Biography

shyamji krishna varma

shyamji krishna varma
shyamji krishna varma

shyamji krishna varma एक भारतीय क्रांतिकारी , वकील और पत्रकार थे. shyamji krishna varma भारत माता के उन वीर पुत्रों में से थे जिन्होंने अपना सारा जीवन आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने इग्लैंड में पढ़ाई के बाद भारत में कुछ समय वकालत की और राज्घरानू में दीवान के तौर पर भी काम किया. लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों से त्रस्त होकर वे फिर इंगलैंड चली गेये. shyamji krishna varma संस्कृत समेत कई भारतीय भाषाओँ के ज्ञाता थे.

shyamji krishna varma father name – श्री कृष्ण वर्मा

shyamji krishna varma mother name – गोमती बाई

shyamji krishna varma date of birth – ४ अक्टूबर १८५७

shyamji krishna varma birth place – मांडवी , गुजरात

shyamji krishna varma wife name – भानुमती

shyamji krishna varma death date – ३० मार्च १९३०

shyamji krishna verma death place – जिनेवा , स्विटजरलैंड

shyamji krishna varma का जन्म गुजरात के मांडवी में ४ अक्टूबर १८५७ को हुआ था. इनके पिता का नाम श्री कृष्ण वर्मा और मां का नाम गोमती बाई था. जब shyamji krishna varma ११ साल के थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया. जिसके बाद उनका लालन पालन उनकी दादी ने किया . उनकी शुरूआती पढ़ाई भुज में हुई और उसके बाद की शिक्षा उन्होंने मुंबई के विल्सन हाई स्कूल से की. उन्होंने संस्कृत की शिक्षा भी मुंबई से ही ग्रहण की.

सन १८७५ में shyam ji का विवाह उनके दोस्त की बहन भानुमती के साथ हो गया. उसके बाद shyam ji की मुलाक़ात दयानंद सरस्वती से हुई. shyam ji जल्द ही उनके शिष्य बन गए और धर्म तथा वैदिक दर्शन पर भाषण देने लगे. सन १८७७ तक उनकी ख्याति पुरे भारत वर्ष में फ़ैल चुकी थी. मोनिएर विलिएम्स जो कि आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफ़ेसर थे वे shyamji krishna verma के संस्कृत ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें आक्सफोर्ड में अपने सहायक के रूप में कार्य करने का न्योता दे दिया.shyamji krishna verma ने इसे स्वीकार कर लिया और उन्हें आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बल्लीओल कालेज में २५ अप्रैल १८७९ को दाखिला मिल गया. वहा से उन्होंने १८८३ में बी.ए. की परीक्षा पास की. उसके बाद वे भारत आ गए और कुछ समय तक वकालत की. उसके बाद उन्होने रतलाम के राजा, उदयपुर के राजा के यहाँ दीवान के तौर पर कार्य किया. इसी सिलसिले में जूनागढ़ में दिवान के तौर पर कार्य किया , लेकिन सन १८९७ में एक ब्रिटिश अधिकारी विवाद के बाद उनका ब्रिटिश राज से मोहभंग हो गया और उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

उसके बाद shyamji krishna varma वापस इग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने दयानंद सरस्वती की प्रेरणा से इंडिया हाउस की स्थापना की. जिसमें वीर सावरकर , एस . आर . राणा , लाला हरदयाल, भगत सिंह , मदन लाल धींगरा जैसे बड़े क्रांतिकारी जुड़े थे. shyamji krishna varma लोकमान्य गंगाधर तिलक के भी प्रशंसक थे. उन्हें कांग्रेस की अंग्रेजों के प्रति नीतियाँ पसंद नहीं थी. इंग्लैण्ड में shyamji krishna verma ने १९०० में लन्दन के हाईगेट में एक आलिशान घर ख़रीदा जो राजनितिक गतिविधियों का केंद्र बना. स्वाधीनता आन्दोलन को मजबूत करने के लिए shyam ji १९०५ से इंडियन सोशियोलोजिस्ट नामक मासिक मात्र निकलना शुरू किया. इसके बाद १८ फ़रवरी १९०५ को इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापाना की. इसका उद्देश्य भारतियों के लिए भारतियों के द्वारा भारतियों की सरकार स्थापित करना था.

shyamji krishna varma के राष्ट्रवादी लेखों ने अंग्रेजी हुकूमत को चौकन्ना कर दिया . इसके बाद इनपर प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया. ब्रिटिश प्रेस भी इनके खिलाफ हो गयी. shyam ji पर तमाम आरोप लगाये गए , जिसका shyam ji ने बखूबी जवाब दिया. ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग shyamji krishna verma पर नजर रखने लगा , इसके बाद shyam ji ने वीर सावरकर को इंडिया हाउस की जिम्मेदारी सौपकर गुप्त रूप से पेरिस निकल गए.पेरिस में इन्होने अपनी गतिविधि फिर शुरू की. ब्रिटिश सरकार ने फ्रांस की सरकार पर shyam ji के प्रत्यर्पण का दबाव बनाया, लेकिन असफल रही. उसके बाद वे १९१४ में जिनेवा चले गए. पेरिस में वे कई फ्रांसीसी नेताओं को अपनी बात समझाने में सफल रहे. सन १९२० में उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा . उन्होंने जिनेवा से भी इंडियन सोशिओलोजिस्ट का प्रकाशन जारी रखा , लेकिन १९२२ के बाद कोई अंक प्रकाशित नहीं कर पाए. जिनेवा के हास्पिटल में ३० मार्च १९३० को shyamji krishna varma को निधन हो गया. इस दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने shyam ji की मृत्यु की खबर को भारत में दबाने की कोशिश की.

आज़ादी ले लगभग ५५ साल बाद २२ अगस्त २००३ को shyamji krishna varma और उनकी पत्नी की अस्थियों को जिनेवा से भारत लाया गया . उनके सम्मान में २०१० में मांडवी के पास कीर्ति तीर्थ नाम से shyamji krishna varma smarak mandvi बनाया गया और उनके नाम से एक डाक टिकट भी जारी किया गया और उसके साथ कच्छ विश्वविद्यालय का नाम shyamji krishna varma के नाम पर रखा गया है.

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