन्हें यह एक खुबसूरत मौक़ा नजर आया. उन्होंने पात्र में लिखे शब्द ” नारायण राव ला धरा ” को बदलकर ” नारायण राव ला मारा ” कर दिया. जिसका अर्थ था नारायण राव को मार दो .

 

पत्र मिलते ही रात में भीलों के समूह ने घात लगाकर महल पर हमला कर दिया.वे तेजी हर बाधा को हटाते हुए नारायण राव के कक्ष की और बढे . जब नारायण राव ने देखा की गार्दी हथियार लेकर खून बहाते हुए उसकी तरफ आ रहे है तो वो अपनी जान बचाने के लिए अपने काका के कक्ष की और काका माला वाचवा कहते हुए भागा. लेकिन वह पहुँचने से पहले ही वो पकड़ा गया और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए गए. यहाँ इतिहसकारों में थोड़ा मतभेद है. कुछ का कहना है कि नारायण राव अपने काका के सामने अपनी जान बचाने की गुहार करता रहा पर उसके काका ने कुछ नहीं किया और गार्दी ने राघोबा की आँखों के सामने उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए. लाश के टुकड़ो को बर्तन में भरकर रात को ही महल से बाहर ले जाकर नदी में बहा दिया गया.

 

कहते हैं कि आज भी शनिवार वाड़ा किले में नारायण राव की आत्मा भटकती है और यही शब्द ” काका माला वाचावा ” बार बार सुनाई देते हैं. मित्रों आपको यह interesting fact कैसा लगा जरुर बताय्यें और इसे लाइक , शेयर और घंटी दबाकर सबस्क्राइब कर लें. इस तह की और भी horror story के लिए इस लिंक भानगढ़ का किला पर क्लिक करें.

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