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suryaputra karn

 suryaputra karn इस कहानी में danveer karna के त्याग और बालिदान को बताया गया है। karna महादानी के साथ एक महा महावीर और कुशल योद्धा थे…पुरे mahabharata में उनकी उपस्थिति बहुत ही अहम है. karna पांडवों के ज्येष्ठ थे. उनकी मां कुंती और पिता सूर्यदेव हैं. कुंती के विवाह के पहले ही कर्ण का जन्म  हो गया था … तो लोक लाज की डर से कुंती ने कर्ण को एक नदी में बहा दिया …. karna के शरीर पर सूर्य देव के वरदान के कारण बचपन  से ही कवच और कुंडल विद्यमान था. जो कि सदैव उनकी रक्षा करता था ….. उन्हें उस कवच कुंडल के रहते कोई भी अस्त्र-शस्त्र भेद नहीं सकता था.

suryaputra karn

karna image

suryaputra karn  नदी में बहते हुए karna को अधिरथ ने देखा और करुना भाव से उन्हें अपने घर ले गया और उनका लालन-पालन किया. समय बितता गया…karna जब थोड़े बड़े हुए तो उन्होंने शस्त्रों का अध्ययन करना शुरू कर दिया. karna सूर्य के उपासक थे और सूर्यदेव की उपासना के समय कोई भी याचक खाली नहीं जाता था..वह उसकी हर इच्छा पूरी करते थे. mahabharata yuddh के दौरान एक निति के तहत भगवान इन्द्रदेव वेश बदलकर karna के पास पहुंचे. उस समय karna उपासना कर रहे थे. तब इन्द्रदेव ने  कवच और कुंडल मांग लिया. karna ने ख़ुशी- ख़ुशी कवच और कुंडल दे दिया…..जबकि उन्होंने भगवान् इंद्र को पहचान लिया था और भगवान सूर्य देव ने भी karna को सचेत किया था…लेकिन वह अपने कर्तव्य पर अडिग रहे और उन्होंने ने कवच कुंडल दान कर कर दिया….इसीलिए danveer karna कहलाते हैं. उनकी इस कर्तव्य परायणता और निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान इंद्र ने danveer karna को अमोघ अस्त्र प्रदान किया और कहा इस अमोघ अस्त्र को जिस पर संधान करके छोड़ा जायेगा उसकी मृत्यु सुनिश्चित होगी, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल एक बार ही किया जा सकता है.

suryaputra karn

Karna image

जब युद्ध भूमि में अर्जुन के हाथों  suryaputra karn बुरी तरह घायल  होकर अपनी अंतिम सांस गिन रहे थे . उसी समय अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा  कि केशव आप बार-बार कर्ण को danveer karna कहते हैं…..ऐसा क्यों ? बहुत से लोग उनसे भी महादानी हैं.

इसपर कान्हा को अर्जुन की बातों में अहंकार दिखा…उन्होंने कहा कि इस धरा पर इस समय karna से बड़ा कोई महादानी नहीं है …अगर तुम्हे विश्वास न हो तो अभी भी जबकि suryaputra karn बुरी तरह घायल हैं उनकी परीक्षा ले सकते हो.

गर्व से चूर अर्जुन ने कहा कि ठीक है और दोनों लोगों ने ब्राह्मण का वेश धारण करके danveer karna के पास पहुंचे.वहां पहुंच कर  ब्राह्मण वेधधारी श्रीकृष्ण ने karna से कह … राजन अपकी जय हो … राजन हम बहुत ही गरीब ब्राहमण हैं .. हम आपसे कुछ दान कि याचना करते हैं…हम उम्मीद करते हैं कि आप हमें खाली हाथ नहीं भेजेंगे.

suryaputra karn

Mahabharata

इस पर karna थोडा सकुचाये और हाथ जोड़कर बोले” हे ब्राह्मण देव…मुझे माफ़ करो…मैं इस अवस्था में आपकी कोई मदद नहीं कर सकता….मैं लज्जित हूँ….मुझे क्षमा करें”

इस पर ब्राह्मण ने कहा कि ठीक है राजन….हम वापस जाते हैं लेकिन एक बात याद रखिये सारा संसार आपको एक धर्म से विमुख राजा के रूप में याद रखेगा…आपका सारा यश धूमिल हो जाएगा….यह कहकर ब्राह्मण जाने लगे…इसपर danveer karna ने कहा…रुकियी महाराज….मैं धर्म से विमुख का पाप नहीं ले सकता….मैं आपको खाली हाथ नहीं जाने दूंगा…फिर suryaputra karn किसी तरह सरक कर एक पत्थर उठाया और अपने दो सोने के दातों को तोड़कर ब्राह्मण को देने लगे …लेकिन ब्राह्मणों ने यह कहते हुए उन स्वर्ण दन्त को लेने से मना कर दिया कि यह जूठा है…..तब कर्ण किसी तरह अपने धनुष तक पहुंचे और मां गंगा का स्मरण कर एक बाण चला दिया और धरती को चीरते हुए एक तेज धारा निकली…फिर danveer karn ने उन स्वर्ण दांतों को धोकर कहा …लीजिये महाराज यह स्वच्छ हो गेये.

इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप प्रकट किया…जिसे देख danveer karna  धन्य हो गए….तब केशव ने कहा “कर्ण तुम्हारी प्रसिद्धि इस संसार में हमेशा बनी रहेगी और यह जगह बाणगंगा के नाम से प्रसिद्धि होगी, जो कि संसार में तुम्हारी दानवीरता से लोगों को परिचित कराएगी. दोस्तों suryaputra karn की यह कहानी आपको कैसी लगी..कमेन्ट करके बताये और अन्य hindi stories के लिए इस भरोसा hindi kahaniya लिंक पर क्लिक करें.

 

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