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tenali rama story hindi तेनाली की 15 उम्दा कहानियां

tenali rama story hindi
Written by Abhishek Pandey

tenali rama story hindi विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय को अनोखी चीजों को जमा करने का बहुत शौक था. हर दरबारी उन्हें खुश करने के लिए ऐसी ही चीजों की खोज में लगे रहते थे, ताकि राजा को खुश कर उनसे मोटी रकम वसूल सके.

 

एक बार कृष्णदेव राय के दरबार में एक दरबारी ने एक मोर को लाल रंग में रंग कर पेश किया और कहा, “महाराज इस लाल मोर को मैंने बहुत मुश्किल से मध्य प्रदेश के घने जंगलों से आपके लिए पकड़ा है.” राजा ने बहुत गौर से मोर को देखा. उन्होंने लाल मोर कहीं नहीं देखा था.

राजा बहुत खुश हुए…उन्होंने कहा, “वास्तव में आपने अद्भुत चीज लाई है. आप बताएं इस मोर को लाने में कितना खर्च पड़ा.” दरबारी अपनी प्रशंसा सुनकर आगे की चाल के बारे में सोचने लगा.

उसने कहा, “मुझे इस मोर को खोजने में करीब पच्चीस हजार रुपए खर्च करने पड़े.”

राजा ने तीस हजार रुपए के साथ पांच हजार पुरस्कार राशि की भी घोषणा की. राजा की घोषणा सुनकर एक दरबारी तेनालीराम की तरफ देखकर मुस्कराने लगा.

तेनालीराम उसकी कुटिल मुस्कराहट देखकर समझ गए कि यह जरूर उस दरबारी की चाल है. वह जानते थे कि लाल रंग का मोर कहीं नहीं होता. बस फिर क्या था, तेनालीराम उस रंग विशेषज्ञ की तलाश में जुट गए.

दूसरे ही दिन उन्होंने उस चित्रकार को खोज निकाला. वे उसके पास चार मोर लेकर गए और उन्हें रंगवाकर राजा के सामने पेश किया.

“महाराज हमारे दरबारी मित्र, पच्चीस हजार में केवल एक मोर लेकर आए थे, पर मैं उतने में चार लेकर आया हूं.”

वाकई मोर बहुत खूबसूरत थे. राजा ने तेनालीराम को पच्चीस हजार रुपए देने की घोषणा की. तेनाली राम ने यह सुनकर एक व्यक्ति की तरफ इशारा किया, “महाराज अगर कुछ देना ही है तो इस चित्रकार को दें. इसी ने इन नीले मोरों को इतनी खूबसूरती से रंगा है.”

राजा को सारा गोरखधंधा समझते देर नहीं लगी. वह समझ गए कि पहले दिन दरबारी ने उन्हें मूर्ख बनाया था.

राजा ने उस दरबारी को पच्चीस हजार रुपए लौटाने के साथ पांच हजार रुपए जुर्माने का आदेश दिया. चित्रकार को उचित पुरस्कार दिया गया. दरबारी बेचारा क्या करता, वह बेचारा सा मुंह लेकर रह गया.

 

 

tenali rama ki Dusari Kahani 

 

एक बार राजा कृष्णदेव राय से पुरोहित ने कहा, ‘महाराज, हमें अपनी प्रजा के साथ सीधे जुड़ना चाहिए.’ पुरोहित की बात सुनकर सभी दरबारी चौंक पड़े. वे पुरोहित की बात समझ न पाए.

 

तब पुरोहित ने अपनी बात को समझाते हुए उन्हें बताया, ‘दरबार में जो भी चर्चा होती है, हर सप्ताह उस चर्चा की प्रमुख बातें जनता तक पहुँचाई जाएँ. प्रजा भी उन बातों को जानें.’ मंत्री ने कहा, ‘महाराज, विचार तो वास्तव में बहुत उत्तम है.

 

तेनालीराम जैसे अकलमंद और चतुर व्यक्ति ही इस कार्य को सुचारु रूप से कर सकते हैं. साथ ही तेनालीराम पर दरबार की विशेष जिम्मेदारी भी नहीं है.

राजा ने मंत्री की बात मान ली और तेनालीराम को यह काम सौंप दिया. तय किया गया-तेनालीराम जनहित और प्रजा-हित की सारी बातें, जो राजदरबार में होंगी, लिखित रूप से दरोगा को देंगे. दरोगा नगर के चौराहों पर मुनादी कराकर जनता और प्रजा को उन बातों की सूचनाएँ देगा.

तेनालीराम सारी बात समझ गया था. वह यह भी समझ गया था कि मंत्री ने उसे जबरदस्ती फँसाया है. तेनालीराम ने भी अपने मन में एक योजना बनाई.

 

सप्ताह के अंत में उसने मुनादी करने के लिए दरोगा को एक पर्चा थमा दिया. दरोगा ने पर्चा मुनादी वाले को पकड़ाकर कहा, ‘जाओ और मुनादी करा दो.’

मुनादी वाला सीधा चौराहे पर पहुँचा और ढोल पीट-पीटकर मुनादी करते हुए बोला, ‘सुनो-सुनो, नगर के सारे नागरिकों सुनो.’ महाराज चाहते हैं कि दरबार में जनहित के लिए जो फैसले किए गए हैं, उन्हें सारे नगरवासी जानें. उन्होंने श्रीमान तेनालीराम को यह कठिन काम सौंपा है. हम उन्हीं की आज्ञा से आपको यह समाचार सुना रहे हैं। ध्यान देकर सुनो.

 

महाराज चाहते हैं कि प्रज्ञा और जनता के साथ पूरा न्याय हो. अपराधी को दंड मिले. इस मंगलवार को राजदरबार में इसी बात को लेकर काफी गंभीर चर्चा हुई. महाराज चाहते थे कि पुरानी न्याय-व्यवस्था की अच्छी और साफ-सुथरी बातें भी इस न्याय प्रणाली में शामिल की जाएँ.

 

 

इस विषय में उन्होंने पुरोहित जी से पौराणिक न्याय-व्यवस्था के बारे में जानना चाहा किंतु पुरोहित जी इस बारे में कुछ न बता सके, क्योंकि वह दरबार में बैठे ऊँघ रहे थे. उन्हें इस दशा में देखकर राजा कृष्णदेव राय को गुस्सा आ गया.

 

उन्होंने भरे दरबार में पुरोहित जी को फटकारा. गुरुवार को सीमाओं की सुरक्षा पर राजदरबार में चर्चा हुईं किंतु सेनापति उपस्थित न थे, इस कारण सीमाओं की सुरक्षा की चर्चा आगे न हो सकी. राजा ने मंत्री को कड़े आदेश दिए हैं कि राजदरबार में सारे सभासद ठीक समय पर आएँ.’

यह कहकर मुनादी वाले ने ढोल बजा दिया.  इस प्रकार हर सप्ताह नगर में जगह-जगह मुनादी होने लगी. हर मुनादी में तेनालीराम की चर्चा हर जगह होती थी. तेनालीराम की चर्चा की बात मंत्री,सेनापति और पुरोहित के कानों में भी पहुँची.

 

वे तीनों बड़े चिंतित हो गए,कहने लगे,‘तेनालीराम ने सारी बाजी ही उलटकर रख दी. जनता समझ रही है कि वह दरबार में सबसे प्रमुख हैं. वह जानबूझकर हमें बदनाम कर रहा है.’

दूसरे ही दिन जब राजा दरबार में थे तो मंत्री ने कहा, ‘महाराज, हमारा संविधान कहता है कि राजकाज की समस्त बातें गोपनीय होती हैं. उन बातों को जनता या प्रजा को बताना ठीक नहीं.’

तभी तेनालीराम बोल पड़ा, ‘बहुत अच्छे मंत्री जी, आपको शायद उस दिन यह बात याद नहीं थी. आपको भी तभी याद आया, जब आपके नाम का ढोल पिट गया.’

यह सुनकर सारे दरबारी हँस पड़े. बेचारे मंत्री जी की शक्ल देखने लायक थी. राजा कृष्णदेव राय भी सारी बात समझ गए .वह मन ही मन तेनालीराम की सराहना कर रहे थे.

 

 

tenali ramakrishna story in hindi  story – 3

 

राजा कृष्णदेव राय का घोड़ा अच्छी नस्ल का था इसलिए उसकी कीमत ज्यादा थी.  तेनालीराम का घोड़ा मरियल था.  तेनाली राम उसे बेचना चाहते थे, पर उसकी कीमत बहुत ही कम थी. वह चाह कर भी बेच नहीं पाते थे.

 

एक दिन राजा कृष्णदेव राय और तेनाली राम अपने अपने घोड़े पर सवार होकर सैर को निकले. सैर के दौरान राजा ने तेनालीराम के घोड़े की मरियल चाल देखकर कहा, “कैसा मरियल घोड़ा है तुम्हारा, जो कमाल मैं अपने घोड़े के साथ दिखा सकता हूं, वह तुम अपने घोड़े के साथ नहीं दिखा सकते.”

तेनाली राम ने राजा को जवाब दिया, “महाराज जो मैं अपने घोड़े के साथ कर सकता हूं वह आप अपने घोड़े के साथ नहीं कर सकते.”

राजा मानने को जरा भी तैयार नहीं थे. दोनों के बीच सौ-सौ स्वर्ण मुद्राओं की शर्त लग गई.

दोनों आगे बढ़े. सामने ही तुंगभद्रा नदी पर बने पुल को वे पार करने लगे. नदी बहुत गहरी और पानी का प्रवाह तेज था. उसमें कई जगह भंवर दिखाई दे रहे थे. एकाएक तेनालीराम अपने घोड़े से उतरे और उसे पानी में धक्का दे दिया.

उन्होंने राजा से कहा, “महाराज अब आप भी अपने घोड़े के साथ ऐसा ही कर के दिखाइए.” मगर राजा अपने बढ़िया और कीमती घोड़े को पानी में कैसे धक्का दे सकते थे.

 

उन्होंने तेनाली राम से कहा, “न बाबा न, मैं मान गया कि मै अपने घोड़े के साथ यह करतब नहीं दिखा सकता, जो तुम दिखा सकते हो.” राजा ने तेनाली राम को सौ स्वर्ण मुद्राएं दे दीं. “पर तुम्हें यह विचित्र बात सूझी कैसे?” राजा ने तेनाली राम से पूछा.

“महाराज, मैंने एक पुस्तक में पढ़ा था कि बेकार और निकम्मे मित्र का यह फायदा होता है कि जब वह नहीं रहे, तो दुख नहीं होता.” तेनाली राम की यह बात सुनकर राजा ठहाका लगाकर हंस पड़े.

 

 

            tenali rama story तेनाली की 15 उम्दा कहानियां  Story -4

 

एक बार तेनालीराम और महाराज में बहस छिड़ गई कि लोग किसी की बात पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं या नहीं ? तेनालीराम का कहना था कि लोगों को आसानी से बेवकूफ बनाकर अपनी बात मनवायी जा सकती है .

महाराज का कहना था कि यह गलत है . लोग इतने मूर्ख नहीं कि किसी की बात पर भी आख मूंदकर विश्वास कर लें . महाराज ने कहा: ”तुम किसी से भी जो चाहो नहीं करवा सकते .” ”क्षमा करें महाराज! मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं कि यदि आपमें योग्यता है तो आप सामने वाले से असम्भव से असम्भव कार्य भी करवा सकते हैं-बल्कि मै तो यहां तक कहूंगा कि यदि मैं चाहूं तो किसी से आप पर जूता भी फिंकवा सकता हूं .”

”क्या कहा ?” महाराज ने आखें तरेरीं- ” हम तुम्हें चुनौती देते हैं तेनालीराम कि तुम ऐसा करके दिखाओ .” ”मुझे आपकी चुनौती स्वीकार है महाराज!”

तेनालीराम ने सिर झुकाया: ”किन्तु इसके लिए मुझे कुछ समय चाहिए .” ”तुम जितना चाहो समय ले सकते हो .” दृढ़ता से महाराज ने कहा .

और उस दिन बात आई-गई हो गई . तेनालीराम और महाराज दोनों ही अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए . दो माह बाद महाराज कृष्णदेव राय ने कुर्ग प्रदेश के एक पहाड़ी सरदार की सुन्दर बेटी से अपना विवाह तय किया .पहाड़ी इलाके के सरदार को विवाह के समय महाराज के परिवार के रीति-रिवाजों का पता न था .

उसने जब महाराज के सामने अपनी यह परेशानी रखी तो वे बोले: ”इस विषय में तुम्हें किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है-हमें केवल आपकी पुत्री चाहिए .” परन्तु सरदार फिर भी न माना . वह अपनी इकलौती बेटी के विवाह में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखना चाहता था, अत: उसने चुपचाप तेनालीराम से सम्पर्क किया .

तेनालीराम ने उसकी समस्या जानकर दिलासा दी कि आप चिन्ता न करें, मैं सभी रस्में अदा करवाने वहां उपस्थित रहूंगा . सरदार को बेहद प्रसन्नता हुई . मगर तेनालीराम ने उसे समझा दिया कि वह इसे बात का जिक्र किसी से न करे .

तेनालीराम ने उससे कहा: ”महाराज कृष्णदेव राय के वंश में एक रिवाज यह भी है कि विवाह की सभी रस्में पूरी हो जाने पर   दुल्हन अपने पांव से मखमल की जूती उतारकर राजा पर फेकती है . उसके  बाद दूल्हा दुल्हन को अपने घर ले जाता है .

मैं चाहता हूं कि लगे हाथों यह रस्म रस्म भी पूरी हो जाए, इसीलिए मैं गोवा के पुर्तगालियों से एक जोड़ा जूतियां भी ले आया हूं . पुर्तगालियों ने मुझे बताया की यह  रिवाज तो यूरोप में भी है, लेकिन वहां चमड़े के जूते फेंके जाते हैं . हमारे यहां तो चमड़े की जुती की बात सोची भी नहीं जा सकती . हां, मखमल की जूती की बात कुछ और ही है . ”

”एक बार और सोच लें तेनालीराम जी-जूती तो जूती ही होती है, फिर चाहे वह मखमल को हो या चमड़े की . पत्नी द्वारा पति पर जूती फेंकना क्या उचित होगा?”

सरदार ने शंकित लहजे में कहा: “हम तो बेटी वाले हैं, कहीं ऐसा न हो कि लेने के देने पड़ जाएं .” ”देखिए साहब! विजय नगर के राजघराने में यह रस्म तो होती ही आई है .

अब आप यदि इसे न करना चाहें तो कोई बात नहीं .” ”नहीं-नहीं तेनालीराम जी! कोई भी रस्म अधूरी नहीं रहनी चाहिए यदि ऐसा हुआ तो ससुराल में बेटी को अपमानित होना पड़ सकता है . लाइए वह जूती मुझे दीजिए . मैं अपनी बेटी के विवाह में कोई कसर नहीं रखना चाहता .”

विवाह की बाकी सभी रस्में पूरी हो चुकी थीं . महाराज को डोली की विदाई का इंतजार था . दुल्हन को बाहर लाकर दहेज के सामान के पास ही एक स्थान पर बैठा दिया गया था . अचानक दुल्हन ने अपने पांव से मखमल की जूती उतारी और मुस्कराते हुए महाराज पर फेंक मारी .

महाराज की भृकुटि तन गई . वह क्रोध और अपमान से तिलमिलाकर उठना ही चाहते थे कि तभी पास बैठे तेनालीराम ने उनका हाथ दबा दिया और जल्दी से उनके कान के पास मुंह ले जाकर बोले: ”महाराज! क्रोध न करें और इन्हें क्षमा कर दें . ये सब मेरा किया धरा है .”

”ओह!” महाराज को तुरन्त उस दिन की बात याद आ गई और वह मुस्करा दिए . फिर रानी की जूती उठाकर उनके करीब आए और जूती वापस दे दी . ”क्षमा करें महाराज! आपके वंश की रस्म अदा करने के लिए….” ”कोई बात नहीं प्रिये-तेनालीराम हमें सब कुछ बता चुके हैं .”

और फिर जब महल लौट आए तो तेनालीराम से मुखातिब होकर वे बोले: ”तुमने ठीक ही कहा था तेनालीराम-लोग किसी की भी बात पर विश्वास कर लेते हैं .”

 

tenali rama story hindi    Story -5  महान पुस्तक 

 

एक बार राजा कॄष्णदेव राय के दरबार में एक महान विद्वान आया.  उसने वहॉ दरबार में उपस्थित सभी विद्वानो को चुनौती दी कि पूरे विश्व में उसके समान कोई बुध्दिमान व विद्वान नहीं है.

 

उसने दरबार में उपस्थित सभी दरबारियों से कहा कि यदि उनमें से कोई चाहे तो उसके साथ किसी भी विषय पर वाद-विवाद कर सकता है. परन्तु कोई भी दरबारी उससे वाद-विवाद करने का साहस न कर सका. अन्त में सभी दरबारी सहायता के लिए तेनाली राम के पास गए .

 

तेनाली राम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया और दरबार में जाकर तेनाली ने विद्वान की चुनौती स्वीकार कर ली. दोनों के बीच वाद-विवाद का दिन भी निश्चित कर दिया गया.

 

निश्चित दिन तेनाली राम एक विद्वान पण्डित के रुप में दरबार पँहुचा. उसने अपने एक हाथ में एक बडा सा गट्ठर ले रखा था, जो देखने में भारी पुस्तकों के गट्ठर के समान लग रहा था.

 

शीघ्र ही वह महान विद्वान भी दरबार में आकर तेनाली राम के सामने बैठ गया. पण्डित रुपी तेनाली राम ने राजा को सिर झुकाकर प्रणाम किया और गट्ठर को अपने और विद्वान के बीच में रख दिया, तत्पश्चात दोनों वाद-विवाद के लिए बैठ गए.

राजा जानते थे कि पण्डित का रुप धरे तेनाली राम के मस्तिष्क में अवश्य ही कोई योजना चल रही होगी इसलिए वह पूरी तरह आश्वस्त थे. अब राजा ने वाद-विवाद आरम्भ करने का आदेश दिया.

पण्डित के रुप में तेनाली राम पहले अपने स्थान पर खडा होकर बोला, “विद्वान महाशय! मैंने आपके विषय मैं बहुत कुछ सुना है. आप जैसे महान विद्वान के लिए मैं एक महान तथा महत्वपूर्ण पुस्तक लाया हूँ, जिस पर हम लोग वाद-विवाद करेंगे.”

“महाशय! कॄपया मुझे इस पुस्तक का नाम बताइए.” विद्वान ने कहा.

तेनाली राम बोले, “विद्वान महाशय, पुस्तक का नाम है, ‘तिलक्षता महिषा बन्धन’

विद्वान हैरान हो गया. अपने पूरे जीवन में उसने इस नाम की कोई पुस्तक न तो सुनी थी न ही पढी थी. वह घबरा गया कि बिना पढी व सुनी हुई पुस्तक के विषय में वह कैसे वाद्-विवाद करेगा.

 

फिर भी वह बोला, “अरे, यह तो बहुत ही उच्च कोटि की पुस्तक है. इस पर वाद-विवाद करने में बहुत ही आनन्द आएगा . परन्तु आज यह वाद-विवाद रहने दिया जाए. मेरा मन भी कुछ उद्विनहै और इसके कुछ महत्वपूर्ण तथ्यूं को मैं भूल भी गया हूँ. कल प्रातः स्वस्थ व स्वच्छ मस्तिष्क के साथ हम वाद-विवाद करेगें.”

 

तेनाली राम के अनुसार, वह विद्वान तो आज के वाद-विवाद के लिए पिछले कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था परन्तु अतिथि की इच्छा का ध्यान रखना तेनाली का कर्तव्य था. इसलिए वह सरलता से मान गया.

 

परन्तु वाद-विवाद में हारने के भय से वह विद्वान नगर छोडकर भाग गया. अगले दिन प्रातः जब विद्वान शाही दरबार में उपस्थित नहीं हुआ, तो तेनाली राम बोला, “महाराज, वह विद्वान अब नहीं आएगा. वाद-विवाद में हार जाने के भय से लगता है, वह नगर छोडकर चला गया है.”

 

“तेनाली, वाद-विवाद के लिय लाई गई उस अनोखी पुस्तक के विषय में कुछ बताओ जिससे कि डर कर वह विद्वान भाग गया ?” राजा ने पूछा .

 

“महाराज, वास्तव में, ऐसी कोई भी पुस्तक नहीं है. मैंने ही उसका यह नाम रखा था. ‘तिलक्षता महिशा बन्धन ‘, इसमें ‘तिलक्षता का अर्थ है, ‘शीशम की सूखी लकडियॉ’ और ‘महिषा बन्धन का अर्थ है, ‘वह रस्सी जिससे भैसों को बॉधा जाता है.’ मेरे हाथ में वह गट्ठर वास्तव में शीशम की सूखी लकडिओं का था, जो कि भैंस को बॉधने वाली रस्सी से बन्धी थीं.  उसे मैंने मलमल के कपडे में इस तरह लपेट दिया था ताकी वह देखने में पुस्तक जैसी लगे.”

 

तेनाली राम की बुद्धिमता देखकर राजा व दरबारी अपनी हँसी नहीं रोक पाए. राजा ने प्रसन्न होकर तेनाली राम को ढेर सारे पुरस्कार दिया.

 

 

 Story – 6 

रामैया नाम के आदमी के विषय में नगर-भर में यह प्रसिद्ध था कि जो कोई प्रातः उसकी सूरत देख लेता था, उसे दिन-भर खाने को नहीं मिलता था. इसलिए सुबह-सुबह कोई उसके सामने आना पसंद नहीं करता था.

 

किसी तरह यह बात राजा कृष्णदेव राय तक पहुँच गई. उन्होंने सोचा, ‘इस बात की परीक्षा करनी चाहिए.’ उन्होंने रामैया को बुलवाकर रात को अपने साथ के कक्ष में सुला दिया और दूसरे दिन प्रातः उठने पर सबसे पहले उसकी सूरत देखी.

दरबार के आवश्यक काम निबटाने के बाद राजा जब भोजन के लिए अपने भोजन कक्ष में गए तो भोजन परोसा गया . अभी राजा ने पहला कौर ही उठाया था कि खाने में मक्खी दिखाई दी.  देखते-ही-देखते उनका मन खराब होने लगा और वह भोजन छोड़कर उठ गए. दोबारा भोजन तैयार होते-होते इतना समय बीत गया कि राजा की भूख ही मिट गई.

 

राजा ने सोचा-‘अवश्य यह रामैया मनहूस है, तभी तो आज सारा दिन भोजन नसीब नहीं हुआ.’ क्रोध में आकर राजा ने आज्ञा दी कि इस मनहूस को फाँसी दे दी जाए. राज्य के प्रहरी उसे फाँसी देने के लिए ले चले . रास्ते में उन्हें तेनालीराम मिला. उसने पूछा तो रामैया ने उसे सारी बात कह सुनाई.

 

तेनालीराम ने उसे धीरज बँधाया और उसके कान में कहा, ‘तुम्हें फाँसी देने से पहले ये तुम्हारी अंतिम इच्छा पूछेंगे.  तुम कहना, ‘मैं चाहता हूँ कि मैं जनता के सामने जाकर कहूँ कि मेरी सूरत देखकर तो खाना नहीं मिलता, पर जो सवेरे-सवेरे महाराज की सूरत देख लेता है, उसे तो अपने प्राण गँवाने पड़ते हैं.’

 

यह समझाकर तेनालीराम चला गया.  फाँसी देने से पहले प्रहरियों ने रामैया से पूछा, ‘तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है?’ रामैया ने वही कह दिया, जो तेनालीराम ने समझाया था. प्रहरी उसकी अनोखी इच्छा सुनकर चकित रह गए. उन्होंने रामैया की अंतिम इच्छा राजा को बताई.

सुनकर राजा सन्न रह गए. अगर रामैया ने लोगों के बीच यह बात कह दी तो अनर्थ हो जाएगा. उन्होंने रामैया को बुलवाकर बहुत-सा पुरस्कार दिया और कहा-‘यह बात किसी से मत कहना.’

 

 

tenali rama story hindi  story – 7

 

एक बार महाराज कॄष्णदेव राय किसी बात पर तेनालीराम से नाराज हो गए. गुस्से में आकर उन्होंने तेनालीराम से भरी राजसभा में कह दिया कि कल से मुझे दरबार में अपना मे अपना मुंह मत दिखाना. उसी समय तेनालीराम दरबार से चला गया.

 

दूसरे दिन जब महाराज राजसभा की ओर आ रहे थे तभी एक चुगलखोर ने उन्हें ये कहकर भडका दिया कि तेनालीराम आपके आदेश के खिलाफ दरबार में उपस्थित हैं.

बस यह सुनते ही महाराज आग-बगुला हो गए. चुगलखोर दरबारी आगे बोला आपने साफ कहा था कि दरबार में आने पर कोडे पडेंगे, इसकी भी उसने कोई परवाह नहीं की . अब तो तेनालीराम आपके हुक्म की भी अवहेलना करने में जुटा हैं.

राजा दरबार में पहुंचे. उन्होंने देखा कि सिर पर मिट्टी का एक घडा ओढे तेनालीराम विचित्र प्रकार की हरकतें कर रहा हैं. घडे पर चारों ओर जानवरों के मुंह बने थे.  तेनालीराम! ये क्या बेहुदगी हैं.

 

तुमने हामारी आज्ञा का उल्लंघन किया हैं. महाराज ने कहा दण्डस्वरुप कोडे खाने के तैयार हो जाओ. मैंने कौन सी आपकी आज्ञा नहीं मानी महाराज?

 

घडे में मुंह छिपाए हुए तेनालीराम बोला-आपने कहा था कि कल मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं क्या आपको मेरा मुंह दिख रहा हैं. हे भगवान! कहीं कुम्भार ने फुटा घडा तो नहीं दे दिया.

यह सुनते ही महाराज की हंसी छूट गई. वे बोले तुम जैसे बुद्धिमान और हाजिरजवाब से कोई नाराज हो ही नहीं सकता. अब इस घडे को हटाओ और सीधी तरह अपना आसन ग्रहण करो.

 

1- कितने अंधे akbar birbal story

2- short story of akbar and birbal 

 

     tenali rama story in hindi  story – 8           बिल्ली के लिए गाय 

 

एक बार की बात है, बहुत सारे चूहों ने विजयनगर के लोगों को परेशान कर रखा था.  चूहों से छुटकारा पाने की बहुत कोशिशें की गई.   अन्त में इस समस्या के हल के लिए राजा ने घोषणा की कि चूहों को पकडने के लिए प्रत्येक परिवार को एक-एक बिल्ली दी जायेगी.

 

बिल्ली की देखरेख का बोझ लोगों पर न पडे, इसलिये प्रत्येक घर को एक-एक गाय भी दी जाएगी जिससे कि उस गाय का दूध बिल्लियों को पिलाया जा सके.

राजा का यह निर्णय तेनाली राम को पसन्द नहीं आया और राजा को समझाने के लिए उसने एक योजना बनाई.

तेनाली राम अपनी बिल्ली को पीने के लिए प्रतिदिन गर्म दूध देता. बिल्ली जैसे ही दूध पीती उसकी जीभ बुरी तरह जल जाती. इसलिए बिल्ली ने धीरे-धीरे दूध पीना ही छोड दिया.

एक दिन राजा बिल्लियों का निरीक्षण करने के लिए शहर गए.  राजा ने देखा  कि सभी घरों की बिल्लियॉ तो स्वस्थ हैं, परन्तु तेनाली राम की बिल्ली बहुत दुर्बल व पतली है.

 

पूछने पर तेनाली राम बोला, ” यह बिल्ली दूध ही नही पीती.” तेनाली राम की बात की सत्यता जॉचने के लिए राजा के कहने पर बिल्ली को दूध दिया गया, परन्तु सदा की तरह अपनी जली जीभ की याद आते ही वह दूध देख तुरन्त भाग गई.

राजा समझ गए कि अवश्य ही इसमें तेनाली राम की कोई चाल है. इससे अवश्य ही कुछ ऐसा किया है जिससे कि बिल्ली दूध को देखते ही भाग जाती है.

वह क्रोधित होकर अपने सैनिकों से बोले, ” तेनाली को सौ कोडे मारे जाएँ.”

तेनाली राम ने राजा की ओर देखा और बोला, “महाराज, मुझे सौ कोडे मारिए. मुझे इसका कोई दुःख नहीं है, परन्तु मैं यही सोचता हूँ कि जब मनुष्यों को पीने के लिए उपयुक्त मात्रा में दूध उपलब्ध नहीं है, तब बिल्लियों को इस प्रकार दूध पिलाना उचित दै.”

राजा को तुरन्त ही अपनी गलती का एहसास हो गया . उन्होनें तुरन्त आदेश दिया कि गायों के दूध का उपयोग बिल्लियों के बजाय मनुष्यों के लिए किया जाए.

 

 tenali rama story in hindi with moral  story – 9 tenali rama story hindi

 

 

हर वर्ष दशहरे से पूर्व काशी की नाटक-मण्डली विजयनगर आती थी.  सामान्यतः वे राजा कॄष्णदेव राय तथा विजयनगर की प्रजा के लिए रामलीला किया करते थे. परन्तु एक बार राजा को सूचना मिली कि नाटक-मण्डली विजयनगर नहीं आ रही है.

 

इसका कारण यह था कि नाटक-मण्डली के कई सदस्य बीमार हो गए थे.  यह सूचना पाकर राजा बहुत दुःखी हुए क्योंकि दशहरे में अब कुछ ही दिन बाकी थे. इतने कम दिनों में दूसरी नाटक-मण्डली की भी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी.

 

पास में दूसरी कोई नाटक-मण्डली नहीं होने के कारण इस वर्ष रामलीला होने के आसार दिखाई नहीं पड रहे थे. जबकी दशहरे से पूर्व रामलीला होना विजयनगर की पुरानी संस्कॄति थी. महाराज को इस तरह दुःखी देख कर राजगुरु बोले, “महाराज, यदि चाहें तो हम रामपुर के कलाकारों को संदेश भेज सकते हैं?”

 

“परन्तु, इसमें तो कुछ सप्ताह का समय लगेगा.” राजा ने निराश स्वर में कहा.

इस पर तेनाली राम बोले, ” महाराज,मैं पास ही की एक मण्डली को जानता हूँ, वे यहॉ दो दिन में आ जाएँगे और मुझे विश्वास है कि वे रामलीला का अच्छा प्रदशन करेंगे.”

यह सुनकर राजा प्रसन्न हो गए और तेनाली राम को मण्डली को बुलाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई, साथ ही मण्डली के रहने व खाने-पीने की व्यवस्था का भार भी तेनाली के ही सुपुर्द कर दिया गया .

 

शीघ्र ही रामलीला के लिए सारी व्यवस्था होनी शुरु हो गई. रामलीला मैदान को साफ किया गया. एक बडा-सा मंच बनाया गया. नवरात्र के लिए नगर को सजाया गया .

 

रामलीला देखने के लिए लोग बहुत उत्सुक थे क्योंकि इसके पूर्व काशी की नाटक-मण्डली के न आने की सूचना से वे काफी दुःखी थे. परन्तु अब नई नाटक-मण्डली के आने की सूचना से उनका उत्साह् दोगुना हो गया था.

 

महल के निकट एक मेला भी लगाया गया था. कुछ ही दिनों में मण्डली रामलीला के लिए तैयार हो गई. राजा, दरबारी, मंत्री व प्रजा प्रतिदिन रामलीला देखने आते.

 

दशहरे के दिन की अन्तिम कडी तो बहुत ही सराहनीय थी. मण्डली में अधिकतर कलाकार बच्चे थे।.उनकी कलाकारी देखकर लोगों की ऑखों में ऑसू तक आ गये.

 

दशहरे के पश्चात राजा ने कुछ मंत्रियों तथा मण्डली के सदस्यों को महल में भोजन के लिए बुलाया. भोजन के पश्चातराजा ने मण्डली के सदस्यों को पुरस्कार दिया. फिर वे तेनाली राम से बोले, “तुम्हें इतनी अच्छी मण्डली कैसे मिली?”

“बाबापुर से महाराज,” तेनाली राम ने उत्तर दिया

“बाबापुर्! यह कहॉ है? मैने इसके विषय में कभी नहीं सुना.” राजा ने आश्चर्य से पूछा.

“बाबापुर विजयनगर के पास ही है, महाराज.” तेनाली राम बोला.

तेनाली राम की बात सुनकर मण्डली के कलाकार मण्डली के कलाकार मुस्करा दिए. राजा ने उनसे उनके इस प्रकार मुस्कराने का कारण पूछा तो मण्डली का एक छोटा बालक सदस्य बोला, “महाराज, वास्तव में हम लोग विजयनगर से ही आए हैं. तेनाली बाबा ने तीन दिन में हमें ये नाटक करना सिखाया था, इसलिए इसे हम बाबापुर की रामलीला कहते हैं.

यह सुनकर राजा भी खिलखिलाकर हँस पडे. अब उन्हें भी बाबापुर के रहस्य का पता चल गया था.

 

 

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तेनालीराम के कारनामों से राजगुरु बहुत परेशान थे. हर दूसरे-तीसरे दिन उन्हें तेनालीराम के कारण नीचा देखना पड़ता था. वह सारे दरबार में हँसी का पात्र बनता था.

 

उन्होंने सोचा कि यह दुष्ट कई बार महाराज के मृत्युदंड से भी बच निकला है. इससे छुटकारा पाने का केवल एक ही रास्ता है कि मैं स्वयं इसको किसी तरह मार दूँ.

 

उन्होंने मन ही मन एक योजना बनाई. राजगुरु कुछ दिनों के लिए तीर्थयात्रा के बहाने नगर छोड़कर चले गए और एक जाने-माने बहुरुपिए के यहाँ जाकर उससे प्रशिक्षण लेने लगे. कुछ समय में वे बहुरुपिए के सारे करतब दिखाने में कुशल हो गए.

वे बहुरुपिए के वेश में ही वापस नगर चले आए और दरबार में पहुँचे. उन्होंने राजा से कहा कि वे तरह-तरह के करतब दिखा सकते है।.राजा बोले, ‘तुम्हारा सबसे अच्छा स्वांग कौन-सा है?’

बहुरुपिए ने कहा, ‘मैं शेर का स्वांग बहुत अच्छा करता हूँ, महाराज. लेकिन उसमें खतरा है. उसमें कोई घायल भी हो सकता है और मर भी सकता है. इस स्वांग के लिए आपको मुझे एक खून माफ करना पड़ेगा.’

महाराज ने उनकी शर्त मान ली. ‘एक शर्त और है महाराज. मेरे स्वांग के समय तेनालीराम भी दरबार में अवश्य उपस्थित रहे,’ बहुरुपिया बोला. ‘ठीक है, हमें यह शर्त भी स्वीकार है,’ महाराज ने सोचकर उत्तर दिया.

इस शर्त को सुनकर तेनालीराम का माथा ठनका. उसे लगा कि यह अवश्य कोई शत्रु है, जो स्वांग के बहाने मेरी हत्या करना चाहता है. अगले दिन स्वांग होना था. तेनालीराम अपने कपड़ों के नीचे कवच पहनकर आया ताकि अगर कुछ गड़बड़ हो तो वह अपनी रक्षा कर सके. स्वांग शुरू हुआ.

बहुरुपिए की कला का प्रदर्शन देखकर सभी दंग थे. कुछ देर तक उछलकूद करने के बाद अचानक बहुरुपिया तेनालीराम के पास पहुँचा और उस पर झपट पड़ा. तेनालीराम तो पहले से ही तैयार था. उसने धीरे से अपने हथनखे से उस पर वार किया. तिलमिलाता हुआ बहुरुपिया उछलकर जमीन पर गिर पड़ा.

तेनालीराम पर हुए आक्रमण से राजा भी एकदम घबरा गए थे. कहीं तेनालीराम को कुछ हो जाता तो? उन्हें बहुरुपिए की शर्तों का ध्यान आया. एक खून की माफी और तेनालीराम के दरबार में उपस्थित रहने की शर्त. अवश्य दाल में कुछ काला है.

उन्होंने तेनालीराम को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘तुम ठीक हो ना? घाव तो नहीं हुआ?’ तेनालीराम ने महाराज को कवच दिखा दिया. उसे एक खरोंच भी न आई थी. महाराज ने पूछा, ‘क्या तुम्हें इस व्यक्ति पर संदेह था, जो तुम कवच पहनकर आए हो?’

‘महाराज, अगर इसकी नीयत साफ होती तो यह दरबार में मेरे उपस्थित रहने की शर्त न रखता,’ तेनालीराम ने कहा।.महाराज बोले, ‘इस दुष्ट को मैं दंड देना चाहता हूँ.

 

इसने तुम्हारे प्राण लेने का प्रयत्न किया है. मैं इसे अभी फाँसी का दंड दे सकता हूँ लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम स्वयं इससे बदला लो.’

‘जी हाँ, मैं स्वयं ही इसको मजा चखाऊँगा.’ तेनालीराम गंभीरता से बोला. ‘वह कैसे?’ महाराज ने पूछा. ‘बस आप देखते जाइए’, तेनालीराम ने उत्तर दिया.

फिर तेनालीराम ने बहुरुपिए से कहा, ‘महाराज, तुम्हारी कला से बहुत प्रसन्न हैं. वह चाहते हैं कि कल तुम सती स्त्री का स्वांग दिखाओ. अगर उसमें तुम सफल हो गए तो महाराज की ओर से तुम्हें पुरस्कार के रूप में पाँच हजार स्वर्णमुद्राएँ भेंट की जाएँगी.’

बहुरुपिए के वेश में छिपे राजगुरु ने मन ही मन कहा कि इस बार तो बुरे फँसे, लेकिन अब स्वांग दिखाए बिना चारा भी क्या था? तेनालीराम ने एक कुंड बनवाया. उसमें बहुत-सी लकड़ियाँ जलवा दी गईं. वैद्य भी बुलवा लिए गए कि शायद तुरंत उपचार की आवश्यकता पड़े.

बहुरुपिया सती का वेश बनाकर पहुँचा. उसका पहनावा इतना सुंदर था कि कोई कह नहीं सकता था कि वह असली स्त्री नहीं है. आखिर उसे जलते कुंड में बैठना ही पड़ा.

 

कुछ पलों में ही लपटों में उसका सारा शरीर झुलसने लगा. तेनालीराम से यह देखा न गया. उसे दया आ गई. उसने बहुरुपिए को कुंड से बाहर निकलवाया. राजगुरु ने एकदम अपना असली रूप प्रकट कर दिया और तेनालीराम से क्षमा माँगने लगे.

 

तेनालीराम ने हँसते हुए उसे क्षमा कर दिया और उपचार के लिए वैद्यों को सौंप दिया. कुछ ही दिनों में राजगुरु स्वस्थ हो गया. उसने तेनालीराम से कहा, ‘आज के बाद मैं कभी तुम्हारे लिए मन में शत्रुता नहीं लाऊँगा. तुम्हारी उदारता ने मुझे जीत लिया है. आज से हमें दोनों अच्छे मित्र की तरह रहेंगे.’

तेनालीराम ने राजगुरु को गले लगा लिया. उसके बाद तेनालीराम और राजगुरु में कभी मनमुटाव नहीं हुआ.

 

 

tenali rama story hindi story story 11 पाप का प्रायश्चित tenali rama story hindi

 

तेनाली राम ने जिस कुत्ते की दुम सीधी कर दी थी, वह बेचारा कमजोरी की वजह से एक-दो दिन में मर गया. उसके बाद अचानक तेनाली राम को जोरों का बुखार आ गया.

 

एक पंडित ने घोषणा कर दी कि तेनाली राम को अपने पाप का प्रायश्चित करना पड़ेगा नहीं तो उन्हें इस रोग से छुटकारा नहीं मिल पाएगा.तेनाली राम ने पंडित से इस पूजा में आने वाले खर्च के बारे में पूछा। पंडित जी ने उन्हें सौ स्वर्ण मुद्राओं का खर्च बताया.

“लेकिन इतनी स्वर्ण मुद्राएं मैं कहां से लाऊंगा?”, तेनाली राम ने पंडित जी से पूछा.

पंडित जी ने कहा, “तुम्हारे पास जो घोड़ा है, उसे बेचने से जो रकम मिले वह तुम मुझे दे देना.”

तेनाली राम ने शर्त स्वीकार कर ली. पंडित जी ने पूजा पाठ करके तेनाली राम के ठीक होने की प्रार्थना की. कुछ दिनों में तेनाली राम बिल्कुल स्वस्थ हो गए.

लेकिन वह जानते थे  कि वह प्रार्थना के असर से ठीक नहीं हुए हैं, बल्कि दवा के असर से ठीक हुए हैं.

तेनाली राम पंडित जी को साथ लेकर बाजार गए. उनके एक हाथ में घोड़े की लगाम थी और दूसरे में एक टोकरी.

उन्होंने बाजार में घोड़े की कीमत एक आना बताई और कहा, “जो भी इस घोड़े को खरीदना चाहता है, उसे यह टोकरी भी लेनी पड़ेगी, जिसका मूल्य है एक सौ स्वर्ण मुद्राएं.”

इस कीमत पर वे दोनों चीजें एक आदमी ने झट से खरीद लीं. तेनाली राम ने पंडित जी की हथेली पर एक आना रख दिया, जो घोड़े की कीमत के रूप में उसे मिला था. एक सौ स्वर्ण मुद्राएं उन्होंने अपनी जेब में डाल ली और चलते बने. पंडित जी कभी अपनी हथेली पर पड़े सिक्के को तो कभी जाते हुए तेनाली राम को देख रहे थे.

 

tenali rama story hindi story स्टोरी १२ परियों से भेंट 

 

एक बार विजयनगर के राज दरबार में एक यात्री राजा कॄष्णदेव राय से मिलने के लिए आया. पहरेदारों ने राजा को उसके आने की सूचना दी. राजा ने यात्री को उनसे मिलने की आज्ञा दे दी.

 

यात्री बहुत ही लम्बा व पतला था. उसका सारा शरीर नीला था. वह राजा के सामने सीधा खडा होकर बोला, “महाराज, मैं नीलदेश का नीलकेतु हूँ और इस समय मैं विश्व-भ्रमण पर निकला हुआ हूँ.

 

अनेक देशों की यात्रा करते हुए मैं यहॉ पहुँचा हूँ.  घूमते हुए मैंने अनेक देशों में विजय नगर और आपके न्यायपूर्ण शासन व उदार स्वाभाव के बारे मैं बहुत कुछ सुना.

 

अतः मेरे मन मैं विजय नगर और आपको देखने व जानने की उत्सुकता और भी बढ गई. इसीलिए मैं आपसे मिलने व विजय नगर साम्राज्य को देखने की अभिलाषा से यहॉ आया हूँ.”

राजा ने यात्री का स्वागत किया और उसे शाही अतिथि घोषित किया. राजा द्वारा मिले आदर व सत्कार से गदगद होकर यात्री बोला, “महाराज, मैं उस स्थान के विषय में जानता हूँ, जहॉ परियॉ रहती हैं. मैं आपके सामने अपनी जादुई शक्ति से उन्हें बुला सकता हूँ.”

यह सुनकर राजा बहुत उत्सुक हो गए और बोले, “इसके लिए मुझे क्या करना होगा, नीलकेतु?”

“महाराज, इसके लिए आपको नगर के बाहर स्थित तालाब के किनारे मध्यरात्री को अकेले आना होगा. तब मैं वहॉ परियों को नॄत्य के लिए बुला सकता हूँ.” नीलकेतु ने उत्तर दिया.

राजा उसकी बात मान गए.  उसी रात मध्यरात्रि में राजा अपने घोडे पर सवार होकर तालाब की ओर चल दिए. वहॉ पुराने किले से घिरा हुआ एक बहुत बडा तालाब था .

राजा के वहॉ पहुँचने पर नीलकेतु पुराने किले से बाहर निकला और बोला, “स्वागत है महाराज, आपका स्वागत है. मैंने सारी व्यवस्था कर दी है और पहले से ही परियों को यहॉ बुला लिया है. वे सभी किले के अन्दर हैं और शीघ्र ही आपके लिए नॄत्य करेंगी.”

यह सुनकर राजा चकित हो गए. उन्होंने कहा था कि मेरी उपस्थिति में परियों को बुलाओगे?”

“यदि महाराज की यही इच्छा है तो मैं फिर से कुछ परियों को बुला दूँगा. अब अन्दर चला जाए .” नीलकेतु बोला. राजा, नीलकेतु के साथ जाने के लिए घोडे से उतर गए. जैसे ही वह आगे बढे, उन्होने ताली की आवाज सुनी. शीघ्र ही उन्हे विजयनगर की सेना ने नीलकेतु को भी पकडकर बेडियों से बॉध दिया.

“यह सब क्या है और यह हो क्या रहा है?” राजा ने आश्चर्य से पूछा.

तभी तेनाली राम पेड के पीछे से निकला और बोला, “महाराज, मैं आपको बताता हूँ कि यह सब क्या हो रहा है? यह नीलकेतु हमारे पडोसी देश् का रक्षा मंत्री हैं . किले के अन्दर कोई परियॉ नहीं हैं. वास्तव में, इसके देश के सिपाही ही वहॉ परियों के रूप में छिपे हुए हैं अपने नकली परों में उन्होंने अपने हथियार छिपाए हुए हैं. यह सब आपको घेरकर मारने की योजना है.”

“तेनाली राम, एक बार फिर मेरे प्राणो की रक्षा के लिए तुम्हें धन्यवाद.  परन्तु, यह बतओ कि तुम्हें यह सब पता कैसे चला?” राजा बोले. तेनाली राम ने उत्तर दिया, “महाराज जब यह नीलकेतु दरबार में आया था, तो इसने अपने शरीर को नीले रंग से रंगा हुआ था .

 

परन्तु यह जानकर कि विजयनगर का दरबार बुद्धिमान दरबारियों से भरा हुआ है, यह घबरा गया तथा पसीने-पसीने हो गया. पसीने के कारण इसके शरीर के कई अगो पर से नीला रंग हट गया तथा इसके शरीर का वास्तविक रंग दिखाई देने लगा. मैंने अपने सेवकों को इसका पीचा करने के लिए कहा . उन्होंने पाया कि ये सब यहॉ आपको मारने की योजना बना रहे हैं.” राजा तेनाली राम की सतर्कता से प्रभावित हुए और उसे पुनः धन्यवाद दिया .

 

 

tenali rama story hindi story    स्टोरी १३ 

 

एक बार राजा कृष्णदेव राय के राज्य विजयनगर में लगातार चोरी होनी शुरू हुई. सेठों ने आकर राजा के दरबार में दुहाई दी, “महाराज हम लुट गए बरबाद हो गए. रात को ताला तोड़कर चोर हमारी तिजोरी का सारा धन उड़ा ले गए.”

 

राजा कृष्णदेव राय ने इन घटनाओं की जांच कोतवाल से करवाई, पर कुछ भी हाथ नहीं लगा. वह बहुत चिंतित हुए. चोरी की घटनाएं होती रही. चोरों की हिम्मत बढ़ती जा रही थी.

अंत में राजा ने दरबारियों को लताड़ते हुए कहा, “क्या आप में से कोई भी ऐसा नहीं जो चोरों को पकड़वाने की जिम्मेदारी ले सके?” सारे दरबारी एक दूसरे का मुंह देखने लगे. तेनालीराम ने उठ कर कहा, “महाराज यह जिम्मेदारी मैं लूंगा.”

वहां से उठकर तेनालीराम नगर के एक प्रमुख जौहरी के यहां गया.  उसने अपनी योजना उसे बताई और घर लौट गया.  उस जौहरी ने अगले दिन अपने यहां आभूषणों की एक बड़ी प्रदर्शनी लगवाई.  रात होने पर उसने सारे आभूषणों को एक तिजोरी में रख कर ताला लगा दिया.

आधी रात को चोर आ धमके. ताला तोड़कर तिजोरी में रखे सारे आभूषण थैले में डालकर वे बाहर आए. जैसे ही वे सेठ की हवेली से बाहर जाने लगे सेठ को पता चल गया, उसने शोर मचा दिया.

आस-पास के लोग भी आ जुटे. तेनालीराम भी अपने सिपाहियों के साथ वहां आ धमके और बोले, “जिनके हाथों में रंग लगा हुआ है, उन्हें पकड़ लो।” जल्द ही सारे चोर पकड़े गए. अगले दिन चोरों को दरबार में पेश किया गया. सभी के हाथों पर लगे रंग देखकर राजा ने पूछा, “तेनालीराम जी यह क्या है?”

“महाराज हमने तिजोरी पर गीला रंग लगा दिया था, ताकि चोरी के इरादे से आए चोरों के शरीर पर रंग चढ़ जाए और हम उन्हें आसानी से पकड़ सकें .”

 

राजा ने पूछा, “पर आप वहां सिपाहियों को तैनात कर सकते थे.”

“महाराज इसमें उनके चोरों से मिल जाने की सम्भावना थी.”

राजा कृष्णदेव राय ने तेनाली राम की खूब प्रशंसा की.

 

 

tenali rama story hindi story    Story – 14 

 

शाही नाई का कार्य प्रतिदिन राजा कॄष्णदेव राय की दाढी बनाना था. एक दिन, जब वह दाढी बनाने के लिए आया तो राजा कॄष्णदेव राय सोए हुए थे. नाई ने सोते हुए ही उनकी दाढी बना दी.

 

उठने पर राजा ने सोते हुए दाढी बनाने पर नाई की बहुत प्रशंसा की. राजा उससे बहुत प्रसन्न हुए और उसे इच्छानुसार कुछ भी मॉगने को कहा. इस पर नाई बोला, “महाराज, मैं आपके शाही दरबार का दरबारी बनना चाहता हूँ.”

 

राजा नाई की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हो गए। नाई की उच्च नियुक्ति का समाचार जैसे ही चारों ओर फैला, अन्य दरबारी यह सुनकर व्याकुल हो गए. सभी ने सोचा कि अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बनकर अपने पद का दुरुपयोग कर सकता है. सभी दरबारी समस्या के समाधान के लिए तेनाली राम के पास पहूँचे. तेनाली राम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया.

 

अगली सुबह राजा नदी किनारे सैर के लिए गए.  वहॉ उन्होंने तेनाली राम को एक काले कुत्ते को जोर से रगड-रगड कर नहलाते हुए देखा तो हैरान हो गए.  राजा द्वारा कारण पूछने पर तेनाली राम ने बताया, “महाराज, मैं इसे गोरा बनाना चाहता हूँ .”

राजा ने हँसते हुए पूछा, “क्या नहलाने से काला कुत्ता गोरा हो जाएगा?”

“महाराज, जब एक अज्ञानी व्यक्ति दरबारी बन सकता है तो यह भी गोरा हो सकता है .” तेनाली राम ने उत्तर दिया.

यह सुनकर राजा तुरन्त समझ गए कि तेनाली राम क्या कहना चाहता है. उसी दिन राजा ने दरबार में नाई को पुनः उसका वही स्थान दिया, जिसके लिए वह उपयुक्त था.

 

 

tenali rama story hindi story  story 15 

 

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय होली का त्योहार बड़ी धूम-धाम से मनाते थे. इस अवसर पर हास्य-मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे. हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था.

 

सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था. कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम सब का मनोरंजन करते थे. वह बहुत तेज दिमाग के थे.

 

उन्हें हर साल का सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था, ‘महामूर्ख’ का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते. दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे. उन्होंने एक बार मिलकर तेनालीराम को हराने की युक्ति निकाली

इस बार होली के दिन उन्होंने तेनालीराम को खूब छककर भंग पिलवा दी.  होली के दिन तेनालीराम भंग के नशे में देर तक सोते रहे.  उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी.  वह भागते हुए दरबार पहुंचे. आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे.

कृष्णदेव राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, “अरे मूर्ख तेनालीराम जी, आज के दिन भी भंग पीकर सो गए?”

राजा ने तेनालीराम को मूर्ख कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए.  उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, “आपने बिल्कुल ठीक कहा, तेनालीराम मूर्ख ही नहीं महामूर्ख है.”

जब तेनालीराम ने सब के मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, “धन्यवाद महाराज, आपने अपने मुंह से मुझे महामूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया.”

तेनालीराम की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे? क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से तेनालीराम को महामूर्ख ठहरा चुके थे. हर साल की तरह इस साल भी तेनालीराम ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार जीत ले गए.

 

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Abhishek Pandey

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