Thumbelina Story in Hindi Written / राजकुमारी थंबलीना की कहानी हिंदी में।

Thumbelina Story in Hindi Written / राजकुमारी थंबलीना की कहानी हिंदी में।

 

Thumbelina Story in Hindi Written  एक औरत अकेली रहती थी।  उसे हमेशा से एक बच्ची की चाहत थी, जिसके साथ वह खेले, लाड – प्यार करे।

 

 

 

उसने एक दिन अपनी यह बात अपनी परी सहेली से कही।  परी उसकी बात ध्यान से सुनी।  उसके बाद उसने एक फूल का बीज उस औरत को देते हुए बोला, ” यह बीज लो और उसे गमले में उगा दो।  ”

 

 

 

इस पर महिला पारी की तरफ आश्चर्य से देखते हुए कहा, ” इस फूल के बीज का बच्ची से क्या सम्बन्ध है? मुझे तो एक बच्ची चाहिए थी।  ” तब परी ने कहा, ” धीरज रखो और जैसा मैंने कहा वैसा करो।  सब अच्छा होगा।  ”

 

 

 

इसके महिला घर आइए और परी के कहेनुसार उस फूल के बीज को गमले में बो दिया।  समय बीता और एक दिन उसने देखा कि उस बीज से एक पौधा निकला।

 

 

 

महिला उस पौधे की सेवा करने लगी।  समय आने पर उसमें कली निकली।  एक दिन उस महिला ने देखा कि वह कली एक सुन्दर फूल बन गयी थी।

 

 

Thumbelina Story in Hindi थंबलीना की कहानी हिंदी में

 

 

 

फूल बहुत ही खूबसूरत था।  लेकिन उसकी पंखुडिया बंद थीं।  वह औरत उस फूल से प्यार करने लगी कि अचानक पखुड़िया खुलीं और उस महिला ने देखा कि उसमें एक प्यारी  सी  छोटी सी खूबसूरत लड़की बैठी हुई थी।  वह परियों की तरह खूबसूरत थी।

 

 

 

उस महिला ने उसका नाम थंबलीना रखा और उसे बड़े ही लाड – प्यार से पालने लगी।  थंबलीना बड़ी खुश थी।  वह अपनी दुनिया में मग्न थी। वह मधुर गीत जाती और खुश रहती।

 

 

 

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एक दिन की बात है जब छोटी सी थंबलीना सो रही थी तभी एक बदमाश मेंढक उसे घूरने लगा। बदमाश मेंढक से सोचा, ” इतनी खूबसूरत लड़की की शादी अगर मेरे लडके से हो जाए तो कितनी अच्छी बात होगी? ”

 

 

 

उसने यह विचार कर थंबलीना को विस्तर के साथ उठाकर अपने घर एक नदी  में ले गया।  तब उसका लड़का भी कहीं से घूमकर पहुँच गया।  मेंढक ने अपने लडके से पूछा, ” इस लड़की से शादी करेगा।  ”

 

 

 

मेंढक का लड़का ख़ुशी से उछलते हुआ बोला, ” जरूर पापा।  ” उनकी इस बातचीत की वजह से थंबलीना की नींद टूट गयी।  उसने अपने अगल बगल मेंढक को देखा और अनजानी जगह देख जोर – जोर से चिल्लाने लगी।

 

 

 

मेंढक ने थंबलीना को नदी  के बीचोबीच एक पत्ते पर रख दिया।  थंबलीना असहाय होकर मदद की गुहार लगाने लगी।  मेंढक की सारी हरकत कुछ मछलियों ने सुन ली थी।

 

 

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उनसे थंबलीना का दुःख देखा नहीं गया।  उन्होंने उस पत्ते की जड़ को चबाकर काट दिया और इस तरह पत्ता आज़ाद होकर पानी पर तैरने लगा।  थंबलीना नदी के ढेर सारे खूबसूरत जगहों से गुजरते हुए आगे बढ़ने लगी कि तभी एक भौरे की नज़र उस पर पड़ गयी।

 

 

 

भौंरा उसे उठाकर एक पेड़ पर ले गया।  वहाँ उसने अपने सभी दोस्तों को उससे मिलवाया।  सभी दोस्तों ने एक मत होकर कहा, ” यह तो एकदम अलग और बदसूरत है।  यह हमारी प्रजाति की नहीं है।  क्या तुम इसके साथ रहोगे? ”

 

 

 

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जब भौरे के सभी दोस्तों ने एक ही बात कही तो भौंरा नाराज हो गया और थंबलीना को जमीन पर फेंक दिया। थंबलीना जंगल में अकेले रहने लगी।  जो कुछ मिलता उसे खाती और कभी नदी तो कभी फूलों पर जमी हुई ओस को पानी की जगह पीती।

 

 

 

मौसम बदला और सर्दी का मौसम आ गया। कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी।  थंबलीना ठण्ड से बुरी तरह कांपती हुई सोचने लगी, ” मुझे जल्द ही कोई घर या छोटी गुफा ढूंढनी होगी, अन्यथा ठण्ड से मेरी मृत्यु हो सकती है।

 

 

 

वह जंगल में इधर – उधर गुफा ढूंढने लगी।  तभी उसे एक छोटा सा घर दिखा।  उसने मन ही मन सोचा, ” जरूर यह किसी चूहे का घर है। मुझे इससे मदद मांगनी चाहिए।  चूहा जरूर ही मदद करेगा।  ”

 

 

 

थंबलीना ने दरवाजा खटखटाया और चूहे से मदद मांगी। चूहा सहर्ष तैयार हो गया।  उसने थंबलीना को खाने के लिए फल दिए और कहा, ” बाहर बहुत ठण्ड है।  अगर तुम चाहो तो यहां पुरे सर्दी के मौसम तक रुक सकती हो।  ”

 

 

Thumbelina Story in Hindi Written in Short 

 

 

 

थंबलीना मान गयी।  अगले दिन चूहे ने कहा, ” चलो घर को मिलकर साफ़ करते हैं।  आज मेरा सबसे प्रिय दोस्त आने वाला है।  ”

 

 

 

” दोस्त? ” क्या वह भी चूहा है ? थंबलीना ने कहा।

 

 

 

” अरे नहीं, वह तो बहुत ही अमीर है।  उसका अपना घर है।  वह भेड़ियों का सरदार है।  ” चूहे ने कहा।  तय समय पर जब भेड़ियों सरदार चूहे के घर के पास आय्या तभी एक चिड़िया ठण्ड की वजह से पेड़ से गिर पड़ी।

 

 

इससे भेड़िया बहुत क्रोधित हुआ और उसे मारने लगा।  यह देख थंबलीना बहुत दुखी हुई और मन ही मन सोचने लगी, ” कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है।  ”

 

 

 

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वह उस चिड़िया को लेकर चूहे के घर से निकल गयी।  थोड़ी दूर चलने पर उसे एक छोटी सी गुफा नजर आयी।  वहाँ उसने उस चिड़िया की सेवा की।  कुछ समय में वह चिड़िया स्वस्थ हो गयी।  उसने थंबलीना का धन्यवाद किया और उसके जंगल में रहने का कारण पूछा।

 

 

 

थंबलीना ने पूरी कहानी बता दी।  चिड़िया बड़ी दुखी हुई।  उसने थंबलीना से कहा, ” क्या तुम मेरे घर चलना पसंद करोगी।  वह बहुत ही खूबसूरत जगह है।  वहाँ फूलों के बगीचे भी हैं। ”

 

 

 

थंबलीना खुश हो गयी।  वह तैयार हो गयी।  वह चिड़िया के घर रहने लगी।  एक दिन की बात है थंबलीना पेड़ की डाली पर सोई हुई थी।  तभी वहाँ फूलों का राजकुमार आया और उसने सोई हुई थंबलीना को देखा और उसपर मोहित हो गया।

 

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तब तक थंबलीना की भी नींद खुल गई।  राजकुमार चौंक गैया और पीछे हट गया।  थंबलीना मुस्कुराने लगी।  तभी चिड़िया भी वहाँ आ पहुंची।  वह सब समझ गयी।

 

 

 

उसने उसी समय थंबलीना से पूछा, ” क्या तुम्हे राजकुमार पसंद हैं? ” थंबलीना ने हाँ कह दिया और उसके बाद राजकुमार ने भी हाँ कह दिया।  दोनों की शादी हो गयी और दोनों ही ख़ुशी से रहने लगे।

 

 

2- एक भिखारी किसी स्टेशन पर पेन्सिल  से भरा कटोरा लेकर बैठा हुआ था.  एक युवा व्यवसायी उधर से गुजरा और उसने कटोरे में  50 रूपये डाल दिया, लेकिन उसने कोई पेन्सिल नहीं  ली.

 

 

उसके बाद वह ट्रेन में  बैठ गया.  डिब्बे का दरवाजा बंद  होने ही वाला था कि व्यवसायी  एकाएक ट्रेन से उतर कर भिखारी के पास लौटा और कुछ पेन्सिल  उठा कर बोला, “मैं कुछ पेन्सिल लूँगा.  इन पेंसिलों की कीमत है, आखिरकार तुम एक व्यापारी हो और मैं  भी.” उसके बाद वह युवा तेजी से ट्रेन में  चढ़ गया.

 

 

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कुछ वर्षों बाद, वह व्यवसायी एक पार्टी में गया.  वह भिखारी भी वहाँ मौजूद था. भिखारी नेँ उस व्यवसायी को देखते ही पहचान लिया, वह उसके पास जाकर बोला-” आप शायद मुझे नहीं पहचान रहे है, लेकिन मैं  आपको पहचानता हूँ.”

 

 

उसके बाद उसने  उसके साथ घटी उस घटना का जिक्र किया.  व्यवसायी  ने  कहा-” तुम्हारे याद दिलाने  पर मुझे याद आ रहा है कि तुम भीख मांग रहे थे.  लेकिन तुम यहाँ सूट और टाई मेँ क्या कर रहे हो?”

 

 

भिखारी ने  जवाब दिया, ” आपको शायद मालूम नहीं  है कि आपने  मेरे लिए उस दिन क्या किया.  मुझे पर दया करने की बजाय मेरे साथ सम्मान के साथ पेश आये. आपने कटोरे से पेन्सिल  उठाकर कहा, ‘इनकी कीमत है, आखिरकार तुम भी एक व्यापारी हो और मैं  भी’

 

 

आपके जाने के बाद मैं  बहूत सोचा,  मैं  यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैं  भीख क्यों मांग  रहा हूँ? मैंने अपनी जिंदगी  को सवारने  के लिये कुछ अच्छा काम करने  का फैसला लिया.

 

 

 

Thumbelina Story in Hindi Fairy Tales

 

 

 

मैंने  अपना थैला उठाया और घूम-घूम कर पेंसिल बेचने लगा . फिर धीरे -धीरे मेरा व्यापार बढ़ता गया , मैं कॉपी – किताब एवं अन्य चीजें भी बेचने लगा और आज पूरे शहर में मैं इन चीजों का सबसे बड़ा थोक विक्रेता हूँ.

 

 

मुझे मेरा सम्मान लौटाने के लिये मैं  आपका तहेदिल से धन्यवाद देता हूँ क्योंकि उस घटना  ने आज मेरा जीवन ही बदल दिया .”

 

 

मित्रों , जब आप अपने बारे में  क्या सोचते है? खुद के लिये आप क्या राय खुद पर जाहिर करते हैं ? क्या आप अपनेँ आपको ठीक तरह से समझ पाते हैँ ? इन सारी चीजों  को ही हम आत्मसम्मान कहते हैं.

 

 

 

दुसरे लोग हमारे बारे में  क्या सोचते हैं  ये बाते उतनी मायने नहीं  रखती या कहें  तो कुछ भी मायने नहीं  रखती लेकिन आप अपने बारे में क्या राय जाहिर करते हैं , क्या सोचते हैं  ये बात बहूत ही ज्यादा मायने  रखती है.

 

 

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याद रखें  कि आत्म-सम्मान की वजह से ही हमारे अंदर प्रेरणा पैदा होती है या कहें  तो हम आत्मप्रेरित होते हैं.  इसलिए आवश्यक है कि हम अपने बारे में एक श्रेष्ठ राय बनाएं और आत्मसम्मान से पूर्ण जीवन जीएं.

 

 

 

3- एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा-‘गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि  जीवन एक संघर्ष है,कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं .  इनमें कौन सही है?’

 

 

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-‘पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है.  जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं. मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं .

 

 

Thumbelina Story in Hindi Kahani

 

 

’यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था.  गुरु जी को इसका आभास हो गया .वे कहने लगे-‘लो,तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ.    ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे .’

 

 

 

उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-   एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में  उनसे क्या चाहिए .

 

 

गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए.  ला सकोगे?’

 

 

वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे .सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं. वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा .’

 

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अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे . लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं . उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा .

 

 

थंबलीना की कहानी बताएं 

 

 

वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया .वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे .

 

 

 

अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था .

 

 

अब वे तीनों पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके .

 

 

 

वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे .

 

 

थंबलीना की कहानी बताइए / Thumbelina Story in Hindi Written 

 

 

लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ  नहीं  दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की औषधियां  बनाया करती थी .

 

 

 

अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये . गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रों  ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया .

 

 

गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये . हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं .

 

 

’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं.  मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो .’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये .

 

 

वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था  अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं .

 

 

आप का  संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?

 

 

चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है . ’गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके .

 

 

 

दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम  निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें .’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था .

 

 

 

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