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Story in Hindi . हिंदी की 3 बेहतरीन कहानियां. जरूर पढ़ें यह खूबसूरत कहानियां

Story in Hindi With Moral
Written by Abhishek Pandey

Story in Hindi For Kids    हिंदी की बेस्ट कहानियां 

 

 

 

Story in Hindi स्कूल में क्लास चल रहा था..अध्यापक सुरेश गुप्ता बच्चों को पढ़ा रही थे. जब स्कूल की छुट्टी का समय हुआ तो अति आवश्यक सूचना के लिए सभी विद्यार्थियों को स्कूल के प्रांगण में इकट्ठा होने की लिए चपरासी सुरेश के द्वारा सभी कक्षाओं में सूचना प्रसारित करवा दिया गया.

 

 

 

सभी विद्यार्धियों के इकट्ठा होने के बाद प्रधानाचार्य संपूर्णानंद ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों हमें यह बताते हुये बड़ी प्रसन्नता हो रही कि हमारे और आपके इस विद्याल को कल २५ वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस उपलक्ष्य में यहां एक समारोह का आयोजन किया जा रहा है.

 

 

 

इसे यादगार बनाने के लिए हम सभी को मिलकर सम्मिलित प्रयास करना होगा. प्रत्येक विद्यार्थी को उसके प्रधान शिक्षक बताएंगे कि किसे क्या सहयोग करना है.

 

 

 

स्कूल की छुट्टी हो गयी....सभी बच्चे अपनेअपने घर को चले गये..लेकिन रोज की तरह छोटा बच्चा नीलेश आज भी सबसे पीछे रह गया. उस विद्यालय के रास्ते में एक जंगल पड़ता था. सभी बच्चे बड़े होने की कारण एक साथ मिलकर निकल जाते थे.

 

 

 

 

हिंदी बेस्ट स्टोरी की खूबसूरत कहानियां 

 

 

 

लेकिन नीलेश पीछे ही रह जाता था..ऐसे में उसे जंगल में बहुत ही डर लगता था. उसने यह बात अपनी मां को बताई थी, तो उसकी मां ने कहा था कि तुम आने और जाने के समय अपने कन्हैया भैया को आवाज़ लगाना...वे तुम्हें जंगल पर करा देंगे.

 

 

 

नीलेश बालक था....अबोध था...जब घर जाते समय जंगल के करीब पहुंचा तो उसे मां की बात याद गयी. उसने ज़ोरज़ोर से कन्हैया भैया..कन्हैया भैया चिल्लाने लगा..और वह जंगल पार कर गया. अब यह उसका रोज का कम हो गया. विश्वास में बड़ी ताक़त होती है.

 

 

 

जब वह घर पहुंचा तो बहुत निरास लग रहा था..उसे निरास देखकर उसकी मां ने इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि विद्यालय में एक कार्यक्रम रखा गया है. उसामीं सभी बच्चों से फूल लाने को कहा गया है. जिससे विद्यालय में जो भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित है उसे सजाया जा सके.

 

 

 

 

इसमें क्या बड़ी बात है ...तुम अपने कन्हैया भैया से मांग लीना..वे ज़रूर दे देंगे...इस पर नीलेश एकदम शांत हो गया..और उसकी मां भी चुप हो गयी. लेकिन इस चुप्पी में बहुत ही बड़ा दर्द छुपा था.. नीलेश भले ही बालक था, लेकिन वह अपनी मां की बेबसी को समझता था.

 

 

 

 

उसके पिता को मरे साल हो गये थे..घर में उसकी मां के अलावा कोई नहीं था. उसकी मां किसी तरह खीतों में काम करके, दूसरों के घरों में काम घर का खर्चा चलाती थी.

 

 

 

 

उससे वह वाकिफ़ था...उसने कहा ठीक है मां..मैं कन्हैया भैया से बोल दूंगा......उसकी यह बातें सुनकर उसकी मां जो अब तक अपने जज्बातों को दबाए हुए थी.

 

 

 

 

वे आसुओं में परिवर्तित हो गयी.....अपनी मां को रोता देख नीलेश भी रोने लगा....कभी उसकी मां नीलेश को चुप कराती..तो कभी नीलेश अपनी मां..उनके इस करुन क्रंदान से पत्थर का भी दिल पसीज जाता....उन बेसहरों का अब कन्हैया के अलावा कोई सहारा नहीं था.

 

 

शेखर विद्यालय की ओर निकाला..उसने देखा कि सभी बच्चे तरहतरह के फूल लिए हुए है...कोई गेंदे का फूल लिया है तो कोई कनैल..तो कोई चमेली का फूल लिया है.

 

 

 

 

सभी बच्चे बहुत खुश थे और अपने अपने फूल की तारीफ कर रहे थे. निराश मन से चलता हुआ नीलेश जंगल के पास पहुंचा, सभी बच्चे आगे निकल गये थे.

 

 

 

 

वह वहीं बैठ गया और रोने लगा. तभी एक सावला सा युवक आया, जिसका चेहरा तेज से चमक रहा था...आधारों पर मनमोहक मुस्कान थी..सिर पर मोर पंख विराजमान थे.

 

 

 

क्या हुआ…क्यों रो रहे हो? उस युवक ने कहा.

 

 

आप कौन...नीलेश चौक कर बोला और पीछे सरकने लगा.

 

 

अरे..क्या कर रहे हो..तुम तो मुझे रोज बुलाते थे..आज तुमने मुझे बुलाया ही नहीं तो मुझे खुद आना पड़ा..उस युवक ने कहा .

 

 

कन्हैया भैया...नीलेश खुश होते हुए बोला.

 

 

हां...लो यह फूल...यह भगवान विघ्नेश्वर को दे देना..वे तुम्हारे सारे कष्ट को ख़त्म कर देंगे..उस युवक ने फूल देते हुए कहा.

 

लेकिन मैने तो आपसे फूल माँगा ही नहीं...फिर आपको कैसे पता चला...नीलेश ने कहा.

 

 

 

तुम मुझे क्या कहते हो..कन्हैया भैया ...यानी कि मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ....तो मुझे अपने छोटे भाई की परेशानी कैसे पता नहीं चलेगी....और विद्यालय से छूटने पर मुझे ज़रूर मिलना...मुस्कुराते हुए उस युवक ने कहा.

 

 

फिर कन्हैया ने नीलेश को जंगल पर करा दिया. नीलेश विद्यालय पहुंचा और टीचर से बोला कि यह फूल कहां रखना है..टीचर ने कहा कि इसे गणेश जी को अर्पित कर दो.....तभी उनकी नज़र फूल पर गयी. उन्होने देखा कि उस फूल में से एक चमक निकल रही थी....और उसकी सुगंध से पूरा वातावरण सुगंधित होने लगा था.

 

 

यह फूल तुम्हे कहा से मिला...टीचर ने नीलेश से पूछा.

 

मेरे कन्हैया भैया ने दिया...नीलेश खुश होते हुए बोला.

 

अच्छा ठीक है...जाओ उसे भगवान गणेश जी को अर्पित कर दो...टीचर ने कहा.

 

 

नीलेश ने फूल चढ़ा दिया...उसके बाद पूजा हुई..सबको प्रसाद दिया गया..उसके बाद छुट्टी हो गयी...छुट्टी के बाद नीलेश जब वापस लौटा तो जंगल के पास पहुँच कर अपनी कन्हैया भैया को पुकारा....फिर वही सवला सा युवक निकला.

 

 

 

निलेश  ने खुशीखुशी उन्हें प्रसाद दिया..उसके बाद उस युवक ने नीलेश को एक पोटली देते हुए कहा कि जाओ और यह पोटली अपनी मां को दे देना..और कहना कि कन्हैया भैया ने दिया है. 

 

 

 

नीलेश घर गया और पोटली देते हुए सारी बात बता दी....उसकी मां ने जब पोटली खोला तो उनकी आंखों में आसू गये...लेकिन यह आसू खुशी के, विश्वास और संतोष के थी...उस पोटली में ढेर सारे रुपये और जवाहरात थे. अब उनकी जिंदगी चैन से कटने लगी.

 

 

 

सीख :- विश्वास ही सबसे बड़ी भक्ति है. 

 

 

 

Story in Hindi For Children शिक्षाप्रद मनोरंजक कहानियां 

 

 

 

२-  इस साल भी बरसात धोखा देगी क्या ? पिछले दो सालों से यही हाल रहा है बरसात का, इस साल तो और भी ज्यादा परेशानी हो रही है. जून महीने में बारिश की एक बूँद भी नही गिरी, जुलाई भी ख़त्म हो रही है लेकिन दोचार बूँदों को छोड़कर बारिस का कुछ आतापता नहीं है. अब तो बस अगस्त महीने की थोड़ी आशा है, अगर अगस्त भी ऐसे ही रहा तो...... फसल चौपट ( यह आवाज़ पीछे सी आई) 

 

 

रघु ने पीछे मुड़कर देखा तो उसकी पत्नी गिरिजा देवी खड़ी थी.

 

गिरा देवी मैं कब से देख रही हूँ , आप खुद से ही बातें किए जा रहे हो.

 

 

रघु शिकायती स्वर में क्या करूं, सब भगवान की लीला है, मरे को और मरते हैं. तुम्हें तो समय मिलता नहीं है तो मान हल्का करणने के लिये खुद से बातें कर लेता हूँ.

 

 

गिरिजा निरुत्तर कुछ देर खड़ी रही, फिर बात बदल कर कहा कि चलिए कुछ खा लिजिये, फिर इसके बारे में कुछ सोचा जाएगा.  सुरेंद्र नगर का जय भारत इंटर कालेज, जहां पिछले चार दिनों से हाकी प्रतियोगिता चल रही थी.

 

 

कालेज की कहानी

 

 

 

जय भारत इंटर कालेज अभी तक अजेय थी, उसका सबसे बड़ा कारण था उसका सबसे तेज खिलाड़ी प्रथमेश. जब प्रथमेश मैदान में हाकी लेकर आता तो दर्शकों का उल्लास अपने चरम सीमा पर होता था....लोग एक स्वर में नारा लगाते...प्रथम..प्रथम...प्रथमेश.

 

 

प्रथमेश भी दर्शकों को निराश नहीं करता, नाम के अनुरूप वह खेल और पढ़ाई दोनो ही क्षेत्रों में बहुत आगे था. प्रथमेश रघु का छोटा बेटा था. उससे पिता का दुख देखा नहीं जाता था, वह किसानों के हर दुख हर समस्यायों से वाकिफ था. एक दिन उसने अपने पिता रघु से पूछा क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कम पानी मीन ही अच्छी फसलें उगाई जा सकें.

 

 

 

बेटा हम पढ़े लिखे तो हैं नहीं, जो अपने पिताजी से विरासत में मिला उसी ही जानते हैं रघु ने कहा.

 

प्रथमेश मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा कि इस विरासत को बदल सकूं.

 

 

 

सुरेंद्र नगर के डी एम दीपक मिश्राने एक कार्ड को देखते हुए अपने चपरासी बहादुर को आवाज दिया..बहादुर... बहादुर...लेकिन बहादुर का कहीं पता नहीं....दीपक मिश्रा झुंझला कर अपनी कुर्सी पर बैठे ही थे कि बहादुर वहां हाजिर हो गया.

 

 

 

दीपक मिश्रा कहां चले गये थे...कब से आवाज़ लगा रहा हूँ.

 

बहादुर जी साब, एक बिल्ली गमले के पास बैठी थी उसे ही भगा रहा था.  

 

दीपक मिश्रा तुम्हारा नाम बहादुर किसने रखा, तुम एक बिल्ली को भगाने में इतना समय लगाते हो.

 

बहादुर मेरे नाना से साब, मेरा नाम बहादुर रखा. 

 

दीपक मिश्रा चुप करो, जाओ फटाफट मेरी गाड़ी तैयार करावो, अभी तुरंत निकलना है.  

 

 

 

खेल अपने अपने सबाब पर था, दोनो टीमें मजबूती से खेल रही थी, यह फाइनल मैच था. जय भारत के खिलाफ की टीम भी बहुत मजबूत थी, अभी मुकाबला के बराबरी पर था, की अचानक खेल का रुख़ ही बदल गया, कुछ ही मिनटों में प्रथमेश ने एक के बाद एक गोल दागे, अब मुकाबला का हो गया और यह आख़िरी तक चला, अंत में जय भारत की टीम विजयी हुई.

 

 

 

प्रथमेश को इस अविस्मरणीय खेल की लिए दीपक मिश्रा के हाथों सम्मानित किया गया. दीपक मिश्रा ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है.

 

 

 

Story in Hindi With Moral

 

 

भारत की अर्थव्यवस्था अच्छी पैदावार पर टिकी रहती है. आज हालत यह है कि कोई खेती करना नहीं चाहता, हालत इतने बिगड़ चुके हैं कि पता चल जाए कि लड़का खेती करता है तो उसके लिए अच्छे रिश्ते आने बंद हो जाते हैं, ऐसे में प्रथमेश ने जो यह चमत्कारी प्रोजेक्ट तैयार किया है जिससे कम पानी में भी अच्छी पैदावार होगी, यह क़ाबिले तारीफ है.

 

 

 

 

इस प्रोजेक्ट लिए इसे राष्ट्रपति कार्यालय से विशेष न्योता आया है. सरकार खुद इस प्रोजेक्ट के लिए फंड उपलब्ध करा रही है. इस प्रोजेक्ट से सभी किसान लाभान्वित होंगे.

 

 

 

प्रथमेश के सम्मान में लोगों ने अपनी अपनी जगहों से उठ कर टली बजाई. उसकी पिता की आँखें खुशी से भर आई. आज प्रथमेश नी अपना वादा पूरा कर दिया था.

 

 

 

Story in Hindi For Class 7  बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां 

 

 

 

3- अंनपूर्णा मतलब जो अन्न से परिपूर्ण हो तथा अपना ख्याल ना रखते हुए भी घर के हर सदस्यों का ख्याल रखे, उसे ही अंनपूर्णा कहते हैं.......रतनलाल अपने पोती और पोते तथा पड़ोस के दोचार बच्चों को समझा रहे थे.

 

 

 

बाबू जी नाश्ता लीजिए...रतन लाल की बहू रीमा धीरे से बोली.

 

 

हाँ बेटा कहते हुई रतनलाल जी ने प्लेट पकड़ी और बच्चों से कहा बेटा यही तो है अंनपूर्णा.

 

 

लेकिन ये हमारी मम्मी है...उनकी पोती स्वाती ने मासूमियत से कहा.

 

 

हँसते हुए रतनलाल जी ने कहा कि हां आपकी मम्मी ही है.

 

 

तो आपनी झूठ क्यों बोला...आप ही तो कहते हो झूठ बोलना पाप है...नदी किनारे सांप है.....उनका पोटा राजेश इठलाते हुए बोला.

 

 

अच्छा एक काम करो, चलो पहले हम सभी लोग नाश्ता कर लेते हैं ....फिर आपको इस बारे में बताएंगे....फिर सभी लोग नाश्ता करने लगते हैं.

 

 

अरे भाई मेरी टाई कहां गयी...रीमा ढ़ुंढ़ो तो ज़रा और हां मेरा लंच बॉक्स भी रेडी कर देना....मैं नहा कर रहा हूँ..रीमा के पति शेखर ने कहा

 

 

 

मम्मी हमीं स्कूल जाना है...तोड़ा जल्दी करो ना...राजेश ने वहीं अपने दादा के पास बैठेबैठे आवाज़ लगाई.ठीक ठीक... रूको अभी पापा की टाई ढूँढ कर आपका भी लंच देती हूँ.

 

 

पापा कितने भुलक्कड़ हैं ना...स्वाती ने हँसते हुए कहा और राजेश ने भी उसकी हां में हां मिलते हुए उसे ताली दी.इतने में शेखर तैयार होकर निकाला, उसका सारा समान रेडी था....उसने दो ब्रेड उठाई और फटाफट आफ़िस के लिए निकला.

 

 

 

स्टोरी इन हिंदी फॉर चाइल्ड 

 

 

 

तब तक बस गयी और रीमा बच्चों को छोड़कर लौटी और रतनलाल से बोली..बाबूजी आप भी नहा लीजिए...पानी गरम करके रखा हुआ है.ठीक है बेटा...रतनलाल जी ने कहा और नहाने चले गये...नहाकर जब वे वापस आए तो उनका खाना लगा हुआ था.

 

 

 

वह खाना खाकर सोच ही रहे थे कि रीमा आकर सब बर्तन ले गयी...रतनलाल देख रहे थे कि सब कुछ सही से चल रहा था...किसी को कहीं भी कोई शिकायत नही थी...क्योंकि उनकी बहू अंनपूर्णा थी.

 

 

 

बाबूजी मैं आफ़िस के लिए निकल रही हूँ, यह घर की चावी अपने पास रख लीजिए ....कहते हुययए रीमा तेज़ी से कदम बढ़ती हुये आफ़िस के लिए निकल पड़ी.

 

 

 

और रतनलाल अपनी बीती हुई जिंदगी में खो गये जो उन्हें १५ साल पीछे ले गयी....चलचित्र की तरह सबकुछ उनकी आँखों के सामने सब कुछ चलने लगा.

 

 

 

रमनलाल की पत्नी को स्वर्ग सिधारे करीब साल हो गये थे. रमनलाल की मां अपनी बहू को अंनपूर्णा नाम दिया हुआ था. पूरे का कितना ख्याल रखती थी मालती. कुछ कहने पर कहती कि मां और बाबूजी दुबारा थोड़े ही मिलेंगे.इस बात पर सभी चुप हो जाते थे.

 

 

 

शाम के बाज गये थी...रीमा ने डोर बेल बजाई.....कुछ देर बाद रतनलाल ने दरवाजा खोला....वैसे वे दरवाजा जल्दी खोल देते थे...रीमा कुछ कहे उसके पहले ही रतनलाल ने कह दिया कि बेटा आज मई थोड़ा सो गया था... इसीलिए थोड़ी देर हो गयी.

 

 

 

अरे देर कहां हुई बाबूजी...मैं तो अभी आई हूँ...रीमा ने बात को टालते हुए कहा...चलिए बाबूजी मैं चाय बनती हूँ....बच्चे भी आते होंगे...आप फ्रेश हो जाइए.

 

 

 

इतने में बच्चे भी गये...पूरे घर में जैसे जिंदगी गयी.....इसी बीच रीमा ने चाय रखा और फ्रेश होने चली गयी.रतनलाल सोचने लगे....अपनी सास का पूरा गुण रीमा को मिला है, कितना ख्याल रखती है पूरे परिवार का.

 

 

 

स्टोरी इन हिंदी फॉर किड्स Story in Hindi

 

 

 

तभी शेखर की गाड़ी दरवाजे पर गयी...दोनो बच्चे...पापा..पापा कहते हुए बाहर गये और आज बाहर कहीं घूमने की ज़िद करने लगे.नहीं बेटा आज बहुत ही काम है...शेखर ने कहा.

 

 

आपको को हमारे लिए समय ही नहीं होता है....स्वाती ने पैर पटक कर कहा.

 

 

सही तो कह रही है बिटिया....कभी तो साथ घुमाने ले जाया कर.....रतनलाल ने शेखर को डाँटते हुए कहा.

 

 

पर बाबूजी....

 

 

क्या बाबूजी....आज तू इन बच्चों को घुमाने ले जाएगा.

 

 

जाने दीजिए बाबूजी....मैं इन्हे घुमा लाऊँगी.....रीमा ने कहा.

 

 

देख यह है अंनपूर्णा.....अपना ख्याल ना रखते हुए सुबह से लेकर शाम तक सिर्फ़ परिवार के लिए भागती रहती है....कभी किसी नी इसकी तरफ देखा...क्या इसे आफ़िस में काम नहीं होता.....बच्चों आप पूछ रहे थे कौन होती है अंनपूर्णा?...तो बच्चों यह है अंनपूर्णा....आप लोग चाहे जो भी किसी नाम से इसे बुलाएं....लेकिन मैं इसे अंनपूर्णा ही कहूँगा......अंनपूर्णा...जो को खुशियों से भर दे.

 

 

 

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