Hindi Kahani

तिरस्कार

तीन गुरु मोरल स्टोरी
Written by Hindibeststory

तिरस्कार वंश बेल तो लड़को से ही बढती है…..सदियों से निरंतर चलती आ रही इस सोच से बूढी मालती भी मुक्त नहीं हो पायी थी. जब उसकी बहु विमला ने बेटी को जन्म दिया तो उसे बड़ी ही निराशा हुई..लेकिन उसने खुद को यह कहते हुए समझा लिया कि अभी कोई देरी नहीं हुई है. अपनी इस इच्छा को मालती ने जिद में बदल लिया. बहु दूसरी बार गर्भवती हो उसके पहले उसने पुजारी से ताबीज बनवाकर बहु और बेटे को पहना दिया. डाक्टर्स के मना करने पर भी उसने बहु सी व्रत भी करवाए और खुद भी कई सारे व्रत किया. लेकिन  शायद प्रकृति ने भी जिद कर रखी थी…इस बार भी बेटी का ही जन्म हुआ.

इधर बेटी का जन्म हुआ और उधर मालती का भगवान,पूजा, पाठ से विश्वास ही उठ गया. अब उसकी जिद नफ़रत में बदल गयी थी. लेकिन वह जीतनी नफ़रत अपनी पोती धनलक्ष्मी से करती…..धनलक्ष्मी उतना ही अपनी दादी से प्यार करती…..मालती उसे अपने से दूर रखने का लेकिन जब तक धनलक्ष्मी उसके गोद में ना आ जाए..वह चुप ही न होती थी.इससे मालती और भी चिढती थी.

धीरे धीरे समय बीता और धनलक्ष्मी बड़ी होनी लगी…और उसकी साथ ही उसका नटखटपना भी बढ़ने लगा. …..वह हर बात पर जिद करती और अपनी दादी से ही उसे पूरा करवाने का भरपूर प्रयास करती…..हांलाकि यह बात अलग है कि वह अपने ज्यादातर प्रयासों में असफल ही रहती….उसकी इन हरकतों से तंग आकर मालती ने उसका नाम डायन रख दिया था. 

विमला तीसरी बार गर्भवती हुई…..इस बार मालती ने ना कोई मन्नत मांगी..ना कोई पूजा पाठ करवाए..यहां तक की बहु को ज्यादा आराम भी दिया…..लेकिन इस बार चमत्कार हो गया….विमला ने पुत्र को जन्म दिया….आज तो मालती मानो ख़ुशी से पागल हो गयी थी….उसने खुद भाग भागकर पुरे गाँव में यह खबर दी…..आज पहली बार मालती ने धनलक्ष्मी को प्यार से देखा….पुरे गांव को दावत दी गयी…सब कुछ अच्छे से चलने लगा…लेकिन धनलक्ष्मी के प्रति मालती का व्यवहार उस दिन के अतिरिक्त कभी नहीं बदला.

वह अपने पोते सुकेस धनलक्ष्मी से दूर ही रखती थी…ठण्ड अपने बचपन में थी….गुनगुनी धूप खिली थी. विमला और उसका पति थोड़ी ही दूर खेतों में कुछ काम करने गए थे. मालती ने सुकेस को बाहर चादर बिछाकर लिटा दिया था और वह उसके लिए दूध लेने चली गयी…तभी बगल में मौजूद झाड़ियों में कुछ सरसराहट की आवाज को सुनकर पास में खेल रही धनलक्ष्मी की नजर उस पर पड़ी…..उसने देखा कि एक नाग सुकेस की ओर बढ़ रहा है….धनलक्ष्मी ने आव देखा ना ताव तुरंत ही उस सर्प को वहाँ पास में पड़ी एक लकड़ी से भगानी लगी….लेकिन एक छोटी सी नादान बच्ची उस नाग को कब तक रोक सकती थी…सांप से उसे डंस लिया और उसके पैरों से लिपट गया…..तब तक मालती वहां पहुंची और यह दृश्य देखकर उसकी चीख निकल गयी…उसकी चीख सुनकर आस पास के लोग और खेतों में काम कर रहे मालती के बहु और बेटे भी दौड कर वहा पहुँच गए. तब तक धनलक्ष्मी बेहोश हो चुकी थी….सभी लोग उसे लेकर पास के दवाखाने भागे.

यह मर चुकी है…..डाक्टर ने उसकी नब्ज को टटोलकर देखने के बाद कहा 

ऐसे कैसे मर सकती है…..नहीं..डाक्टर आप झूट बोल रहे हैं….हे भगवान क्या हो गया…..मैंने कभी भी उसे प्यार से नहीं देखा….उससे दो शब्द भी प्यार से नहीं बोले….जिस सुकेस को उससे छुपाती रही कि डायन है खा जायेगी..आज उसी सुकेस को बचाने के लिए उसने अपनी जान दांव पर लगा दी…..मालती के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे….रोते हुए बडबडाती जा रही थी…..हमेशा मैंने उसका तिरस्कार किया….उसके जगह मुझे मर जाना चाहिए था …आज धनलक्ष्मी के  प्रति सारी  कड़वाहट उसके आंसुओ के साथ बह निकली…….लेकिन अब क्या अब तो सब कुछ खत्म हो चुका था….वाह रे नसीब …..हमेशा तिरस्कार सहती बिटिया मरने के बाद प्यार पा रही थी.

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