Bhakti Story

maha shivaratri story

maha shivratri image
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Written by Hindibeststory

maha shivaratri story महाशिवरात्रि हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है. इसे लेकर बहुत सारी कथाएं प्रचिलित हैं. आज हम आपको इससे जुडी एक पौराणिक कथा बताने जा रहा हूँ.

एक बार माता पार्वती जी ने lord shiva से पूछा, ‘ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’ इस पर lord shiva ने पार्वती को maha shivaratri story के व्रत की कथा सुनाई.

एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था. शिकार करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था. उसने एक साहुकार से ऋण लिया था और गरीबी के कारण वह ऋण नहीं चुका सका. इससे साहूकार बहुत क्रोधित हुआ और शिकारी एक शिवमठ में बंदी बना लिया. संयोग से उस दिन mahashivratri थी.

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा. चतुर्दशी को उसने mahashivratri व्रत की कथा भी सुनी. संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की. शिकारी ने साहूकार को वचन दिया कि वह अगले दिन कर्ज वापस कर देगा. इस पर साहूकार ने उसे हिदायत देती हुए छोड़ दिया. अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए गया. लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था. शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा.. बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था. शिकारी को उसका पता न चला.

maha shivaratri story / mahashivratri festival

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं. इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए. एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाव पर पानी पीने पहुंची. शिकारी ने धनिश पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खिंची , मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूं. शीघ्र ही प्रसव करूंगी. तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है. मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना.’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई.

maha shivaratri story
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कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली. शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया. तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं. कामातुर विरहिणी हूं. अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं. मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी.’ अब तो उसका माथा ठनका , लेकिन फिर भी उसने मृगी को जाने दिया. दो बार शिकार छोड़ने के बाद उसी चिंता सताने लगी .

maha shivaratri story / shivaratri speacial

रात्री का आखिरी प्रहर भी बितने वाला था. तभी एक दूसरी अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ निकली . अब शिकारी के ख़ुशी कका ठिकाना नहीं रहा. शिकारी के लिए यह अंतिम अवसर था. उसने यह स्वर्णिम अवसर गवाना उचित नहीं समझा. उसने झट से धनुष पर तीर चढ़ाया और जैसे ही तीर छोड़ने वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी!’ मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो.

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं. इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार छोड़ चुका हूं. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे. इस पर मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी. इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूँ. हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं.

maha shivaratri story / why mahashivratri is celebrated

मृगी के इस प्रकार बोलने पर शिकारी को दया आ गयी. उसने इस मृगी को भी जाने दिया. शिकार के अभाव में बेल के पत्र पर शिकारी बैठा बैठा बेलपत्र तोड़ तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था. सुबह होने वाली थी . वह निराश हो चला था. तभी एक हृष्ट – पुष्ट मृग उस रास्ते पर आया. शिकारी ने दृढ निश्चय कर लिया कि इसका शिकार वह निश्चय ही करेगा.

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग बहुत ही विनीत स्वर में बोला, हे पारधी ! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े. मैं उन मृगियों का पति हूं.यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो. मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

maha shivaratri story
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मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी. तब मृग ने कहा ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी. अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो. मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं.’

उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था. धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया. lord shiva की कृपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया. वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा.

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई. उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई. उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया. देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे. घटना की परिणति होते ही देवी देवतावों ने पुष्प वर्षा की और मृग परिवार , शिकारी और उसका परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए.

इसके बाद से ही mahashivaratri का त्यौहार मनाया जाने लगा. मित्रों यह पोस्ट maha shivaratri story आपको कैसी लगी अवश्य ही बताएं और भी अन्य bhakti story के लिए ब्लॉग को सबस्क्राइब कर लें और भी अन्य hindi story के लिए इस लिंक https://www.hindibeststory.com/hindi-kahani/ पर क्लिक करें.

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