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तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां

तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां
Written by Abhishek Pandey

तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां विजयनगर राज्य में बड़ी जोरदार ठंड पड़ रही थी . राजा कृष्णदेव राय के दरबार में इस ठंड की बहुत चर्चा हुई.  पुरोहित ने महाराज को सुझाया.  ‘महाराज, यदि इन दिनों यज्ञ किया जाए तो उसका फल उत्तम होगा.  दूर-दूर तक उठता यज्ञ का धुआँ सारे वातावरण को स्वच्छ और पवित्र कर देगा.’

 

 

दरबारियों ने एक स्वर में कहा, ‘बहुत उत्तम सुझाव है पुरोहित जी का.  महाराज को यह सुझाव अवश्य पसंद आया होगा .’ महाराज कृष्णदेव राय ने कहा-‘ठीक है.  आप आवश्यकता के अनुसार हमारे कोष से धन प्राप्त कर सकते हैं.’

 

‘महाराज, यह महान यज्ञ सात दिन तक चलेगा.  कम-से-कम एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ तो खर्च हो ही जाएँगी .’ प्रतिदिन सवेरे सूर्योदय से पहले मैं नदी के ठंडे जल में खड़े होकर तपस्या करुँगा और देवी-देवताओं को प्रसन्न करुँगा.  और अगले ही दिन से यज्ञ शुरू हो गया. इस यज्ञ में दूर-दूर से हजारों लोग आते और ढेरों प्रसाद बँटता है.

 

पुरोहित जी यज्ञ से पहले सुबह-सवेरे कड़कड़ाती ठंड में नदी के ठंडे जल में खड़े होकर तपस्या करते, देवी-देवताओं को प्रसन्न करते.  लोग यह सब देखते और आश्चर्यचकित होते.  एक दिन राजा कृष्णदेव राय भी सुबह-सवेरे पुरोहित जी को तपस्या करते देखने के लिए गए . उनके साथ तेनालीराम भी था .

 

ठंड इतनी थी कि दाँत किटकिटा रहे थे. ऐसे में पुरोहित जी को नदी के ठंडे पानी में खड़े होकर तपस्या करते देख राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से कहा, ‘आश्चर्य! अदभुत करिश्मा है! कितनी कठिन तपस्या कर रहे हैं हमारे पुरोहित जी.  राज्य की भलाई की उन्हें कितनी चिंता है.’

 

‘वह तो है ही.  आइए महाराज…जरा पास चलकर देखें पुरोहित जी की तपस्या को. ’ तेनालीराम ने कहा.  ‘लेकिन पुरोहित जी ने तो यह कहा है कि तपस्या करते समय कोई पास न आए.  इससे उनकी तपस्या में विघ्न पैदा होगा .’ राजा ने कहा.

 

‘तो महाराज, हम दोनों ही कुछ देर तक उनकी प्रतीक्षा कर लें.  जब पुरोहित जी तपस्या समाप्त करके ठंडे पानी से बाहर आएँ, तो फल-फूल देकर उनका सम्मान करें. ’ राजा कृष्णदेव राय को तेनालीराम की यह बात जँच गई.  वह एक ओर बैठकर पुरोहित को तपस्या करते देखते रहे.

 

काफी समय गुजर गया लेकिन पुरोहित जी ने ठंडे पानी से बाहर निकलने का नाम तक न लिया.  तभी तेनालीराम बोल उठा- ‘अब समझ में आया.  लगता है ठंड की वजह से पुरोहित जी का शरीर अकड़ गया है.  इसीलिए शायद इन्हें पानी से बाहर आने में कष्ट हो रहा है.  मैं इनकी सहायता करता हूँ.’

 

तेनालीराम नदी की ओर गया और पुरोहित जी का हाथ पकड़कर उन्हें बाहर खींच लाया.  पुरोहित जी के पानी से बाहर आते ही राजा हैरान रह गए.  उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.  वे बोले, ‘अरे, पुरोहित जी की तपस्या का चमत्कार तो देखो! इनकी कमर से नीचे का सारा शरीर नीला हो गया.’

 

तेनालीराम हँसकर बोला, ‘यह कोई चमत्कार नहीं है, महाराज…. यह देखिए…सर्दी से बचाव के लिए पुरोहित जी ने धोती के नीचे नीले रंग का जलरोधक पाजामा पहन रखा है. ’ राजा कृष्णदेव राय हँस पड़े और तेनालीराम को साथ लेकर अपने महल की ओर चल दिए.  पुरोहित दोनों को जाते हुए देखता रहा.

                                                                                 तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां   
एक दिन राजा कृष्णदेव राय शिकार के लिए गए .  वह जंगल में भटक गए.  दरबारी पीछे छूट गए। शाम होने को थी . उन्होंने घोड़ा एक पेड़ से बांधा.  रात पास के एक गांव में बिताने का निश्चय किया . राहगीर के वेश में किसान के पास गए। कहा, “दूर से आया हूं . रात को आश्रय मिल सकता है ?”

किसान बोला, “आओ, जो रूखा-सूखा हम खाते हैं, आप भी खाइएगा .  मेरे पास एक पुराना कम्बल ही है, क्या उसमें जाड़े की रात काट सकेंगे ?” राजा ने ‘हां’ में सिर हिलाया.

रात को राजा गांव में घूमे . भयानक गरीबी थी.  उन्होंने पूछा, “दरबार में जाकर फरियाद क्यों नहीं करते ?” कैसे जाएं? राजा तो चापलूसों से घिरे रहते हैं.  कोई हमें दरबार में जाने ही नहीं देता .” किसान बोला .

सुबह राजधानी लौटते ही राजा ने मंत्री और दूसरे अधिकारियों को बुलाया .  कहा, “हमें पता चला है, हमारे राज्य के गांवों की हालत ठीक नहीं है.  तुम गांवों की भलाई के काम करने के लिए खज़ाने से काफी रुपया ले चुके हो .  क्या हुआ उसका ?”

मंत्री बोला, “महाराज, सारा रुपया गांवों की भलाई में खर्च हुआ है .  आपसे किसी ने गलत कहा .” मंत्री के जाने के बाद उन्होंने तेनाली राम को बुलवा भेजा .  कल की पूरी घटना कह सुनाई .  तेनाली राम ने कहा, “महाराज, प्रजा दरबार में नहीं आएगी .  अब आपको ही उनके दरबार में जाना चाहिए .  उनके साथ जो अन्याय हुआ है, उसका फैसला उन्हीं के बीच जाकर कीजिए .”

अगले दिन राजा ने दरबार में घोषणा की-“कल से हम गांव-गांव में जाएंगे, यह देखने के लिए कि प्रजा किस हाल में जी रही है!” सुनकर मंत्री बोला, “महाराज, लोग खुशहाल हैं .  आप चिन्ता न करें। जाड़े में बेकार परेशान होंगे .”

तेनाली राम बोला, “मंत्रीजी से ज्यादा प्रजा का भला चाहने वाला और कौन होगा? यह जो कह रहे हैं, ठीक ही होगा.  मगर आप भी तो प्रजा की खुशहाली देखिए . ” मंत्री ने राजा को आसपास के गांव दिखाने चाहे .  पर राजा ने दूर-दराज के गावों की ओर घोड़ा मोड़ दिया . राजा को सामने पाकर लोग खुल कर अपने समस्याएं बताने लगे .

मंत्री के कारनामे का सारा भेद खुल चुका था .  वह सिर झुकाए खड़ा था .  राजा कृष्णदेव राय ने घोषणा करवा दी- अब हर महीने कम से कम एक बार वे खुद जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे .

                                                                         
                                                          तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां

एक दिन तेनालीराम को संदेश मिला कि रानी तिरुमलादेवी इस समय बड़े संकट में हैं और आपसे मिलना चाहती हैं .  तेनालीराम तुरन्त रानी जी से मिलने गए  .  ”रानी जी! कैसे याद किया सेवक को ?” ”तेनालीराम जी! हम एक भारी मुसीबत में फंस गए हैं .”

”मेरे होते आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें और मुझे बताएं कि क्या बात है . ” दिलासा पाकर रानी की औखें भर आईं .  वे बोलीं…… ”बात दरअसल ये है कि महाराज हमसे काफी नाराज हैं .” ”किन्तु क्यों ? क्या हुआ था ?” ”एक दिन वह हमें अपना एक नाटक पढ़कर सुना रहे थे कि हमें उबासी आ गई, बस इसी बात पर महाराज नाराज होकर चले गए .

तब से आज तक कई दिन हो गए हैं, महाराज ने इस तरफ का रुख ही नहीं किया .  हालांकि इसमें मेरा कोई दोष नहीं था, फिर भी मैंने महाराज से माफी मांगी, पर महाराज पर कोई असर नहीं हुआ .  अब तो तुम्हीं हमारी इस समस्या को हल कर सकते हो तेनालीराम .”

”आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें .  मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास करूँगा . ” महारानी को ढांढस बंधाकर तेनालीराम दरबार में जा पहुंचे .  महाराज राज्यसभा में  राज्य में चावल की खेती पर मंत्रियों से चर्चा कर रहे थे .  ”चावल की उपज बढ़ाना बहुत आवश्यक है .”

महाराज कह रहे थे….. ”हमने बहुत प्रयत्न किए . हमारे प्रयत्नों से स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन समस्या पूरी तरह सुलझी नहीं है .” ”महाराज!” तभी तेनालीराम ने चावल के बीजों में से एक-एक बीज उठाकर कहा:  ”यदि इस किस्म का बीज बोया जाए तो इस साल उपज दुगनी-तिगुनी हो सकती है .”

”अच्छा-क्या इस किस्म का बीज इसी खाद में हो जाएगा ?” ”हां महाराज! किसी प्रकार का और दूसरा प्रयत्न करने की आवश्यकता ही नहीं है किन्तु….”  ”किन्तु क्या तेनालीराम ” ”इसे बोने, सींचने और काटने वाला व्यक्ति ऐसा हो जिसे जीवन में कभी उबासी न आई हो और न कभी आए .”

”तेनालीराम! तुम्हारे जैसा मूर्ख मैंने आज तक नहीं देखा  . ” महाराज चिढ़ से गए.   ”क्या संसार में ऐसा कोई व्यक्ति है जिसे कभी उबासी न आई हो . ” ”ओह! क्षमा करें महाराज! मुझे नहीं मालूम था कि उबासी सभी को आती है.  मैं ही क्या, महारानी जी भी यही समझती हैं कि उबासी  आना बहुत बड़ा जुर्म है.  मैं अभी जाकर महारानी जी को भी बताता हूं .”

अब महाराज की समझ में पूरी बात आ गई .  वे समझ गए कि हमें रास्ते पर लाने के लिए ही तेनालीराम ने ऐसा कहा है .  वे बोले: ”मैं स्वयं जाकर महारानी को बता दूंगा .” महाराज तुरन्त महल में जाकर रानी जी से मिले और उनके सभी शिकवे समाप्त कर दिए .

                                                                         तेनाली रामा की बेस्ट कहानियां
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एक बार विजय नगर राज्य में भयंकर वर्षा हुई जिसके कारण पूरे राज्य में बाढ़ आ गई जिसने तबाही मचा डाली .  अनेकों घर पानी में बह गए . हजारों पशु बाढ़ की भेंट चढ़ गए .  इस विपदा की खबर राजा कृष्णदेव राय को मिली तो उन्होंने तुरन्त मंत्री को बुलाकर आदेश दिया—– ”तुरन्त बाढ़ पीड़ितों की सहायता की जाए .  उनकी चिकित्सा, खाने और रहने की व्यवस्था की जाए और इस कार्य के लिए जितने भी धन की आवश्यकता हो, वह राजकोष से अविलम्ब ले लिया जाए .

नदी नालों पर पुल बनाएं जाएं तथा उसी प्रकार की और दूसरी व्यवस्था की जाए जिससे प्रजा को राहत मिले . ” मंत्री ने महाराज को आश्वासन दिया और राजकोष से तुरन्त भारी रकम निकलवाकर सहायता के कार्य में जुट गया .  उस दिन के बाद से कई हफ्तों तक मंत्री जी राजधानी में दिखाई न दिए .

महाराज व दूसरे लोग आश्वस्त थे कि मंत्री जी जोर-शोर से राहत कार्यों में जुटे हैं .  उधर तेनालीराम भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं थे .  करीब एक महीने बाद प्राकृतिक आपदा राहत मंत्री दरबार में पधारे और महाराज को राहत कार्य की रिपोर्ट देने लगे .  अपने काम की उन्होंने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की .

जब दरबार की कार्यवाही समाप्त हो गई तो सभी के जाने के बाद महाराज ने तेनालीराम से कहा: ”तेनालीराम! यह मंत्री काफी कर्मठ हैं .  एक माह में ही बाढ़-पीड़ितों के दुख-दर्द दूर कर दिए .”  ”आप ठीक कहते हैं महाराज-क्यों न एक बार आप भी चलकर देख लें कि मंत्री जी ने कैसे और क्या-क्या प्रबंध किए हैं-प्रजा आपको अपने बीच देखेगी तो उनका काफी मनोबल बढ़ेगा .”

”बात तो तुम्हारी ठीक है .” महाराज ने फौरन सहमति दे दी .  अगले ही दिन महाराज कृष्णदेव राय और तेनालीराम अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की ओर निकल गए .  रास्ते में राजा का बाग था . उन्होंने देखा कि बाग के बहुत से कीमती वृक्ष कटे हुए हैं .

”ये पेड़ किसने काटे हैं . ” ”महाराज! या तो तेज हवा से टूट गए होंगे या बाढ़ बहाकर ले गई होगी . ” चलते-चलते वे एक नाले पर जा पहुंचे . उस स्थान पर पुल के नाम पर कटे हुए पेड़ों के दो तने रखे थे .  ”अरे! क्या इस मंत्री के बच्चे ने ऐसे ही पुल बनाए हैं . ये तने तो शाही बाग के पेड़ों के लगते हैं . ”

”महाराज! हो सकता है कि ये तने बाढ़ के पानी में बहकर स्वयं ही यहां आकर अटक गए हों .  आगे चलिए आगे अवश्य ही मंत्री जी ने अच्छे पुलों का निर्माण कराया  होगा . ” मगर सभी जगह वही हाल था .  वे जैसे-तैसे एक गांव में जा पहुंचे .  गांव का बहुत-सा भाग अभी खे पानी में डूबा हुआ था .

जिस स्थान से बाढ़ का पानी निकल गया था, वहां गंदगी फैली थी .  जगह-जगह मरे हुए जानवर सड़ रहे थे .  जिसके कारण ऐसी दुर्गंध फैली हुई थी कि सांस लेना भी दूभर हो रहा था .  लोग अभी तक पेड़ों पर मचान बनाकर रह रहे थे .  खाने की कौन कहे, पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं थी .

यह सब देखकर महाराज का खून खौल रहा था .  उधर, तेनालीराम अलग आग में घी डाल रहे थे .   ”देखिए महाराज! मंत्री जी ने इन लोगों को सदा के लिए पेड़ों पर बसा दिया है, अब चाहे कितनी भी बाढ़ आए इनका पांव भी गीला नहीं होगा .  इससे बेहतर राहत कार्य और भला क्या हो सकता है .”

“तेनालीराम-तुमने यहां लाकर हमारी औखें खोल दीं .  इस मंत्री को हम ऐसा दण्ड देंगे कि जीवन भर याद रखेगा .  चलो, तुरन्त वापस चलो .” दूसरे दिन दरबार लगा, महाराज ने अपना आसन ग्रहण करते ही मंत्री को आड़े हाथों लिया और खूब फटकार लगाई, फिर बोले: ”राजकोष से जितना पैसा तुमने लिया है, अब उससे दोगुना तुम्हें इस कार्य पर खर्च करना होगा और इस काम में खर्च होने वाली एक-एक पाई का हिसाब तेनालीराम रखेंगे .”  महाराज का यह आदेश सुनते ही मंत्री महोदय का चेहरा लटक गया .

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