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खिचड़ी

खिचड़ी
Written by Abhishek Pandey

खिचड़ी   एक दिन शेख्चिल्ले बीमार हो गया. हाकिम साहब शहर में रहते थे.  शेखचिल्ली के गाँव से दो मील के फासले पर, जब शेखचिल्ली उनके पास पहुंचा तो उन्होंने बताया यह चार पुडिया सौंफ के अर्क के साथ खाओ.

 

 

शेखचिल्ली बोला श्रीमान खाऊँ क्या? हकीम साहिब बोले खिचडी. अब शेखचिल्ली जिसने अभी तक खिचड़ी न खाई थी उस विचार से कि खिचडी शब्द भूल न जाऊं, जबान से खिचड़ी-खिचड़ी  कहता हुआ घर को चला.

 

 

 

लेकिन था गंवार ही खिचड़ी  शब्द भूल गया और खाचिडी-खाचिड़ी अपने आप उसके मुंह से निकलने लगा. रास्ते में एक स्थान पर एक किसान  अपने खेत की रक्षा कर रहा था.  उसने जिस समय शेखचिल्ली को खाचिडी-२ कहते हुए सुना तो मार-मार कर उसका भूसा बना दिया और कहने लगा अब खाचिडी न कहना, दूर रहो, समीप मत आओ.

 

 

 

अब शेख चिल्ली  दूर रहो समीप मत आओ कहना आरम्भ कर दिया. थोड़ी दूर गया होगा कि वहां चिड़ीमार  जाल फैलाए बैठे थे. उन्होंने भी खूब मरम्मत की और बोले कि अब तुम आते जाते और फंसते जाओ कहना.  शेखचिल्ली ने आते जाओ और फंसे जाओ कहना आरम्भ कर दिया. सामने से बहुत से चोर आ रहे थे.

 

 

उन्होंने  शेख चिल्ली के यह शब्द सुने तो मारे गुस्से के उनका बुरा हाल हो गया. उन्होंने शेखचिल्ली को इतना पीटा कि अधमरा कर छोड़ दिया.  वहां से रिहाई हुई तो शेखचिल्ली थक कर चूर हो गया था. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि हे खुदा! कोई सवारी भेज, इतने में पीछे से एक सवार आता दिखाई दिया और बोला- मेरी घोडी की बछेडी कंधे पर उठा लो.

 

 

 

शेखचिल्ली ने बछेडी कंधे पर उठा ली और बोला-वाह मेरे ईश्वर! इतने वर्ष खुदाई करते हो गए हैं और अभी नीचे ऊपर के अंतर का पता नहीं। मैंने घोडी माँगी थी नीचे को, आपने दे दी ऊपर को….मित्रों यह कहानी खिचड़ी आपको कैसी लगी जरुर बताएं और इस तरह की कहानी के लिए इस ब्लॉग को लाइक, शेयर और सबस्क्राइब करना ना भूलें और दूसरी कहानी के लिए नीचे की लिंक पर क्लिक करें.

 

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